अंतर्राष्ट्रीय संबंध
बहुपक्षीय शासन व्यवस्था में अमेरिका की घटती भागीदारी
प्रिलिम्स के लिये: नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC), पेरिस समझौता 2015, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC), संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO), संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना के लिये गठबंधन (CDRI), कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) 2023 और लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR)।
मेन्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और समझौतों से अमेरिका की वापसी के प्रभाव तथा इन चुनौतियों से निपटने के लिये भारत द्वारा उठाए जाने वाले कदम।
चर्चा में क्यों?
अमेरिका ने “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण के अंतर्गत राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए 66 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, जिसमें से 31 संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ के निकाय हैं, से स्वयं को अलग कर लिया है। यह स्थिति पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन के दौरान की गई समान प्रकार की वापसियों की पुनरावृत्ति को प्रतिबिंबित करती है।
- UNFCCC जैसे प्रमुख जलवायु संगठनों से पीछे हटकर अमेरिका वैश्विक जलवायु शासन को कमज़ोर करने तथा विकासशील देशों के लिये जलवायु वित्तपोषण को सीमित करने का जोखिम उत्पन्न कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय निकायों में अमेरिका की घटती भागीदारी के संभावित परिणाम क्या होंगे?
- भू-राजनीतिक और रणनीतिक शून्यता की स्थिति: चीन ने संयुक्त राष्ट्र के तकनीकी निकायों (ITU , FAO , ICAO) में अपनी उपस्थिति को व्यवस्थित रूप से बढ़ाया है। अमेरिका के हटने से न केवल विश्व के एक भाग की अभिव्यक्ति प्रभावित होगी बल्कि एक प्रतिसंतुलनकारी वीटो शक्ति अस्तित्वहीन हो जाएगी।
- ऐतिहासिक रूप से, इसी तरह की कार्रवाइयों, जैसे- वर्ष 2017 में यूनेस्को से अमेरिका की वापसी, जो कि बाद में पुनः इससे जुड़ गया, के कारण इस संगठन को 22% की फंडिंग की हानि हुई थी।
- जलवायु शासन और वित्तपोषण: UNFCCC से हटने से अमेरिका, जो कि सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक (जो ऐतिहासिक रूप से लगभग 24% CO₂ उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार) है, कानूनी रूप से जलवायु संधि से बाहर हो जाएगा, जिससे COP के नियमों को निर्धारित करने में उसकी औपचारिक भूमिका समाप्त हो जाएगी। इस कदम से उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी हानि पहुँचेगी, जिससे अन्य असंबंधित क्षेत्रों में अमेरिका के हित प्रभावित होंगे।
- इसके अतिरिक्त, यह कदम अन्य अनिच्छुक सरकारों को भी पीछे हटने का बहाना प्रदान कर सकता है तथा विकासशील देशों के रुख को कठोर बना सकता है, जो इसे वर्तमान प्रमुख उत्सर्जक (2024 में वैश्विक CO₂ का 12.7%) द्वारा नेतृत्व की विफलता के रूप में देखते हैं।
- अनुकूलन वित्तपोषण पहले से ही अनुमानित 310-365 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से काफी कम है। ऐसे में अमेरिका की घटती भागीदारी उत्तर–दक्षिण विश्वास असंतुलन को और गहरा कर सकती है तथा वार्त्ताओं में विकासशील देशों की स्थिति को कठोर बना सकती है।
- शांति निर्माण/मानव सुरक्षा के प्रभाव: संयुक्त राज्य अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र शांति निर्माण तंत्रों से वापसी उसके सुरक्षा लक्ष्यों को कमज़ोर करती है और ऐसे अस्थिरता के जोखिम को बढ़ाती है, जो भविष्य में महंगी सैन्य समाधान की आवश्यकता पैदा कर सकती है। स्वास्थ्य, जलवायु प्रवासन और संघर्ष निवारण प्रयासों के लिये अनुदान कम करने से मानवाधिकारों पर खतरा उत्पन्न होता है और वर्ष 2050 तक 200 मिलियन लोगों के लिये जलवायु-प्रेरित प्रवासन की समस्या बढ़ सकती है।
- आर्थिक/व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा: जब संयुक्त राज्य अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय मानकों को तय करने में अपनी भूमिका खो देता है, तो उसके निर्यातक विदेशी जलवायु-संबंधित व्यापार उपायों, जैसे– कार्बन सीमा समायोजन (Carbon Border Adjustments) के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इससे जलवायु-संबंधी व्यापार की कुल लागत बढ़ती है और अमेरिकी उद्योग को विकसित होते वैश्विक मानकों से अलग करने का जोखिम उत्पन्न होता है।
- सहायता और तकनीकी सहयोग में कमी: संयुक्त राज्य अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र निकायों से पीछे हटना अक्सर अनुदान कटौती से संबंधित होता है, जैसे वर्ष 2017 में UN जनसंख्या कोष (UNFPA) का वित्तपोषण बंद करना, जिसने अफ्रीका तथा एशिया में प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रमों को प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त विज्ञान तथा शिक्षा संस्थाओं से वापसी से ग्लोबल साउथ को आवश्यक तकनीकी हस्तांतरण प्राप्त करने में बाधा आती है।
मुख्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन और समझौते जिनसे संयुक्त राज्य अमेरिका ने वापसी की है
- संयुक्त राष्ट्र संधियाँ और जलवायु निकाय:
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा कन्वेंशन (UNFCCC): यह मुख्य वैश्विक जलवायु संधि है, जो COP वार्त्ताओं और 2015 के पेरिस समझौते की नींव तैयार करती है।
- अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC): यह विश्व का प्रमुख वैज्ञानिक संगठन है, जो जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन करता है।
- जलवायु, पर्यावरण और जैव विविधता संस्थान:
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): यह भारत-नेतृत्व वाली पहल है, जो सौर ऊर्जा पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देती है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN): यह जैव विविधता संरक्षण का वैश्विक प्राधिकरण है।
- अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच ऑन जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ (IPBES): यह जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का मूल्यांकन करता है।
- संयुक्त राष्ट्र सहकारी कार्यक्रम – वनों की कटाई और वन क्षरण से उत्सर्जन को कम करना (REDD+): इसका उद्देश्य वनों को काटने की बजाय सुरक्षित रखने में अधिक मूल्यवान बनाकर जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना है।
- संयुक्त राष्ट्र ऊर्जा (UN Energy): यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में ऊर्जा से संबंधित कार्यों का समन्वय करता है।
- अंतर-सरकारी मंच – खनन, खनिज, धातु और सतत विकास: यह सतत खनन पर संयुक्त राष्ट्र के साथ निकटता से कार्य करता है।
- जनसांख्यिकी और चुनावी निकाय:
- संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA): यह प्रजनन स्वास्थ्य, जनसंख्या डेटा और लैंगिक समानता पर केंद्रित है।
- अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र और चुनाव सहायता संस्थान (IDEA): यह लोकतांत्रिक संस्थानों और प्रक्रियाओं का समर्थन करता है।
- सुरक्षा और आतंकवाद-विरोध: वैश्विक आतंकवाद रोधी परिषद (GCTF) आतंकवाद-विरोधी सहयोग के लिये एक बहुपक्षीय मंच है।
- पहले से ही अमेरिका द्वारा वापसी किये गए संगठन और समझौते: पेरिस समझौता, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)।
बहुपक्षीय संस्थाओं से अमेरिका की वापसी पर भारत कैसे प्रतिक्रिया दे सकता है?
- जलवायु गठबंधनों में सक्रिय नेतृत्व: भारत को सिर्फ भागीदारी से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे के लिये गठबंधन (CDRI) जैसे प्लेटफॉर्म पर एजेंडा-निर्धारण नेतृत्व करना चाहिये, ताकि अमेरिका की पीछे हटने की स्थिति में वैश्विक जलवायु गति बनाए रखी जा सके।
- वैकल्पिक जलवायु वित्त सुरक्षित करना: ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) में संभावित अमेरिकी योगदान के ठहराव का मुकाबला करने के लिये भारत को अपने जलवायु वित्त को विविधतापूर्ण बनाना चाहिये, अन्य दाताओं (EU, UK, जापान, नॉर्डिक देश) को परियोजनाएँ सक्रिय रूप से प्रस्तुत करना चाहिये और बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) से वित्त मिश्रित करना चाहिये।
- कार्बन सीमा उपायों के प्रति तैयारी और लचीलापन: यह अनुमान लगाते हुए कि अमेरिका की वापसी से EU-शैली के कार्बन बॉर्डर समायोजन तंत्र (CBAM) तेज़ हो सकते हैं, भारत को मुख्य निर्यात क्षेत्रों, जैसे– इस्पात, सीमेंट और एल्यूमिनियम में डिकार्बोनाइज़ेशन करना चाहिये, जिसके लिये राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM), 2023 और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को तेज़ी से लागू करना ज़रूरी है।
- ग्रीन टेक हब बनना: सोलर PV, बैटरियों और इलेक्ट्रोलाइज़र के लिये PLI योजनाओं को बढ़ाकर और एक कम-कार्बन बेसलोड विकल्प के रूप में IAEA-सुरक्षित छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के वैश्विक निर्यातक बनकर आत्मनिर्भरता के लिये लक्ष्य रखना।
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में निवेश करना: अमेरिकी भागीदारी में कमी का सामना करने के लिये भारत को जलवायु विज्ञान नेटवर्क को सुदृढ़ करने और हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण एवं कार्बन अभिग्रहण में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने की आवश्यकता है। इसे नवाचार और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देने के लिये जलवायु प्रौद्योगिकी में अपने सार्वजनिक और निजी अनुसंधान एवं विकास व्यय में भी काफी वृद्धि करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
बहुपक्षीय निकायों से अमेरिकी वापसी वैश्विक शासन में एक शून्यता उत्पन्न करती है, जिससे जलवायु कार्रवाई, वित्त और सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक दक्षिण के हितों की रक्षा के लिये सुधारित बहुपक्षवाद का समर्थन करके, जलवायु गठबंधनों का नेतृत्व करके, वैकल्पिक वित्त को सुरक्षित करके और हरित-प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता बढ़ाकर प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. बहुपक्षीय संस्थानों से अमेरिकी विमुखता वैश्विक भू-राजनीति और जलवायु वित्त स्थापत्य को कैसे पुनः आकार देती है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. UNFCCC से अमेरिका का बाहर निकलना समस्याग्रस्त क्यों है?
इससे विश्व के सबसे बड़े संचयी CO₂ उत्सर्जक को COP वार्त्ता और पेरिस समझौते के कार्यान्वयन को नियंत्रित करने वाले मूल कानूनी ढाँचे से हटा देता है।
2. अमेरिका के जलवायु परिवर्तन से बाहर निकलने का विकासशील देशों के लिये जलवायु वित्तपोषण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इससे GCF और GEF जैसे तंत्रों के लिये वित्तपोषण की पूर्वानुमान क्षमता कमज़ोर हो जाती है, जिससे अनुकूलन, शमन और हानि एवं क्षति वित्तपोषण प्रभावित होता है।
3. अमेरिका की वापसी के भूराजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
इससे वैश्विक शासन में नेतृत्व का अभाव उत्पन्न होता है, जिससे चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को संयुक्त राष्ट्र संस्थानों में एजेंडा तय करने का प्रभाव प्राप्त करने का मौका मिलता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
- इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
- यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2°C या कोशिश करें कि 1.5°C से भी अधिक न होने पाए।
- विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के COP के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गईं वचनबद्धताएँ क्या हैं? (2021)
प्रश्न. नवंबर 2021 में ग्लासगो में विश्व के नेताओं के शिखर सम्मेलन में COP 26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में आरंभ की गई हरित ग्रिड पहल का प्रयोजन स्पष्ट कीजिये। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) में यह विचार पहली बार कब दिया गया था? (2021)

शासन व्यवस्था
सहमति की आयु और किशोर स्वायत्तता
प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, सहमति की आयु, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012
मेन्स के लिये: भारत में बाल अधिकार और संरक्षण कानून, किशोरों की स्वायत्तता एवं विकसित होती क्षमताएँ
चर्चा में क्यों?
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध एवं अन्य (2026) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति से बनाए गए किशोर संबंधों से जुड़े मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की।
- न्यायालय ने पाया कि यौन शोषण से बच्चों की रक्षा के लिये बनाए गए इस कानून का प्रायः परिवारों द्वारा उन युवा जोड़ों के खिलाफ दुरुपयोग किया जाता है जिनमें एक की उम्र 18 वर्ष से कम होती है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से सुधारात्मक उपाय करने का आग्रह किया।
- इस टिप्पणी ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को इस रूप में पुनः जीवंत किया कि क्या भारत को सहमति की आयु पर पुनर्विचार करना चाहिये।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन उजागर करते हैं कि कैसे POCSO अधिनियम, बाल संरक्षण के उद्देश्य से गठित, का प्रयोग तीव्रता के साथ सहमतिपूर्ण किशोर संबंधों के मामलों में किया जा रहा है, जिससे अति-अपराधीकरण और सामाजिक वास्तविकताओं के साथ बेमेल होने की चिंताएँ उठ रही हैं।
- इस बहस के लिये एक संतुलित, सूक्ष्म दृष्टिकोण की मांग है, जो शोषण से बच्चों की रक्षा करते हुए न्यायिक स्पष्टता, लक्षित कानूनी सुरक्षा उपायों और शिक्षा एवं सहायता प्रणालियों पर सुदृढ़ ज़ोर के माध्यम से किशोर स्वायत्तता को मान्यता दे।
भारतीय कानून में "सहमति की आयु" का क्या अर्थ है?
- सहमति की आयु: यह वह कानूनी रूप से निर्धारित आयु है, जिस पर एक व्यक्ति यौन क्रियाओं के लिये सहमति देने में सक्षम माना जाता है। भारत में यह आयु 18 वर्ष है, जो लैंगिक रूप से तटस्थ POCSO अधिनियम, 2012 के अंतर्गत आती है।
- 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से एक "बच्चा" माना जाता है, उसकी सहमति के लिये कोई कानूनी वैधता नहीं है। एक नाबालिग के साथ यौन क्रिया को स्वेच्छा की परवाह किये बगैर स्वतः ही वैधानिक बलात्कार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 19 किसी भी व्यक्ति के लिये रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाती है, जो किसी अपराध को जानता है या यहाँ तक कि संदेह करता है।
- कानूनी विकास: भारत में सहमति की आयु मूल रूप से भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 के तहत 10 वर्ष निर्धारित की गई थी, फिर सहमति की आयु अधिनियम, 1891 द्वारा 12 तक बढ़ा दी गई, जिसे बाद में बढ़ाकर 14 और बाद में 16 कर दिया गया।
- वर्ष 2012 में, POCSO अधिनियम ने सहमति की आयु 18 वर्ष तक बढ़ा दी, इस स्थिति को आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा सुदृढ़ किया गया, जिसने IPC के बलात्कार संबंधी प्रावधानों को POCSO ढाँचे के साथ संरेखित किया।
- इन मानकों को भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत बरकरार रखा गया है, जहाँ धारा 63 बलात्कार को परिभाषित करती है। इसमें सहमति से या बगैर सहमति के यौन कृत्य शामिल हैं यदि महिला 18 वर्ष से कम आयु की है।
- उल्लेखनीय है कि सहमति की आयु विवाह की न्यूनतम आयु से अलग है, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं के लिये 18 वर्ष और पुरुषों के लिये 21 वर्ष निर्धारित है।
- न्यायिक दृष्टिकोण:
- राज्य बनाम हितेश (2025), दिल्ली उच्च न्यायालय: न्यायालय ने कहा कि कानून को किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों को मान्यता देनी चाहिये और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिये, बशर्ते ऐसे संबंध किसी भी प्रकार के दबाव, शोषण या दुरुपयोग से मुक्त हों।
- इस निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि किशोरों की वास्तविकताओं के अनुरूप कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोणों में विकास होना आवश्यक है।
- आशिक रामजाई अंसारी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023), बॉम्बे उच्च न्यायालय: न्यायालय ने निर्णय दिया कि यौन स्वायत्तता में सहमति-आधारित यौन संबंध स्थापित करने का अधिकार तथा यौन आक्रामकता से संरक्षण का अधिकार दोनों शामिल हैं और मानव गरिमा की रक्षा के लिये दोनों की मान्यता आवश्यक है।
- मोहम्मद रफायत अली बनाम दिल्ली राज्य, दिल्ली उच्च न्यायालय (2025): न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम के अंतर्गत यदि पीड़ित की आयु 18 वर्ष से कम है, तो उसकी सहमति का कोई विधिक महत्त्व नहीं है और नाबालिग के साथ कोई भी यौन कृत्य उसकी इच्छा की परवाह किये बिना अपराध माना जाएगा।
- राज्य बनाम हितेश (2025), दिल्ली उच्च न्यायालय: न्यायालय ने कहा कि कानून को किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों को मान्यता देनी चाहिये और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिये, बशर्ते ऐसे संबंध किसी भी प्रकार के दबाव, शोषण या दुरुपयोग से मुक्त हों।
सहमति की उम्र कम करने के संबंध में क्या तर्क हैं?
पक्ष में तर्क
- किशोर स्वायत्तता की मान्यता: 16-18 वर्ष आयु वर्ग के किशोर शिक्षा की व्यापक पहुँच, अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता, डिजिटल सूचना के संपर्क और बेहतर संज्ञानात्मक परिपक्वता के कारण संबंधों से जुड़े सूचित निर्णय लेने में अधिक सक्षम होते जा रहे हैं, किंतु वर्तमान कानून उनकी विकसित होती सहमति-क्षमता को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं देता।
- चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4) के अनुसार, भारत में 39% लड़कियों का पहला यौन अनुभव 18 वर्ष से पहले हुआ था। वहीं Enfold और प्रोजेक्ट 39A के अध्ययनों (2016-20) में पाया गया कि लगभग एक-चौथाई POCSO मामलों में किशोरों के बीच सहमति-आधारित संबंध शामिल थे, जिससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान कानून ज़मीनी वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
- सहमति-आधारित संबंधों में POCSO का दुरुपयोग: POCSO के अनेक मामले किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों से जुड़े होते हैं, जो प्रायः यौन शोषण के बजाय अभिभावकों की असहमति के कारण दर्ज कराए जाते हैं।
- 18 वर्ष की एकरूप आयु-सीमा सहमति-आधारित अंतरंगता को वैधानिक बलात्कार में परिवर्तित कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप गिरफ्तारी, कारावास और दीर्घ न्यायिक प्रक्रियाएँ होती हैं, जो लड़के और लड़की दोनों के लिये हानिकारक सिद्ध होती हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएँ: कई देशों में सहमति की आयु 16 वर्ष निर्धारित की गई है और सहमति-आधारित संबंधों में समान आयु वर्ग के किशोरों को अपराधीकरण से बचाने के लिये ‘आयु-समीपता’ (Close-in-Age) अपवाद प्रदान किये जाते हैं।
- दंड के बजाय शिक्षा की ओर झुकाव: समर्थकों का तर्क है कि सुरक्षित किशोर व्यवहार सुनिश्चित करने के लिये आपराधिक कानून की तुलना में समग्र यौन शिक्षा और जागरूकता अधिक प्रभावी उपाय हैं।
- सूक्ष्म एवं संतुलित कानूनी दृष्टिकोण की आवश्यकता: समर्थकों का सुझाव है कि 16 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिये सहमति को मान्यता दी जाए, साथ ही दबाव, शोषण या अधिकार के दुरुपयोग से संरक्षण हेतु पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान बनाए रखे जाएँ।
विरोध में तर्क
- बच्चों को शोषण से संरक्षण: सहमति की आयु कम करने से यौन शोषण, मानव तस्करी और दबाव के विरुद्ध मौजूद सुरक्षा तंत्र कमज़ोर पड़ सकता है, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ गहन शक्ति-असंतुलन विद्यमान है।
- सहमति का भ्रम: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के 2007 के अध्ययन के अनुसार, 50% से अधिक मामलों में अपराधी बच्चे के परिचित (परिवार के सदस्य, शिक्षक, पड़ोसी) थे, जहाँ दिखाई देने वाली सहमति वास्तव में भय, हेर-फेर या निर्भरता का परिणाम हो सकती है।
- कठोर आयु-सीमा वयस्क शिकारियों के विरुद्ध एक प्रबल प्रतिरोधक के रूप में कार्य करती है, जो अन्यथा सहमति की आड़ में नाबालिगों का शोषण कर सकते हैं।
- पीड़ितों को चुप कराने का जोखिम: POCSO को कमज़ोर करने से शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति कम हो सकती है और दबावपूर्ण व्यवहार को वैधता मिल सकती है, जिससे बाल संरक्षण के उद्देश्य प्रभावित होते हैं।
- संसदीय और विशेषज्ञ विरोध: संसदीय स्थायी समितियों (2011, 2012) ने नाबालिग की सहमति को मान्यता देने या “क्लोज़-इन-एज़” अपवाद लागू करने का विरोध किया था।
- संसदीय एवं विशेषज्ञ विरोध: वर्ष 2011 और 2012 की संसदीय स्थायी समितियों ने अल्पवयस्क की सहमति को मान्यता देने तथा आयु-समीपता (Close-in-Age) अपवाद प्रदान करने के प्रस्तावों का विरोध किया था।
- विधि आयोग की 283वीं रिपोर्ट (2023) में यह चेतावनी दी गई कि यदि सहमति की आयु कम की जाती है, तो POCSO अधिनियम की प्रभावशीलता घट जाएगी और इससे बाल विवाह, वेश्यावृत्ति तथा मानव तस्करी के खिलाफ चल रहे प्रयासों को नुकसान पहुँच सकता है।
- व्यापक सामाजिक परिणाम: यह चिंता व्यक्त की गई है कि सहमति की आयु घटाने से भावनात्मक परिपक्वता और पर्याप्त सामाजिक समर्थन के अभाव में समय से पहले यौन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
सहमति की आयु पर पुनर्विचार करते समय बाल सुरक्षा और संरक्षण को मज़बूत करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- कानूनी क्षेत्र में न्यायिक मार्गदर्शन: यद्यपि सहमति की आयु (Age of Consent) में किसी भी प्रकार का बदलाव करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को वैधानिक कानून (Statutory Law) और उच्च न्यायालयों के फैसलों के बीच बढ़ते व्याख्यात्मक अंतर (Interpretational Divide) को स्पष्ट करना चाहिये, ताकि पुलिस और निचली अदालतों द्वारा इसका एक समान अनुप्रयोग सुनिश्चित किया जा सके।
- समग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता: केवल कानूनी सुधार किशोरों की वास्तविकताओं को पूरी तरह संबोधित नहीं कर सकता, इसके लिये यौन शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, लैंगिक-संवेदनशील पुलिसिंग और परिवार व समुदाय का समर्थन भी आवश्यक है, विशेषकर किशोर लड़कियों हेतु जिन्हें अक्सर विकल्प और संबंधों के मामलों में माता-पिता के विरोध का सामना करना पड़ता है।
- भेदभाव पर केंद्रित, कमज़ोर करने पर नहीं: सहमति की आयु 16 या 18 के बारे में केवल यांत्रिक बहस करने के बजाय कानून को बाल सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पुनर्गठित किया जाना चाहिये। कानून में एक सूक्ष्म विभेदन (Nuanced distinction) की आवश्यकता है, जो सहमतिपूर्ण किशोर संबंधों और दबावपूर्ण शोषण के बीच के अंतर को पहचान सके। ऐसा दृष्टिकोण न केवल युवाओं को अनैतिक दंड से बचाएगा, बल्कि कानून के मूल सुरक्षात्मक उद्देश्य को भी सुदृढ़ करेगा।
- 16–18 वर्ष के किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों की अनुमति: ऐसे संबंधों में समान आयु अंतराल (जैसे– 3–4 वर्ष) को मान्यता दी जा सकती है। अनिवार्य न्यायिक जाँच से दुरुपयोग या शक्ति असंतुलन की पहचान करने में मदद मिलेगी।
- सहानुभूतिपूर्ण ढाँचा तैयार करना: उद्देश्य अत्यधिक अपराधीकरण के बिना सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिये। एक संतुलित दृष्टिकोण बच्चों की सुरक्षा करते हुए किशोरों की स्वायत्तता और गरिमा का सम्मान भी करता है।
निष्कर्ष
सहमति की आयु के संदर्भ में संतुलन अपरिहार्य है, न कि अतिवाद। विधि व्यवस्था को बच्चों के संरक्षण और किशोरों के मध्य आपसी सहमति से बने संबंधों के बीच भेद करना चाहिये, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उन्हें अनैतिक अपराधीकरण से बचाया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. सहमत किशोर संबंधों में POCSO अधिनियम का दुरुपयोग कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच के अंतर को दर्शाता है। परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय कानून के तहत सहमति की उम्र क्या है?
POCSO अधिनियम, 2012 के अनुसार सहमति की कानूनी आयु 18 वर्ष निर्धारित है। इसके अंतर्गत किसी भी नाबालिग (अल्पवयस्क) के साथ किया गया यौन कृत्य 'सांविधिक बलात्कार' (Statutory Rape) की श्रेणी में आता है, चाहे इसमें नाबालिग की आपसी सहमति ही क्यों न रही हो।
2. सहमति आधारित किशोर मामलों में POCSO की आलोचना क्यों होती है?
अधिकांश मामले किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों से संबद्ध होते हैं, जिन्हें अक्सर परिवार की नापसंदगी या विरोध के कारण रिपोर्ट किया जाता है, जिससे अत्यधिक अपराधीकरण (Over-Criminalisation) हो जाता है।
3. अनुरुद्ध (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति आधारित किशोर संबंधों में POCSO अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग को नोट किया और सुधारात्मक कदम उठाने का आग्रह किया।
4. ‘उम्र में कम अंतर’ वाली छूट क्या है?
यह किशोरों के बीच सहमति-आधारित संबंधों की अनुमति देता है, यदि उनकी आयु में सामान्य अंतर सीमित हो और साथ ही ज़बर्दस्ती और शोषण से सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)
- विकास का अधिकार
- अभिव्यक्ति का अधिकार
- मनोरंजन का अधिकार
उपर्युक्त में से कौन-सा/से बच्चे का अधिकार है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: D

जैव विविधता और पर्यावरण
घास के मैदानों का संरक्षण
प्रिलिम्स के लिये: घास के मैदान, संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC), चरागाह और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (IYRP), कार्बन सिंक, सतत विकास लक्ष्य
मेन्स के लिये: कार्बन सिंक के रूप में घास के मैदान और जलवायु शमन में उनकी भूमिका, वैश्विक तथा राष्ट्रीय जलवायु नीतियों में वन-केंद्रित पक्षपात, भारत में घास के मैदान के संरक्षण में संस्थागत एवं कानूनी अंतर
चर्चा में क्यों?
वैश्विक और राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में घास के मैदान अभी भी पर्याप्त रूप से शामिल नहीं हैं, क्योंकि UNFCCC COP30 की चर्चाओं में मुख्य रूप से वनों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि संयुक्त राष्ट्र ने 2026 को चरागाह और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष (International Year of Rangelands and Pastoralists- IYRP) घोषित किया है।
सारांश
- घास के मैदान जलवायु नियंत्रण, जैव विविधता और आजीविका के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, फिर भी वन-केंद्रित दृष्टिकोण, संस्थागत अलगाव और कमज़ोर कानूनी सुरक्षा के कारण इन्हें जलवायु और संरक्षण नीतियों में पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है।
- घास के मैदानों को स्वतंत्र पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता देना, उन्हें जलवायु प्रतिबद्धताओं में शामिल करना तथा चरागाह और पशुपालक समुदायों को सशक्त बनाना, विशेषकर IYRP 2026 के तहत सतत और समावेशी पारिस्थितिक शासन के लिये अत्यंत आवश्यक है।
घास के मैदान क्या हैं?
- परिचय: घास के मैदान खुले स्थलीय पारिस्थितिक तंत्र होते हैं, जिनमें घास का प्रभुत्व होता है तथा वृक्षों की संख्या बहुत कम या नगण्य होती है। ये मौसमी सूखे, चराई और आग जैसी परिस्थितियों के अनुकूल विकसित हुए होते हैं। इनमें सवाना, रेंजलैंड और चरागाह कॉमन्स शामिल हैं।
- यूनेस्को के अनुसार, घास के मैदान वे भूमि क्षेत्र होते हैं जिनमें वृक्ष और झाड़ियाँ 10% से कम होती हैं, जबकि वनाच्छादित घास के मैदानों (Wooded Grasslands) में यह आवरण 10% से 40% के बीच होता है।
- घास के मैदान पृथ्वी के सबसे व्यापक पारिस्थितिक तंत्रों में शामिल हैं और ये (ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को छोड़कर) विश्व के स्थलीय क्षेत्रफल के लगभग 40.5% हिस्से में फैले हुए हैं। इनका क्षेत्रफल वृक्षयुक्त सवाना, झाड़ीदार भूमि और टुंड्रा की तुलना में कहीं अधिक है।
- ये महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय घास के मैदान वैश्विक स्थलीय कार्बन का लगभग 15% संचित करते हैं।
- ये विश्व की लगभग 20% जनसंख्या की आजीविका का समर्थन करते हैं, विशेषकर चरवाहा और कृषि-पशुपालक समुदायों की। साथ ही जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिये ये आग और चराई जैसी प्राकृतिक व्यवधान प्रक्रियाओं पर निर्भर रहते हैं।
- भारत में घास के मैदान: भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 24% हिस्सा घास के मैदानों से आच्छादित है, लेकिन समय के साथ इनका गंभीर क्षरण और संकुचन हुआ है।
- भारत में प्रमुख घास के मैदान क्षेत्र राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश का तराई–दुआर क्षेत्र, उत्तराखंड, असम और पश्चिम बंगाल में पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के अल्पाइन घास के मैदान भी महत्त्वपूर्ण हैं।
- गुजरात के कच्छ ज़िले में स्थित बन्नी घास का मैदान एशिया का सबसे बड़ा घास का मैदान है।
- उनके पारिस्थितिक और आजीविका संबंधी महत्त्व के बावजूद भारत के 1% से भी कम घास के मैदान औपचारिक संरक्षण नेटवर्क के अंतर्गत संरक्षित हैं।
- घास के मैदानों की भूमिका:
- जलवायु विनियमन: घास के मैदान, विशेषकर उष्णकटिबंधीय घास के मैदान, प्रमुख कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और जलवायु परिवर्तन के शमन में सहायक होते हैं।
- आजीविका समर्थन: घास के मैदान चरवाहा और कृषि-पशुपालक समुदायों को चराई भूमि, चारा, ईंधन और भोजन उपलब्ध कराकर उनकी आजीविका को बनाए रखते हैं।
- जैव विविधता संरक्षण: घास के मैदान विविध पौध प्रजातियों, पक्षियों तथा घास के मैदानों पर निर्भर वन्यजीवों के लिये महत्त्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं।
- जल एवं मृदा विनियमन: घास के मैदान भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को सुगम बनाते हैं, प्रभावी ढंग से मृदा अपरदन को नियंत्रित करते हैं और स्थानीय जल विज्ञान (Hydrology) के नियमन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता: घास के मैदान प्राकृतिक अग्नि चक्र और नियंत्रित चराई की प्रक्रियाओं पर निर्भर करते हैं। ये प्रक्रियाएँ न केवल पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखती हैं, बल्कि पारिस्थितिक तंत्र की 'लचीलापन क्षमता' (Resilience) को भी सुदृढ़ करती हैं।
नोट: संयुक्त राष्ट्र महासभा ने खाद्य एवं कृषि संगठन के नेतृत्व में वर्ष 2026 को अंतर्राष्ट्रीय चरागाह और पशुचारक वर्ष घोषित किया है।
- चरागाह, जिसमें घास के मैदान, सवाना, रेगिस्तान और झाड़ीदार भूमियाँ शामिल हैं, जैव विविधता, पारिस्थितिकी विनियमन और जलवायु लचीलापन के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- चरागाह पृथ्वी के भू-पृष्ठ के आधे से अधिक भाग को कवर करते हैं और 500 मिलियन से अधिक पशुचारकों (ऐसे समुदाय जो पशुधन की चराई के लिये चरागाहों पर निर्भर हैं) का समर्थन करते हैं।
- इस पहल का उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, ज़िम्मेदार निवेश को बढ़ावा देना, पशुचारकों के भूमि और गतिशीलता अधिकारों को सुरक्षित करना, समावेशी शासन को सुदृढ़ करना और चरागाह प्रबंधन में सुधार करना है, जिससे सतत आजीविका और सतत विकास लक्ष्यों (SDG) में योगदान हो।
घास के मैदान/चरागाह संरक्षण में अंतराल क्या हैं?
- अनुचित वर्गीकरण और नीतियों की अनदेखी: चरागाहों को आमतौर पर वनों की अवनति या बंजर भूमि के रूप में चिह्नित किया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप वनरोपण, रोपण या अवसंरचना के लिये भूमि का उपयोग किया जाता है, भले ही वे प्राकृतिक, जैव विविधता से समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र हों।
- भारतीय चरागाहों पर लगभग 18 मंत्रालयों का शासन है जिनके परस्पर विरोधी जनादेश हैं। पर्यावरण मंत्रालय उन्हें वनरोपण लक्ष्यों के रूप में मानता है, हालाँकि ग्रामीण विकास मंत्रालय विभिन्न क्षेत्रों को बंजर भूमि के रूप में चिह्नित करता है।
- यह नीतिगत विखंडन चरागाहों के अनुचित वर्गीकरण और कमज़ोर संरक्षण की ओर ले जाता है।
- भारतीय चरागाहों पर लगभग 18 मंत्रालयों का शासन है जिनके परस्पर विरोधी जनादेश हैं। पर्यावरण मंत्रालय उन्हें वनरोपण लक्ष्यों के रूप में मानता है, हालाँकि ग्रामीण विकास मंत्रालय विभिन्न क्षेत्रों को बंजर भूमि के रूप में चिह्नित करता है।
- संस्थागत अलगाव: जलवायु कार्रवाई (UNFCCC), जैव विविधता (जैविक विविधता पर कन्वेंशन) और भूमि क्षरण (मरुस्थलीकरण से निपटने के लिये संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) को अलग-अलग सँभाला जाता है, जिससे एकीकृत पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण रोका जाता है और चरागाह शासन अंतराल में फँस जाते हैं।
- हालाँकि मरुस्थलीकरण से निपटने के लिये संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (COP16) ने औपचारिक रूप से चरागाहों को जटिल सामाजिक-पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता प्रदान की है और संकल्प L15 ने प्राथमिक निवेश और बेहतर भूमि-किराया सुरक्षा के लिये आह्वान किया है, फिर भी चरागाहों में वनों और आर्द्रभूमियों के विपरीत एक समर्पित कानूनी ढाँचे की कमी है।
- भारत में, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 जैसे कानून प्राकृतिक रूप से होने वाले चरागाहों पर अस्थिर रूप से लागू होते हैं, जिससे उनका कानूनी रूप से संवेदनशील और कमज़ोर संरक्षण होता है।
- वानिकी-केंद्रित जलवायु नीतियाँ: जलवायु और कार्बन नीतियाँ वृक्ष आवरण (REDD+, वनरोपण अभियान) को प्राथमिकता देती हैं, जो प्रायः पारिस्थितिक रूप से अनुपयुक्त चरागाहों पर रोपण को बढ़ावा देती हैं, जिससे जैव विविधता हानि और अग्नि प्रबंधन में बदलाव देखने को मिलता है।
- विक्षोभ पारिस्थितिकी की उपेक्षा: दहन पर नियंत्रण और चराई जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं का दमन पारिस्थितिक वास्तविकता को नज़रअंदाज़ करता है कि चरागाह पुनर्जनन और लचीलापन के लिये विक्षोभ व्यवस्था पर निर्भर हैं।
- अपर्याप्त डेटा और निगरानी: चरागाह विस्तार, स्थिति या पारिस्थितिक तंत्र सेवा मूल्य का आकलन करने के लिये कोई व्यापक राष्ट्रीय सूची या मानकीकृत संकेतक नहीं हैं, जिससे साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण कमज़ोर होता है।
- पशुचारक समुदायों का हाशियाकरण: पारंपरिक पशुचारक और स्वदेशी प्रबंधन प्रणालियों को उपेक्षित किया जाता है, भले ही सतत चराई, अग्नि प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण में उनकी सिद्ध भूमिका हो।
- भूमि-उपयोग निर्णयों में विकासात्मक पूर्वाग्रह: रक्षा, ऊर्जा और औद्योगिक परियोजनाओं के लिये बड़े पैमाने पर भूमि का उपयोग प्रायः चरागाहों को “अनुपयोगी” भूमि के रूप में ब्रांडिंग करके न्यायोचित ठहराया जाता है, जिससे पारिस्थितिक प्रभाव आकलन और स्थानीय सहमति को दरकिनार किया जाता है।
चरागाह संरक्षण को कौन-से उपाय सुदृढ़ कर सकते हैं?
- उचित पारिस्थितिक वर्गीकरण: चरागाहों को आधिकारिक रूप से विशिष्ट प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र के रूप में मान्यता देना, न कि अवनत वनों या बंजर भूमि के रूप में। उन्हें वनों एवं आर्द्रभूमियों के साथ एक प्रमुख भूमि-उपयोग श्रेणी के रूप में वर्गीकृत भी कर सकते हैं।
- चरागाहों को भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान में स्पष्ट रूप से शामिल करना, मृदा कार्बन, देशी प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्र के लचीलेपन पर ध्यान केंद्रित करना, न कि वृक्षारोपण पर।
- समर्पित कानूनी संरक्षण: एक राष्ट्रीय चरागाह संरक्षण और चराई नीति अधिनियमित करना और वन (संरक्षण) अधिनियम एवं वन्यजीव संरक्षण अधिनियम जैसे मौज़ूदा कानूनों के अंतर्गत सुरक्षा उपायों को प्राकृतिक रूप से होने वाले चरागाहों तक विस्तारित करना।
- पारिस्थितिक तंत्र-आधारित प्रबंधन को अपनाना: ड्राइवर-प्रेशर-स्टेट-इंपैक्ट-रिस्पॉन्स फ्रेमवर्क (DPSIR) जैसे प्रणालीगत दृष्टिकोण का उपयोग करना, ताकि भूमि-उपयोग निर्णयों का मार्गदर्शन कर सकें, संचयी प्रभावों का आकलन कर सकें और संरक्षण को आजीविका एवं विकास की आवश्यकताओं के साथ संरेखित कर सकें।
- DPSIR मॉडल पर्यावरणीय परिवर्तन को कारण-परिणाम शृंखला के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें प्रेरक शक्तियाँ (Driving Forces) और दबाव (Pressures) पर्यावरण की स्थिति (State) को बदलते हैं, जिससे इसके प्रभाव (Impacts) उत्पन्न होते हैं और अंततः इसके लिये नीतिगत प्रतिक्रियाएँ (Responses) विकसित की जाती हैं।
- यह नीति-निर्माताओं को पर्यावरणीय गुणवत्ता का आकलन करने और सूचित हस्तक्षेपों की रूपरेखा तैयार करने में सहायता करता है, यद्यपि अनेक परस्पर क्रियाशील कारणों की उपस्थिति के कारण इसका अनुप्रयोग जटिल होता है।
- पशुपालक एवं जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाना: साझा संसाधनों (कॉमन्स) पर सुरक्षित भू-अधिकार सुनिश्चित किये जाएँ, परंपरागत पशु-चराई एवं अग्नि प्रबंधन प्रथाओं को पुनरुज्जीवित किया जाए तथा समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण (Stewardship) मॉडलों को विधिक मान्यता दी जाए।
- विज्ञान-आधारित पुनर्स्थापन: देशज घास प्रजातियों के पुनर्स्थापन को प्राथमिकता दी जाए, आक्रामक विदेशी वनस्पतियों का नियमन किया जाए तथा पारिस्थितिक रूप से अनुपयुक्त घासभूमि परिदृश्यों में वनीकरण से बचा जाए।
- डेटा एवं निगरानी प्रणालियों को सुदृढ़ करना: जैव विविधता, कार्बन भंडारण, चारा क्षमता तथा जलवैज्ञानिक सेवाओं के लिये मानकीकृत संकेतकों के साथ एक राष्ट्रीय घासभूमि सूची (नेशनल ग्रासलैंड इन्वेंटरी) का निर्माण किया जाए।
- घासभूमियों के विचलन के लिये पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को अनिवार्य बनाया जाए तथा साझा भूमि के उपयोग हेतु ग्राम सभा की सहमति सुनिश्चित की जाए।
निष्कर्ष
घास के मैदान जलवायु-अनुकूलन, जैव विविधता और आजीविका के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, किंतु अब तक इन्हें पर्याप्त मान्यता और संरक्षण नहीं मिला है। नीतिगत ब्लाइंड स्पॉट्स को दूर करना, पशुपालक समुदायों को सशक्त बनाना तथा घासभूमियों को जलवायु और विधिक ढाँचों में एकीकृत करना अत्यावश्यक है। IYRP 2026 घासभूमि संरक्षण को मुख्यधारा में लाने के लिये एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. घास के मैदान पारिस्थितिक संवेदनशीलता के बजाय नीतिगत अदृश्यता के शिकार हैं। भारत और विश्व स्तर पर जलवायु शासन के संदर्भ में इस कथन की व्याख्या कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. नीति ढाँचों में घासभूमियों को अक्सर गलत वर्गीकृत क्यों किया जाता है?
घासभूमियों को अक्सर बंजर भूमि या अवनत वनों के रूप में लेबल किया जाता है, जिसके कारण अफोरेस्टेशन, वृक्षारोपण और भूमि विचलन होते हैं, जबकि ये प्राकृतिक और जैव विविधता-समृद्ध पारिस्थितिक तंत्र हैं।
2. चरागाह और पशुपालकों का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष 2026 का महत्त्व क्या है?
इसका उद्देश्य जागरूकता बढ़ाना, ज़िम्मेदार निवेश को बढ़ावा देना, पशुपालक भूमि अधिकारों को सुरक्षित करना और सतत रेंजलैंड प्रबंधन में सुधार लाना है, जो सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के अनुरूप हो।
3. घास के मैदान वैश्विक शासन अंतराल में क्यों गिरते हैं?
जलवायु, जैव विविधता और भूमि क्षरण को UNFCCC, CBD और UNCCD के तहत अलग-अलग सँभाला जाता है, जिससे एकीकृत पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण मुश्किल हो जाता है।
4. भारत में घास के मैदान संरक्षण की स्थिति क्या है?
भारत में घास के मैदान लगभग 24% क्षेत्रफल में विस्तृत हैं, लेकिन औपचारिक संरक्षण में केवल 1% से भी कम हैं। वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 जैसे कानूनों का पालन असंगत रूप से किया जाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. घासस्थलों में वृक्ष पारिस्थितिक अनुक्रमण के अंश के रूप में किस कारण घासों को प्रतिस्थापित नहीं करते हैं?
(a) कीटों एवं कवकों के कारण
(b) सीमित सूर्य के प्रकाश एवं पोषक तत्त्वों की कमी के कारण
(c) जल की सीमाओं एवं आग के कारण
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (c)
प्रश्न. सवाना की वनस्पति में बिखरे हुए छोटे वृक्षों के साथ घास के मैदान होते हैं, किंतु विस्तृत क्षेत्र में कोई वृक्ष नहीं होते हैं। ऐसे क्षेत्रों में वन विकास सामान्यतः एक या एकाधिक या कुछ परिस्थितियों के संयोजन के द्वारा नियंत्रित होता है। ऐसी परिस्थितियाँ निम्नलिखित में से कौन-सी हैं? (2021)
1. बिलकारी प्राणी और दीमक
2. अमि
3. चरने वाले तृणभक्षी प्राणी (हर्बिवोर्स)
4. मौसमी वर्षा
5. मृदा के गुण
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) 1 और 2
(b) 4 और 5
(c) 2, 3 और 4
(d) 1, 3 और 5
उत्तर: C

प्रारंभिक परीक्षा
पैक्स सिलिका और भारत का समावेश
चर्चा में क्यों?
भारत में अमेरिका के नव-नियुक्त राजदूत सर्जियो गोर ने कहा है कि भारत को ‘पैक्स सिलिका’ (Pax Silica) में शामिल होने के लिये आमंत्रित किया जाएगा। यह अमेरिका के नेतृत्व वाला एक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित और सुदृढ़ करना है।
पैक्स सिलिका क्या है?
- परिचय: यह अमेरिका के नेतृत्व वाला एक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य विश्वसनीय वैश्विक साझेदारों के साथ गहन सहयोग के माध्यम से एक सुरक्षित, अनुकूल और नवाचार-आधारित सिलिकॉन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आपूर्ति शृंखला पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण करना है।
- पैक्स सिलिका का उद्घाटन शिखर सम्मेलन दिसंबर 2025 में वॉशिंगटन, डी.सी. में आयोजित किया गया था।
- उद्देश्य: इसका लक्ष्य किसी एक देश पर जबरन निर्भरता को कम करना, AI के लिये महत्त्वपूर्ण सामग्रियों की सुरक्षा करना तथा समान दृष्टिकोण वाले देशों को बड़े पैमाने पर परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों के विकास और तैनाती में सक्षम बनाना है।
- चीन सिलिकॉन और AI आपूर्ति शृंखला पारिस्थितिक तंत्र के लिये आवश्यक महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला पर प्रभुत्व रखता है तथा लिथियम, कोबाल्ट और दुर्लभ मृदा तत्त्वों (रेयर अर्थ्स) के 60% से अधिक का परिशोधन करता है। दुर्लभ मृदा चुंबकों पर चीन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों से आपूर्ति शृंखलाएँ बाधित होने के बाद वैश्विक स्तर पर विविधीकरण के प्रयास तेज़ हो गए हैं।
- भाग लेने वाले देश: जापान, कोरिया गणराज्य, सिंगापुर, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात और ऑस्ट्रेलिया।
- साझेदार देश प्रमुख कंपनियों, जैसे– सोनी, हिताची, फुजित्सु, सैमसंग, एसके हाइनिक्स, टेमासेक, डीपमाइंड, MGX, रियो टिंटो और ASML की मेज़बानी करते हैं, जो वैश्विक AI आपूर्ति शृंखला को संचालित करती हैं।
- मुख्य प्रतिबद्धताएँ: साझा परियोजनाओं के माध्यम से महत्त्वपूर्ण खनिजों, सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, निर्माण और पैकेजिंग, कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा ग्रिड में AI आपूर्ति शृंखला की कमज़ोरियों को दूर करना तथा संदेहास्पद देशों से संवेदनशील तकनीकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी शामिल है।
पैक्स सिलिका और भारत
- भारत की पूर्विक बहिष्करण स्थिति: वर्तमान में भारत वह महत्त्वपूर्ण उन्नत तकनीकें नहीं रखता जिन्हें पैक्स सिलिका प्राथमिकता देता है और यह महत्त्वपूर्ण खनिजों का प्रमुख भंडार भी नहीं है, जिसके कारण इसे इस समूह में शामिल करने में बाधाएँ आईं।
- हालाँकि जिस प्रकार भारत ने अमेरिका द्वारा नेतृत्व किये गए खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) 2022 में शामिल होकर इसके लॉन्च के एक वर्ष बाद 2023 में 14वाँ सदस्य बन गया, उसी तरह भारत को भविष्य में पैक्स सिलिका में भी शामिल किया जा सकता है।
सिलिकॉन और AI आपूर्ति शृंखला को समर्थन देने के लिये भारत की क्या पहलें हैं?
- भारत की सेमीकंडक्टर पहल: USD 10 बिलियन के इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM, 2021) के तहत भारत का उद्देश्य देश में स्वदेशी सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम का विकास करना है।
- 10 परियोजनाओं को मंज़ूरी दी गई है, जिनमें 1.6 ट्रिलियन रुपये का निवेश होगा, जिसमें फैब्रिकेशन और पैकेजिंग शामिल हैं।
- भारत की AI रणनीति: ₹10,372 करोड़ के इंडिया AI मिशन (2024) का लक्ष्य लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models – LLMs) और घरेलू AI क्षमता का विकास करना है।
- ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (GPUs) की क्षमता बढ़कर 34,333 GPUs हो गई है, जो पहले के स्तर से लगभग दोगुनी है।
- AI प्रशिक्षण और इनफेरेंस के लिये साझा क्लाउड-आधारित कंप्यूट प्लेटफॉर्म का समर्थन करता है, जो भारतीय डेटा और संदर्भ के अनुरूप मूलभूत मॉडल बनाने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM): इसका उद्देश्य उच्च तकनीक, स्वच्छ ऊर्जा और रक्षा क्षेत्रों के लिये भारत की महत्त्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना है।
- इस मिशन में पूरा चक्र शामिल है, अन्वेषण और खनन से लेकर प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण तक, साथ ही यह विदेशी संपत्ति अधिग्रहण और अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों को भी प्रोत्साहित करता है।
- यह खनिज पार्कों की स्थापना, पुनर्चक्रण को प्रोत्साहन और अनुसंधान का समर्थन करेगा, जिसमें एक उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence) भी शामिल होगा।
- खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP): MSP, एक अमेरिकी पहल, महत्त्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखलाओं को सुदृढ़ करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि खनिजों का उत्पादन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण किया जाए, जिससे उनके आर्थिक विकास के लाभों को अधिकतम किया जा सके।
- यह सीधे तौर पर भारत की खनिज आत्मनिर्भरता रणनीति का समर्थन करता है, जो 'राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन' (National Critical Minerals Mission) जैसे घरेलू प्रयासों और 'काबिल' (KABIL ) द्वारा विदेशों में किये जा रहे अधिग्रहणों का पूरक है। यह भविष्य के उद्योगों और ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) के लिये अनिवार्य 'महत्त्वपूर्ण खनिजों' की वैश्विक दौड़ में भारत की स्थिति को और मज़बूत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. पैक्स सिलिका क्या है?
पैक्स सिलिका नौ देशों का एक अमेरिकी नेतृत्व वाला गठबंधन है, जिसका उद्देश्य एक लचीली, नवाचार-संचालित सेमीकंडक्टर और AI आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करना है।
2. पैक्स सिलिका में कौन-से देश शामिल हैं?
जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड, यूनाइटेड किंगडम, इज़रायल, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका।
3. सेमीकंडक्टर और AI संबंधी भारत की प्रमुख पहलें क्या हैं?
भारत सेमीकंडक्टर मिशन, भारत AI मिशन और राष्ट्रीय महत्त्वपूर्ण खनिज मिशन (NCMM) का लक्ष्य स्वदेशी आपूर्ति शृंखलाओं, AI अवसंरचना और महत्त्वपूर्ण खनिज सुरक्षा का निर्माण करना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. हाल में तत्त्वों के एक वर्ग, जिसे दुर्लभ मृदा धातु कहते हैं, की कम आपूर्ति पर चिंता जताई गई है। क्यों? (2012)
- चीन, जो इन तत्त्वों का सबसे बड़ा उत्पादक है, द्वारा इनके निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगा दिया गया है।
- चीन, ऑस्ट्रेलिया, कनाड़ा और चिली को छोड़कर अन्य किसी भी देश में ये तत्त्व नहीं पाए जाते हैं।
- दुर्लभ मृदा धातु विभिन्न प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक सामानों के निर्माण में आवश्यक हैं और इन तत्त्वों की मांग बढ़ती जा रही है।
उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही हैं/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)

