शासन व्यवस्था
हेट स्पीच और हेट क्राइम
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, हेट क्राइम, हेट स्पीच, विधि आयोग की रिपोर्ट, अनुच्छेद 19, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो
मुख्य परीक्षा के लिये: हेट स्पीच बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भारत में हेट क्राइम को संबोधित करने में कानूनी और संस्थागत अंतराल, भाईचारा और समानता को संरक्षित करने में न्यायपालिका की भूमिका।
चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हेट क्राइम और हेट स्पीच पर बढ़ती चिंताओं को संबोधित किया, विभाजनकारी सार्वजनिक वक्तव्यों में संयम बरतने का आग्रह किया, साथ ही हेट क्राइम को मान्यता देने हेतु एक विशेष विधिक ढाँचे के लिये दायर याचिका की जाँच की।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पहचान-आधारित हिंसा और भेदभावपूर्ण बयानबाज़ी सामाजिक एकता के लिये खतरा उत्पन्न करते हैं, साथ ही इस बात पर भी बल दिया कि प्रतिक्रियाएँ समता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने वाली होनी चाहिये।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ते हेट स्पीच और हेट क्राइम पर चिंता व्यक्त की है, यह रेखांकित करते हुए कि पहचान-आधारित हिंसा सामाजिक एकता के लिये खतरा है और इस चुनौती से निपटना समानता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक आदर्शों के संरक्षण हेतु आवश्यक है।
- इसने कानूनी अंतराल, कार्यान्वयन की विफलताओं और डिजिटल माध्यमों से घृणा फैलाने की तीव्रता को प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित करते हुए हेट क्राइम पर अंकुश लगाने के लिये अधिक स्पष्ट कानूनों, सख्त प्रवर्तन और निवारक उपायों की मांग की है।
हेट स्पीच और हेट क्राइम क्या है?
हेट स्पीच
- परिचय: विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट (2017) के अनुसार, हेट स्पीच से आशय ऐसे शब्दों या कृत्यों से है, जिनका उद्देश्य नस्ल, जातीयता, लिंग, धर्म, यौन अभिविन्यास आदि के आधार पर समूहों के विरुद्ध घृणा भड़काना हो।
- हेट स्पीच के अंतर्गत ऐसे बोले या लिखे गए शब्द, संकेत या दृश्य शामिल होते हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा भड़काना, घृणा या भय उत्पन्न करना हो।
- हेट स्पीच के खिलाफ सुरक्षा:
- संवैधानिक संरक्षण एवं सीमाएँ: अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) लोक‑व्यवस्था, गरिमा, राष्ट्र की अखंडता एवं संप्रभुता की रक्षा तथा अपराध को बढ़ावा देने जैसे उद्देश्यों हेतु इस अधिकार पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
- विधिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले कृत्यों के लिये दंडित करती है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने के दोषसिद्ध प्रत्याशियों को अयोग्य ठहराता है।
- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: SC/ST के सदस्यों का अपमान या उन्हें अपमानित करने वाले कृत्यों को "अत्याचार" के रूप में मान्यता देता है और अपराधियों के लिये कठोर दंड निर्धारित करता है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले कृत्यों को दंडनीय बनाता है।
- हेट स्पीच से संबंधित प्रमुख निर्णय:
- शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने हेट स्पीच की बढ़ती प्रवृत्ति को रेखांकित किया और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये स्वप्रेरणा से कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने हेट स्पीच से प्रेरित भीड़ हिंसा पर अंकुश लगाने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, जिसमें लिंचिंग रोकने के लिये ज़िला नोडल अधिकारी नियुक्त करना शामिल था।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): उच्चतम न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को अस्पष्टता के आधार पर निरस्त कर दिया, यह पुष्टि करते हुए कि अस्पष्ट प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।
- प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014): न्यायालय ने विधि आयोग से हेट स्पीच को परिभाषित करने और निर्वाचन आयोग को इसे विनियमित करने हेतु सशक्त बनाने वाले उपायों का पता लगाने का आग्रह किया।
हेट क्राइम
- परिचय: हेट क्राइम वह अपराध है जो किसी व्यक्ति या समूह के नस्ल, रंग, धर्म, राष्ट्रीयता, यौन अभिविन्यास, लैंगिक पहचान या विकलांगता के आधार पर पक्षपातपूर्ण भावना से किया जाता है।
- हेट क्राइम के विरुद्ध संरक्षण: भारत में हेट क्राइम की कोई विशिष्ट वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है।
- हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे प्रावधान धर्म के आधार पर मॉब लिंचिंग, जाति‑आधारित हिंसा, दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमलों तथा लैंगिकता के आधार पर किये गए हमलों जैसी कृतियों को संबोधित करते हैं।
हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने में क्या चुनौतियाँ हैं?
- विधिक चुनौती:
- अस्पष्ट परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में "हेट क्राइम" संबंधी कानून का अभाव पूर्वाग्रह-प्रेरित हिंसा पर विशेष रूप से मुकदमा चलाना कठिन बना देता है।
- "उपद्रव," "अपमान," या "असामंजस्य" जैसे शब्दों की व्याख्या व्यक्तिपरक रूप से की जा सकती है।
- आशय सिद्ध करना: दोषसिद्धि सुनिश्चित करने के लिये अभियोजकों को "दुर्भावनापूर्ण आशय" या किसी विशिष्ट "पूर्वाग्रह मंशा" को सिद्ध करना होता है।
- अपराध के समय किसी व्यक्ति के मन में क्या था, यह सिद्ध करना एक बड़ी साक्ष्यगत चुनौती है।
- अस्पष्ट परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में "हेट क्राइम" संबंधी कानून का अभाव पूर्वाग्रह-प्रेरित हिंसा पर विशेष रूप से मुकदमा चलाना कठिन बना देता है।
- प्रवर्तन अंतराल:
- स्वतः संज्ञानात्मक कार्रवाई का अभाव: यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को शिकायत की प्रतीक्षा किये बगैर स्वतः संज्ञान से मामले दर्ज करने का निर्देश दिया है, विशेषकर जब शक्तिशाली राजनीतिक हस्तियाँ शामिल हों, तब प्रवर्तन असमान बना हुआ है।
- कम दोषसिद्धि दर: वैमनस्य को बढ़ावा देने से संबंधित मामलों में अक्सर अपर्याप्त साक्ष्य संग्रह या जाँचकर्त्ताओं पर राजनीतिक दबाव के कारण आरोपियों को बरी कर दिया जाता है।
- डिजिटल चुनौती:
- एल्गोरिद्मिक विस्तार: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अक्सर “एंगेजिंग” कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें दुर्भाग्यवश सनसनीखेज और हेट स्पीच भी शामिल होते हैं।
- गुमनामी: इंटरनेट पर पहचान छिपे रहने की धारणा आदतन अपराधियों को बेखौफ होकर काम करने की छूट देती है, जो अक्सर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) या फर्ज़ी खातों का उपयोग करते हैं।
- वैश्विक प्रकृति: विदेशी सर्वरों पर होस्ट की गई हेट स्पीच सामग्री को हटाना भारतीय कानून-प्रवर्तन के लिये एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह विधिक क्षेत्राधिकार और सीमा-पार डेटा सहयोग के मुद्दों से जुड़ा है।
- सामाजिक चुनौती:
- चुनावी लाभ: सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि कुछ राजनीतिक समूह चुनावी समर्थन जुटाने के लिये डर फैलाने और बहिष्कारकारी विमर्श का सहारा लेते हैं, जिससे घृणा ‘राजनीतिक और व्यावसायिक रूप से लाभदायक’ बन जाती है।
- ऐतिहासिक पूर्वाग्रह: समाज में गहराई से जमी जाति और धर्म आधारित संरचनाएँ घृणा फैलाने वाली अभिव्यक्तियों के लिये अनुकूल माहौल तैयार करती हैं, जो आगे चलकर शारीरिक हिंसा (हेट क्राइम) और अन्य घृणा अपराधों में बदल सकती हैं।
- सांख्यिकीय ब्लाइंड स्पॉट: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को अतीत में लिंचिंग और धार्मिक हत्याओं से संबंधित अलग-अलग व विशिष्ट आँकड़े संकलित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण नीति-निर्माताओं के लिये समस्या की वास्तविक व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है।
हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- विशिष्ट परिभाषा को संहिताबद्ध करना: एक स्वतंत्र कानून बनाया जाए, जो ‘हेट स्पीच’ और ‘हेट क्राइम’ को हिंसा, भेदभाव या गंभीर बहिष्करण के लिये उकसावे के आधार पर स्पष्ट रूप से परिभाषित करे।
- संवैधानिक अपकृत्य दायित्व: यह सिद्धांत स्थापित किया जाए कि सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा हेट स्पीच का कृत्य एक दीवानी अपराध के समकक्ष माना जाए। इसके तहत पीड़ित व्यक्ति गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के उल्लंघन के लिये राज्य से मुआवज़े की मांग कर सकते हैं।
- सेवा नियमों का कड़ाई से प्रवर्तन: अखिल भारतीय सेवा नियमों में संशोधन कर ‘हेट स्पीच को रोकने या उसकी रिपोर्ट करने में विफलता’ को गंभीर कदाचार घोषित किया जाए। इससे विषाक्त बयानबाज़ी को सामान्य बनाने वाले अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जा सकेगा।
- विशाखा-शैली आचार संहिता: संवैधानिक पदाधिकारियों के लिये न्यायिक दिशा-निर्देश लागू किये जाएँ, जो “संयम के दायित्व” को अनिवार्य बनाएँ, ताकि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप बंधुत्व को बढ़ावा दें।
- सुओ मोटो FIR अनिवार्यता: 2022 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को सख्ती से लागू किया जाए, जिसके तहत पुलिस को घृणास्पद भाषण के मामलों में स्वतः (सुओ मोटो) FIR दर्ज करनी होगी और किसी भी देरी को न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
- 24 घंटे में डिजिटल सामग्री हटाने की व्यवस्था: IT नियम 2026 के तहत ज़िला नोडल अधिकारियों के लिये एक “प्राथमिक चैनल” स्थापित किया जाए, जिससे भड़काऊ सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाने की कार्रवाई की जा सके और उसके तीव्र प्रसार को रोका जा सके।
- फास्ट-ट्रैक “हेट कोर्ट्स”: घृणा अपराधों के मामलों का निपटारा 6 महीने के भीतर सुनिश्चित करने के लिये विशेष अदालतें नामित की जाएँ, ताकि न्याय शीघ्र मिले और यह एक स्पष्ट निवारक (डिटरेंट) के रूप में कार्य करे।
- विद्यालयों में मीडिया साक्षरता: राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में NCERT के माध्यम से समालोचनात्मक चिंतन को समाहित किया जाए, ताकि विद्यार्थी भ्रामक सूचनाओं और “अन्यीकरण” को पहचान सकें।
- सामुदायिक शांति समितियाँ: विविध स्थानीय नेताओं को शामिल करते हुए वार्ड-स्तरीय समितियों को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि वे प्रथम प्रतिक्रिया-कर्त्ताओं की भूमिका निभा सकें और सांप्रदायिक तनाव को हिंसा में परिवर्तित होने से पूर्व ही संबोधित कर सकें।
निष्कर्ष
विधायी स्पष्टता, डिजिटल त्वरित-प्रतिक्रिया तंत्र और अधिकारियों के “ड्यूटी ऑफ केयर” को एकीकृत करके भारत घृणा के क्षरणकारी प्रभावों से अपने संवैधानिक बंधुत्व की रक्षा करना चाहता है। अंततः सभी के लिये समान नागरिकता सुनिश्चित करने हेतु कानूनी प्रावधानों और ज़मीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटना ही अंतिम चुनौती बना हुआ है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में हेट क्राइम पर मुकदमा चलाने में आने वाली कानूनी और संस्थागत चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। एक अलग कानून की मांग क्यों की जा रही है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत के विधि आयोग के अनुसार हेट स्पीच क्या है?
हेट स्पीच में ऐसे शब्द, संकेत या दृश्य शामिल होते हैं, जिनका उद्देश्य धर्म, जाति, लिंग, नस्ल या जातीयता जैसी पहचान के आधार पर किसी समूह के विरुद्ध घृणा, भय या हिंसा को भड़काना होता है।
2. क्या भारत में हेट क्राइम को डिफाइन करने वाला कोई खास कानून है?
नहीं। भारत में घृणा अपराधों पर कोई पृथक् (स्टैंडअलोन) कानून नहीं है, ऐसे कृत्यों से संबंधित मामलों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत निपटाया जाता है।
3. भारत में हेट स्पीच को कौन-से संवैधानिक प्रावधान विनियमित करते हैं?
अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) लोक व्यवस्था, गरिमा की रक्षा और अपराध के लिये उकसावे को रोकने हेतु युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
4. हेट स्पीच और हेट क्राइम के खिलाफ कार्रवाई में कौन-सी चुनौतियाँ बाधा डालती हैं?
मुख्य समस्याओं में अस्पष्ट कानूनी परिभाषाएँ, पक्षपातपूर्ण मंशा सिद्ध करने में कठिनाई, कमज़ोर प्रवर्तन, डिजिटल गुमनामी और सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत 'निजता का अधिकार' संरक्षित है? (2021)
(a) अनुच्छेद 15
(b) अनुच्छेद 19
(c) अनुच्छेद 21
(d) अनुच्छेद 29
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. आप 'वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य' संकल्पना से क्या समझते हैं? क्या इसकी परिधि में घृणा वाक् भी आता है? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (2014)

शासन व्यवस्था
फ्रीबीज़ की संस्कृति पर अंकुश
प्रिलिम्स के लिये: सर्वोच्च न्यायालय, राजनीतिक दल, राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP), आदर्श आचार संहिता, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, राजकोषीय घाटा, मध्याह्न भोजन योजना, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003, ऑफ-बजट बॉरोइंग
मेन्स के लिये: भारत में फ्रीबीज़ और उनसे जुड़ी चिंताएँ, फ्रीबीज़ बनाम कल्याणकारी योजनाओं पर बहस, फ्रीबीज़ पर अंकुश लगाने के लिये आवश्यक कदम।
स्रोत: IE
चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों द्वारा फ्रीबीज़ और सीधे नकद हस्तांतरण की घोषणा करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने लोक-लुभावन उपायों पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि वे राष्ट्रीय विकास में बाधा डाल रहे हैं और पूछा कि क्या इस तरह के कदम 'तुष्टीकरण' के समान हैं। इस तरह फ्रीबीज़ और वास्तविक कल्याण के बीच बहस फिर से शुरू हो गई है।
सारांश
- फ्रीबीज़ से अल्पकालिक राहत मिलती है लेकिन इससे राजकोषीय अस्थिरता और निर्भरता का खतरा उत्पन्न होता है।
- DPSP पर आधारित कल्याणकारी नीतियाँ नियोजित व्यय के माध्यम से दीर्घकालिक मानव विकास को लक्षित करती हैं।
- समाधानों में सशर्त हस्तांतरण, FRMB को मज़बूत करना, मतदाता जागरूकता और योग्यता आधारित वस्तुओं को लोक-लुभावन फ्रीबीज़ से अलग करना शामिल है।
फ्रीबीज़ क्या हैं?
- परिचय: निशुल्क प्रदान की जाने वाली चीज़ो या वस्तुओं से आशय उन लोक कल्याणकारी उपायों और लाभों से है, जिन्हें या तो सरकारों द्वारा मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है या फिर राजनीतिक दलों द्वारा आमतौर पर चुनावों के दौरान मतदाताओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से उपलब्ध कराने का वादा किया जाता है।
- मुख्य विशेषताएँ: फ्रीबीज़ लोक-लुभावन और भ्रामक होते हैं। इन्हें मत प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रदान किया जाता है, जिससे महत्त्वपूर्ण दीर्घकालिक निवेशों में लगने वाला धन दूसरी ओर मोड़ दिया जाता है।
- वे अस्थिर और अनुत्पादक भी हैं, जो राज्य के वित्त पर बोझ उत्पन्न करते हैं और आत्मनिर्भरता के बजाय निर्भरता की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं।
- सामान्य उदाहरण:
- उपयोगिता सब्सिडी:किसानों या परिवारों के लिये मुफ्त बिजली (कुछ निश्चित इकाइयों तक), मुफ्त पानी के कनेक्शन।
- उपभोक्ता वस्तुएँ: लैपटॉप, TV, मिक्सर-ग्राइंडर आदि का निशुल्क वितरण।
- खाद्य एवं आवश्यक वस्तुएँ: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अलावा मुफ्त अनाज, मासिक मुफ्त राशन किट
- ऋण माफी: किसानों या अन्य सामुदायिक ऋणों को माफ करना।
- नकद हस्तांतरण: बेरोज़गार युवाओं या महिलाओं जैसे विशिष्ट समूहों को सीधे नकद सहायता प्रदान करना।
- कानूनी और संस्थागत परिदृश्य:
- सर्वोच्च न्यायालय: एस. सुब्रमण्यम बालाजी मामले, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि फ्रीबीज़ विधायी नीति के दायरे में आते हैं और न्यायिक जाँच से परे हैं। इसने इस बात पर जोर दिया कि कुछ फ्रीबीज़/सुविधाएँ राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP) के अनुरूप हैं।
- वर्ष 2022 में, सर्वोच्च न्यायालय ने नीति आयोग, वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग, RBI और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों वाले एक विशेषज्ञ समूह का गठन करने का फैसला किया, ताकि मुफ्त योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन किया जा सके और नियामक उपायों की सिफारिश की जा सके, लेकिन अंततः इसका गठन नहीं किया गया।
- वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव से पहले दिये जाने वाले फ्रीबीज़ की कड़ी आलोचना की। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चेतावनी दी कि मुफ्त राशन और पैसा देने से कार्यबल हतोत्साहित होता है और इससे समाज में ‘आश्रितों का एक वर्ग’ उत्पन्न होता है।
- भारत निर्वाचन आयोग: अपनी आदर्श आचार संहिता और घोषणापत्र दिशा-निर्देशों के तहत, यद्यपि घोषणापत्रों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता है, फिर भी दलों को ऐसे वादों से बचना चाहिये जो चुनावों की पवित्रता को दूषित कर सकते हैं या अनुचित प्रभाव डाल सकते हैं।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की चेतावनी: RBI ने फ्रीबीज़ को कल्याणकारी उपायों के रूप में वर्गीकृत किया है, जो शिक्षा जैसी योग्यता-आधारित वस्तुओं से अलग हैं। RBI ने आगाह किया है कि ऋण माफी, मुफ्त बिजली और नकद हस्तांतरण जैसी प्रतिस्पर्द्धी चुनावी घोषणाएँ राज्य के बजट पर दबाव डालती हैं और बुनियादी ढाँचे पर होने वाले व्यय को कम करती हैं।
भारत में फ्रीबीज़ के समक्ष क्या चिंताएँ हैं?
- बढ़ता ऋण भार: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारतीय राज्यों में लागू किये गए निशुल्क नकद हस्तांतरण और जनहितकारी मुफ्त योजनाओं पर वित्त वर्ष 2026 में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। राज्यों का संयुक्त सकल राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2022 में सकल घरेलू उत्पाद के 2.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 3.2% हो गया, जबकि बकाया देनदारियाँ सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 28.1% तक पहुँच गईं।
- उत्पादक पूंजी का अपवर्जन: जब वित्तीय दबाव बढ़ता है, तो गैर-उत्पादक व्यय को प्राथमिकता देने से महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में निवेश कम हो जाता है। पूंजीगत व्यय में यह कटौती, जो अधिक मज़बूत और सतत विकास के लिये आवश्यक है, दीर्घकालिक निवेशों से विचलन उत्पन्न करती है। नतीजतन, यह मध्यम अवधि के आर्थिक विकास और विकासात्मक लक्ष्यों को कमज़ोर करता है।
- चुनावी और लोकतांत्रिक चिंताएँ: चुनाव से पहले लोक वित्त से अनुचित फ्रीबीज़ का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है और निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा को बाधित करता है। इस प्रकार की प्रथाएँ मतदाताओं को रिश्वत देने जैसे अनैतिक आचरण के समान हैं।
- निर्भरता संस्कृति का निर्माण: लाभार्थियों के संदर्भ में, नकद हस्तांतरण अनियत मज़दूरों के लिये मासिक आय का 11-24% और कुछ स्वरोज़गार में संलग्न महिलाओं के लिये 87% तक होता है, जिससे दीर्घकालिक निर्भरता को लेकर चिंताएँ बढ़ जाती हैं। यह आत्मनिर्भरता एवं उद्यमशीलता को हतोत्साहित करता है, जो सतत आर्थिक विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- उदाहरण के लिये, वेनेज़ुएला द्वारा निशुल्क भोजन, परिवहन और सेवाओं के प्रावधान ने एक अनुत्पादक जनसंख्या को बढ़ावा दिया, जिसने अंततः लगभग वर्ष 2000 में देश के आर्थिक पतन में योगदान दिया।
- विकासात्मक परिणामों पर सीमित प्रभाव: यद्यपि फ्रीबीज़ से उपभोग और अल्पकालिक आय स्थिरता में सुधार होता है लेकिन इससे बच्चों के पोषण, शिक्षा के परिणामों में लगातार सुधार नहीं होता है और न ही गरीबी से स्थायी रूप से बाहर निकलने में मदद मिलती है। ऐसे परिणाम केवल नकद हस्तांतरण पर निर्भर नहीं करते, बल्कि पूरक लोक सेवाओं और रोज़गार पर भी निर्भर करते हैं।
फ्रीबीज़ के लाभ
- कल्याणकारी योजनाओं की नींव: मध्याह्न भोजन योजना, जिसे पहली बार वर्ष 1956 में तमिलनाडु द्वारा शुरू किया गया था, बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई गई। एन.टी. रामाराव की आंध्र प्रदेश में 2 रुपये प्रति किग्रा. चावल योजना ने आज के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की नींव रखी।
- तेलंगाना की रायथु बंधु और ओडिशा की कालिया योजनाओं ने किसान सहायता के लिये प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN) के अग्रदूत के रूप में कार्य किया।
- शैक्षिक पहुँच: नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार और पश्चिम बंगाल में स्कूली छात्राओं को साइकिल वितरित करने से ड्रॉपआउट की दर में उल्लेखनीय कमी आई है, उपस्थिति बढ़ी है और अधिगम के परिणाम बेहतर हुए हैं।
- महिला सशक्तीकरण: महिलाओं के लिये बस पास जैसे फ्रीबीज़ उन्हें कार्यबल में शामिल होने के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिससे परिवार आर्थिक रूप से स्थिर होते हैं और महिलाओं का सशक्तीकरण होता है। तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्य महिलाओं को सिलाई मशीनें प्रदान करते हैं, जिससे आजीविका के अवसर बढ़ते हैं।
- खाद्य सुरक्षा: सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मध्याह्न भोजन जैसी खाद्य सुरक्षा योजनाएँ बुनियादी पोषण सुनिश्चित करती हैं, जिससे चरम गरीबी को रोका जा सकता है।
- आर्थिक प्रोत्साहन: नकद हस्तांतरण से मांग-पक्षीय प्रोत्साहन उत्पन्न होता है जिससे लघु व्यवसायों और स्थानीय निर्माताओं को लाभ होता है।
- लोकतांत्रिक भागीदारी: फ्रीबीज़ प्रदान करने से सरकार की जवाबदेही और नागरिकों की ज़रूरतों के प्रति उसकी तत्परता प्रदर्शित करके राजनीतिक जागरूकता और जन विश्वास बढ़ता है।
फ्रीबीज़ बनाम कल्याण पर विमर्श क्या है?
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पहलू |
फ्रीबीज़ |
Welfare Policies / Schemes कल्याण |
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परिभाषा |
निशुल्क उपलब्ध कराए जाने वाले जन कल्याणकारी उपाय, जो प्रायः अल्पकालिक और लोक-लुभावन प्रकृति के होते हैं। |
दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक उत्थान, मानव पूंजी निर्माण और समानता के उद्देश्य से संरचित, अधिकार-आधारित या विकासात्मक हस्तक्षेप (राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के अनुरूप)। |
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प्राथमिक उद्देश्य |
मतदाताओं को तुरंत आकर्षित करना, चुनावी लाभ प्राप्त करना या अल्पकालिक राहत/लोकप्रियतावादी तुष्टीकरण। |
जीवन स्तर में सतत सुधार, गरीबी उन्मूलन, कौशल विकास और सामाजिक न्याय। |
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समय-सीमा |
अल्पकालिक; प्रायः चुनावों के आसपास घोषित या विस्तारित किये जाते हैं, लेकिन उनकी स्थिरता के लिये सीमित योजना होती है। |
दीर्घकालिक; स्थायी प्रभाव और संस्थागत निरंतरता के लिये डिज़ाइन किया गया। |
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लक्ष्य निर्धारण |
प्रायः यह सार्वभौमिक होता है (उदाहरण के लिये, आय पर ध्यान दिये बिना सभी उपभोक्ताओं के लिये निशुल्क विद्युत/जल)। |
कमज़ोर/वंचित समूहों (जैसे– निर्धन, महिलाएँ, बच्चे, ग्रामीण बेरोज़गार) को लक्षित करके सार्वभौमिक कवरेज की अनुत्पादक लागत से बचा जा सके। |
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राजकोषीय स्थिरता |
इससे प्रायः राज्य के बजट पर दबाव पड़ता है, पूंजीगत व्यय में कटौती होती है और राजस्व घाटे या आकस्मिक देनदारियों में योगदान मिलता है। |
राजकोषीय विवेक को प्राथमिकता देता है; विकास और प्रगति पर उच्च गुणक प्रभाव वाले लाभकारी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करता है। |
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आर्थिक प्रभाव |
इससे निर्भरता उत्पन्न हो सकती है, बाज़ारों में विकृति आ सकती है, ऋण अनुशासन कमज़ोर हो सकता है (जैसे– ऋण माफी) और बुनियादी ढाँचे/शिक्षा/स्वास्थ्य सेवा से संसाधन कम हो सकते हैं। |
यह मानव विकास को बढ़ावा देता है, असमानता को कम करता है, उत्पादकता बढ़ाता है और समावेशी विकास का समर्थन करता है। |
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उदाहरण |
निशुल्क लैपटॉप, स्मार्टफोन, टेलीविज़न, साइकिल, सार्वभौमिक मुफ्त विद्युत, सख्त आवश्यकता-आधारित मानदंडों के बिना प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण, कृषि ऋण माफी |
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्याह्न भोजन योजना, लक्षित स्वास्थ्य सेवा/शिक्षा कार्यक्रम, पोषण योजनाएँ। |
फ्रीबीज़ पर रोक लगाने हेतु आवश्यक कदम क्या हैं?
- फ्रीबीज़ और कल्याण में अंतर करना: आवश्यक कल्याण और चुनावी फ्रीबीज़ को अलग पहचानने के लिये नीति मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करें, जिसमें सामाजिक उपयोगिता, दीर्घकालिक मानव विकास प्रभाव, राजकोषीय स्थिरता, लक्षित वितरण की प्रभावशीलता और परिणाम-केंद्रित दृष्टिकोण जैसे वस्तुनिष्ठ मानदंड शामिल हों। इस ढाँचे के तहत मेरिट गुड्स को गैर-मेरिट उपभोग सब्सिडी से अलग वर्गीकृत किया जाना चाहिये।
- बजटीय अनुशासन: राज्यों के अविवेकपूर्ण वित्तीय खर्च को रोकने के लिये राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 को मज़बूत किया जाए। सभी सब्सिडी योजनाओं में समाप्ति तिथियाँ और नियमित समीक्षा तंत्र अनिवार्य किये जाएँ।
- बजट के बाहर ऋण और प्रच्छन्न सब्सिडी (जैसे– बिजली की कम कीमत) की निगरानी में सुधार: इसे मज़बूत वित्तीय नियामकों के माध्यम से किया जाए।
- मतदाता जागरूकता बढ़ाना: फ्रीबीज़ के अवसर लागत पर जागरूक सार्वजनिक चर्चा को बढ़ावा दें, जब संसाधनों को उपभोग सब्सिडी में लगाया जाता है तो स्कूल, अस्पताल, सड़कें जैसे अन्य विकास क्षेत्र पीछे रह जाते हैं। सिविल सोसाइटी संगठन और मीडिया को चुनावी वादों तथा उनके वित्तीय प्रभाव की समीक्षा करने के लिये प्रोत्साहित करें।
- अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से सीखना: नकद सहायता को शर्त आधारित, समीक्षा-आधारित और समय-सीमित बनाया जा सकता है, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय कठिनाई कम होती है तथा मानव संसाधन के परिणाम मज़बूत होते हैं।
- उदाहरण के लिये मेक्सिको का प्रोग्रेसा और ब्राज़ील का बोल्सा फमिलिया नकद हस्तांतरण को सत्यापित क्रियाओं, जैसे– स्कूल में उपस्थित रहने और स्वास्थ्य जाँच से जोड़ते हैं।
- विधिक ढाँचे को सुदृढ़ करना: चुनावी फ्रीबीज़ वादों के माध्यम से अनुचित प्रभाव को रोकने के लिये लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधनों का सुझाव दें, साथ ही राजनीतिक दलों को उनके वित्त पोषण के स्रोत तथा चुनावी घोषणापत्र की वित्तीय व्यवहार्यता सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने के लिये कानूनी ढाँचे को मज़बूत किया जाए।
निष्कर्ष
फ्रीबीज़ बनाम कल्याण बहस भारत में शासन संबंधी प्रमुख चुनौती को दर्शाती है, यानी चुनावी लोकतंत्र और वित्तीय विवेक के बीच संतुलन बनाए रखना। जहाँ फ्रीबीज़ अल्पकालिक राहत प्रदान करते हैं, वहीं ये दीर्घकालिक विकास को कमज़ोर कर सकते हैं। आगे की राह यह है कि शर्त-आधारित, लक्षित तथा समय-सीमित कल्याण योजनाएँ तैयार की जाएँ, जो निर्भरता नहीं बल्कि मानव क्षमताओं का निर्माण करें एवं सतत तथा समावेशी समृद्धि सुनिश्चित करें।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. ‘फ्रीबीज़ अक्सर लोकप्रिय चुनावी उपकरण के रूप में आलोचना के पात्र हैं, फिर भी कुछ ने रूपांतरकारी कल्याण योजनाओं का स्वरूप ले लिया है।’ – विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय राजनीति में फ्रीबीज़ क्या हैं?
फ्रीबीज़ वे जनकल्याण लाभ हैं जो अक्सर चुनावी समय पर बिल्कुल मुफ्त प्रदान किये जाते हैं और ये शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मेरिट गुड्स से अलग होते हैं।
2. कल्याणकारी योजनाएँ फ्रीबीज़ से कैसे भिन्न हैं?
कल्याणकारी योजनाएँ लक्षित, अधिकार-आधारित और विकास-केंद्रित होती हैं जबकि फ्रीबीज़ अक्सर सार्वभौमिक, अल्पकालिक और चुनाव प्रेरित होते हैं।
3. फ्रीबीज़ को नियंत्रित करने के लिये कौन-से सुधार सुझाए गए हैं?
मुख्य सुधारों में शामिल हैं:
- FRBM ढाँचे को सुदृढ़ करना
- पारदर्शिता में सुधार
- शर्त-आधारित हस्तांतरण
- समाप्ति तिथियाँ लागू करना
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की निगरानी को सुदृढ़ बनाना

मुख्य परीक्षा
AI हेतु भारत का MANAV विज़न
चर्चा में क्यों?
भारत के प्रधानमंत्री ने इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026 में MANAV विज़न प्रस्तुत किया, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के विकास को निर्देशित करने के लिये एक मानव-केंद्रित ढाँचा है जिसके मूल में नैतिकता, समावेशिता और राष्ट्रीय संप्रभुता है।
भारत का MANAV विज़न कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में क्या महत्त्व रखता है?
- MANAV की परिकल्पना AI को केवल एक स्वायत्त शक्ति होने के बजाय मानवीय आकांक्षाओं के विस्तार के रूप में स्थापित करने पर केंद्रित है।
- यह पाँच मूलभूत स्तंभों का संक्षिप्त रूप है:
- M- नैतिक और नीतिगत प्रणाली (मॉरल एंड एथिकल सिस्टम): कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एक सुदृढ़ नैतिक और नीतिपरक प्रणाली पर आधारित होनी चाहिये।
- A – जवाबदेह शासन (अकाउंटेबल गवर्नेंस): पारदर्शी नियमों और सुदृढ़ निगरानी तंत्रों को सुनिश्चित करना।
- N- राष्ट्रीय संप्रभुता (नेशनल सोवरेंटी): यह सिद्धांत डेटा स्वामित्व को मज़बूत करता है: डेटा उन लोगों का रहता है जो इसे उत्पन्न करते हैं।
- A - सुलभ और समावेशी AI (एक्सेसिबल एंड इनक्लूसिव AI): AI को सामाजिक लाभ के लिये कार्य करना चाहिये, न कि कुछ ही हाथों में केंद्रित एकाधिकार के रूप में।
- V – वैध और न्यायसंगत प्रणाली (वैलिड एंड लेजिटिमेट सिस्टम): AI प्रणालियाँ और उनके अनुप्रयोग वैध, सत्यापन योग्य और भरोसेमंद होने चाहिये।
भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को भय या आशंका की दृष्टि से नहीं देखता, बल्कि इसे एक रणनीतिक संपत्ति और वैश्विक कल्याण का उपकरण मानता है। भारत का दृढ़ मत है कि AI 'सौभाग्य और भविष्य' (फॉर्च्यून एंड फ्यूचर) का वाहक है। इस सकारात्मक दृष्टिकोण का आधार देश की विशाल प्रतिभा, मज़बूत डिजिटल आधारभूत संरचना और एक सुस्पष्ट नीतिगत ढाँचा है।
भारत किस प्रकार MANAV विज़न को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) हेतु आगे बढ़ा रहा है?
नैतिक और नीतिपरक AI प्रणालियों को सुनिश्चित करना
- राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020: भविष्य के लिये तैयार नागरिकों में नैतिक और डेटा-आधारित निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ावा देने के लिये शिक्षा प्रणाली में डिजिटल साक्षरता, कंप्यूटेशनल थिंकिंग और AI अवधारणाओं को प्रारंभिक चरण में ही एकीकृत करना महत्त्वपूर्ण है।
- जनभागीदारी: इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026 में भारत ने 24 घंटों के भीतर AI ज़िम्मेदारी अभियान के लिये सबसे अधिक प्रतिज्ञाओं (250,946 से अधिक) का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया, जिससे नैतिक AI को एक नीतिगत सिद्धांत से एक सामूहिक राष्ट्रीय प्रतिबद्धता में बदल दिया गया।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता में जवाबदेह शासन को बढ़ावा देने के तंत्र
- इंडिया-AI मिशन: 10,300 करोड़ रुपये से अधिक के परिव्यय के साथ स्वीकृत होने के साथ यह शुरुआत से ही शासन तंत्र को समाहित करता है।
- इंडिया-AI मिशन AI सिस्टम के विकास, प्रयोजन और निगरानी के लिये मानकों को संस्थागत रूप प्रदान करता है जिससे कंप्यूट, डेटा, कौशल और नवाचार क्षमता मज़बूत होती है।
इंडिया AI गवर्नेंस दिशा-निर्देश, 2025: विश्वास, समानता, जवाबदेही और संवैधानिक लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित एक पारदर्शी नियामक संरचना स्थापित करता है।
डिजिटल युग में राष्ट्रीय संप्रभुता
- वैश्विक डिजिटल परिदृश्य में संप्रभुता: AI-प्रधान वैश्विक व्यवस्था में संप्रभुता का दायरा भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़ते हुए डेटा नियंत्रण, एल्गोरिद्मिक संरचनाओं तथा डिजिटल अवसंरचना को भी समाहित करता है
- आत्मनिर्भरता संबंधी पहल: इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और सुरक्षित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भारत महत्त्वपूर्ण डेटासेट को सुरक्षित कर रहा है तथा घरेलू कंप्यूटिंग क्षमता को मज़बूत कर रहा है।
- भारत, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन जैसी पहलों और एक सुरक्षित डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण के माध्यम से, आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास कर रहा है। इन कार्यक्रमों से महत्त्वपूर्ण डेटासेट को सुरक्षित करने और घरेलू कंप्यूटिंग क्षमता को सुदृढ़ बनाने में सहायता मिल रही है।
- रणनीतिक स्वायत्तता और पैक्स सिलिका पहल: चिप्स और क्लाउड प्रौद्योगिकियों में अनुकूल क्षमताओं का निर्माण करके भारत यह सुनिश्चित करता है कि उसका AI पारिस्थितिक तंत्र वैश्विक स्तर पर सहयोगात्मक होने के साथ-साथ रणनीतिक रूप से स्वायत्त भी बना रहे।
- इस बात का और समर्थन करने के लिये भारत इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026 में अमेरिका के नेतृत्व वाली 'पैक्स सिलिका' पहल में औपचारिक रूप से शामिल हुआ।
सुलभ और समावेशी AI सुनिश्चित करना
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI): DPI स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और शासन जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सुलभ और विस्तृत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) समाधान को सक्षम बनाती है।
- कंप्यूटिंग का लोकतंत्रीकरण: मेघराज GI क्लाउड और IndiaAI कंप्यूट पोर्टल जैसे प्लेटफॉर्म स्टार्टअप और शोधकर्त्ताओं के लिये ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU) और टेंसर प्रोसेसिंग यूनिट (TPU) का साझा उपयोग प्रदान करके प्रवेश बाधाओं को कम करते हैं।
- ग्रासरूट क्षमता: IndiaAI कोश (डेटासेट और AI मॉडल के लिये), AI डेटा लैब्स नेटवर्क और राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन जैसी पहलें मिलकर यह सुनिश्चित करती हैं कि AI नवाचार व्यापक स्तर पर हो और समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे।
विश्वास, सुरक्षा और वैधता के लिये AI का नियमन
- डीपफेक्स से निपटना: लोकतांत्रिक संवाद और सामाजिक विश्वास पर कृत्रिम मीडिया के खतरों से निपटने के लिये AI प्रणाली को विधिक रूप से सत्यापन योग्य और पारदर्शी होना चाहिये।
- IT संशोधन नियम, 2026: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशा-निर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) संशोधन नियम, 2026 में सिंथेटिक रूप से उत्पन्न सामग्री को औपचारिक रूप से परिभाषित किया गया है तथा इसे सख्ती से नियंत्रित किया गया है, जिससे प्लेटफॉर्म की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
- सुरक्षित और विश्वसनीय AI स्तंभ: भारत के IndiaAI मिशन का एक प्रमुख घटक यह है कि यह पक्षपात कम करने तथा एल्गोरिद्मिक ऑडिटिंग और गोपनीयता-संरक्षित डिज़ाइन का समर्थन करने में सहायक है ताकि नैतिक उद्देश्यों को लागू करने योग्य मानकों में बदला जा सके।
पैक्स सिलिका पहल
- यह संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व वाली रणनीतिक पहल है, जिसे दिसंबर 2025 में लॉन्च किया गया था, जिसका उद्देश्य सुरक्षित, लचीली और नवाचार-संचालित सिलिकॉन आपूर्ति शृंखला का निर्माण करना है।
- इसका उद्देश्य चीन के प्रभुत्व को कम करना और महत्त्वपूर्ण खनिज, ऊर्जा संसाधन, सेमीकंडक्टर्स, उन्नत विनिर्माण, AI अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स में निर्भरता को रोकना है।
- पैक्स सिलिका के प्रमुख स्तंभों में से एक यह था कि साझेदार देशों में AI-संचालित समृद्धि को बढ़ावा देने के लिये एक स्थायी आर्थिक व्यवस्था बनाई जाए।
- पैक्स सिलिका के तहत प्रमुख उपायों का ध्यान उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में संयुक्त उद्यम और रणनीतिक सह-निवेश को बढ़ावा देने, संवेदनशील तकनीकों तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना को संदेहास्पद देशों से सुरक्षित रखने एवं विश्वसनीय तकनीकी पारिस्थितिक तंत्र बनाने पर है।
- पैक्स सिलिका के सदस्य देशों में ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, इज़रायल, जापान, कतर, कोरिया गणराज्य, सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।
वैश्विक AI एजेंडा का विकास
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता सुरक्षा शिखर सम्मेलन, 2023 बैलेचली पार्क (यूके): इस सम्मेलन का ध्यान अस्तित्वगत AI जोखिम और फ्रंटियर मॉडल सुरक्षा पर था, जिसके परिणामस्वरूप बैलेचली डिक्लेरेशन और AI सेफ्टी संस्थानों की स्थापना हुई।
- AI सियोल समिट, दक्षिण कोरिया: इस सम्मेलन ने सुरक्षा, नवाचार और समावेशिता के बीच संतुलन स्थापित किया, तकनीकी कंपनियों ने स्वैच्छिक सुरक्षा प्रतिबद्धताएँ अपनाईं।
- AI एक्शन समिट 2025, पेरिस: इस सम्मेलन में ध्यान “सुरक्षा” से “कार्रवाई” की ओर गया, जिसमें AI में लोक हित, भविष्य का कार्य और AI सिस्टम की पर्यावरणीय स्थिरता पर बल दिया गया।
- ‘लोगों और ग्रह के लिये समावेशी और सतत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)’ पर संयुक्त वक्तव्य 58 देशों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया, जिसमें भारत भी शामिल है।
- इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026: वैश्विक दक्षिण में आयोजित पहला AI समिट होने के नाते, नई दिल्ली में यह बैठक भय आधारित प्रणाली से हटकर “लोग, ग्रह और प्रगति” दृष्टिकोण की ओर मुड़ने का प्रतीक बनी, जो त्वरित AI अपनाने के माध्यम से वास्तविक समस्याओं के समाधान पर केंद्रित है।
- MANAV विज़न का समर्थन करते हुए भारत ने AI संसाधनों, जैसे– कंप्यूटिंग पावर और डेटासेट तक पहुँच का लोकतंत्रीकरण करने पर ज़ोर दिया तथा स्वैच्छिक वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया ताकि विकासशील देश केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि AI समाधानों के निर्माता बन सकें।
- आगामी समिट: स्विट्ज़रलैंड जेनेवा में AI इंपैक्ट समिट 2027 की मेज़बानी करेगा, जिसमें अंतर्राष्ट्रीय AI कानून और समावेशी शासन पर ध्यान केंद्रित होगा। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात वर्ष 2028 में समिट आयोजित करेगा, जो ज़िम्मेदार AI विकास के लिये वैश्विक सहयोग को आगे बढ़ाने का हिस्सा है।
निष्कर्ष
MANAV फ्रेमवर्क के माध्यम से भारत वैश्विक AI संवाद को सक्रिय रूप से आकार दे रहा है, जो तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देता है। भारत का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) केवल एक अनियंत्रित तकनीकी शक्ति न बनकर समाज के लिये सुरक्षित, न्यायसंगत और रूपांतरकारी उपकरण के रूप में कार्य करे।
और पढ़ें: इंडिया-AI इंपैक्ट समिट 2026
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में मानव-केंद्रित AI गवर्नेंस मॉडल बनाने में MANAV फ्रेमवर्क के महत्त्व पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत की AI नीति में MANAV का दृष्टिकोण क्या है?
यह एक मानव-केंद्रित AI ढाँचा है जो AI प्रणालियों में नैतिकता, जवाबदेही, संप्रभुता, समावेशिता और कानूनी वैधता पर ध्यान केंद्रित करता है।
2. इंडियाAI मिशन क्या है?
यह 10,300 करोड़ रुपये से अधिक की एक पहल है जिसका उद्देश्य ज़िम्मेदार AI विकास के लिये कंप्यूटिंग क्षमता, डेटासेट, कौशल विकास, नवाचार और शासन तंत्र को मज़बूत करना है।
3. IT नियम संशोधन, 2026 AI जोखिमों को कैसे संबोधित करता है?
यह कृत्रिम मीडिया और डीपफेक को विनियमित करता है, जिससे डिजिटल सामग्री में प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
4. पैक्स सिलिका पहल क्या है?
यह साझेदार देशों के बीच सुरक्षित सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला और विश्वसनीय AI पारिस्थितिक तंत्र बनाने के लिये अमेरिका के नेतृत्व वाली एक पहल है।
5. डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना AI समावेशन के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह कंप्यूटिंग संसाधनों, डेटासेट और AI उपकरणों तक सुलभ पहुँच को सक्षम बनाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि नवाचार स्टार्टअप, शोधकर्त्ताओं और वंचित क्षेत्रों तक पहुँच सकें।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. विकास की वर्तमान स्थिति में, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)
1. औद्योगिक इकाइयों में विद्युत की खपत कम करना
2. सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना
3. रोगों का निदान
4. टेक्स्ट से स्पीच (Text-to-Speech) में परिवर्तन
5. विद्युत ऊर्जा का बेतार संचरण
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1,2,3 और 5
(b) केवल 1,3 और 4
(c) केवल 2,4 और 5
(d) 1,2,3,4 और 5
उत्तर: (b)
प्रश्न. 'वान्नाक्राई, पेट्या और इटर्नलब्लू' पद जो हाल ही में समाचारों में उल्लिखित थे, निम्नलिखित में से किसके साथ संबंधित हैं? (2018)
(a) एक्सोप्लैनेट्स
(b) प्रच्छन्न मुद्रा (क्रिप्टोकरेंसी)
(c) साइबर आक्रमण
(d) लघु उपग्रह
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. कृत्रिम बुद्धि (एआई) की अवधारणा का परिचय दीजिये। एआई क्लिनिकल निदान में कैसे मदद करता है? क्या आप स्वास्थ्य सेवा में एआई के उपयोग में व्यक्ति की निजता को कोई खतरा महसूस करते हैं? (2023)
प्रश्न. भारत के प्रमुख शहरों में आईटी उद्योगों के विकास से उत्पन्न होने वाले मुख्य सामाजिक-आर्थिक प्रभाव क्या हैं? (2022)
प्रश्न. "चौथी औद्योगिक क्रांति (डिजिटल क्रांति) के प्रादुर्भाव ने ई-गवर्नेंस को सरकार का अविभाज्य अंग बनाने में पहल की है।" विवेचन कीजिये। (2020)
