शासन व्यवस्था
सहमति की आयु और किशोर स्वायत्तता
- 13 Jan 2026
- 90 min read
प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, सहमति की आयु, यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012
मेन्स के लिये: भारत में बाल अधिकार और संरक्षण कानून, किशोरों की स्वायत्तता एवं विकसित होती क्षमताएँ
चर्चा में क्यों?
उत्तर प्रदेश राज्य बनाम अनुरुद्ध एवं अन्य (2026) मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति से बनाए गए किशोर संबंधों से जुड़े मामलों में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO), 2012 के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त की।
- न्यायालय ने पाया कि यौन शोषण से बच्चों की रक्षा के लिये बनाए गए इस कानून का प्रायः परिवारों द्वारा उन युवा जोड़ों के खिलाफ दुरुपयोग किया जाता है जिनमें एक की उम्र 18 वर्ष से कम होती है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से सुधारात्मक उपाय करने का आग्रह किया।
- इस टिप्पणी ने लंबे समय से चले आ रहे विवाद को इस रूप में पुनः जीवंत किया कि क्या भारत को सहमति की आयु पर पुनर्विचार करना चाहिये।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकन उजागर करते हैं कि कैसे POCSO अधिनियम, बाल संरक्षण के उद्देश्य से गठित, का प्रयोग तीव्रता के साथ सहमतिपूर्ण किशोर संबंधों के मामलों में किया जा रहा है, जिससे अति-अपराधीकरण और सामाजिक वास्तविकताओं के साथ बेमेल होने की चिंताएँ उठ रही हैं।
- इस बहस के लिये एक संतुलित, सूक्ष्म दृष्टिकोण की मांग है, जो शोषण से बच्चों की रक्षा करते हुए न्यायिक स्पष्टता, लक्षित कानूनी सुरक्षा उपायों और शिक्षा एवं सहायता प्रणालियों पर सुदृढ़ ज़ोर के माध्यम से किशोर स्वायत्तता को मान्यता दे।
भारतीय कानून में "सहमति की आयु" का क्या अर्थ है?
- सहमति की आयु: यह वह कानूनी रूप से निर्धारित आयु है, जिस पर एक व्यक्ति यौन क्रियाओं के लिये सहमति देने में सक्षम माना जाता है। भारत में यह आयु 18 वर्ष है, जो लैंगिक रूप से तटस्थ POCSO अधिनियम, 2012 के अंतर्गत आती है।
- 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति कानूनी रूप से एक "बच्चा" माना जाता है, उसकी सहमति के लिये कोई कानूनी वैधता नहीं है। एक नाबालिग के साथ यौन क्रिया को स्वेच्छा की परवाह किये बगैर स्वतः ही वैधानिक बलात्कार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- POCSO अधिनियम, 2012 की धारा 19 किसी भी व्यक्ति के लिये रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाती है, जो किसी अपराध को जानता है या यहाँ तक कि संदेह करता है।
- कानूनी विकास: भारत में सहमति की आयु मूल रूप से भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 के तहत 10 वर्ष निर्धारित की गई थी, फिर सहमति की आयु अधिनियम, 1891 द्वारा 12 तक बढ़ा दी गई, जिसे बाद में बढ़ाकर 14 और बाद में 16 कर दिया गया।
- वर्ष 2012 में, POCSO अधिनियम ने सहमति की आयु 18 वर्ष तक बढ़ा दी, इस स्थिति को आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा सुदृढ़ किया गया, जिसने IPC के बलात्कार संबंधी प्रावधानों को POCSO ढाँचे के साथ संरेखित किया।
- इन मानकों को भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत बरकरार रखा गया है, जहाँ धारा 63 बलात्कार को परिभाषित करती है। इसमें सहमति से या बगैर सहमति के यौन कृत्य शामिल हैं यदि महिला 18 वर्ष से कम आयु की है।
- उल्लेखनीय है कि सहमति की आयु विवाह की न्यूनतम आयु से अलग है, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के तहत महिलाओं के लिये 18 वर्ष और पुरुषों के लिये 21 वर्ष निर्धारित है।
- न्यायिक दृष्टिकोण:
- राज्य बनाम हितेश (2025), दिल्ली उच्च न्यायालय: न्यायालय ने कहा कि कानून को किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों को मान्यता देनी चाहिये और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिये, बशर्ते ऐसे संबंध किसी भी प्रकार के दबाव, शोषण या दुरुपयोग से मुक्त हों।
- इस निर्णय में इस बात पर बल दिया गया कि किशोरों की वास्तविकताओं के अनुरूप कानूनी और सामाजिक दृष्टिकोणों में विकास होना आवश्यक है।
- आशिक रामजाई अंसारी बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023), बॉम्बे उच्च न्यायालय: न्यायालय ने निर्णय दिया कि यौन स्वायत्तता में सहमति-आधारित यौन संबंध स्थापित करने का अधिकार तथा यौन आक्रामकता से संरक्षण का अधिकार दोनों शामिल हैं और मानव गरिमा की रक्षा के लिये दोनों की मान्यता आवश्यक है।
- मोहम्मद रफायत अली बनाम दिल्ली राज्य, दिल्ली उच्च न्यायालय (2025): न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि POCSO अधिनियम के अंतर्गत यदि पीड़ित की आयु 18 वर्ष से कम है, तो उसकी सहमति का कोई विधिक महत्त्व नहीं है और नाबालिग के साथ कोई भी यौन कृत्य उसकी इच्छा की परवाह किये बिना अपराध माना जाएगा।
- राज्य बनाम हितेश (2025), दिल्ली उच्च न्यायालय: न्यायालय ने कहा कि कानून को किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों को मान्यता देनी चाहिये और उनकी स्वायत्तता का सम्मान करना चाहिये, बशर्ते ऐसे संबंध किसी भी प्रकार के दबाव, शोषण या दुरुपयोग से मुक्त हों।
सहमति की उम्र कम करने के संबंध में क्या तर्क हैं?
पक्ष में तर्क
- किशोर स्वायत्तता की मान्यता: 16-18 वर्ष आयु वर्ग के किशोर शिक्षा की व्यापक पहुँच, अधिकारों के प्रति बढ़ती जागरूकता, डिजिटल सूचना के संपर्क और बेहतर संज्ञानात्मक परिपक्वता के कारण संबंधों से जुड़े सूचित निर्णय लेने में अधिक सक्षम होते जा रहे हैं, किंतु वर्तमान कानून उनकी विकसित होती सहमति-क्षमता को पर्याप्त रूप से मान्यता नहीं देता।
- चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-4) के अनुसार, भारत में 39% लड़कियों का पहला यौन अनुभव 18 वर्ष से पहले हुआ था। वहीं Enfold और प्रोजेक्ट 39A के अध्ययनों (2016-20) में पाया गया कि लगभग एक-चौथाई POCSO मामलों में किशोरों के बीच सहमति-आधारित संबंध शामिल थे, जिससे स्पष्ट होता है कि वर्तमान कानून ज़मीनी वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
- सहमति-आधारित संबंधों में POCSO का दुरुपयोग: POCSO के अनेक मामले किशोरों के बीच सहमति-आधारित रोमांटिक संबंधों से जुड़े होते हैं, जो प्रायः यौन शोषण के बजाय अभिभावकों की असहमति के कारण दर्ज कराए जाते हैं।
- 18 वर्ष की एकरूप आयु-सीमा सहमति-आधारित अंतरंगता को वैधानिक बलात्कार में परिवर्तित कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप गिरफ्तारी, कारावास और दीर्घ न्यायिक प्रक्रियाएँ होती हैं, जो लड़के और लड़की दोनों के लिये हानिकारक सिद्ध होती हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रथाएँ: कई देशों में सहमति की आयु 16 वर्ष निर्धारित की गई है और सहमति-आधारित संबंधों में समान आयु वर्ग के किशोरों को अपराधीकरण से बचाने के लिये ‘आयु-समीपता’ (Close-in-Age) अपवाद प्रदान किये जाते हैं।
- दंड के बजाय शिक्षा की ओर झुकाव: समर्थकों का तर्क है कि सुरक्षित किशोर व्यवहार सुनिश्चित करने के लिये आपराधिक कानून की तुलना में समग्र यौन शिक्षा और जागरूकता अधिक प्रभावी उपाय हैं।
- सूक्ष्म एवं संतुलित कानूनी दृष्टिकोण की आवश्यकता: समर्थकों का सुझाव है कि 16 वर्ष से अधिक आयु वालों के लिये सहमति को मान्यता दी जाए, साथ ही दबाव, शोषण या अधिकार के दुरुपयोग से संरक्षण हेतु पर्याप्त सुरक्षा प्रावधान बनाए रखे जाएँ।
विरोध में तर्क
- बच्चों को शोषण से संरक्षण: सहमति की आयु कम करने से यौन शोषण, मानव तस्करी और दबाव के विरुद्ध मौजूद सुरक्षा तंत्र कमज़ोर पड़ सकता है, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ गहन शक्ति-असंतुलन विद्यमान है।
- सहमति का भ्रम: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के 2007 के अध्ययन के अनुसार, 50% से अधिक मामलों में अपराधी बच्चे के परिचित (परिवार के सदस्य, शिक्षक, पड़ोसी) थे, जहाँ दिखाई देने वाली सहमति वास्तव में भय, हेर-फेर या निर्भरता का परिणाम हो सकती है।
- कठोर आयु-सीमा वयस्क शिकारियों के विरुद्ध एक प्रबल प्रतिरोधक के रूप में कार्य करती है, जो अन्यथा सहमति की आड़ में नाबालिगों का शोषण कर सकते हैं।
- पीड़ितों को चुप कराने का जोखिम: POCSO को कमज़ोर करने से शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति कम हो सकती है और दबावपूर्ण व्यवहार को वैधता मिल सकती है, जिससे बाल संरक्षण के उद्देश्य प्रभावित होते हैं।
- संसदीय और विशेषज्ञ विरोध: संसदीय स्थायी समितियों (2011, 2012) ने नाबालिग की सहमति को मान्यता देने या “क्लोज़-इन-एज़” अपवाद लागू करने का विरोध किया था।
- संसदीय एवं विशेषज्ञ विरोध: वर्ष 2011 और 2012 की संसदीय स्थायी समितियों ने अल्पवयस्क की सहमति को मान्यता देने तथा आयु-समीपता (Close-in-Age) अपवाद प्रदान करने के प्रस्तावों का विरोध किया था।
- विधि आयोग की 283वीं रिपोर्ट (2023) में यह चेतावनी दी गई कि यदि सहमति की आयु कम की जाती है, तो POCSO अधिनियम की प्रभावशीलता घट जाएगी और इससे बाल विवाह, वेश्यावृत्ति तथा मानव तस्करी के खिलाफ चल रहे प्रयासों को नुकसान पहुँच सकता है।
- व्यापक सामाजिक परिणाम: यह चिंता व्यक्त की गई है कि सहमति की आयु घटाने से भावनात्मक परिपक्वता और पर्याप्त सामाजिक समर्थन के अभाव में समय से पहले यौन गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
सहमति की आयु पर पुनर्विचार करते समय बाल सुरक्षा और संरक्षण को मज़बूत करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- कानूनी क्षेत्र में न्यायिक मार्गदर्शन: यद्यपि सहमति की आयु (Age of Consent) में किसी भी प्रकार का बदलाव करना संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को वैधानिक कानून (Statutory Law) और उच्च न्यायालयों के फैसलों के बीच बढ़ते व्याख्यात्मक अंतर (Interpretational Divide) को स्पष्ट करना चाहिये, ताकि पुलिस और निचली अदालतों द्वारा इसका एक समान अनुप्रयोग सुनिश्चित किया जा सके।
- समग्र प्रतिक्रिया की आवश्यकता: केवल कानूनी सुधार किशोरों की वास्तविकताओं को पूरी तरह संबोधित नहीं कर सकता, इसके लिये यौन शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएँ, लैंगिक-संवेदनशील पुलिसिंग और परिवार व समुदाय का समर्थन भी आवश्यक है, विशेषकर किशोर लड़कियों हेतु जिन्हें अक्सर विकल्प और संबंधों के मामलों में माता-पिता के विरोध का सामना करना पड़ता है।
- भेदभाव पर केंद्रित, कमज़ोर करने पर नहीं: सहमति की आयु 16 या 18 के बारे में केवल यांत्रिक बहस करने के बजाय कानून को बाल सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए पुनर्गठित किया जाना चाहिये। कानून में एक सूक्ष्म विभेदन (Nuanced distinction) की आवश्यकता है, जो सहमतिपूर्ण किशोर संबंधों और दबावपूर्ण शोषण के बीच के अंतर को पहचान सके। ऐसा दृष्टिकोण न केवल युवाओं को अनैतिक दंड से बचाएगा, बल्कि कानून के मूल सुरक्षात्मक उद्देश्य को भी सुदृढ़ करेगा।
- 16–18 वर्ष के किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों की अनुमति: ऐसे संबंधों में समान आयु अंतराल (जैसे– 3–4 वर्ष) को मान्यता दी जा सकती है। अनिवार्य न्यायिक जाँच से दुरुपयोग या शक्ति असंतुलन की पहचान करने में मदद मिलेगी।
- सहानुभूतिपूर्ण ढाँचा तैयार करना: उद्देश्य अत्यधिक अपराधीकरण के बिना सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिये। एक संतुलित दृष्टिकोण बच्चों की सुरक्षा करते हुए किशोरों की स्वायत्तता और गरिमा का सम्मान भी करता है।
निष्कर्ष
सहमति की आयु के संदर्भ में संतुलन अपरिहार्य है, न कि अतिवाद। विधि व्यवस्था को बच्चों के संरक्षण और किशोरों के मध्य आपसी सहमति से बने संबंधों के बीच भेद करना चाहिये, ताकि सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए उन्हें अनैतिक अपराधीकरण से बचाया जा सके।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. सहमत किशोर संबंधों में POCSO अधिनियम का दुरुपयोग कानून और सामाजिक वास्तविकता के बीच के अंतर को दर्शाता है। परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय कानून के तहत सहमति की उम्र क्या है?
POCSO अधिनियम, 2012 के अनुसार सहमति की कानूनी आयु 18 वर्ष निर्धारित है। इसके अंतर्गत किसी भी नाबालिग (अल्पवयस्क) के साथ किया गया यौन कृत्य 'सांविधिक बलात्कार' (Statutory Rape) की श्रेणी में आता है, चाहे इसमें नाबालिग की आपसी सहमति ही क्यों न रही हो।
2. सहमति आधारित किशोर मामलों में POCSO की आलोचना क्यों होती है?
अधिकांश मामले किशोरों के बीच सहमति आधारित संबंधों से संबद्ध होते हैं, जिन्हें अक्सर परिवार की नापसंदगी या विरोध के कारण रिपोर्ट किया जाता है, जिससे अत्यधिक अपराधीकरण (Over-Criminalisation) हो जाता है।
3. अनुरुद्ध (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सहमति आधारित किशोर संबंधों में POCSO अधिनियम के बढ़ते दुरुपयोग को नोट किया और सुधारात्मक कदम उठाने का आग्रह किया।
4. ‘उम्र में कम अंतर’ वाली छूट क्या है?
यह किशोरों के बीच सहमति-आधारित संबंधों की अनुमति देता है, यदि उनकी आयु में सामान्य अंतर सीमित हो और साथ ही ज़बर्दस्ती और शोषण से सुरक्षा भी सुनिश्चित करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)
- विकास का अधिकार
- अभिव्यक्ति का अधिकार
- मनोरंजन का अधिकार
उपर्युक्त में से कौन-सा/से बच्चे का अधिकार है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: D