अंतर्राष्ट्रीय संबंध
बहुपक्षीय शासन व्यवस्था में अमेरिका की घटती भागीदारी
- 13 Jan 2026
- 84 min read
प्रिलिम्स के लिये: नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC), पेरिस समझौता 2015, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC), संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO), संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना के लिये गठबंधन (CDRI), कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) 2023 और लघु मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR)।
मेन्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और समझौतों से अमेरिका की वापसी के प्रभाव तथा इन चुनौतियों से निपटने के लिये भारत द्वारा उठाए जाने वाले कदम।
चर्चा में क्यों?
अमेरिका ने “अमेरिका फर्स्ट” दृष्टिकोण के अंतर्गत राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए 66 अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, जिसमें से 31 संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ के निकाय हैं, से स्वयं को अलग कर लिया है। यह स्थिति पूर्ववर्ती ट्रंप प्रशासन के दौरान की गई समान प्रकार की वापसियों की पुनरावृत्ति को प्रतिबिंबित करती है।
- UNFCCC जैसे प्रमुख जलवायु संगठनों से पीछे हटकर अमेरिका वैश्विक जलवायु शासन को कमज़ोर करने तथा विकासशील देशों के लिये जलवायु वित्तपोषण को सीमित करने का जोखिम उत्पन्न कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय निकायों में अमेरिका की घटती भागीदारी के संभावित परिणाम क्या होंगे?
- भू-राजनीतिक और रणनीतिक शून्यता की स्थिति: चीन ने संयुक्त राष्ट्र के तकनीकी निकायों (ITU , FAO , ICAO) में अपनी उपस्थिति को व्यवस्थित रूप से बढ़ाया है। अमेरिका के हटने से न केवल विश्व के एक भाग की अभिव्यक्ति प्रभावित होगी बल्कि एक प्रतिसंतुलनकारी वीटो शक्ति अस्तित्वहीन हो जाएगी।
- ऐतिहासिक रूप से, इसी तरह की कार्रवाइयों, जैसे- वर्ष 2017 में यूनेस्को से अमेरिका की वापसी, जो कि बाद में पुनः इससे जुड़ गया, के कारण इस संगठन को 22% की फंडिंग की हानि हुई थी।
- जलवायु शासन और वित्तपोषण: UNFCCC से हटने से अमेरिका, जो कि सबसे बड़ा CO₂ उत्सर्जक (जो ऐतिहासिक रूप से लगभग 24% CO₂ उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार) है, कानूनी रूप से जलवायु संधि से बाहर हो जाएगा, जिससे COP के नियमों को निर्धारित करने में उसकी औपचारिक भूमिका समाप्त हो जाएगी। इस कदम से उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को भी हानि पहुँचेगी, जिससे अन्य असंबंधित क्षेत्रों में अमेरिका के हित प्रभावित होंगे।
- इसके अतिरिक्त, यह कदम अन्य अनिच्छुक सरकारों को भी पीछे हटने का बहाना प्रदान कर सकता है तथा विकासशील देशों के रुख को कठोर बना सकता है, जो इसे वर्तमान प्रमुख उत्सर्जक (2024 में वैश्विक CO₂ का 12.7%) द्वारा नेतृत्व की विफलता के रूप में देखते हैं।
- अनुकूलन वित्तपोषण पहले से ही अनुमानित 310-365 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से काफी कम है। ऐसे में अमेरिका की घटती भागीदारी उत्तर–दक्षिण विश्वास असंतुलन को और गहरा कर सकती है तथा वार्त्ताओं में विकासशील देशों की स्थिति को कठोर बना सकती है।
- शांति निर्माण/मानव सुरक्षा के प्रभाव: संयुक्त राज्य अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र शांति निर्माण तंत्रों से वापसी उसके सुरक्षा लक्ष्यों को कमज़ोर करती है और ऐसे अस्थिरता के जोखिम को बढ़ाती है, जो भविष्य में महंगी सैन्य समाधान की आवश्यकता पैदा कर सकती है। स्वास्थ्य, जलवायु प्रवासन और संघर्ष निवारण प्रयासों के लिये अनुदान कम करने से मानवाधिकारों पर खतरा उत्पन्न होता है और वर्ष 2050 तक 200 मिलियन लोगों के लिये जलवायु-प्रेरित प्रवासन की समस्या बढ़ सकती है।
- आर्थिक/व्यापारिक प्रतिस्पर्द्धा: जब संयुक्त राज्य अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय मानकों को तय करने में अपनी भूमिका खो देता है, तो उसके निर्यातक विदेशी जलवायु-संबंधित व्यापार उपायों, जैसे– कार्बन सीमा समायोजन (Carbon Border Adjustments) के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। इससे जलवायु-संबंधी व्यापार की कुल लागत बढ़ती है और अमेरिकी उद्योग को विकसित होते वैश्विक मानकों से अलग करने का जोखिम उत्पन्न होता है।
- सहायता और तकनीकी सहयोग में कमी: संयुक्त राज्य अमेरिका का संयुक्त राष्ट्र निकायों से पीछे हटना अक्सर अनुदान कटौती से संबंधित होता है, जैसे वर्ष 2017 में UN जनसंख्या कोष (UNFPA) का वित्तपोषण बंद करना, जिसने अफ्रीका तथा एशिया में प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रमों को प्रभावित किया। इसके अतिरिक्त विज्ञान तथा शिक्षा संस्थाओं से वापसी से ग्लोबल साउथ को आवश्यक तकनीकी हस्तांतरण प्राप्त करने में बाधा आती है।
मुख्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन और समझौते जिनसे संयुक्त राज्य अमेरिका ने वापसी की है
- संयुक्त राष्ट्र संधियाँ और जलवायु निकाय:
- संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा कन्वेंशन (UNFCCC): यह मुख्य वैश्विक जलवायु संधि है, जो COP वार्त्ताओं और 2015 के पेरिस समझौते की नींव तैयार करती है।
- अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC): यह विश्व का प्रमुख वैज्ञानिक संगठन है, जो जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन करता है।
- जलवायु, पर्यावरण और जैव विविधता संस्थान:
- अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA): यह भारत-नेतृत्व वाली पहल है, जो सौर ऊर्जा पर वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देती है।
- अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN): यह जैव विविधता संरक्षण का वैश्विक प्राधिकरण है।
- अंतर-सरकारी विज्ञान-नीति मंच ऑन जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ (IPBES): यह जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का मूल्यांकन करता है।
- संयुक्त राष्ट्र सहकारी कार्यक्रम – वनों की कटाई और वन क्षरण से उत्सर्जन को कम करना (REDD+): इसका उद्देश्य वनों को काटने की बजाय सुरक्षित रखने में अधिक मूल्यवान बनाकर जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना है।
- संयुक्त राष्ट्र ऊर्जा (UN Energy): यह संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में ऊर्जा से संबंधित कार्यों का समन्वय करता है।
- अंतर-सरकारी मंच – खनन, खनिज, धातु और सतत विकास: यह सतत खनन पर संयुक्त राष्ट्र के साथ निकटता से कार्य करता है।
- जनसांख्यिकी और चुनावी निकाय:
- संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA): यह प्रजनन स्वास्थ्य, जनसंख्या डेटा और लैंगिक समानता पर केंद्रित है।
- अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र और चुनाव सहायता संस्थान (IDEA): यह लोकतांत्रिक संस्थानों और प्रक्रियाओं का समर्थन करता है।
- सुरक्षा और आतंकवाद-विरोध: वैश्विक आतंकवाद रोधी परिषद (GCTF) आतंकवाद-विरोधी सहयोग के लिये एक बहुपक्षीय मंच है।
- पहले से ही अमेरिका द्वारा वापसी किये गए संगठन और समझौते: पेरिस समझौता, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) और संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO)।
बहुपक्षीय संस्थाओं से अमेरिका की वापसी पर भारत कैसे प्रतिक्रिया दे सकता है?
- जलवायु गठबंधनों में सक्रिय नेतृत्व: भारत को सिर्फ भागीदारी से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे के लिये गठबंधन (CDRI) जैसे प्लेटफॉर्म पर एजेंडा-निर्धारण नेतृत्व करना चाहिये, ताकि अमेरिका की पीछे हटने की स्थिति में वैश्विक जलवायु गति बनाए रखी जा सके।
- वैकल्पिक जलवायु वित्त सुरक्षित करना: ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) और वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) में संभावित अमेरिकी योगदान के ठहराव का मुकाबला करने के लिये भारत को अपने जलवायु वित्त को विविधतापूर्ण बनाना चाहिये, अन्य दाताओं (EU, UK, जापान, नॉर्डिक देश) को परियोजनाएँ सक्रिय रूप से प्रस्तुत करना चाहिये और बहुपक्षीय विकास बैंकों (MDBs) से वित्त मिश्रित करना चाहिये।
- कार्बन सीमा उपायों के प्रति तैयारी और लचीलापन: यह अनुमान लगाते हुए कि अमेरिका की वापसी से EU-शैली के कार्बन बॉर्डर समायोजन तंत्र (CBAM) तेज़ हो सकते हैं, भारत को मुख्य निर्यात क्षेत्रों, जैसे– इस्पात, सीमेंट और एल्यूमिनियम में डिकार्बोनाइज़ेशन करना चाहिये, जिसके लिये राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (NGHM), 2023 और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को तेज़ी से लागू करना ज़रूरी है।
- ग्रीन टेक हब बनना: सोलर PV, बैटरियों और इलेक्ट्रोलाइज़र के लिये PLI योजनाओं को बढ़ाकर और एक कम-कार्बन बेसलोड विकल्प के रूप में IAEA-सुरक्षित छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों के वैश्विक निर्यातक बनकर आत्मनिर्भरता के लिये लक्ष्य रखना।
- विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार में निवेश करना: अमेरिकी भागीदारी में कमी का सामना करने के लिये भारत को जलवायु विज्ञान नेटवर्क को सुदृढ़ करने और हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण एवं कार्बन अभिग्रहण में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का समर्थन करने की आवश्यकता है। इसे नवाचार और प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देने के लिये जलवायु प्रौद्योगिकी में अपने सार्वजनिक और निजी अनुसंधान एवं विकास व्यय में भी काफी वृद्धि करने की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
बहुपक्षीय निकायों से अमेरिकी वापसी वैश्विक शासन में एक शून्यता उत्पन्न करती है, जिससे जलवायु कार्रवाई, वित्त और सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और वैश्विक दक्षिण के हितों की रक्षा के लिये सुधारित बहुपक्षवाद का समर्थन करके, जलवायु गठबंधनों का नेतृत्व करके, वैकल्पिक वित्त को सुरक्षित करके और हरित-प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता बढ़ाकर प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता है।
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दृष्टि मेंस प्रश्न: प्रश्न. बहुपक्षीय संस्थानों से अमेरिकी विमुखता वैश्विक भू-राजनीति और जलवायु वित्त स्थापत्य को कैसे पुनः आकार देती है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. UNFCCC से अमेरिका का बाहर निकलना समस्याग्रस्त क्यों है?
इससे विश्व के सबसे बड़े संचयी CO₂ उत्सर्जक को COP वार्त्ता और पेरिस समझौते के कार्यान्वयन को नियंत्रित करने वाले मूल कानूनी ढाँचे से हटा देता है।
2. अमेरिका के जलवायु परिवर्तन से बाहर निकलने का विकासशील देशों के लिये जलवायु वित्तपोषण पर क्या प्रभाव पड़ेगा?
इससे GCF और GEF जैसे तंत्रों के लिये वित्तपोषण की पूर्वानुमान क्षमता कमज़ोर हो जाती है, जिससे अनुकूलन, शमन और हानि एवं क्षति वित्तपोषण प्रभावित होता है।
3. अमेरिका की वापसी के भूराजनीतिक परिणाम क्या होंगे?
इससे वैश्विक शासन में नेतृत्व का अभाव उत्पन्न होता है, जिससे चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों को संयुक्त राष्ट्र संस्थानों में एजेंडा तय करने का प्रभाव प्राप्त करने का मौका मिलता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
- इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
- यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2°C या कोशिश करें कि 1.5°C से भी अधिक न होने पाए।
- विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये।
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के COP के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गईं वचनबद्धताएँ क्या हैं? (2021)
प्रश्न. नवंबर 2021 में ग्लासगो में विश्व के नेताओं के शिखर सम्मेलन में COP 26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में आरंभ की गई हरित ग्रिड पहल का प्रयोजन स्पष्ट कीजिये। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) में यह विचार पहली बार कब दिया गया था? (2021)