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फ्रीबीज़ की संस्कृति पर अंकुश

  • 20 Feb 2026
  • 111 min read

स्रोत: IE

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये राजनीतिक दलों और राज्य सरकारों द्वारा फ्रीबीज़ और सीधे नकद हस्तांतरण की घोषणा करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

  • सर्वोच्च न्यायालय ने लोक-लुभावन उपायों पर सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि वे राष्ट्रीय विकास में बाधा डाल रहे हैं और पूछा कि क्या इस तरह के कदम 'तुष्टीकरण' के समान हैं। इस तरह फ्रीबीज़ और वास्तविक कल्याण के बीच बहस फिर से शुरू हो गई है।

सारांश

  • फ्रीबीज़ से अल्पकालिक राहत मिलती है लेकिन इससे राजकोषीय अस्थिरता और निर्भरता का खतरा उत्पन्न होता है।
  • DPSP पर आधारित कल्याणकारी नीतियाँ नियोजित व्यय के माध्यम से दीर्घकालिक मानव विकास को लक्षित करती हैं।
  • समाधानों में सशर्त हस्तांतरण, FRMB को मज़बूत करना, मतदाता जागरूकता और योग्यता आधारित वस्तुओं को लोक-लुभावन फ्रीबीज़ से अलग करना शामिल है।

फ्रीबीज़ क्या हैं?

  • परिचय: निशुल्क प्रदान की जाने वाली चीज़ो या वस्तुओं से आशय उन लोक कल्याणकारी उपायों और लाभों से है, जिन्हें या तो सरकारों द्वारा मुफ्त में उपलब्ध कराया जाता है या फिर राजनीतिक दलों द्वारा आमतौर पर चुनावों के दौरान मतदाताओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से उपलब्ध कराने का वादा किया जाता है।
  • मुख्य विशेषताएँ: फ्रीबीज़ लोक-लुभावन और भ्रामक होते हैं। इन्हें मत प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रदान किया जाता है, जिससे महत्त्वपूर्ण दीर्घकालिक निवेशों में लगने वाला धन दूसरी ओर मोड़ दिया जाता है।
    • वे अस्थिर और अनुत्पादक भी हैं, जो राज्य के वित्त पर बोझ उत्पन्न करते हैं और आत्मनिर्भरता के बजाय निर्भरता की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं।
  • सामान्य उदाहरण: 
    • उपयोगिता सब्सिडी:किसानों या परिवारों के लिये मुफ्त बिजली (कुछ निश्चित इकाइयों तक), मुफ्त पानी के कनेक्शन।
    • उपभोक्ता वस्तुएँ: लैपटॉप, TV, मिक्सर-ग्राइंडर आदि का निशुल्क वितरण।
    • खाद्य एवं आवश्यक वस्तुएँ: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अलावा मुफ्त अनाज, मासिक मुफ्त राशन किट
    • ऋण माफी: किसानों या अन्य सामुदायिक ऋणों को माफ करना।
    • नकद हस्तांतरण: बेरोज़गार युवाओं या महिलाओं जैसे विशिष्ट समूहों को सीधे नकद सहायता प्रदान करना।
  • कानूनी और संस्थागत परिदृश्य:
    • सर्वोच्च न्यायालय: एस. सुब्रमण्यम बालाजी मामले, 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि फ्रीबीज़ विधायी नीति के दायरे में आते हैं और न्यायिक जाँच से परे हैं। इसने इस बात पर जोर दिया कि कुछ फ्रीबीज़/सुविधाएँ राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP) के अनुरूप हैं। 
    • वर्ष 2022 में, सर्वोच्च न्यायालय ने नीति आयोग, वित्त आयोग, निर्वाचन आयोग, RBI और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों वाले एक विशेषज्ञ समूह का गठन करने का फैसला किया, ताकि मुफ्त योजनाओं के प्रभाव का अध्ययन किया जा सके और नियामक उपायों की सिफारिश की जा सके, लेकिन अंततः इसका गठन नहीं किया गया।
      • वर्ष 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव से पहले दिये जाने वाले फ्रीबीज़ की कड़ी आलोचना की। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने चेतावनी दी कि मुफ्त राशन और पैसा देने से कार्यबल हतोत्साहित होता है और इससे समाज में ‘आश्रितों का एक वर्ग’ उत्पन्न होता है।
    • भारत निर्वाचन आयोग: अपनी आदर्श आचार संहिता और घोषणापत्र दिशा-निर्देशों के तहत, यद्यपि घोषणापत्रों को लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता है, फिर भी दलों को ऐसे वादों से बचना चाहिये जो चुनावों की पवित्रता को दूषित कर सकते हैं या अनुचित प्रभाव डाल सकते हैं।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की चेतावनी: RBI ने फ्रीबीज़ को कल्याणकारी उपायों के रूप में वर्गीकृत किया है, जो शिक्षा जैसी योग्यता-आधारित वस्तुओं से अलग हैं। RBI ने आगाह किया है कि ऋण माफी, मुफ्त बिजली और नकद हस्तांतरण जैसी प्रतिस्पर्द्धी चुनावी घोषणाएँ राज्य के बजट पर दबाव डालती हैं और बुनियादी ढाँचे पर होने वाले व्यय को कम करती हैं।

भारत में फ्रीबीज़ के समक्ष क्या चिंताएँ हैं?

  • बढ़ता ऋण भार: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, भारतीय राज्यों में लागू किये गए निशुल्क नकद हस्तांतरण और जनहितकारी मुफ्त योजनाओं पर वित्त वर्ष 2026 में लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। राज्यों का संयुक्त सकल राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 2022 में सकल घरेलू उत्पाद के 2.6% से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 3.2% हो गया, जबकि बकाया देनदारियाँ सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 28.1% तक पहुँच गईं।
  • उत्पादक पूंजी का अपवर्जन: जब वित्तीय दबाव बढ़ता है, तो गैर-उत्पादक व्यय को प्राथमिकता देने से महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में निवेश कम हो जाता है। पूंजीगत व्यय में यह कटौती, जो अधिक मज़बूत और सतत विकास के लिये आवश्यक है, दीर्घकालिक निवेशों से विचलन उत्पन्न करती है। नतीजतन, यह मध्यम अवधि के आर्थिक विकास और विकासात्मक लक्ष्यों को कमज़ोर करता है।
  • चुनावी और लोकतांत्रिक चिंताएँ: चुनाव से पहले लोक वित्त से अनुचित फ्रीबीज़ का वादा मतदाताओं को अनुचित रूप से प्रभावित करता है और निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा को बाधित करता है। इस प्रकार की प्रथाएँ मतदाताओं को रिश्वत देने जैसे अनैतिक आचरण के समान हैं।
  • निर्भरता संस्कृति का निर्माण: लाभार्थियों के संदर्भ में, नकद हस्तांतरण अनियत मज़दूरों के लिये मासिक आय का 11-24% और कुछ स्वरोज़गार में संलग्न महिलाओं के लिये 87% तक होता है, जिससे दीर्घकालिक निर्भरता को लेकर चिंताएँ बढ़ जाती हैं। यह आत्मनिर्भरता एवं उद्यमशीलता को हतोत्साहित करता है, जो सतत आर्थिक विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
    • उदाहरण के लिये, वेनेज़ुएला द्वारा निशुल्क भोजन, परिवहन और सेवाओं के प्रावधान ने एक अनुत्पादक जनसंख्या को बढ़ावा दिया, जिसने अंततः लगभग वर्ष 2000 में देश के आर्थिक पतन में योगदान दिया।
  • विकासात्मक परिणामों पर सीमित प्रभाव: यद्यपि फ्रीबीज़ से उपभोग और अल्पकालिक आय स्थिरता में सुधार होता है लेकिन इससे बच्चों के पोषण, शिक्षा के परिणामों में लगातार सुधार नहीं होता है और न ही गरीबी से स्थायी रूप से बाहर निकलने में मदद मिलती है। ऐसे परिणाम केवल नकद हस्तांतरण पर निर्भर नहीं करते, बल्कि पूरक लोक सेवाओं और रोज़गार पर भी निर्भर करते हैं।

फ्रीबीज़ के लाभ

  • कल्याणकारी योजनाओं की नींव: मध्याह्न भोजन योजना, जिसे पहली बार वर्ष 1956 में तमिलनाडु द्वारा शुरू किया गया था, बाद में राष्ट्रीय स्तर पर अपनाई गई। एन.टी. रामाराव की आंध्र प्रदेश में 2 रुपये प्रति किग्रा. चावल योजना ने आज के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम की नींव रखी।
  • शैक्षिक पहुँच: नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार और पश्चिम बंगाल में स्कूली छात्राओं को साइकिल वितरित करने से ड्रॉपआउट की दर में उल्लेखनीय कमी आई है, उपस्थिति बढ़ी है और अधिगम के परिणाम बेहतर हुए हैं।
  • महिला सशक्तीकरण: महिलाओं के लिये बस पास जैसे फ्रीबीज़ उन्हें कार्यबल में शामिल होने के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं, जिससे परिवार आर्थिक रूप से स्थिर होते हैं और महिलाओं का सशक्तीकरण होता है। तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्य महिलाओं को सिलाई मशीनें प्रदान करते हैं, जिससे आजीविका के अवसर बढ़ते हैं।
  • खाद्य सुरक्षा: सार्वजनिक वितरण प्रणाली और मध्याह्न भोजन जैसी खाद्य सुरक्षा योजनाएँ बुनियादी पोषण सुनिश्चित करती हैं, जिससे चरम गरीबी को रोका जा सकता है।
  • आर्थिक प्रोत्साहन: नकद हस्तांतरण से मांग-पक्षीय प्रोत्साहन उत्पन्न होता है जिससे लघु व्यवसायों और स्थानीय निर्माताओं को लाभ होता है।
  • लोकतांत्रिक भागीदारी: फ्रीबीज़ प्रदान करने से सरकार की जवाबदेही और नागरिकों की ज़रूरतों के प्रति उसकी तत्परता प्रदर्शित करके राजनीतिक जागरूकता और जन विश्वास बढ़ता है।

फ्रीबीज़ बनाम कल्याण पर विमर्श क्या है?

पहलू

फ्रीबीज़

Welfare Policies / Schemes                                                                                                                             कल्याण                                                                  

परिभाषा

निशुल्क उपलब्ध कराए जाने वाले जन कल्याणकारी उपाय, जो प्रायः अल्पकालिक और लोक-लुभावन प्रकृति के होते हैं।

दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक उत्थान, मानव पूंजी निर्माण और समानता के उद्देश्य से संरचित, अधिकार-आधारित या विकासात्मक हस्तक्षेप (राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के अनुरूप)।

प्राथमिक उद्देश्य

मतदाताओं को तुरंत आकर्षित करना, चुनावी लाभ प्राप्त करना या अल्पकालिक राहत/लोकप्रियतावादी तुष्टीकरण।

जीवन स्तर में सतत सुधार, गरीबी उन्मूलन, कौशल विकास और सामाजिक न्याय।

समय-सीमा

अल्पकालिक; प्रायः चुनावों के आसपास घोषित या विस्तारित किये जाते हैं, लेकिन उनकी स्थिरता के लिये सीमित योजना होती है।

दीर्घकालिक; स्थायी प्रभाव और संस्थागत निरंतरता के लिये डिज़ाइन किया गया।

लक्ष्य निर्धारण

प्रायः यह सार्वभौमिक होता है (उदाहरण के लिये, आय पर ध्यान दिये बिना सभी उपभोक्ताओं के लिये निशुल्क विद्युत/जल)।

कमज़ोर/वंचित समूहों (जैसे– निर्धन, महिलाएँ, बच्चे, ग्रामीण बेरोज़गार) को लक्षित करके सार्वभौमिक कवरेज की अनुत्पादक लागत से बचा जा सके।

राजकोषीय स्थिरता

इससे प्रायः राज्य के बजट पर दबाव पड़ता है, पूंजीगत व्यय में कटौती होती है और राजस्व घाटे या आकस्मिक देनदारियों में योगदान मिलता है।

राजकोषीय विवेक को प्राथमिकता देता है; विकास और प्रगति पर उच्च गुणक प्रभाव वाले लाभकारी उत्पादों पर ध्यान केंद्रित करता है।

आर्थिक प्रभाव

इससे निर्भरता उत्पन्न हो सकती है, बाज़ारों में विकृति आ सकती है, ऋण अनुशासन कमज़ोर हो सकता है (जैसे– ऋण माफी) और बुनियादी ढाँचे/शिक्षा/स्वास्थ्य सेवा से संसाधन कम हो सकते हैं।

यह मानव विकास को बढ़ावा देता है, असमानता को कम करता है, उत्पादकता बढ़ाता है और समावेशी विकास का समर्थन करता है।

उदाहरण

निशुल्क लैपटॉप, स्मार्टफोन, टेलीविज़न, साइकिल, सार्वभौमिक मुफ्त विद्युत, सख्त आवश्यकता-आधारित मानदंडों के बिना प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण, कृषि ऋण माफी

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्याह्न भोजन योजना, लक्षित स्वास्थ्य सेवा/शिक्षा कार्यक्रम, पोषण योजनाएँ।

फ्रीबीज़ पर रोक लगाने हेतु आवश्यक कदम क्या हैं?

  • फ्रीबीज़ और कल्याण में अंतर करना: आवश्यक कल्याण और चुनावी फ्रीबीज़ को अलग पहचानने के लिये नीति मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करें, जिसमें सामाजिक उपयोगिता, दीर्घकालिक मानव विकास प्रभाव, राजकोषीय स्थिरता, लक्षित वितरण की प्रभावशीलता और परिणाम-केंद्रित दृष्टिकोण जैसे वस्तुनिष्ठ मानदंड शामिल हों। इस ढाँचे के तहत मेरिट गुड्स को गैर-मेरिट उपभोग सब्सिडी से अलग वर्गीकृत किया जाना चाहिये।
  • बजटीय अनुशासन: राज्यों के अविवेकपूर्ण वित्तीय खर्च को रोकने के लिये राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम, 2003 को मज़बूत किया जाए। सभी सब्सिडी योजनाओं में समाप्ति तिथियाँ और नियमित समीक्षा तंत्र अनिवार्य किये जाएँ।
    • बजट के बाहर ऋण और प्रच्छन्न सब्सिडी (जैसे– बिजली की कम कीमत) की निगरानी में सुधार: इसे मज़बूत वित्तीय नियामकों के माध्यम से किया जाए।
  • मतदाता जागरूकता बढ़ाना: फ्रीबीज़ के अवसर लागत पर जागरूक सार्वजनिक चर्चा को बढ़ावा दें, जब संसाधनों को उपभोग सब्सिडी में लगाया जाता है तो स्कूल, अस्पताल, सड़कें जैसे अन्य विकास क्षेत्र पीछे रह जाते हैं। सिविल सोसाइटी संगठन और मीडिया को चुनावी वादों तथा उनके वित्तीय प्रभाव की समीक्षा करने के लिये प्रोत्साहित करें।
  • अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं से सीखना: नकद सहायता को शर्त आधारित, समीक्षा-आधारित और समय-सीमित बनाया जा सकता है, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय कठिनाई कम होती है तथा मानव संसाधन के परिणाम मज़बूत होते हैं।
    • उदाहरण के लिये मेक्सिको का प्रोग्रेसा और ब्राज़ील का बोल्सा फमिलिया नकद हस्तांतरण को सत्यापित क्रियाओं, जैसे– स्कूल में उपस्थित रहने और स्वास्थ्य जाँच से जोड़ते हैं।
  • विधिक ढाँचे को सुदृढ़ करना: चुनावी फ्रीबीज़ वादों के माध्यम से अनुचित प्रभाव को रोकने के लिये लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधनों का सुझाव दें, साथ ही राजनीतिक दलों को उनके वित्त पोषण के स्रोत तथा चुनावी घोषणापत्र की वित्तीय व्यवहार्यता सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत करने के लिये कानूनी ढाँचे को मज़बूत किया जाए।

निष्कर्ष

फ्रीबीज़ बनाम कल्याण बहस भारत में शासन संबंधी प्रमुख चुनौती को दर्शाती है, यानी चुनावी लोकतंत्र और वित्तीय विवेक के बीच संतुलन बनाए रखना। जहाँ फ्रीबीज़ अल्पकालिक राहत प्रदान करते हैं, वहीं ये दीर्घकालिक विकास को कमज़ोर कर सकते हैं। आगे की राह यह है कि शर्त-आधारित, लक्षित तथा समय-सीमित कल्याण योजनाएँ तैयार की जाएँ, जो निर्भरता नहीं बल्कि मानव क्षमताओं का निर्माण करें एवं सतत तथा समावेशी समृद्धि सुनिश्चित करें।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. ‘फ्रीबीज़ अक्सर लोकप्रिय चुनावी उपकरण के रूप में आलोचना के पात्र हैं, फिर भी कुछ ने रूपांतरकारी कल्याण योजनाओं का स्वरूप ले लिया है।’ – विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारतीय राजनीति में फ्रीबीज़ क्या हैं?
फ्रीबीज़ वे जनकल्याण लाभ हैं जो अक्सर चुनावी समय पर बिल्कुल मुफ्त प्रदान किये जाते हैं और ये शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मेरिट गुड्स से अलग होते हैं।

2. कल्याणकारी योजनाएँ फ्रीबीज़ से कैसे भिन्न हैं?
कल्याणकारी योजनाएँ लक्षित, अधिकार-आधारित और विकास-केंद्रित होती हैं जबकि फ्रीबीज़ अक्सर सार्वभौमिक, अल्पकालिक और चुनाव प्रेरित होते हैं।

3. फ्रीबीज़ को नियंत्रित करने के लिये कौन-से सुधार सुझाए गए हैं?
मुख्य सुधारों में शामिल हैं:

  1. FRBM ढाँचे को सुदृढ़ करना
  2. पारदर्शिता में सुधार
  3. शर्त-आधारित हस्तांतरण
  4. समाप्ति तिथियाँ लागू करना
  5. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की निगरानी को सुदृढ़ बनाना

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