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भारतीय न्याय संहिता, 2023

  • 25 Oct 2023
  • 8 min read

प्रिलिम्स के लिये:

भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), भारतीय साक्ष्य अधिनियम, सर्वोच्च न्यायालय, व्यभिचार, राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड

मेन्स के लिये:

भारतीय न्याय संहिता, 2023, संशोधन, सरकारी नीतियों तथा विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप एवं उनके डिज़ाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स

चर्चा में क्यों?

हाल ही में एक संसदीय समिति ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 विधेयक की समीक्षा की है, जिसमें भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में महत्त्वपूर्ण बदलावों का प्रस्ताव दिया गया है, जिसमें व्यभिचार को अपराध मानने वाले लिंग-तटस्थ प्रावधान तथा सिफारिशें शामिल हैं।

  • गृह मंत्रालय द्वारा पेश किया गया BNS विधेयक, औपनिवेशिक युग के भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रावधानों को बदलने का प्रयास करता है।

BNS में प्रस्तावित परिवर्तनों की मुख्य विशेषताएँ:

  • व्यभिचार और लिंग-तटस्थ प्रावधान:
    • संसदीय समिति ने व्यभिचार को अपराध मानने वाले लिंग-तटस्थ प्रावधान को शामिल करने की सिफारिश की है।
      • यह कदम सर्वोच्च न्यायालय (SC) द्वारा वर्ष 2018 में व्यभिचार को अपराध मानने वाली भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 497 को असंवैधानिक घोषित करने के बाद उठाया गया है।
    • पैनल लिंग-तटस्थ तरीके से विवाह संस्था की रक्षा करना चाहता है।
  • बिना सहमति के शारीरिक संबंध स्थापित करना और पाशविकता:
    • यह समिति पुरुषों, महिलाओं या ट्रांसपर्सन के बीच गैर-सहमति वाले यौन संबंधों के साथ-साथ पाशविकता के कृत्यों को अपराध मानने के लिये एक खंड पर विचार कर रही है।
    • यह यौन अपराधों के विभिन्न रूपों को व्यापक रूप से संबोधित करने के प्रयास को इंगित करती है।
  • विभिन्न शब्दों की परिभाषा:
    • समिति ने विधेयक में "सामुदायिक सेवा" और "आजीवन कारावास" जैसे शब्दों के लिये बेहतर परिभाषाएँ सुझाई हैं।
  • सकारात्मक परिवर्तन:
    • नए ड्राफ्ट कोड में धारा 124A (देशद्रोह) को हटाने और विदेशों में किये गए अपराधों पर मुकदमा चलाने के प्रावधान शामिल हैं।

व्यभिचार को वैध बनाने और अपराध घोषित करने के पक्ष में तर्क:

  • व्यभिचार को वैध बनाना
    • व्यक्तिगत स्वायत्तता और गोपनीयता: जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ, 2018 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वायत्तता एवं गोपनीयता के अधिकार के महत्त्व को मान्यता दी।
    • व्यभिचार को वैध बनाना वयस्कों का राज्य के हस्तक्षेप के बिना अपने व्यक्तिगत संबंधों के बारे में निर्णय लेने के अधिकार को स्वीकार करता है।
      • न्यायालय ने कहा कि 158 वर्ष पुराना कानून असंवैधानिक है और अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
    • डॉक्ट्रिन ऑफ करवेचर: भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code- IPC) की धारा 497 कवरचर के सिद्धांत पर आधारित है।
      • हालाँकि यह संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है इस सिद्धांत के अनुसार, विवाह के बाद एक महिला अपनी पूर्व पहचान और कानूनी अधिकार खो देती है, यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
    • मानवीय स्वतंत्रता: सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार, विवाह का मतलब एक की स्वायत्तता दूसरे को सौंपना नहीं है।
      • यौन विकल्प चुनने की क्षमता मानव स्वतंत्रता के लिये आवश्यक है। यहाँ तक कि निजी क्षेत्रों में भी किसी व्यक्ति को उसकी पसंद से संबंध बनाने की अनुमति दी जानी चाहिये।
      • सर्वोच्च न्यायालय का मानना है कि "समाज एक महिला पर असंभव गुण थोपता है, उसे ऊँचे पायदान पर खड़ा करता है तथा उसे एक दायरे में सीमित कर देता है, समाज उसे एक वस्तु की श्रेणी में रखता है और कहता है कि उसे पवित्र होना चाहिये। लेकिन उसी समाज को बलात्कार, ऑनर किलिंग, लिंग-निर्धारण और शिशु हत्या जैसे कृत्य करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होती।"
    • निवारण प्रभाव: वैधीकरण उन व्यक्तियों पर कानून के भयावह प्रभाव को खत्म कर सकता है जो विधिक परिणामों के डर के कारण अपमानजनक या नाखुश विवाह को छोड़ने के लिये अनिच्छुक हो जाते हैं।
      • यह मुक्त संचार और वैवाहिक मुद्दों के समाधान को प्रोत्साहित कर सकता है।
    • न्यायिक बोझ को कम करना: व्यभिचार के मामले कानूनी व्यवस्था पर बोझ डालते थे। इसका विधिकरण किये जाने से न्यायालय अधिक गंभीर मुद्दों और मामलों को निपटाने के लिये स्वतंत्र हो सकते हैं।
  • व्यभिचार को अपराध घोषित करना:
    • वैवाहिक पवित्रता का संरक्षण: व्यभिचार वैवाहिक प्रथा को नुकसान पहुँचा सकता है, जिससे परिवार टूट सकते हैं और जीवनसाथी एवं बच्चों को भावनात्मक आघात लग सकता है। इसे अपराध घोषित करना विवाह की पवित्रता की रक्षा करने के एक साधन के रूप में देखा जा सकता है।
    • लिंग संरक्षण: यह तर्क दिया जाता है कि व्यभिचार को अपराध घोषित करना महिलाओं को बेवफा जीवनसाथी से बचाने का एक साधन है जो अन्यथा उन्हें छोड़ सकते हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से कमज़ोर हो सकती हैं।
    • नैतिक और सामाजिक मूल्य: यह तर्क दिया जाता है कि व्यभिचार (Adultery) कानून पारंपरिक नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों को बरकरार रखता है, जो अभी भी भारतीय समाज में कई लोगों के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
      • व्यभिचार को अपराध घोषित करने को पारिवारिक संरचना की सुरक्षा एवं संरक्षण के एक तरीके के रूप में देखा जा सकता है, जिसे समाज का मूलभूत निर्माण खंड माना जाता है।

आगे की राह

  • परिवारों और रिश्तों पर व्यभिचार के प्रभाव के बारे में जागरूकता उत्पन्न करने से व्यक्तियों को अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में सूचित निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
  • मैरिज काउंसलिंग के मामलों में जोड़ों को विवाह परामर्श और मध्यस्थता के लिये प्रोत्साहित करना व्यभिचार के मुद्दों को हल करने के लिये एक सक्रिय दृष्टिकोण हो सकता है। ऐसी सेवाओं की उपलब्धता एवं पहुँच को बढ़ावा देना लाभप्रद हो सकता है।
  • जोड़ों को न्यायालय प्रणाली के बाहर बेवफाई या वैवाहिक कलह से संबंधित मुद्दों को सुलझाने में मदद करने के लिये मध्यस्थता जैसे वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
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