सामाजिक न्याय
बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान
प्रिलिम्स के लिये: बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (UN SDG), अनुच्छेद 21, यूनिसेफ
मेन्स के लिये: भारत में बाल विवाह एक सामाजिक एवं विकासात्मक चुनौती के रूप में, बाल विवाह के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक
चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने हाल ही में बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान (BVMB) के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर देशव्यापी 100-दिवसीय जन-जागरूकता अभियान की शुरुआत की है। इसके माध्यम से भारत ने वर्ष 2030 तक बाल विवाह के उन्मूलन के संयुक्त राष्ट्र लक्ष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया है।
सारांश
- बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान 2030 तक बाल विवाह के उन्मूलन हेतु भारत के दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है, जिसमें केवल विधिक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर निवारक, समुदाय-आधारित तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम रणनीति अपनाई गई है, जो SDG 5.3 के अनुरूप है।
- हालाँकि बाल विवाह की व्यापकता में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी गहनता से निहित सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक एवं लैंगिक असमानताएँ इस प्रथा को बनाए हुए हैं। अतः बाल विवाह के समूल उन्मूलन के लिये CHAINS-BREAK जैसे समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें शिक्षा, प्रभावी प्रवर्तन, आर्थिक सुरक्षा, जागरूकता तथा संरक्षण को एकीकृत किया जाए।
बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान क्या है?
- परिचय: बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान (BVMB) की शुरुआत वर्ष 2024 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक बाल विवाह का उन्मूलन कर भारत को बाल विवाह-मुक्त बनाना है।
- यह संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है तथा केवल विधिक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर निवारक और समुदाय-आधारित दृष्टिकोण की ओर किये गए परिवर्तन को रेखांकित करता है।
- उद्देश्य: इस अभियान का लक्ष्य 2026 तक बाल विवाह की व्यापकता में 10% की कमी लाना तथा वर्ष 2030 तक इस प्रथा का पूर्ण उन्मूलन करना है।
- इसका व्यापक उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा, विवाह की आयु को विलंबित करना, बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना तथा बाल विवाह को बनाए रखने वाले सामाजिक मानदंडों और आर्थिक संवेदनशीलताओं का समाधान करना है।
- BVMB का विधिक एवं संवैधानिक आधार: यह अभियान संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है, जो जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है तथा इसे बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 का विधिक समर्थन प्राप्त है।
- इसे सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन एंड अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (2024) में दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा और अधिक सुदृढ़ किया गया है, जिसमें रोकथाम पर विशेष बल दिया गया, बचपन में हुई सगाई पर प्रतिबंध लगाया गया तथा बाल विवाह के विरुद्ध सशक्त संस्थागत तंत्र के निर्माण हेतु राज्यों को निर्देशित किया गया।
- BVMB के प्रमुख घटक: यह अभियान ज़िला एवं उप-ज़िला स्तर पर नियुक्त समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPO), रियल-टाइम रिपोर्टिंग एवं निगरानी हेतु प्रौद्योगिकी-सक्षम BVMB पोर्टल तथा विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों, पंचायतों, गैर-सरकारी संगठनों (NGO), युवा समूहों और धार्मिक नेताओं की भागीदारी के साथ व्यापक सामुदायिक सहभागिता पर आधारित है।
- BVMB के अंतर्गत प्रगति: इस अभियान ने जागरूकता अभियानों, परामर्श, निषेधाज्ञाओं (Injunctions) और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली के माध्यम से सक्रिय रोकथाम को बढ़ावा दिया है।
- यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने प्राविधिक सहायता प्रदान की है, वहीं छत्तीसगढ़ के बालोद ज़िले का भारत का पहला बाल विवाह-मुक्त ज़िला बनना और सूरजपुर ज़िले द्वारा 75 बाल विवाह-मुक्त पंचायतों की घोषणा करना, स्थानीय स्तर पर निरंतर प्रयासों के प्रभाव को उजागर करता है।
बाल विवाह क्या है?
- परिचय: बाल विवाह एक वैवाहिक संघ को संदर्भित करता है, जिसमें एक या दोनों पक्ष की आयु विवाह की कानूनी रूप से निर्धारित आयु से कम होती है।
- भारत में, इसका अर्थ है 18 वर्ष से कम आयु की लड़की या 21 वर्ष से कम आयु का लड़का, जैसा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत परिभाषित है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत, 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध बलात्कार के समान है और सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एक बाल वधू के पति द्वारा यौन हमला लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के तहत दंडनीय गंभीर यौन हमला है, जिससे बाल विवाह न केवल एक सामाजिक बुराई बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी बन जाता है।
- बाल विवाह का वैश्विक प्रसार: बाल विवाह को समाप्त करना संयुक्त राष्ट्र SDG 5 के तहत एक मुख्य लक्ष्य है, जो लैंगिक समानता प्राप्त करने और सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाने का प्रयास करता है।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 विशेष रूप से बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह जैसी अन्य कुरीतियों के उन्मूलन का आह्वान करता है।
- प्रगति का मापन 18 वर्ष से पूर्व विवाहित 20-24 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या के भाग से किया जाता है।
- प्रयासों के बावज़ूद वर्ष 2023 में UNICEF के अनुमान के अनुसार विश्व भर में लगभग 64 करोड़ लड़कियों का विवाह बचपन में हुआ था।
- यह प्रथा सब-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका एवं मध्य पूर्व के कुछ भागों में सर्वाधिक प्रचलित है।
- विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि प्रगति को लगभग 20 गुना तेज़ नहीं किया गया, तो विश्व वर्ष 2030 के लक्ष्यों और स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी एवं लैंगिक समानता से संबंधित अन्य विकास लक्ष्यों में पिछड़ जाएगा।
- सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 विशेष रूप से बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह जैसी अन्य कुरीतियों के उन्मूलन का आह्वान करता है।
- भारत और बाल विवाह: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) (2019-21) के अनुसार, भारत ने बाल विवाह को वर्ष 2005–06 के 47.4% से घटाकर वर्ष 2019–21 में 23.3% कर दिया है, हालाँकि वर्ष 2015–16 के बाद प्रगति धीमी हो गई।
- हालाँकि भारत में विश्व की लगभग एक-तिहाई बालिकाओं के विवाह होते हैं।
- वृहद् क्षेत्रीय असमानताएँ बनी हुई हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा में सबसे अधिक दरें हैं और लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, गोवा और नागालैंड में सबसे कम हैं।
- शिक्षा और आय के आधार पर तीव्र असमानताएँ मौज़ूद हैं: 4% उच्च शिक्षित लड़कियों की तुलना में 48% अशिक्षित लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है, जबकि 40% सबसे गरीब परिवारों की लड़कियों का विवाह शीघ्र हो जाता है, 8% सबसे अमीर परिवारों की तुलना में।
बाल विवाह रोकने के लिये भारतीय पहलें
- कानूनी ढाँचा:
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006: बच्चे को 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष या 18 वर्ष से कम आयु की महिला के रूप में परिभाषित करता है, बाल विवाह को संज्ञेय और गैर-ज़मानती अपराध बनाता है तथा बाल विवाह को रद्द करने की अनुमति देता है।
- यह वयस्क वर और उन लोगों के लिये सज़ा निर्धारित करता है, जो विवाह में सहायता या संचालन करते हैं।
- पॉक्सो अधिनियम, 2012: 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंधों को अपराध मानता है, उन्हें इस अधिनियम के तहत बलात्कार एवं अन्य यौन अपराधों के रूप में मानता है।
- बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006: बच्चे को 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष या 18 वर्ष से कम आयु की महिला के रूप में परिभाषित करता है, बाल विवाह को संज्ञेय और गैर-ज़मानती अपराध बनाता है तथा बाल विवाह को रद्द करने की अनुमति देता है।
- प्रमुख अभियान:
- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP): लड़कियों की शिक्षा और सशक्तीकरण को बढ़ावा देता है; स्कूली निरंतरता में सुधार करके वैवाहिक उम्र को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाता है।
- सामाजिक-आर्थिक प्रोत्साहन:
- सुकन्या समृद्धि योजना: लड़कियों की शिक्षा और भविष्य के लिये बचत को प्रोत्साहित करती है, शीघ्र विवाह के लिये आर्थिक दबाव को कम करती है।
- कन्याश्री प्रकल्प (पश्चिम बंगाल): वार्षिक छात्रवृत्ति (13-18 वर्ष) और एकमुश्त अनुदान (18-19 वर्ष) यदि लड़की अविवाहित रहती है और शिक्षा जारी रखती है।
- कल्याण लक्ष्मी/शादी मुबारक (तेलंगाना): विवाह के लिये वित्तीय सहायता केवल तभी यदि दुल्हन 18+ वर्ष की है, जो बाल विवाह को हतोत्साहित करती है।
- संस्थागत तंत्र:
- चाइल्डलाइन 1098: जबरन या शीघ्र विवाह के जोखिम वाले बच्चों को बचाने के लिये 24x7 आपातकालीन हेल्पलाइन।
- बाल कल्याण समितियाँ (CWC): बचाए गए बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और सर्वोत्तम हित का निर्णय लेने वाला अर्द्ध-न्यायिक निकाय।
भारत में बाल विवाह को रोकने में प्रमुख चुनौतियाँ और इसे समाप्त करने के उपाय क्या हैं?
बाल विवाह इसलिये जारी है क्योंकि बच्चे गरीबी, पितृसत्ता और कमज़ोर संस्थानों की शृंखला में फँसे रहते हैं। इन बाधाओं को तोड़ने के लिये शिक्षा, प्रवर्तन, आर्थिक सुरक्षा, जागरूकता और सुरक्षा पर केंद्रित एक विघटन-आधारित रणनीति (BREAK-based strategy) की आवश्यकता है।
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चुनौतियाँ (शृंखला) |
आगे की राह (विघटन) |
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सांस्कृतिक मानदंड और परंपरा: सम्मान, जातिगत मानदंडों और बचपन में हुई सगाई से प्रेरित शीघ्र विवाह की सामाजिक स्वीकृति एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है क्योंकि यह प्रथा को सामान्य बनाती है और विधिक प्रवर्तन को कमज़ोर करती है। |
लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना: समग्र शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा के लिये छात्राओं को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना जैसी योजनाएँ माध्यमिक शिक्षा में छात्राओं की निरंतरता में सुधार करती हैं, जो कम उम्र में विवाह के विरुद्ध सबसे प्रभावी निवारक है (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5)। |
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पारिवारिक गरीबी: आर्थिक असुरक्षा परिवारों को शीघ्र विवाह हेतु जीविका-रणनीति के रूप में देखने के लिये प्रेरित करती है, ताकि आर्थिक बोझ और दहेज़ संबंधी दबावों को कम किया जा सके। |
प्रवर्तन में सुधार और दृढ़ता लाना: महिलाओं के लिये विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तक बढ़ाने का प्रस्ताव उच्च शिक्षा, कौशल विकास, कार्यबल की भागीदारी को बढ़ावा देने तथा बाल विवाहों को और हतोत्साहित करने का प्रयास करता है। बाल विवाह निगरानी और प्रतिबंधक प्रणाली पूर्णकालिक बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों, ज़िला स्तरीय निगरानी और वास्तविक समय रिपोर्टिंग के माध्यम से प्रवर्तन को मज़बूत करती है। |
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शिक्षा में पहुँच अंतराल: गुणवत्तापूर्ण माध्यमिक शिक्षा तक सीमित पहुँच और उच्च ड्रॉपआउट दरें बाल विवाह के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती हैं, विशेष रूप से ग्रामीण और उपेक्षित वर्ग की लड़कियों के बीच। |
परिवारों को आर्थिक सहायता: दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसी आजीविका और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ परिवार की आय को स्थिर करके गरीबी-प्रेरित शीघ्र विवाहों को कम करती हैं। |
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कानूनों का अप्रभावी कार्यान्वयन: बाल विवाह कानूनों का कमज़ोर प्रवर्तन, अत्यधिक कार्यभारित अधिकारी और निम्न दोषसिद्धि दरें निवारक प्रभाव को कमज़ोर करती हैं और प्रथा को निर्बाध रूप से जारी रहने देती हैं। |
जागरुकता और सामुदायिक स्वामित्व: पोषण अभियान और राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम आंगनवाड़ी और सहकर्मी शिक्षकों का लाभ उठाकर मानदंडों को बदलने तथा विवाह में विलंब करने में सहायक हैं। |
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मानकीय लैंगिक असमानता: गहराई से जमी हुई लैंगिक असमानता लड़कियों की स्वायत्तता को सीमित करती है और शिक्षा पर शीघ्र विवाह को प्राथमिकता देती है, जिससे महिला यौनिकता पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण सुदृढ़ होता है। उत्पीड़न, हिंसा या सामाजिक प्रतिक्रिया का भय परिवारों को संरक्षण के कथित साधन के रूप में लड़कियों का शीघ्र विवाह करने के लिये विवश करते हैं। |
लड़कियों को सुरक्षित और सशक्त बनाना: मिशन शक्ति और किशोरियों से संबंधित योजना जैसी पहलें सुरक्षा, जीवन कौशल और स्वास्थ्य समर्थन को मज़बूत करती हैं, जिससे लड़कियों को जल्दी विवाह का विरोध करने में सक्षम बनाया जाता है। |
निष्कर्ष
भारत में बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष ने प्रारंभिक सामाजिक सुधार आंदोलनों से विकसित होकर एक मज़बूत कानूनी और संस्थागत ढाँचे का रूप ले लिया है, जिनका नेतृत्व राजा राममोहन रॉय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और महात्मा ज्योतिराव फुले ने किया। आधुनिक पहलें, जैसे– BVMB इस विरासत को रोकथाम, तकनीकी साधनों और सामुदायिक सक्रियता के ज़रिये आगे बढ़ा रही हैं। लगातार सामूहिक प्रयास करने से भारत बाल विवाह-मुक्त भविष्य की दिशा में अग्रसर हो सकता है, जो गरिमा, समानता और विकास के आदर्शों के अनुरूप होगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. कानूनी निषेध के बावजूद भारत में बाल विवाह आज भी प्रचलित है। इसके लिये ज़िम्मेदार सामाजिक-आर्थिक और संस्थागत कारणों का विश्लेषण कीजिये और आगे बढ़ने का मार्ग सुझाइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान क्या है?
वर्ष 2024 में शुरू किया गया एक राष्ट्रीय अभियान, जिसका लक्ष्य रोकथाम, सामुदायिक भागीदारी और तकनीक-आधारित निगरानी के माध्यम से वर्ष 2030 तक बाल विवाह का उन्मूलन करना है।
2. भारत में बाल विवाह को मुख्य रूप से कौन-सा कानून नियंत्रित करता है?
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006, जो वैध आयु को परिभाषित करता है, दंड का प्रावधान करता है और रोकथाम के तंत्र को सक्षम बनाता है।
3. वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल विवाह पर क्या निर्णय दिया?
इसने बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाया, दंड के बजाय रोकथाम पर ज़ोर दिया और राज्यों को संस्थागत प्रवर्तन मज़बूत करने का निर्देश दिया।
4. NFHS के आँकड़े भारत में बाल विवाह के बारे में क्या बताते हैं?
बाल विवाह की दर घटकर 23.3% (2019–21) हो गई है, लेकिन यह गरीब, कम शिक्षित और कुछ विशेष क्षेत्रों की आबादी में अभी भी अधिक है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. राष्ट्रीय बाल नीति के मुख्य प्रावधानों का परीक्षण कीजिये तथा इसके क्रियान्वयन की प्रस्थिति पर प्रकाश डालिये। (2016)
प्रश्न. रीति-रिवाज़ों एवं परंपराओं द्वारा तर्क को दबाने से प्रगति-विरोध उत्पन्न हुआ है। क्या आप इससे सहमत हैं? (2020)

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
हेल्थकेयर में नैनोरोबोट्स
प्रिलिम्स के लिये: नैनोरोबोट्स, नैनोटेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर्स, क्वांटम डॉट्स, सोलर सेल्स, पॉलिमर, स्टेम सेल्स, mRNA वैक्सीन, टी-सेल्स, बायोएक्यूमुलेशन, खाद्य शृंखला, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन।
मेन्स के लिये: मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स से संबंधित प्रमुख तथ्य, स्वास्थ्य देखभाल में नैनोप्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग, इससे जुड़ी चिंताएँ और आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
IISc बंगलुरु के एक शोधकर्त्ता को मैग्नेटिक नैनोरोबोट विकसित करने के लिये प्रतिष्ठित न्यू यॉर्क एकेडमी ऑफ साइंसेज 2025 और टाटा संस ट्रांसफॉर्मेशन प्राइज़ से सम्मानित किया गया, जिससे सटीक, मिनिमम इनवेसिव और अधिक प्रभावी उपचारों के मार्ग प्रशस्त हुए।
- उनका शोध वर्तमान कैंसर उपचार की एक बड़ी चुनौती को हल करने का प्रयास करता है, ताकि दवाओं को ट्यूमर के भीतर सुरक्षित रूप से पहुँचाया जा सके बिना स्वस्थ ऊतकों को नुकसान पहुँचाए और इस तरह स्वास्थ्य देखभाल में नैनोटेक्नोलॉजी के नए अवसर सृजित हों।
सारांश
- चुंबकीय नैनोरोबोट सटीक, मिनिमम इनवेसिव (ऐसी चिकित्सा प्रक्रिया जिसमें शरीर में बहुत छोटा चीरा लगाना पड़ता है या बिल्कुल नहीं) दवा वितरण, हाइपरथर्मिया और संभावित इमेजिंग-निर्देशित उपचार को सक्षम बनाते हैं।
- नैनोप्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग निदान, पुनर्योजी चिकित्सा, जीवाणुरोधी उपचार और वैक्सीन तक फैले हुए हैं।
- चुनौतियों में नैनोटॉक्सिसिटी, नियामक अंतराल, नैतिक चिंताएँ और उच्च लागत शामिल हैं, इनके समाधान और इसे सर्वसुलभ बनाने के लिये नैदानिक परीक्षणों (Clinical Trials) और अनुकूल सरकारी नीतियों की अनिवार्यता है।
मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स क्या होते हैं?
- परिचय: मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स सूक्ष्मदर्शी मशीनें हैं, जो आयरन ऑक्साइड जैसी मैग्नेटिक सामग्रियों से बनी या लेपित होती हैं। शरीर के बाहर से लगाए गए मैग्नेटिक/चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा इन्हें सटीक रूप से निर्देशित किया जा सकता है, ताकि ये रक्त वाहिकाओं या ऊतकों में बिना किसी अंतर्निहित ऊर्जा स्रोत के गतिशीलता प्राप्त कर सकें।
- कार्यप्रणाली: ये बैक्टीरिया की कॉर्कस्क्रू (Corkscrew) जैसी गति का अनुकरण करते हैं, जिसमें एक छोटा, हेलिक्स-आकार का पूँछ प्रोपेलर की तरह कार्य करती है।
- इस हेलिक्स (कुंडली) से जुड़े एक मैग्नेटिक के माध्यम से इसे बाहरी मैग्नेटिक क्षेत्रों द्वारा नियंत्रित और संचालित किया जा सकता है, जिससे यह जटिल जैविक वातावरण के भीतर आगे बढ़ने के लिये 'ड्रिलिंग' जैसी गति (Motion) करने में सक्षम हो जाता है।
- इनकी संरचना बायोकंपैटिबल (Biocompatible) होती है, जो सिलिका और लोहे से बनी होती है और इन्हें कैंसर की दवाओं से कोट किया जा सकता है, जिससे ये प्रभावी रूप से लक्षित दवा वितरण वाहनों (Delivery Trucks) के रूप में कार्य कर सकें।
- प्रमुख अनुप्रयोग: ये मिनिमम इनवेसिव हेतु महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ रखते हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
- उपचार प्रभाव को बढ़ाना: चिकित्सकीय पदार्थों को सीधे रोगस्थल, जैसे– ट्यूमर तक पहुँचाना, जिससे प्रभावकारिता बढ़े और शरीर में दुष्प्रभाव कम हों।
- निदानात्मक उपकरण: बायोसेंसिंग, इमेजिंग में सुधार या बायोफिल्म हटाना।
- दंत चिकित्सा: ये रूट कैनाल उपचार के लिये एक आशाजनक, बिना दर्द वाला विकल्प प्रदान करते हैं, जो प्रभावी रूप से एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया (E. faecalis) को लक्षित करते हैं बिना आसपास के ऊतक को नुकसान पहुँचाए।
नैनोटेक्नोलॉजी
- परिचय: नैनोटेक्नोलॉजी विज्ञान और इंजीनियरिंग की उस शाखा को संदर्भित करती है जो नैनोस्केल अर्थात, एक या एक से अधिक आयाम 100 नैनोमीटर (मिलीमीटर का 100 मिलियनवाँ भाग) या उससे कम पर परमाणुओं और अणुओं में हेरफेर करके संरचनाओं, उपकरणों तथा प्रणालियों को डिज़ाइन करने, उत्पादन करने और उपयोग करने के लिये समर्पित है।
- नैनोटेक्नोलॉजी के विकास के लिये आणविक सिमुलेशन अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह वैज्ञानिकों को कंप्यूटर मॉडल का उपयोग करके विभिन्न परिस्थितियों में परमाणु, आणविक और नैनो संरचना व्यवहार का अनुकरण करने में सक्षम बनाता है
- गुण:
- यांत्रिक गुण: नैनो पदार्थों में दानों (ग्रेन्स) का आकार अत्यंत छोटा होने के कारण उनकी यांत्रिक शक्ति अधिक होती है। इनका उपयोग ऐसे अनुप्रयोगों में किया जाता है जहाँ मज़बूत, हल्के पदार्थों की आवश्यकता होती है, जैसे कि एयरोस्पेस और ऑटोमोटिव उद्योग।
- क्वांटम साइज़ इफेक्ट: कणों का आकार घटने पर क्वांटम मेकैनिकल इफेक्ट हावी हो जाते हैं, जो सेमीकंडक्टर, ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स और गैर-रेखीय प्रकाशिकी के लिये एक महत्त्वपूर्ण गुण है। उदाहरण के लिये, क्वांटम डॉट्स को उनके आकार को समायोजित करके विशिष्ट प्रकाश तरंगदैर्घ्य उत्सर्जित या अवशोषित करने के लिये ट्यून किया जा सकता है, जिससे वे डिस्प्ले तकनीकों और सौर सेल के लिये महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।
- उत्प्रेरक क्षमता: नैनोमैटेरियल्स में उनके बढ़े हुए सतही क्षेत्र के कारण उन्नत उत्प्रेरक गुण होते हैं, जो उन्हें रासायनिक प्रतिक्रियाओं और पर्यावरणीय सुधार के लिये आदर्श बनाते हैं।
- चुंबकीय विशेषताएँ: नैनोकण प्रायः एकल मैग्नेटिक डोमेन बनाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सुपरपैरामैग्नेटिज़्म होता है, जो मैग्नेटिक रिकॉर्डिंग और सूचना भंडारण में उपयोगी गुण है।
अनुप्रयोग:
स्वास्थ्य सेवा में नैनोप्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग क्या हैं?
- लक्षित दवा वितरण और चिकित्सा: लिपोसोम, पॉलिमर और डेंड्रिमर जैसे नैनोकण लक्षित वाहक या मैजिक बुलेट के रूप में कार्य करते हैं, जो दवाओं, जीनों या नैदानिकों को विशेष रूप से ट्यूमर जैसी रोगग्रस्त कोशिकाओं तक पहुँचाते हैं, जिससे प्रणालीगत दुष्प्रभाव कम होते हैं और उपचार दक्षता में सुधार होता है।
- यह लक्षित दृष्टिकोण अल्ज़ाइमर जैसे तंत्रिका संबंधी विकारों के इलाज के लिये रक्त-मस्तिष्क (Blood-Brain) अवरोध जैसी कठिन बाधाओं के पार दवा वितरण को भी सक्षम बनाता है।
- उन्नत निदान और इमेजिंग: नैनोप्रौद्योगिकी रोगजनकों, बायोमार्कर और ग्लूकोज़ स्तरों का त्वरित, संवेदनशील और पोर्टेबल डिटेक्टशन को संभव बनाती है, जो प्रारंभिक रोग निदान और महामारी प्रबंधन के लिये महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, गोल्ड नैनोपार्टिकल और क्वांटम डॉट्स MRI, CT स्कैन और फ्लोरोसेंस इमेजिंग के रिज़ॉल्यूशन और विशिष्टता को बढ़ाते हैं, जिससे अधिक सटीक रोग का पता लगाना संभव होता है।
- पुनर्योजी चिकित्सा और ऊतक इंजीनियरिंग: नैनोप्रौद्योगिकी कोशिका वृद्धि और ऊतक पुनर्जनन का मार्गदर्शन करने के लिये आवश्यक संरचनात्मक और जैव रासायनिक संकेत प्रदान कर सकती है, जो हड्डियों, उपास्थि, तंत्रिकाओं और हृदय ऊतक की मरम्मत में सहायता करती है। इसके अतिरिक्त, नैनोपार्टिकल स्टेम सेल को उपचारात्मक जीनों को ट्रैक, विभेदित और वितरित कर सकते हैं, जो रीढ़ की हड्डी में चोट और अपकर्षी रोगों के उपचार को बढ़ाता है।
- रोगाणुरोधी अनुप्रयोग: चिकित्सा उपकरणों (कैथेटर, इंप्लांट, सर्जिकल उपकरण) और अस्पताल की सतहों पर चांदी, तांबा या ज़िंक ऑक्साइड नैनोपार्टिकल की कोटिंग स्वास्थ्य सेवा से संबंधित संक्रमणों को रोकते हैं।
- वैक्सीन डेवलपमेंट और इम्यूनोथेरैपी: mRNA वैक्सीन में नैनोपार्टिकल-आधारित वैक्सीन प्लेटफॉर्म एंटीजन स्थिरता में सुधार करते हैं, नियंत्रित रिलीज़ को सक्षम करते हैं और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ाते हैं। इसके अतिरिक्त, नैनोपार्टिकल कैंसर कोशिकाओं के विरुद्ध T-सेल को सटीक रूप से सक्रिय करने के लिये इम्यूनोमोड्यूलेटर वितरित कर सकते हैं, जो ऑन्कोलॉजी में एक प्रमुख प्रगति का प्रतिनिधित्व करता है।
स्वास्थ्य सेवा में नैनोप्रौद्योगिकी को अपनाने में प्रमुख बाधाएँ क्या हैं?
- नैनोविषाक्तता: एक प्रमुख चुनौती मनुष्यों और पारिस्थितिक तंत्र में नैनोपार्टिकल जैवसंचयन, बायोडिग्रेडेबिलिटी और पुरानी विषाक्तता पर अपर्याप्त डेटा के कारण अज्ञात दीर्घकालिक प्रभाव हैं। उनकी पर्यावरणीय दृढ़ता मृदा, जल और खाद्य शृंखलाओं में स्थायी नैनोप्रदूषण पैदा करने का जोखिम उठाती है।
- विनियामक और मानकीकरण संबंधी चुनौतियाँ: वर्तमान विनियम, जैसे कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन से, नैनोसामग्री के नए गुणों के लिये अनुपयुक्त हैं, जिससे एक नियामक अंतर उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त, नामकरण, अभिलक्षणीकरण और सुरक्षा परीक्षण के लिये सार्वभौमिक मानकों की कमी अस्थिरता का कारण बनती है व गुणवत्ता नियंत्रण में बाधा डालती है।
- नैतिक, कानूनी और सामाजिक प्रभाव: प्रत्यारोपण योग्य नैनोसेंसर डेटा गोपनीयता, सुरक्षा और शारीरिक स्वायत्तता से संबंधित गंभीर चिंताएँ व्यक्त करते हैं, जबकि वे एक नैनो-विभाजन का जोखिम भी उठाते हैं जहाँ उन्नत चिकित्सा केवल धनाड्य वर्ग के लिये सुलभ होती है, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं में वृद्धि देखने को मिलती है।
- इसके अतिरिक्त, जागरूकता की कमी और भय, जैसे कि ग्रे गू (grey goo) परिदृश्य (अनियंत्रित स्व-प्रतिकृति) से सार्वजनिक विश्वास चुनौतीपूर्ण होता है, जो आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों के साथ प्रतिरोधात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर सकता है।
- उच्च लागत और आर्थिक व्यवहार्यता: नैनोप्रौद्योगिकी अनुसंधान के लिये इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप जैसे महंगे, परिष्कृत उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिससे मौलिक कार्य और प्रोटोटाइप लागत महंगी होती है। गुणवत्ता और लागत बनाए रखते हुए नैनोसामग्री उत्पादन को प्रयोगशाला-से-उद्योग तक बढ़ाना एक प्रमुख चुनौती है, जिससे एक निरंतर प्रयोगशाला-से-बाज़ार अंतर उत्पन्न होता है।
हेल्थकेयर में नैनोटेक्नोलॉजी को सतत और सुरक्षित तरीके से अपनाने हेतु कौन-से कदम ज़रूरी हैं?
- अनुसंधान एवं विकास (R&D): नैनोमैटेरियल्स के जैव-संचयन, अपघटन मार्गों तथा दीर्घकालिक प्रभावों पर अनिवार्य और पर्याप्त रूप से वित्तपोषित अध्ययनों की व्यवस्था की जानी चाहिये। साथ ही सेफ्टी-बाय-डिज़ाइन सिद्धांत के तहत लिपिड्स और प्राकृतिक पॉलिमरों का उपयोग कर जैव-अपघटनीय एवं गैर-विषाक्त नैनोमैटेरियल्स के लिये ग्रीन नैनोटेक्नोलॉजी को प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिये।
- नैतिक, सामाजिक एवं आर्थिक शासन: तकनीकी R&D के समानांतर गोपनीयता, स्वायत्तता, समानता और डेटा स्वामित्व जैसे मुद्दों को संबोधित करने हेतु सक्रिय ELSA अनुसंधान को वित्तपोषित किया जाना चाहिये। नैनो-डिवाइड को रोकने के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से समान सुलभता सुनिश्चित की जाए तथा विश्वास निर्माण हेतु पारदर्शी जन-सहभागिता शुरू की जाए।
- क्लिनिकल ट्रांसलेशन एवं व्यवसायीकरण: क्लिनिकल ट्रांसलेशन अनुसंधान के लिये वित्तीय समर्थन प्रदान कर वैली ऑफ डेथ की खाई को पाटा जाए और किफायती, बड़े पैमाने पर उत्पादन हेतु स्केलेबल विनिर्माण प्रणालियाँ विकसित की जाएँ। सामग्री वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और अभियंताओं के बीच अंतरविषयक सहयोग को प्रोत्साहित किया जाए ताकि समाधान चिकित्सकीय रूप से प्रासंगिक और व्यवहार्य हों।
- पर्यावरणीय संरक्षण: नैनोमैटेरियल्स के उत्पादन और निपटान के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) को अनिवार्य किया जाए तथा सुरक्षित निपटान और पुनर्चक्रण हेतु विशिष्ट प्रोटोकॉल विकसित किये जाएँ। साथ ही, जल, मृदा और वायु में अभियांत्रिक नैनोकणों की निगरानी हेतु पर्यावरणीय मॉनिटरिंग कार्यक्रम स्थापित किये जाएँ।
निष्कर्ष
मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स नैनोमेडिसिन में एक महत्त्वपूर्ण प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं, क्योंकि ये सटीक और न्यूनतम आक्रामक उपचार को संभव बनाते हैं। हालाँकि, इनका क्लिनिकल अडॉप्शन नैनो-विषाक्तता, नियामकीय और नैतिक चुनौतियों के समाधान पर निर्भर करता है। इसके लिये सतत अनुसंधान एवं विकास, सुदृढ़ नैतिक शासन, समान पहुँच, प्रभावी क्लिनिकल ट्रांसलेशन तथा सुदृढ़ पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं, ताकि स्वास्थ्य सेवाओं में इनका सुरक्षित, किफायती और ज़िम्मेदार उपयोग सुनिश्चित किया जा सके।
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दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न. नैनोप्रौद्योगिकी स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने की अपार क्षमता रखती है। इसके प्रमुख अनुप्रयोगों पर चर्चा कीजिये तथा भारत में इसके व्यापक अपनाव में बाधा बनने वाली प्रमुख नैतिक और नियामकीय चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स क्या हैं?
मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स सूक्ष्म, हेलिक्स-आकार के उपकरण होते हैं, जिन्हें बाह्य चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा संचालित किया जाता है। ये ट्यूमर जैसे लक्षित ऊतकों तक दवाओं को सटीक रूप से पहुँचाने में सक्षम होते हैं।
2. मैग्नेटिक नैनोरोबोट्स मानव शरीर के भीतर कैसे संचालित होते हैं?
ये बाह्य चुंबकीय क्षेत्रों की सहायता से आगे बढ़ते और नियंत्रित होते हैं। इनकी कॉर्कस्क्रू जैसी हेलिकल संरचना बैक्टीरिया की गति की नकल करती है, जिससे ये ऊतकों और द्रवों के माध्यम से आगे बढ़ पाते हैं।
3. स्वास्थ्य क्षेत्र के संदर्भ में ‘नैनो-डिवाइड’ से क्या अभिप्राय है?
नैनो-डिवाइड से तात्पर्य असमान पहुँच के जोखिम से है, जिसमें उन्नत और उच्च लागत वाली नैनोमेडिसिन उपचार विधियाँ केवल समृद्ध व्यक्तियों या देशों तक सीमित रह जाती हैं, जिससे वैश्विक स्वास्थ्य असमानताएँ और बढ़ जाती हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्नः निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- परासूक्ष्मकण (नैनोपार्टिकल्स) मानव-निर्मित होने के सिवाय प्रकृति में अस्तित्व में नहीं है।
- कुछ धात्विक ऑक्साइडों के परासूक्ष्मकण, प्रसाधन-सामग्री (कॉस्मेटिक्स) के निर्माण में काम आते हैं।
- कुछ वाणिज्यिक उत्पादों के परासूक्ष्मकण, जो पर्यावरण में आ जाते हैं, मनुष्यों के लिये असुरक्षित हैं।
उपर्युक्त कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 2
(d) केवल 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न: विभिन्न उत्पादों के विनिर्माण में उद्योग द्वारा प्रयुक्त होने वाले कुछ रासायनिक तत्त्वों के नैनो-कणों के बारे में कुछ चिंता है। क्यों? (2014)
- वे पर्यावरण में संचित हो सकते हैं तथा जल और मृदा को संदूषित कर सकते हैं।
- वे खाद्य शृंखलाओं में प्रविष्ट हो सकते हैं।
- वे मुक्त मूलकों के उत्पादन को विमोचित कर सकते हैं।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्नः नैनोटेक्नोलॉजी से आप क्या समझते हैं और यह स्वास्थ्य क्षेत्र में कैसे मदद कर रही है? (2020)
प्रश्नः अतिसूक्ष्म प्रौद्योगिकी (नैनोटेक्नोलॉजी) 21वीं शताब्दी की प्रमुख प्रौद्योगिकियों में से एक क्यों है? अतिसूक्ष्म विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर भारत सरकार के मिशन की प्रमुख विशेषताओं तथा देश के विकास के प्रक्रम में इसके प्रयोग के क्षेत्र का वर्णन कीजिये। (2016)

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