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सामाजिक न्याय

बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान

  • 12 Jan 2026
  • 99 min read

प्रिलिम्स के लिये: बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (UN SDG), अनुच्छेद 21, यूनिसेफ

मेन्स के लिये: भारत में बाल विवाह एक सामाजिक एवं विकासात्मक चुनौती के रूप में, बाल विवाह के सामाजिक-आर्थिक निर्धारक

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने हाल ही में बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान (BVMB) के एक वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर देशव्यापी 100-दिवसीय जन-जागरूकता अभियान की शुरुआत की है। इसके माध्यम से भारत ने वर्ष 2030 तक बाल विवाह के उन्मूलन के संयुक्त राष्ट्र लक्ष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया है।

सारांश

  • बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान 2030 तक बाल विवाह के उन्मूलन हेतु भारत के दृष्टिकोण में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है, जिसमें केवल विधिक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर निवारक, समुदाय-आधारित तथा प्रौद्योगिकी-सक्षम रणनीति अपनाई गई है, जो SDG 5.3 के अनुरूप है।
  • हालाँकि बाल विवाह की व्यापकता में उल्लेखनीय कमी आई है, फिर भी गहनता से निहित सामाजिक-आर्थिक, शैक्षिक एवं लैंगिक असमानताएँ इस प्रथा को बनाए हुए हैं। अतः बाल विवाह के समूल उन्मूलन के लिये CHAINS-BREAK जैसे समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें शिक्षा, प्रभावी प्रवर्तन, आर्थिक सुरक्षा, जागरूकता तथा संरक्षण को एकीकृत किया जाए।

बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान क्या है?

  • परिचय: बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान (BVMB) की शुरुआत वर्ष 2024 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक बाल विवाह का उन्मूलन कर भारत को बाल विवाह-मुक्त बनाना है।
    • यह संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है तथा केवल विधिक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर निवारक और समुदाय-आधारित दृष्टिकोण की ओर किये गए परिवर्तन को रेखांकित करता है।
  • उद्देश्य: इस अभियान का लक्ष्य 2026 तक बाल विवाह की व्यापकता में 10% की कमी लाना तथा वर्ष 2030 तक इस प्रथा का पूर्ण उन्मूलन करना है।
    • इसका व्यापक उद्देश्य बच्चों के अधिकारों की रक्षा, विवाह की आयु को विलंबित करना, बालिकाओं की शिक्षा को बढ़ावा देना तथा बाल विवाह को बनाए रखने वाले सामाजिक मानदंडों और आर्थिक संवेदनशीलताओं का समाधान करना है।
  • BVMB का विधिक एवं संवैधानिक आधार: यह अभियान संविधान के अनुच्छेद 21 पर आधारित है, जो जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है तथा इसे बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA), 2006 का विधिक समर्थन प्राप्त है।
    • इसे सोसाइटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन एंड अन्य  बनाम भारत संघ एवं अन्य (2024) में दिये गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय द्वारा और अधिक सुदृढ़ किया गया है, जिसमें रोकथाम पर विशेष बल दिया गया, बचपन में हुई सगाई पर प्रतिबंध लगाया गया तथा बाल विवाह के विरुद्ध सशक्त संस्थागत तंत्र के निर्माण हेतु राज्यों को निर्देशित किया गया
  • BVMB के प्रमुख घटक: यह अभियान ज़िला एवं उप-ज़िला स्तर पर नियुक्त समर्पित बाल विवाह निषेध अधिकारियों (CMPO), रियल-टाइम रिपोर्टिंग एवं निगरानी हेतु प्रौद्योगिकी-सक्षम BVMB पोर्टल तथा विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों, पंचायतों, गैर-सरकारी संगठनों (NGO), युवा समूहों और धार्मिक नेताओं की भागीदारी के साथ व्यापक सामुदायिक सहभागिता पर आधारित है।
  • BVMB के अंतर्गत प्रगति: इस अभियान ने जागरूकता अभियानों, परामर्श, निषेधाज्ञाओं (Injunctions) और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली के माध्यम से सक्रिय रोकथाम को बढ़ावा दिया है।
    • यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने प्राविधिक सहायता प्रदान की है, वहीं छत्तीसगढ़ के बालोद ज़िले का भारत का पहला बाल विवाह-मुक्त ज़िला बनना और सूरजपुर ज़िले द्वारा 75 बाल विवाह-मुक्त पंचायतों की घोषणा करना, स्थानीय स्तर पर निरंतर प्रयासों के प्रभाव को उजागर करता है।

बाल विवाह क्या है?

  • परिचय: बाल विवाह एक वैवाहिक संघ को संदर्भित करता है, जिसमें एक या दोनों पक्ष की आयु विवाह की कानूनी रूप से निर्धारित आयु से कम होती है।
    • भारत में, इसका अर्थ है 18 वर्ष से कम आयु की लड़की या 21 वर्ष से कम आयु का लड़का, जैसा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत परिभाषित है।
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत, 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंध बलात्कार के समान है और सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि एक बाल वधू के पति द्वारा यौन हमला लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के तहत दंडनीय गंभीर यौन हमला है, जिससे बाल विवाह न केवल एक सामाजिक बुराई बल्कि एक आपराधिक कृत्य भी बन जाता है।
  • बाल विवाह का वैश्विक प्रसार: बाल विवाह को समाप्त करना संयुक्त राष्ट्र SDG 5 के तहत एक मुख्य लक्ष्य है, जो लैंगिक समानता प्राप्त करने और सभी महिलाओं एवं लड़कियों को सशक्त बनाने का प्रयास करता है।
    • सतत विकास लक्ष्य (SDG) 5.3 विशेष रूप से बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह जैसी अन्य कुरीतियों के उन्मूलन का आह्वान करता है।
      • प्रगति का मापन 18 वर्ष से पूर्व विवाहित 20-24 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं की संख्या के भाग से किया जाता है।
    • प्रयासों के बावज़ूद वर्ष 2023 में UNICEF के अनुमान के अनुसार विश्व भर में लगभग 64 करोड़ लड़कियों का विवाह बचपन में हुआ था।
      • यह प्रथा सब-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका एवं मध्य पूर्व के कुछ भागों में सर्वाधिक प्रचलित है।
    • विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि प्रगति को लगभग 20 गुना तेज़ नहीं किया गया, तो विश्व वर्ष 2030 के लक्ष्यों और स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी एवं लैंगिक समानता से संबंधित अन्य विकास लक्ष्यों में पिछड़ जाएगा।
  • भारत और बाल विवाह: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) (2019-21) के अनुसार, भारत ने बाल विवाह को वर्ष 2005–06 के 47.4% से घटाकर वर्ष 2019–21 में 23.3% कर दिया है, हालाँकि वर्ष 2015–16 के बाद प्रगति धीमी हो गई
    • हालाँकि भारत में विश्व की लगभग एक-तिहाई बालिकाओं के विवाह होते हैं
    • वृहद् क्षेत्रीय असमानताएँ बनी हुई हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल, बिहार और त्रिपुरा में सबसे अधिक दरें हैं और लक्षद्वीप, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, गोवा और नागालैंड में सबसे कम हैं।
    • शिक्षा और आय के आधार पर तीव्र असमानताएँ मौज़ूद हैं: 4% उच्च शिक्षित लड़कियों की तुलना में 48% अशिक्षित लड़कियों का विवाह 18 वर्ष से पहले हो जाता है, जबकि 40% सबसे गरीब परिवारों की लड़कियों का विवाह शीघ्र हो जाता है, 8% सबसे अमीर परिवारों की तुलना में।

बाल विवाह रोकने के लिये भारतीय पहलें

  • कानूनी ढाँचा:
    • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006: बच्चे को 21 वर्ष से कम आयु के पुरुष या 18 वर्ष से कम आयु की महिला के रूप में परिभाषित करता है, बाल विवाह को संज्ञेय और गैर-ज़मानती अपराध बनाता है तथा बाल विवाह को रद्द करने की अनुमति देता है।
      • यह वयस्क वर और उन लोगों के लिये सज़ा निर्धारित करता है, जो विवाह में सहायता या संचालन करते हैं।
    • पॉक्सो अधिनियम, 2012: 18 वर्ष से कम आयु की पत्नी के साथ यौन संबंधों को अपराध मानता है, उन्हें इस अधिनियम के तहत बलात्कार एवं अन्य यौन अपराधों के रूप में मानता है।
  • प्रमुख अभियान:
    • बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP): लड़कियों की शिक्षा और सशक्तीकरण को बढ़ावा देता है; स्कूली निरंतरता में सुधार करके वैवाहिक उम्र को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाता है।
  • सामाजिक-आर्थिक प्रोत्साहन:
    • सुकन्या समृद्धि योजना: लड़कियों की शिक्षा और भविष्य के लिये बचत को प्रोत्साहित करती है, शीघ्र विवाह के लिये आर्थिक दबाव को कम करती है।
    • कन्याश्री प्रकल्प (पश्चिम बंगाल): वार्षिक छात्रवृत्ति (13-18 वर्ष) और एकमुश्त अनुदान (18-19 वर्ष) यदि लड़की अविवाहित रहती है और शिक्षा जारी रखती है।
    • कल्याण लक्ष्मी/शादी मुबारक (तेलंगाना): विवाह के लिये वित्तीय सहायता केवल तभी यदि दुल्हन 18+ वर्ष की है, जो बाल विवाह को हतोत्साहित करती है।
  • संस्थागत तंत्र:
    • चाइल्डलाइन 1098: जबरन या शीघ्र विवाह के जोखिम वाले बच्चों को बचाने के लिये 24x7 आपातकालीन हेल्पलाइन।
    • बाल कल्याण समितियाँ (CWC): बचाए गए बच्चों की देखभाल, सुरक्षा, पुनर्वास और सर्वोत्तम हित का निर्णय लेने वाला अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

भारत में बाल विवाह को रोकने में प्रमुख चुनौतियाँ और इसे समाप्त करने के उपाय क्या हैं?

बाल विवाह इसलिये जारी है क्योंकि बच्चे गरीबी, पितृसत्ता और कमज़ोर संस्थानों की शृंखला में फँसे रहते हैं। इन बाधाओं को तोड़ने के लिये शिक्षा, प्रवर्तन, आर्थिक सुरक्षा, जागरूकता और सुरक्षा पर केंद्रित एक विघटन-आधारित रणनीति (BREAK-based strategy) की आवश्यकता है।

चुनौतियाँ (शृंखला)

आगे की राह (विघटन)

सांस्कृतिक मानदंड और परंपरा: सम्मान, जातिगत मानदंडों और बचपन में हुई सगाई से प्रेरित शीघ्र विवाह की सामाजिक स्वीकृति एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है क्योंकि यह प्रथा को सामान्य बनाती है और विधिक प्रवर्तन को कमज़ोर करती है।

लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देना: समग्र शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा के लिये छात्राओं को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना जैसी योजनाएँ माध्यमिक शिक्षा में छात्राओं की निरंतरता में सुधार करती हैं, जो कम उम्र में विवाह के विरुद्ध सबसे प्रभावी निवारक है (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5)।

पारिवारिक गरीबी: आर्थिक असुरक्षा परिवारों को शीघ्र विवाह हेतु जीविका-रणनीति के रूप में देखने के लिये प्रेरित करती है, ताकि आर्थिक बोझ और दहेज़  संबंधी दबावों को कम किया जा सके।

प्रवर्तन में सुधार और दृढ़ता लाना: महिलाओं के लिये विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तक बढ़ाने का प्रस्ताव उच्च शिक्षा, कौशल विकास, कार्यबल की भागीदारी को बढ़ावा देने तथा बाल विवाहों को और हतोत्साहित करने का प्रयास करता है।

बाल विवाह निगरानी और प्रतिबंधक प्रणाली पूर्णकालिक बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों, ज़िला स्तरीय निगरानी और वास्तविक समय रिपोर्टिंग के माध्यम से प्रवर्तन को मज़बूत करती है।

शिक्षा में पहुँच अंतराल: गुणवत्तापूर्ण माध्यमिक शिक्षा तक सीमित पहुँच और उच्च ड्रॉपआउट दरें बाल विवाह के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती हैं, विशेष रूप से ग्रामीण और उपेक्षित वर्ग की लड़कियों के बीच।

परिवारों को आर्थिक सहायता: दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसी आजीविका और सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ परिवार की आय को स्थिर करके गरीबी-प्रेरित शीघ्र विवाहों को कम करती हैं।

कानूनों का अप्रभावी कार्यान्वयन: बाल विवाह कानूनों का कमज़ोर प्रवर्तन, अत्यधिक कार्यभारित अधिकारी और निम्न दोषसिद्धि दरें निवारक प्रभाव को कमज़ोर करती हैं और प्रथा को निर्बाध रूप से जारी रहने देती हैं।

जागरुकता और सामुदायिक स्वामित्व: पोषण अभियान और राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसे कार्यक्रम आंगनवाड़ी और सहकर्मी शिक्षकों का लाभ उठाकर मानदंडों को बदलने तथा विवाह में विलंब करने में सहायक हैं।

मानकीय लैंगिक असमानता: गहराई से जमी हुई लैंगिक असमानता लड़कियों की स्वायत्तता को सीमित करती है और शिक्षा पर शीघ्र विवाह को प्राथमिकता देती है, जिससे महिला यौनिकता पर पितृसत्तात्मक नियंत्रण सुदृढ़ होता है।

उत्पीड़न, हिंसा या सामाजिक प्रतिक्रिया का भय परिवारों को संरक्षण के कथित साधन के रूप में लड़कियों का शीघ्र विवाह करने के लिये विवश करते हैं।

लड़कियों को सुरक्षित और सशक्त बनाना: मिशन शक्ति और किशोरियों से संबंधित योजना जैसी पहलें सुरक्षा, जीवन कौशल और स्वास्थ्य समर्थन को मज़बूत करती हैं, जिससे लड़कियों को जल्दी विवाह का विरोध करने में सक्षम बनाया जाता है।

निष्कर्ष

भारत में बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष ने प्रारंभिक सामाजिक सुधार आंदोलनों से विकसित होकर एक मज़बूत कानूनी और संस्थागत ढाँचे का रूप ले लिया है, जिनका नेतृत्व राजा राममोहन रॉय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर और महात्मा ज्योतिराव फुले ने किया। आधुनिक पहलें, जैसे– BVMB इस विरासत को रोकथाम, तकनीकी साधनों और सामुदायिक सक्रियता के ज़रिये आगे बढ़ा रही हैं। लगातार सामूहिक प्रयास करने से भारत बाल विवाह-मुक्त भविष्य की दिशा में अग्रसर हो सकता है, जो गरिमा, समानता और विकास के आदर्शों के अनुरूप होगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  कानूनी निषेध के बावजूद भारत में बाल विवाह आज भी प्रचलित है। इसके लिये ज़िम्मेदार सामाजिक-आर्थिक और संस्थागत कारणों का विश्लेषण कीजिये और आगे बढ़ने का मार्ग सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. बाल विवाह-मुक्त भारत अभियान क्या है?
वर्ष 2024 में शुरू किया गया एक राष्ट्रीय अभियान, जिसका लक्ष्य रोकथाम, सामुदायिक भागीदारी और तकनीक-आधारित निगरानी के माध्यम से वर्ष 2030 तक बाल विवाह का उन्मूलन करना है।

2. भारत में बाल विवाह को मुख्य रूप से कौन-सा कानून नियंत्रित करता है?
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006, जो वैध आयु को परिभाषित करता है, दंड का प्रावधान करता है और रोकथाम के तंत्र को सक्षम बनाता है।

3. वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने बाल विवाह पर क्या निर्णय दिया?
इसने बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाया, दंड के बजाय रोकथाम पर ज़ोर दिया और राज्यों को संस्थागत प्रवर्तन मज़बूत करने का निर्देश दिया।

4. NFHS के आँकड़े भारत में बाल विवाह के बारे में क्या बताते हैं?
बाल विवाह की दर घटकर 23.3% (2019–21) हो गई है, लेकिन यह गरीब, कम शिक्षित और कुछ विशेष क्षेत्रों की आबादी में अभी भी अधिक है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रश्न. राष्ट्रीय बाल नीति के मुख्य प्रावधानों का परीक्षण कीजिये तथा इसके क्रियान्वयन की प्रस्थिति पर प्रकाश डालिये। (2016)

प्रश्न. रीति-रिवाज़ों एवं परंपराओं द्वारा तर्क को दबाने से प्रगति-विरोध उत्पन्न हुआ है। क्या आप इससे सहमत हैं? (2020)

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