शासन व्यवस्था
हेट स्पीच और हेट क्राइम
- 20 Feb 2026
- 89 min read
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, हेट क्राइम, हेट स्पीच, विधि आयोग की रिपोर्ट, अनुच्छेद 19, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो
मुख्य परीक्षा के लिये: हेट स्पीच बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, भारत में हेट क्राइम को संबोधित करने में कानूनी और संस्थागत अंतराल, भाईचारा और समानता को संरक्षित करने में न्यायपालिका की भूमिका।
चर्चा में क्यों?
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हेट क्राइम और हेट स्पीच पर बढ़ती चिंताओं को संबोधित किया, विभाजनकारी सार्वजनिक वक्तव्यों में संयम बरतने का आग्रह किया, साथ ही हेट क्राइम को मान्यता देने हेतु एक विशेष विधिक ढाँचे के लिये दायर याचिका की जाँच की।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पहचान-आधारित हिंसा और भेदभावपूर्ण बयानबाज़ी सामाजिक एकता के लिये खतरा उत्पन्न करते हैं, साथ ही इस बात पर भी बल दिया कि प्रतिक्रियाएँ समता, बंधुत्व और राष्ट्रीय एकता के संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने वाली होनी चाहिये।
सारांश
- सर्वोच्च न्यायालय ने बढ़ते हेट स्पीच और हेट क्राइम पर चिंता व्यक्त की है, यह रेखांकित करते हुए कि पहचान-आधारित हिंसा सामाजिक एकता के लिये खतरा है और इस चुनौती से निपटना समानता और बंधुत्व जैसे संवैधानिक आदर्शों के संरक्षण हेतु आवश्यक है।
- इसने कानूनी अंतराल, कार्यान्वयन की विफलताओं और डिजिटल माध्यमों से घृणा फैलाने की तीव्रता को प्रमुख चुनौतियों के रूप में रेखांकित करते हुए हेट क्राइम पर अंकुश लगाने के लिये अधिक स्पष्ट कानूनों, सख्त प्रवर्तन और निवारक उपायों की मांग की है।
हेट स्पीच और हेट क्राइम क्या है?
हेट स्पीच
- परिचय: विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट (2017) के अनुसार, हेट स्पीच से आशय ऐसे शब्दों या कृत्यों से है, जिनका उद्देश्य नस्ल, जातीयता, लिंग, धर्म, यौन अभिविन्यास आदि के आधार पर समूहों के विरुद्ध घृणा भड़काना हो।
- हेट स्पीच के अंतर्गत ऐसे बोले या लिखे गए शब्द, संकेत या दृश्य शामिल होते हैं, जिनका उद्देश्य हिंसा भड़काना, घृणा या भय उत्पन्न करना हो।
- हेट स्पीच के खिलाफ सुरक्षा:
- संवैधानिक संरक्षण एवं सीमाएँ: अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) लोक‑व्यवस्था, गरिमा, राष्ट्र की अखंडता एवं संप्रभुता की रक्षा तथा अपराध को बढ़ावा देने जैसे उद्देश्यों हेतु इस अधिकार पर उचित प्रतिबंधों की अनुमति देता है।
- विधिक प्रावधान:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023: समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाले कृत्यों के लिये दंडित करती है।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951: सांप्रदायिक वैमनस्य भड़काने के दोषसिद्ध प्रत्याशियों को अयोग्य ठहराता है।
- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: SC/ST के सदस्यों का अपमान या उन्हें अपमानित करने वाले कृत्यों को "अत्याचार" के रूप में मान्यता देता है और अपराधियों के लिये कठोर दंड निर्धारित करता है।
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले कृत्यों को दंडनीय बनाता है।
- हेट स्पीच से संबंधित प्रमुख निर्णय:
- शाहीन अब्दुल्ला बनाम भारत संघ (2022): सर्वोच्च न्यायालय ने हेट स्पीच की बढ़ती प्रवृत्ति को रेखांकित किया और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत की प्रतीक्षा किये स्वप्रेरणा से कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
- तहसीन एस. पूनावाला बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने हेट स्पीच से प्रेरित भीड़ हिंसा पर अंकुश लगाने हेतु दिशानिर्देश जारी किये, जिसमें लिंचिंग रोकने के लिये ज़िला नोडल अधिकारी नियुक्त करना शामिल था।
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): उच्चतम न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66A को अस्पष्टता के आधार पर निरस्त कर दिया, यह पुष्टि करते हुए कि अस्पष्ट प्रतिबंध अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं।
- प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारत संघ (2014): न्यायालय ने विधि आयोग से हेट स्पीच को परिभाषित करने और निर्वाचन आयोग को इसे विनियमित करने हेतु सशक्त बनाने वाले उपायों का पता लगाने का आग्रह किया।
हेट क्राइम
- परिचय: हेट क्राइम वह अपराध है जो किसी व्यक्ति या समूह के नस्ल, रंग, धर्म, राष्ट्रीयता, यौन अभिविन्यास, लैंगिक पहचान या विकलांगता के आधार पर पक्षपातपूर्ण भावना से किया जाता है।
- हेट क्राइम के विरुद्ध संरक्षण: भारत में हेट क्राइम की कोई विशिष्ट वैधानिक परिभाषा उपलब्ध नहीं है।
- हालाँकि, भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 जैसे प्रावधान धर्म के आधार पर मॉब लिंचिंग, जाति‑आधारित हिंसा, दलितों एवं अल्पसंख्यकों पर हमलों तथा लैंगिकता के आधार पर किये गए हमलों जैसी कृतियों को संबोधित करते हैं।
हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने में क्या चुनौतियाँ हैं?
- विधिक चुनौती:
- अस्पष्ट परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में "हेट क्राइम" संबंधी कानून का अभाव पूर्वाग्रह-प्रेरित हिंसा पर विशेष रूप से मुकदमा चलाना कठिन बना देता है।
- "उपद्रव," "अपमान," या "असामंजस्य" जैसे शब्दों की व्याख्या व्यक्तिपरक रूप से की जा सकती है।
- आशय सिद्ध करना: दोषसिद्धि सुनिश्चित करने के लिये अभियोजकों को "दुर्भावनापूर्ण आशय" या किसी विशिष्ट "पूर्वाग्रह मंशा" को सिद्ध करना होता है।
- अपराध के समय किसी व्यक्ति के मन में क्या था, यह सिद्ध करना एक बड़ी साक्ष्यगत चुनौती है।
- अस्पष्ट परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में "हेट क्राइम" संबंधी कानून का अभाव पूर्वाग्रह-प्रेरित हिंसा पर विशेष रूप से मुकदमा चलाना कठिन बना देता है।
- प्रवर्तन अंतराल:
- स्वतः संज्ञानात्मक कार्रवाई का अभाव: यद्यपि उच्चतम न्यायालय ने पुलिस को शिकायत की प्रतीक्षा किये बगैर स्वतः संज्ञान से मामले दर्ज करने का निर्देश दिया है, विशेषकर जब शक्तिशाली राजनीतिक हस्तियाँ शामिल हों, तब प्रवर्तन असमान बना हुआ है।
- कम दोषसिद्धि दर: वैमनस्य को बढ़ावा देने से संबंधित मामलों में अक्सर अपर्याप्त साक्ष्य संग्रह या जाँचकर्त्ताओं पर राजनीतिक दबाव के कारण आरोपियों को बरी कर दिया जाता है।
- डिजिटल चुनौती:
- एल्गोरिद्मिक विस्तार: सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म अक्सर “एंगेजिंग” कंटेंट को प्राथमिकता देते हैं, जिसमें दुर्भाग्यवश सनसनीखेज और हेट स्पीच भी शामिल होते हैं।
- गुमनामी: इंटरनेट पर पहचान छिपे रहने की धारणा आदतन अपराधियों को बेखौफ होकर काम करने की छूट देती है, जो अक्सर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) या फर्ज़ी खातों का उपयोग करते हैं।
- वैश्विक प्रकृति: विदेशी सर्वरों पर होस्ट की गई हेट स्पीच सामग्री को हटाना भारतीय कानून-प्रवर्तन के लिये एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह विधिक क्षेत्राधिकार और सीमा-पार डेटा सहयोग के मुद्दों से जुड़ा है।
- सामाजिक चुनौती:
- चुनावी लाभ: सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि कुछ राजनीतिक समूह चुनावी समर्थन जुटाने के लिये डर फैलाने और बहिष्कारकारी विमर्श का सहारा लेते हैं, जिससे घृणा ‘राजनीतिक और व्यावसायिक रूप से लाभदायक’ बन जाती है।
- ऐतिहासिक पूर्वाग्रह: समाज में गहराई से जमी जाति और धर्म आधारित संरचनाएँ घृणा फैलाने वाली अभिव्यक्तियों के लिये अनुकूल माहौल तैयार करती हैं, जो आगे चलकर शारीरिक हिंसा (हेट क्राइम) और अन्य घृणा अपराधों में बदल सकती हैं।
- सांख्यिकीय ब्लाइंड स्पॉट: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को अतीत में लिंचिंग और धार्मिक हत्याओं से संबंधित अलग-अलग व विशिष्ट आँकड़े संकलित करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसके कारण नीति-निर्माताओं के लिये समस्या की वास्तविक व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है।
हेट स्पीच और हेट क्राइम को रोकने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- विशिष्ट परिभाषा को संहिताबद्ध करना: एक स्वतंत्र कानून बनाया जाए, जो ‘हेट स्पीच’ और ‘हेट क्राइम’ को हिंसा, भेदभाव या गंभीर बहिष्करण के लिये उकसावे के आधार पर स्पष्ट रूप से परिभाषित करे।
- संवैधानिक अपकृत्य दायित्व: यह सिद्धांत स्थापित किया जाए कि सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्तियों द्वारा हेट स्पीच का कृत्य एक दीवानी अपराध के समकक्ष माना जाए। इसके तहत पीड़ित व्यक्ति गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) और समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) के उल्लंघन के लिये राज्य से मुआवज़े की मांग कर सकते हैं।
- सेवा नियमों का कड़ाई से प्रवर्तन: अखिल भारतीय सेवा नियमों में संशोधन कर ‘हेट स्पीच को रोकने या उसकी रिपोर्ट करने में विफलता’ को गंभीर कदाचार घोषित किया जाए। इससे विषाक्त बयानबाज़ी को सामान्य बनाने वाले अधिकारियों को तत्काल निलंबित किया जा सकेगा।
- विशाखा-शैली आचार संहिता: संवैधानिक पदाधिकारियों के लिये न्यायिक दिशा-निर्देश लागू किये जाएँ, जो “संयम के दायित्व” को अनिवार्य बनाएँ, ताकि उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप बंधुत्व को बढ़ावा दें।
- सुओ मोटो FIR अनिवार्यता: 2022 के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश को सख्ती से लागू किया जाए, जिसके तहत पुलिस को घृणास्पद भाषण के मामलों में स्वतः (सुओ मोटो) FIR दर्ज करनी होगी और किसी भी देरी को न्यायालय की अवमानना माना जाएगा।
- 24 घंटे में डिजिटल सामग्री हटाने की व्यवस्था: IT नियम 2026 के तहत ज़िला नोडल अधिकारियों के लिये एक “प्राथमिक चैनल” स्थापित किया जाए, जिससे भड़काऊ सामग्री को 24 घंटे के भीतर हटाने की कार्रवाई की जा सके और उसके तीव्र प्रसार को रोका जा सके।
- फास्ट-ट्रैक “हेट कोर्ट्स”: घृणा अपराधों के मामलों का निपटारा 6 महीने के भीतर सुनिश्चित करने के लिये विशेष अदालतें नामित की जाएँ, ताकि न्याय शीघ्र मिले और यह एक स्पष्ट निवारक (डिटरेंट) के रूप में कार्य करे।
- विद्यालयों में मीडिया साक्षरता: राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में NCERT के माध्यम से समालोचनात्मक चिंतन को समाहित किया जाए, ताकि विद्यार्थी भ्रामक सूचनाओं और “अन्यीकरण” को पहचान सकें।
- सामुदायिक शांति समितियाँ: विविध स्थानीय नेताओं को शामिल करते हुए वार्ड-स्तरीय समितियों को संस्थागत रूप दिया जाए, ताकि वे प्रथम प्रतिक्रिया-कर्त्ताओं की भूमिका निभा सकें और सांप्रदायिक तनाव को हिंसा में परिवर्तित होने से पूर्व ही संबोधित कर सकें।
निष्कर्ष
विधायी स्पष्टता, डिजिटल त्वरित-प्रतिक्रिया तंत्र और अधिकारियों के “ड्यूटी ऑफ केयर” को एकीकृत करके भारत घृणा के क्षरणकारी प्रभावों से अपने संवैधानिक बंधुत्व की रक्षा करना चाहता है। अंततः सभी के लिये समान नागरिकता सुनिश्चित करने हेतु कानूनी प्रावधानों और ज़मीनी स्तर पर उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच की खाई को पाटना ही अंतिम चुनौती बना हुआ है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में हेट क्राइम पर मुकदमा चलाने में आने वाली कानूनी और संस्थागत चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। एक अलग कानून की मांग क्यों की जा रही है? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत के विधि आयोग के अनुसार हेट स्पीच क्या है?
हेट स्पीच में ऐसे शब्द, संकेत या दृश्य शामिल होते हैं, जिनका उद्देश्य धर्म, जाति, लिंग, नस्ल या जातीयता जैसी पहचान के आधार पर किसी समूह के विरुद्ध घृणा, भय या हिंसा को भड़काना होता है।
2. क्या भारत में हेट क्राइम को डिफाइन करने वाला कोई खास कानून है?
नहीं। भारत में घृणा अपराधों पर कोई पृथक् (स्टैंडअलोन) कानून नहीं है, ऐसे कृत्यों से संबंधित मामलों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों और अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत निपटाया जाता है।
3. भारत में हेट स्पीच को कौन-से संवैधानिक प्रावधान विनियमित करते हैं?
अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 19(2) लोक व्यवस्था, गरिमा की रक्षा और अपराध के लिये उकसावे को रोकने हेतु युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है।
4. हेट स्पीच और हेट क्राइम के खिलाफ कार्रवाई में कौन-सी चुनौतियाँ बाधा डालती हैं?
मुख्य समस्याओं में अस्पष्ट कानूनी परिभाषाएँ, पक्षपातपूर्ण मंशा सिद्ध करने में कठिनाई, कमज़ोर प्रवर्तन, डिजिटल गुमनामी और सामाजिक-राजनीतिक ध्रुवीकरण शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. भारत के संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत 'निजता का अधिकार' संरक्षित है? (2021)
(a) अनुच्छेद 15
(b) अनुच्छेद 19
(c) अनुच्छेद 21
(d) अनुच्छेद 29
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. आप 'वाक् और अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य' संकल्पना से क्या समझते हैं? क्या इसकी परिधि में घृणा वाक् भी आता है? भारत में फिल्में अभिव्यक्ति के अन्य रूपों से तनिक भिन्न स्तर पर क्यों हैं? चर्चा कीजिये। (2014)