जैव विविधता और पर्यावरण
पेरिस समझौते के 10 वर्ष
- 05 Jan 2026
- 108 min read
प्रिलिम्स के लिये: पेरिस समझौता, UNFCCC, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs), क्योटो प्रोटोकॉल बनाम पेरिस समझौता, जलवायु वित्त, सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियाँ (CBDR)
मेन्स के लिये: वैश्विक जलवायु शासन: UNFCCC, पेरिस समझौता, क्योटो प्रोटोकॉल, भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ और ऊर्जा परिवर्तन
चर्चा में क्यों?
पेरिस समझौते (2015) ने नवंबर 2025 में अपने दस वर्ष पूरे किये, जिससे इसकी प्रभावशीलता और प्रासंगिकता का वैश्विक स्तर पर पुनर्मूल्यांकन शुरू हुआ।
सारांश:
- पेरिस समझौते ने जलवायु कार्रवाई में सार्वभौमिक भागीदारी सुनिश्चित की और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), पारदर्शिता व्यवस्था तथा वैश्विक स्टॉकटेक के माध्यम से शमन, अनुकूलन तथा जलवायु वित्त को मुख्यधारा में शामिल किया।
- हालाँकि, यह समझौता अब भी कमज़ोर जवाबदेही, निरंतर वित्तीय एवं समानता संबंधी अंतराल तथा अपर्याप्त महत्त्वाकांक्षा जैसी चुनौतियों से ग्रस्त है। इससे अधिक मज़बूत प्रतिबद्धताओं, पूर्वानुमेय जलवायु वित्त तथा विकास प्राथमिकताऍं और जलवायु कार्रवाई के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता रेखांकित होती है।
पेरिस समझौता क्या है?
- परिचय: यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत विधिक रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता है जिसका अंगीकार वर्ष 2015 (COP 21) में किया गया था।
- इसने क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लिया जो जलवायु परिवर्तन के शमन हेतु एक पूर्व समझौता था।
- उद्देश्य: इसका लक्ष्य वैश्विक तापवृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में 2°C से काफी नीचे सीमित रखना है तथा इसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करना है।
- कार्यप्रणाली: पेरिस समझौता क्रमिक रूप से अधिक मज़बूत जलवायु कार्रवाई के पाँच-वर्षीय चक्र का अनुसरण करता है।
- पेरिस समझौते के अंतर्गत, प्रत्येक देश को हर पाँच वर्ष में अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) प्रस्तुत करना और उसे अद्यतन करना होता है, जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने की उनकी योजनाओं की रूपरेखा होती है
- वर्ष 2023 में पहला ग्लोबल स्टॉकटेक COP28 में संपन्न हुआ, जिसमें वर्ष 2030 तक शमन, अनुकूलन और जलवायु वित्त पर तीव्र कार्रवाई का आह्वान किया गया, साथ ही जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को क्रमशः समाप्त करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया।
- देशों को दीर्घकालिक निम्न-उत्सर्जन विकास रणनीतियाँ प्रस्तुत करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। हालाँकि ये स्वैच्छिक होती हैं।
- COP24 (काटोविस, पोलैंड) और COP26 (ग्लासगो, स्कॉटलैंड) में पेरिस रूलबुक ने समझौते के कार्यान्वयन हेतु विस्तृत नियम निर्धारित किये।
- मुख्य उपलब्धियाँ:
- सार्वभौमिक भागीदारी: लगभग सभी देशों (194 देश तथा यूरोपीय संघ) ने एक ही ढाँचे के अंतर्गत जलवायु कार्रवाई के प्रति प्रतिबद्धता जताई।
- जलवायु वित्त प्रतिबद्धता: विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु शमन और अनुकूलन में सहायता देने हेतु वर्ष 2025 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता की।
- COP29 (बाकू, अज़रबैजान, 2024) में एक नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) तय किया गया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष कम-से-कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर का उच्च लक्ष्य निर्धारित किया गया।
- समानता का सिद्धांत: पेरिस समझौते में सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियों (CBDR) के सिद्धांत को अंतर्निहित किया गया, जिससे विभिन्न देशों की क्षमताओं और ज़िम्मेदारियों को मान्यता मिली।
- जलवायु नीति का मुख्यधारा में समावेशन: जलवायु कार्रवाई को राष्ट्रीय कानूनों, बजटों और विकास योजनाओं में समाहित किया गया (जैसे—यूरोपीय संघ का ग्रीन डील, भारत का मिशन LiFE)।
- जलवायु वित्त और बाज़ारों को बढ़ावा: ग्रीन बॉण्ड, कार्बन बाज़ारों और जलवायु निवेशों का विस्तार हुआ। हालाँकि यह अब भी अपर्याप्त है।
भारत और पेरिस समझौता
- भारत ने वर्ष 2015 में UNFCCC के समक्ष अपना इच्छित आधारित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDC) प्रस्तुत किया था, जिसे पेरिस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2030 तक की अवधि के लिये इसके प्रथम राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के रूप में स्वीकार किया गया।
- अद्यतन NDC के तहत भारत ने LIFE (पर्यावरण के लिये जीवनशैली) के माध्यम से सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने, स्वच्छ और जलवायु-अनुकूल विकास पथ अपनाने, वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी लाने तथा स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
- यह 2.5–3 बिलियन टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करने, संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन को सुदृढ़ करने, घरेलू तथा विकसित देशों के स्रोतों से वित्त जुटाने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं जलवायु अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देने का भी लक्ष्य रखता है।
- भारत ने UNFCCC और पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करते हुए कहा कि यह अद्यतन वर्ष 2070 तक अपने दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
- उपलब्धियाँ: भारत ने वर्ष 2025 में गैर-जीवाश्म स्रोतों से अपनी विद्युत उत्पादन क्षमता का 50% हासिल कर लिया, जो वर्ष 2030 के लक्ष्य से काफी अधिक है तथा COP26 में वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन के लिये प्रतिबद्धता जताई।
- इसने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), कोएलिशन फॉर डिज़ास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) और LiFE आंदोलन जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक नेतृत्व का प्रदर्शन किया है, साथ ही अपने जलवायु दृष्टिकोण को ‘विकसित भारत 2047’ के साथ संरेखित किया है तथा सौर और हरित हाइड्रोजन को विकास और रोज़गार के प्रमुख चालक के रूप में स्थापित किया है।
पेरिस समझौते से संबंधित क्या-क्या चिंताएँ हैं?
- स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ: पेरिस समझौते ने क्योटो प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों के लिये कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों को स्वैच्छिक राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों से बदल दिया, जिससे जवाबदेही कमज़ोर हो गई।
- समानता संबंधी चिंताएँ: उत्सर्जन में समान रूप से कटौती की अपेक्षाएँ साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) के सिद्धांत को कमज़ोर करती हैं और विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन की अनदेखी करती हैं तथा कम विकसित देशों (LDC) एवं छोटे द्वीप विकासशील राज्यों (SIDS) को पर्याप्त समर्थन के बिना अस्तित्व संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
- जलवायु वित्त की कमी: भारत ने NCQG को अपर्याप्त मानते हुए अस्वीकार कर दिया और यह स्पष्ट किया कि विकासशील देशों के समक्ष मौजूद जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिये 300 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं है।
- भारत, अन्य वैश्विक दक्षिण देशों के साथ मिलकर, विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिये सालाना कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का समर्थन कर रहा है, जिसमें से 600 बिलियन अमेरिकी डॉलर अनुदान या अनुदान-समकक्ष संसाधनों के रूप में होंगे।
- शमन-केंद्रित दृष्टिकोण: उत्सर्जन कटौती पर अत्यधिक ध्यान देने से अनुकूलन और लचीलेपन की अनदेखी होती है, जो कमज़ोर देशों के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
- विकास संबंधी बाधाएँ: जलवायु संबंधी दायित्व और कार्बन सीमा कर (जैसे कि (CABM)) जैसे उपाय विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा और औद्योगिक विकल्पों को सीमित करते हैं।
- अपर्याप्त महत्त्वाकांक्षा: वर्तमान राष्ट्रीय लक्ष्यों में महत्वाउकांक्षा का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वर्तमान 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDCs) विश्व को 2.5°C से 2.9°C की तापमान वृद्धि की ओर धकेल रहे हैं, जो पेरिस समझौते के 1.5°C या 2°C के अनिवार्य लक्ष्यों से काफी दूर है। यह अंतराल वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के लिये विनाशकारी जलवायु जोखिम उत्पन्न करता है।
जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- स्वैच्छिक से लागू करने योग्य कार्रवाई की ओर बदलाव: जलवायु प्रतिबद्धताओं को अब मात्र 'स्वैच्छिक प्रतिज्ञाओं' तक सीमित नहीं रहना चाहिये, बल्कि इन्हें कानूनी रूप से बाध्यकारी और समयबद्ध राष्ट्रीय नीतियों का रूप दिया जाना चाहिये। इसके लिये प्रत्येक क्षेत्र हेतु विशिष्ट 'कार्बन बजट' निर्धारित करना और प्रगति के मूल्यांकन के लिये मापने योग्य मानक तय करना अनिवार्य है।
- जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन के बीच संतुलन: जलवायु संबंधी कार्रवाई में अनुकूलन को समान प्राथमिकता दी जानी चाहिये, साथ ही जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे, कृषि, जल प्रणालियों और प्रारंभिक चेतावनी तंत्रों में अधिक निवेश किया जाना चाहिये।
- जलवायु वित्त अंतर को कम करना: विकसित देशों को अपनी जलवायु वित्त संबंधी प्रतिबद्धताओं को न केवल पूरा करना चाहिये बल्कि उनका विस्तार भी करना चाहिये, वहीं बहुपक्षीय बैंकों, ग्रीन बॉन्ड और मिश्रित वित्त तंत्र में सुधार के माध्यम से विकासशील देशों के लिये वित्तीय लागत को कम किया जाना चाहिये।
- समानता और जलवायु न्याय को सुदृढ़ बनाना: सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत कार्यान्वयन का मार्गदर्शन करना चाहिये, जिससे विकासशील देशों के लिये नीतिगत कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके और कार्बन सीमा कर जैसे व्यापार उपायों में निष्पक्षता बनी रहे।
- प्रौद्योगिकी तक पहुँच को गति प्रदान करना: नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण, हरित हाइड्रोजन और ग्रिड प्रौद्योगिकियों तक किफायती पहुँच को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, पेटेंट साझाकरण और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से विस्तारित किया जाना चाहिये।
- जलवायु विज्ञान और शासन को मज़बूत करना: प्रभावी जलवायु कार्रवाई की आधारशिला विश्वसनीय विज्ञान और पारदर्शी डेटा पर टिकी है। इसके लिये एक सुदृढ़ निगरानी और सत्यापन तंत्र अनिवार्य है, जो न केवल नीतियों की सटीकता सुनिश्चित करे बल्कि जलवायु संबंधी भ्रामक सूचनाओं का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में भी सक्षम हो।
जलवायु कार्रवाई में चीन मॉडल
- जलवायु कार्रवाई का चीन मॉडल विकास-प्रथम दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें तीव्र औद्योगिकीकरण के चरण के दौरान उत्सर्जन में वृद्धि की अनुमति दी जाती है, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युतीकरण और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में बड़े पैमाने पर क्षमताओं का समानांतर विकास किया जाता है।
- आर्थिक पैमाने और ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के बाद चीन ने वर्ष 2030 से पहले अपने उत्सर्जन को चरम तक पहुँचाने और वर्ष 2060 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे यह दिखाया गया है कि स्वच्छ ऊर्जा में प्रारंभिक निवेश बाद में तेज़ी से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकता है।
निष्कर्ष
पेरिस समझौते ने विश्व भर के देशों को साथ लाने में मदद की, लेकिन इसमें कम जवाबदेही, वित्तीय अंतर और समानता के मुद्दे हैं। जलवायु कार्रवाई को मज़बूत बनाने के लिये लागू होने वाली प्रतिबद्धताएँ, सुनिश्चित वित्त, अनुकूलन तथा उत्सर्जन कमी पर समान ध्यान देना आवश्यक है। भारत के लिये अपने जलवायु लक्ष्य को विकास के साथ जोड़ना एक संतुलित और व्यावहारिक मार्ग है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. एक दशक बाद पेरिस समझौते की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। कौन-सी संरचनात्मक सीमाएँ इसकी सफलता में बाधा उत्पन्न करती हैं? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पेरिस समझौता क्या है और इसे कब अपनाया गया था?
पेरिस समझौता एक कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक जलवायु संधि है, जिसे वर्ष 2015 में COP21 के दौरान UNFCCC के तहत अपनाया गया था। इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे और संभव हो तो 1.5°C तक सीमित करना है।
2. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?
NDCs यानी राष्ट्रीय स्तर पर तय किये गए योगदान, हर देश द्वारा हर पाँच वर्ष में प्रस्तुत किये जाने वाले जलवायु कार्रवाई योजनाएँ हैं। इनमें मुख्य रूप से उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य और अनुकूलन के उपाय बताए जाते हैं।
3. COP28 में पहले ग्लोबल स्टॉकटेक का क्या महत्त्व था?
ग्लोबल स्टॉकटेक (2023) ने विश्व भर के देशों की सामूहिक प्रगति का मूल्यांकन किया और वर्ष 2030 तक उत्सर्जन कम करने, अनुकूलन और जलवायु वित्त में तेज़ कदम उठाने की आवश्यकता जताई।
4. पेरिस समझौते की कमज़ोर जवाबदेही के लिये आलोचना क्यों की जाती है?
यह कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों पर नहीं, बल्कि स्वैच्छिक NDCs पर निर्भर करता है और पालन न करने पर कोई दंड नहीं है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. ‘अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित अंशदान (Intended Nationally Determined Contributions)’ पद को कभी-कभी समाचारों में किस संदर्भ में देखा जाता है? (2016)
(a) युद्ध-प्रभावित मध्य-पूर्व के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय देशों द्वारा दिये गए वचन
(b) जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्य-योजना
(c) एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक) की स्थापना करने में सदस्य राष्ट्रों द्वारा किया गया पूंजी योगदान
(d) धारणीय विकास लक्ष्यों के बारे में विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्य-योजना
उत्तर : (B)
प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
- इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
- यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विकं तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2 °C या कोशिश करें कि 1.5 °C से भी अधिक न होने पाए।
- विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आई.पी.सी.सी.) ने वैश्विक समुद्र स्तर में 2100 ईस्वी तक लगभग एक मीटर की वृद्धि का पूर्वानुमान लगाया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और दूसरे देशों में इसका क्या प्रभाव होगा? (2023)
प्रश्न 2. ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) की चर्चा कीजिये और वैश्विक जलवायु पर इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिये। क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 के आलोक में ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनने वाली ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को कम करने के लिये नियंत्रण उपायों को समझाइये। (2022)
प्रश्न 3. संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई प्रतिबद्धताएँ क्या हैं? (2021)

