प्रयागराज शाखा पर IAS GS फाउंडेशन का नया बैच 10 जून से शुरू :   संपर्क करें
ध्यान दें:

टू द पॉइंट


सामाजिक न्याय

यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR)

  • 26 Mar 2024
  • 26 min read

प्रिलिम्स के लिये:

महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW), नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध (ICCPR), बीजिंग घोषणा-पत्र एवं प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5), भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम, 2030 एजेंडा।

मेन्स के लिये:

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR ): SRHR के उल्लंघन का कारण और परिणाम, भारत में SRHR की आवश्यकता, SRHR से संबंधित पहल, SRHR सुनिश्चित करने के लिये उठाए जाने वाले कदम।

प्रसंग क्या है?

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (Ensuring Sexual and Reproductive Health Rights- SRHR) सुनिश्चित करना विश्व भर में व्यक्तियों तथा राष्ट्रों के समग्र स्वास्थ्य, कल्याण एवं सामाजिक-आर्थिक विकास के लिये सर्वोपरि है। SRHR में निवेश करने हेतु सरकारों को प्रतिबद्ध करने वाले अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के बावजूद, राजनीतिक दृढ़ संकल्प की कमी, अपर्याप्त धन, लगातार लैंगिक असमानता व कामुकता से जुड़े मुद्दों का खुलकर सामना करने की अनिच्छा के कारण प्रगति बाधित हुई है।

यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार क्या हैं?

  • परिचय: 
    • SRHR में यौन और प्रजनन से संबंधित मानवाधिकारों का एक स्पेक्ट्रम शामिल है। इन अधिकारों में नागरिक तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार भी शामिल हैं, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि महिलाओं एवं पुरुषों दोनों को इष्टतम यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य तक समान पहुँच प्राप्त हो।
      • इसमें भेदभाव, अवपीड़न (Coercion) या हिंसा का सामना किये बिना, परिवार नियोजन सहित उनके यौन और प्रजनन जीवन के बारे में सूचित निर्णय लेने का अधिकार शामिल है।
      • संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, "प्रजनन और यौन स्वास्थ्य के अधिकारों में जीवन, स्वतंत्रता तथा व्यक्ति की सुरक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य देखभाल एवं सूचना का अधिकार, स्वास्थ्य सेवाओं के लिये संसाधनों के आवंटन व उनकी उपलब्धता और गैर-भेदभावपूर्ण पहुँच का अधिकार शामिल है।"
    • SRHR बच्चों और किशोरों सहित सभी व्यक्तियों के लिये अंतर्निहित अधिकार हैं, तथा सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने हेतु अभिन्न अंग हैं, जिसमें न केवल बीमारी की रोकथाम बल्कि शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं सामाजिक आयामों तक समग्र कल्याण भी शामिल है।
  • SRHR के सिद्धांत:
    • यौन और प्रजनन स्वास्थ्य की उपलब्धि यौन और प्रजनन अधिकारों की प्राप्ति पर निर्भर करती है, जो सभी व्यक्तियों के मानवाधिकारों पर आधारित हैं:
      • उनकी दैहिक अखंडता, गोपनीयता और व्यक्तिगत स्वायत्तता का सम्मान किया जाए;
      • यौन अभिविन्यास और लिंग पहचान तथा अभिव्यक्ति सहित उनकी कामुकता को स्वतंत्र रूप से परिभाषित करना;
      • तय करना कि यौन रूप से कब सक्रिय होना है या नहीं;
      • अपना यौन साथी चुनना;
      • सुरक्षित और आनंददायक यौन अनुभव प्राप्त करना;
      • तय करना कि क्या, कब और किससे शादी करनी है;
      • निर्णय लेना कि क्या, कब और किस माध्यम से बच्चा पैदा करना है या बच्चे पैदा करने हैं तथा कितने बच्चे पैदा करने हैं;
      • उपरोक्त सभी को प्राप्त करने के लिये आवश्यक जानकारी, संसाधनों, सेवाओं और समर्थन तक उनके जीवनकाल में भेदभाव, ज़बरदस्ती, शोषण तथा हिंसा से मुक्त पहुँच हो।

नोट: 

  • पुट्टास्वामी निर्णय ने विशेष रूप से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के एक हिस्से के रूप में प्रजनन विकल्प चुनने के महिलाओं के संवैधानिक अधिकार को मान्यता दी।

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR) के उल्लंघन के कारण और परिणाम क्या हैं?

कारण

नतीजे

महिलाओं के SRHR का उल्लंघन

  • गर्भनिरोधक, प्रसव पूर्व देखभाल और सुरक्षित गर्भपात सहित आवश्यक प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पर प्रतिबंध, अनपेक्षित गर्भधारण तथा असुरक्षित गर्भपात की दरों में वृद्धि में योगदान देता है, जिससे मातृ मृत्यु दर और रुग्णता बढ़ जाती है।
  • इसके अतिरिक्त अपने शरीर पर महिलाओं की स्वायत्तता को सीमित करने वाले सामाजिक मानदंड लिंग-आधारित हिंसा को कायम रखते हैं, जिससे भय और असुरक्षा का माहौल बनता है जो शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक कल्याण को प्रभावित करता है।

पितृसत्तात्मक मान्यताएँ और सामाजिक मूल्य

  • पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पारंपरिक सामाजिक मूल्य उन रूढ़ियों तथा मानदंडों को मज़बूत करके लैंगिक असमानता को कायम रखते हैं जो महिलाओं की तुलना में पुरुषों की भूमिकाओं एवं योगदान को प्राथमिकता देते हैं।
    • यह अवमूल्यन प्रजनन से परे तक फैला हुआ है, महिलाओं की शिक्षा, रोज़गार के अवसरों और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं तक पहुँच को सीमित करता है तथा उन्हें सामाजिक कलंक, भेदभाव और हाशिये पर डाल देता है।

शीघ्र विवाह और गर्भावस्था

  • कम उम्र में विवाह जैसी सांस्कृतिक प्रथाएँ लड़कियों को स्वायत्तता और शिक्षा से वंचित करती हैं, जिससे जल्दी तथा बार-बार गर्भधारण होता है।
    • किशोर गर्भधारण से मातृ जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है और गरीबी एवं निर्भरता का चक्र बना रहता है क्योंकि युवा माताओं को अक्सर शिक्षा तथा रोज़गार में बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे स्वास्थ्य व सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और बढ़ जाती हैं।

मातृ मृत्यु दर और रुग्णता

  • सुरक्षित गर्भपात सेवाओं और कुशल मातृ स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं तक सीमित पहुँच के परिणामस्वरूप मातृ मृत्यु दर और रुग्णता की उच्च दर देखी जाती है।
    • पहुँच की यह कमी मौजूदा चुनौतियों को बढ़ाती है, जो मातृ मृत्यु, जटिलताओं और विशेष रूप से सीमित स्वास्थ्य देखभाल संसाधनों वाले हाशिये पर रहे स्थित समुदायों में महिलाओं तथा उनके परिवारों के लिये दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव में योगदान देती हैं।

भारत में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR) की क्या आवश्यकता है?

  • महिलाओं की स्वायत्तता और प्रजनन स्वास्थ्य के लिये चुनौतियाँ: कई महिलाओं में शारीरिक स्वायत्तता का अभाव बना हुआ है। नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में केवल 10% महिलाएँ स्वतंत्र रूप से अपने स्वास्थ्य के बारे में निर्णय लेने में सक्षम हैं और 11% महिलाओं का मानना है कि यदि कोई महिला अपने पति के साथ यौन संबंध बनाने से इनकार करती है तो उन्हें वैवाहिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। भारत में लगभग आधे गर्भधारण अनियोजित होते हैं।
  • असुरक्षित गर्भपात का उच्च प्रसार: भारत में 15 मिलियन गर्भपात में से लगभग 78% का कारण चिकित्सा सुविधाओं का  उपलब्ध न  होना है, जो महत्त्वपूर्ण सुरक्षित गर्भपात सेवाओं तक पहुँच की कमी को दर्शाता है।
  • गर्भनिरोधक तक सीमित पहुँच: भारत के प्रजनन वर्षों में 30 मिलियन से अधिक विवाहित महिलाएँ गर्भनिरोधक का उपयोग करने में असमर्थ हैं, जो परिवार नियोजन सेवाओं में बाधाओं को उजागर करता है।
  • किशोर प्रजनन स्वास्थ्य चुनौतियाँ: भारत में 2 मिलियन किशोर महिलाओं की आधुनिक गर्भनिरोधक तक पहुँच नहीं है और जन्म देने वाली किशोरियों के एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत का अनुशंसित न्यूनतम चार प्रसव-पूर्व देखभाल परीक्षण में शामिल न होना है। 
  • जनसंख्या नियंत्रण पर सरकार का ध्यान: प्रजनन अधिकारों के लिये सरकार के ऐतिहासिक दृष्टिकोण ने व्यक्तिगत स्वायत्तता और व्यापक यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच पर जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्राथमिकता दी है, जिससे गर्भपात एवं गर्भनिरोधक तक सार्वभौमिक पहुँच जैसी पहल पर ध्यान केंद्रित करने में कमी देखी गई है।
  • लिंग आधारित हिंसा का हाशियाकरण: भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में लिंग आधारित हिंसा को अक्सर हाशिये पर रखा जाता है, जिसे मुख्य रूप से स्वास्थ्य संबंधी चिंता के बजाय कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में संबोधित किया जाता है, बावजूद इसके कि व्यक्तियों की भलाई पर इसका अत्यधिक प्रभाव पड़ता है।
  • असुरक्षित गर्भपात के कारण मातृ मृत्यु: संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की विश्व जनसंख्या रिपोर्ट 2022 के अनुसार, असुरक्षित गर्भपात भारत में मातृ मृत्यु का तीसरा प्रमुख कारण है तथा प्रतिदिन असुरक्षित गर्भपात से संबंधित कारणों की वज़ह से लगभग 8 महिलाओं की मृत्यु हो जाती है। वर्ष 2007-2011 के बीच भारत में 67% गर्भपात के मामलों को असुरक्षित के रूप में वर्गीकृत किया गया था।

यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR) से संबंधित पहल क्या हैं?

  • वैश्विक पहल:
    • महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर कन्वेंशन (CEDAW): यह एक अंतर्राष्ट्रीय कानूनी साधन है जिसके लिये देशों को सभी क्षेत्रों में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करना होगा तथा महिलाओं एवं लड़कियों के समान अधिकारों को बढ़ावा देना होगा।
      • CEDAW को अक्सर महिलाओं के अधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय बिल के रूप में वर्णित किया जाता है और यह प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समझौतों में से एक है जो लैंगिक समानता हासिल करने तथा सभी महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाने में मार्गदर्शन करता है।
    • नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध (ICCPR): इसका उद्देश्य नागरिक और राजनीतिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिनमें शामिल हैं:
      • भेदभाव से मुक्ति, पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता का अधिकार, जीवन का अधिकार, प्रताड़ना/यातना से मुक्ति, दासता से मुक्ति, व्यक्ति की स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार, हिरासत में मानवता का व्यवहार करने का अधिकार, आंदोलन की स्वतंत्रता, गैर-नागरिकों को मनमाने निष्कासन से मुक्ति, निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार, कानून के समक्ष मान्यता का अधिकार, निजता का अधिकार, धर्म और विश्वास की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा का अधिकार, संघ की स्वतंत्रता, विवाह करने और परिवार बसाने का अधिकार, बच्चों का जन्म पंजीकरण एवं राष्ट्रीयता का अधिकार, सार्वजनिक मामलों में भाग लेने का अधिकार, कानून के समक्ष समानता का अधिकार और अल्पसंख्यक अधिकार।
    • बीजिंग घोषणा-पत्र एवं प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन: यह महिलाओं के सशक्तीकरण के लिये एक दूरदर्शी एजेंडा है। यह विश्व भर में महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण करने और महिला सशक्तीकरण के समर्थन में राज्यों के प्रयासों का आकलन करने हेतु संदर्भ ढाँचे में से एक है।
  • राष्ट्रीय पहल:
    • गर्भनिरोधक पद्धति का विस्तार और सुदृढ़ीकरण: परिवार नियोजन 2030 साझेदारी के प्रति भारत की प्रतिबद्धता में अपनी गर्भनिरोधक बास्केट (Contraceptive Basket) का विस्तार करना शामिल है। नए गर्भनिरोधक विकल्पों को शामिल करने से महिलाओं के अधिकारों और स्वायत्तता को बढ़ावा मिलता है, जिससे आधुनिक गर्भनिरोधक के प्रचलन में वृद्धि होती है।
      • समय पर गुणवत्तापूर्ण और किफायती परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुँच महत्त्वपूर्ण है क्योंकि बिना अंतराल के गर्भधारण से नवजात शिशु के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है और साथ ही मातृ मृत्यु दर, रुग्णता तथा स्वास्थ्य देखभाल व्यय पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।
    • भारत की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017: यह मौजूदा संसाधनों के इष्टतम उपयोग के माध्यम से प्रजनन, मातृ, बाल और किशोर स्वास्थ्य के सभी पहलुओं के लिये निशुल्क, व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने को प्राथमिकता देती है।
      • इसके अलावा भारत सरकार ने प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं के लिये प्रदाता आधार का विस्तार करने हेतु देश भर में प्रसूति विद्या सेवाएँ भी शुरू की हैं।
    • राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK): वर्ष 2014 में शुरू की गई यह पहल किशोरावस्था के दौरान स्वस्थ विकास को बढ़ावा देने, युवा लोगों की विशिष्ट यौन और प्रजनन स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करने पर केंद्रित है।
    • किशोर यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं में कमियों को दूर करना: प्रगति के बावजूद महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं, जिनमें सटीक जानकारी तक सीमित पहुँच और व्यापक गर्भपात देखभाल शामिल है। प्रदाता पूर्वाग्रह और अपर्याप्त जानकारी जैसी बाधाओं को दूर करने के लिये प्रयासों की आवश्यकता है।
    • SDG में SRHR के प्रति भारत की प्रतिबद्धता: सतत् विकास लक्ष्यों (SDG) में SRHR का एकीकरण और अंतर्राष्ट्रीय नीति ढाँचे में इसकी मान्यता इन अधिकारों को बनाए रखने का कर्त्तव्य राष्ट्रों पर है और यह मौलिक मानवाधिकारों के रूप में यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य की स्वीकृति को अनिवार्य बनाती है।
      • सतत् विकास के लिये 2030 एजेंडा पर हस्ताक्षरकर्त्ता और वैश्विक आबादी के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से के घर के रूप में भारत यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा करने वाली नीतियों और कानून के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये मजबूर है।
      • स्वास्थ्य पर SDG 3 और लैंगिक समानता तथा महिलाओं और लड़कियों के सशक्तीकरण पर SDG 5 दोनों में यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य एवं प्रजनन अधिकारों से संबंधित लक्ष्य शामिल हैं।

नोट: भारत सरकार के स्वास्थ्य, जनसंख्या और विकास कार्यक्रमों ने पिछले कुछ वर्षों में लगातार प्रगति दिखाई है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में जन्म के समय जीवन प्रत्याशा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

  • 1990 के दशक की तुलना में वर्तमान में एक भारतीय की जीवन प्रत्याशा में एक दशक से अधिक समय की वृद्धि हुई है। मातृ स्वास्थ्य के मामले में भारत ने प्रभावशाली प्रगति की है। मातृ मृत्यु दर की वर्तमान दर 97 (प्रति 100,000 जीवित जन्म) है, जो वर्ष 2004 में 254 से कम है।
  • इन कार्यक्रमों की एक और जीत लैंगिक सशक्तीकरण है। वर्ष 2000 की शुरुआत से भारत में बाल विवाह की संख्या आधी हो गई है।
    • किशोर गर्भधारण में भी उल्लेखनीय कमी आई है। स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण सहित महत्त्वपूर्ण सेवाओं तक पहुँच में भी सुधार हुआ है।

यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR) सुनिश्चित करने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

  • व्यापक लैंगिकता शिक्षा (CSE): स्कूलों और समुदायों में आयु-उपयुक्त, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील तथा साक्ष्य-आधारित यौन शिक्षा कार्यक्रमों को लागू करने से व्यक्तियों को यौन स्वास्थ्य, रिश्ते, गर्भनिरोधक तथा सहमति के बारे में सटीक जानकारी मिल सकती है।
  • गर्भनिरोधक और परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुँच: किफायती और सुलभ गर्भनिरोधक तथा परिवार नियोजन सेवाएँ सुनिश्चित करने से व्यक्तियों को अपने प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में सूचित विकल्प चुनने एवं अनपेक्षित गर्भधारण को रोकने की अनुमति मिलती है।
  • सुरक्षित एवं कानूनी गर्भपात सेवाएँ: सुरक्षित और कानूनी गर्भपात सेवाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने से व्यक्तियों के प्रजनन अधिकारों की रक्षा हो सकती है तथा स्वास्थ्य एवं जीवन को खतरे में डालने वाली असुरक्षित गर्भपात प्रथाओं को रोका जा सकता है।
  • स्वास्थ्य कार्यबल क्षमता: समय पर उच्च-गुणवत्ता और सम्मानजनक यौन तथा प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के लिये स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की क्षमता एवं कौशल को बढ़ाना आवश्यक है।
  • अंतर-क्षेत्रीय सहयोग: यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिये पूरे जीवन चक्र में पहुँच तथा समर्थन सुनिश्चित करने हेतु स्वास्थ्य, शिक्षा व परिवहन सहित विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग की आवश्यकता होती है।
  • लक्षित निवेश की आवश्यकता: भारत के लिये गुटमाकर-लैंसेट आयोग की सिफारिशों के अनुसार, अवांछित गर्भधारण, असुरक्षित गर्भपात, अनियोजित प्रसव और मातृ मृत्यु दर को कम करने के साथ-साथ युवा लोगों की शारीरिक स्वायत्तता तथा कल्याण की सुरक्षा के लिये किशोर यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य में लक्षित निवेश महत्त्वपूर्ण है।
  • समुदाय-आधारित सहकर्मी शिक्षा कार्यक्रम: नवीन सहकर्मी शिक्षा कार्यक्रमों के माध्यम से स्थानीय समुदायों को शामिल करने से मासिक धर्म के आसपास की चुप्पी और कलंक (Silence and Stigma) को तोड़ने में मदद मिल सकती है। ये कार्यक्रम महिलाओं तथा लड़कियों को मासिक धर्म स्वच्छता दूत (Menstrual Hygiene Ambassadors) बनने के लिये प्रशिक्षित कर सशक्त बना सकते हैं।

निष्कर्ष

भारत में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार (SRHR) सुनिश्चित करने की दिशा में यात्रा जारी है, जिसमें प्रगति के साथ-साथ लगातार चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। जैसे-जैसे हम लैंगिक समानता, स्वास्थ्य देखभाल पहुँच तथा सामाजिक मानदंडों की जटिलताओं से निपटते हैं, सभी के लिये स्वायत्तता, गरिमा एवं कल्याण को बढ़ावा देने हेतु हमारी प्रतिबद्धता को दृढ़ करना आवश्यक है। समावेशिता, शिक्षा व सहयोगात्मक प्रयासों को अपनाकर, हम एक ऐसे भविष्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकता है और एक सहायक तथा न्यायसंगत समृद्ध समाज का निर्माण कर सकता है।

  UPSC सिविल सेवा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स

प्रश्न. प्रायः समाचारों में देखा जाने वाला 'बीजिंग घोषणा और कार्रवाई मंच (बीजिंग डिक्लरेशन एंड प्लेटफॉर्म फॉर एक्शन)' निम्नलिखित में से क्या है? (2015)

(a) क्षेत्रीय आतंकवाद से निपटने की एक कार्यनीति (स्ट्रैटजी), शंघाई सहयोग संगठन की बैठक का एक परिणाम।
(b) एशिया-प्रशांत क्षेत्र में धारणीय आर्थिक संवृद्धि की एक कार्य-योजना, एशिया-प्रशांत आर्थिक मंच (एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक फोरम) के विचार-विमर्श का एक परिणाम।
(c) महिला सशक्तीकरण हेतु एक कार्यसूची, संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित विश्व सम्मेलन का एक परिणाम।
(d) वन्यजीवों के दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग) की रोकथाम हेतु कार्यनीति, पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईस्ट एशिया समिट) की एक उद्घोषणा।

उत्तर: (c)


मेन्स:

प्रश्न. समय और स्थान के विपरीत भारत में महिलाओं के लिये निरंतर चुनौतियाँ क्या हैं? (2019)

प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचना कीजिये। (2020)

close
एसएमएस अलर्ट
Share Page
images-2
images-2