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राजस्थान स्टेट पी.सी.एस.

  • 12 Mar 2026
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मदुरै हवाई अड्डे को अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में मंज़ूरी

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने तमिलनाडु के मदुरै हवाई अड्डे को अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में घोषित करने को मंज़ूरी दे दी है, जो वैश्विक हवाई संपर्क और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिये भारत के विमानन क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

मुख्य बिंदु:

  • स्थान: मदुरै हवाई अड्डा तमिलनाडु के मंदिर नगरी मदुरै में स्थित है, जो राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों के लिये एक प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह हवाई अड्डा राज्य के सबसे पुराने विमानन केंद्रों में से एक रहा है तथा पूर्व से ही सीमा शुल्क सुविधाओं और सीमित अंतर्राष्ट्रीय सेवाओं के साथ संचालित होता रहा है, जिसमें कोलंबो, दुबई और अबू धाबी जैसे शहरों के लिये सीधी उड़ानें शामिल रही हैं।
    • इस उन्नयन से वैश्विक संपर्क में वृद्धि होगी, जिससे अंतर्राष्ट्रीय यात्रियों, विशेषकर पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिये दक्षिणी तमिलनाडु तक सीधी पहुँच अधिक सुगम हो सकेगी।
  • प्रभाव: इस स्वीकृति से पर्यटन, व्यापार और निवेश को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है, जिससे समूचे क्षेत्र में आर्थिक विकास को बल मिलेगा।
    • मदुरै की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, विशेषकर प्रसिद्ध मीनाक्षी अम्मन मंदिर की उपस्थिति, इस हवाई अड्डे को अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाती है तथा शहर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्त्व को और अधिक सुदृढ़ करती है।
  • रणनीतिक महत्त्व: यह कदम प्रमुख महानगरों से परे अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन अवसंरचना के विस्तार, संतुलित क्षेत्रीय विकास को प्रोत्साहित करने तथा वैश्विक संपर्क को सुदृढ़ करने के व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्यों के अनुरूप है।

और पढ़ें: पर्यटन


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जल जीवन मिशन 2.0: विस्तार और पुनर्गठन

चर्चा में क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जल जीवन मिशन (JJM) को दिसंबर 2028 तक विस्तार देने की स्वीकृति प्रदान की है। JJM 2.0 का यह नया चरण, राष्ट्रीय प्राथमिकता को केवल अवसंरचना निर्माण तक सीमित रखने के स्थान पर सतत और नागरिक-केंद्रित सेवा वितरण सुनिश्चित करने की दिशा में अग्रसर करता है।

मुख्य बिंदु:

  • विस्तारित समय-सीमा: सभी 19.36 करोड़ ग्रामीण परिवारों में 100% संतृप्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मिशन की अवधि को अब दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है।
  • वित्तीय परिव्यय में वृद्धि: मिशन का कुल बजट बढ़ाकर 8.69 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है।
  • केंद्रीय सहायता: केंद्रीय वित्तीय सहायता बढ़ाकर 3.59 लाख करोड़ रुपये कर दी गई है, जो वर्ष 2019 के मूल आवंटन की तुलना में 1.51 लाख करोड़ रुपये अधिक है।
  • संरचनात्मक सुधार: मिशन के क्रियान्वयन को इस प्रकार पुनर्गठित किया जा रहा है कि ‘अवसंरचना-केंद्रित’ मॉडल से आगे बढ़कर ‘उपयोगिता-आधारित सेवा वितरण’ दृष्टिकोण को अपनाया जा सके।
  • JJM 2.0 के अंतर्गत नई पहल: दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये पुनर्गठित मिशन के तहत अनेक शासन तथा डिजिटल सुधार लागू किये जा रहे हैं-
    • सुजलम भारत डिजिटल ढाँचा : एकीकृत राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रत्येक गाँव को एक विशिष्ट सुजल गाँव/सेवा क्षेत्र ID प्रदान की जाएगी। इससे जल स्रोत से लेकर प्रत्येक घरेलू नल तक की संपूर्ण आपूर्ति शृंखला का मानचित्रण संभव हो सकेगा।
    • जल अर्पण पहल: सामुदायिक स्वामित्व को सुदृढ़ करने के लिये ग्राम पंचायतों तथा ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों (VWSC) को जल योजनाओं के संचालन और हस्तांतरण की प्रक्रिया में औपचारिक रूप से सम्मिलित किया जाएगा।
    • हर घर जल प्रमाणन: कोई भी ग्राम पंचायत स्थानीय स्तर पर पर्याप्त संचालन एवं रख-रखाव (O&M) व्यवस्था सुनिश्चित करने के पश्चात ही स्वयं को ‘हर घर जल’ के रूप में प्रमाणित कर सकेगी।
    • जल उत्सव: यह एक वार्षिक सामुदायिक-नेतृत्व वाला कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य ग्राम स्तर पर जल प्रणालियों के कार्यनिष्पादन की समीक्षा करना तथा जल स्थिरता को प्रोत्साहित करना है।
  • वर्तमान प्रगति और प्रभाव: मार्च 2026 तक, वर्ष 2019 में मिशन के आरंभ के बाद से उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है-
    • कवरेज में वृद्धि: नल के जल कनेक्शन वर्ष 2019 में 17% (3.23 करोड़) से बढ़कर अब ग्रामीण परिवारों के लगभग 81.6% (15.80 करोड़) तक पहुँच चुके हैं।

और पढ़ें: जल जीवन मिशन


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हरीश राणा मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति

चर्चा में क्यों?

एक ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेप में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार किसी व्यक्तिगत रोगी के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के व्यावहारिक क्रियान्वयन की अनुमति प्रदान की है।

मुख्य बिंदु:

  • मामला: न्यायमूर्ति जे.बी.पर्दीवाला तथा न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने 32 वर्षीय हरीश राणा के लिये जीवन रक्षक उपचार वापस लेने की अनुमति प्रदान की, जो 13 वर्षों से अधिक समय से स्थायी अचेतन अवस्था (PVS) में थे।
  • याचिका: उनके माता-पिता ने न्यायालय में याचिका दायर करते हुए कहा कि उनके पुत्र की स्थिति “ठीक होने की संभावना से परे” है और उसे कोमा जैसी अवस्था में बनाए रखना उसकी मानवीय गरिमा के विपरीत है।
  • न्यायिक निर्णय: न्यायालय ने चिकित्सकीय सहायता प्राप्त पोषण एवं जलयोजन (CANH) को वापस लेने की अनुमति दी। साथ ही निर्देश दिया कि रोगी को मानवीय और गरिमापूर्ण अंत सुनिश्चित करने के लिये अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली के पैलियेटिव केयर सेंटर में स्थानांतरित किया जाए।
  • भारत में इच्छामृत्यु का विधिक विकास:गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार’ की अवधारणा समय के साथ कई महत्त्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित हुई है:
    • अरुणा शानबाग मामला (2011): अरुणा शानबाग मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार सैद्धांतिक रूप में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी, यद्यपि संबंधित याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था।
  • कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018): संविधान पीठ ने यह घोषित किया कि “गरिमा के साथ मृत्यु का अधिकार” भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है तथा इस निर्णय में ‘लिविंग विल’ (पूर्व चिकित्सा निर्देश) को भी वैधता प्रदान की गई।
  • 2023 का संशोधन: सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 के दिशा-निर्देशों को सरल बनाते हुए जीवन-रक्षक उपकरण हटाने की प्रक्रिया को सरल किया तथा न्यायिक मजिस्ट्रेट की अनिवार्य उपस्थिति की शर्त को समाप्त कर दिया।
  • 2026 का आदेश: यद्यपि यह विधिक व्यवस्था पहले से अस्तित्व में थी, किंतु यह पहला अवसर है जब न्यायालय ने किसी विशिष्ट व्यक्ति के संदर्भ में इन दिशानिर्देशों को सक्रिय रूप से लागू करते हुए मृत्यु की अनुमति प्रदान की है।
  • सर्वोत्तम हित का सिद्धांत: न्यायालय ने ‘सर्वोत्तम हित’ परीक्षण लागू करते हुए निष्कर्ष निकाला कि जब चिकित्सकीय उपचार निरर्थक हो जाए और स्वास्थ्य लाभ की कोई संभावना न हो, तब जीवन को कृत्रिम रूप से लंबा खींचना देखभाल के स्थान पर ‘क्रूरता’ का रूप ले सकता है।
  • शारीरिक स्वायत्तता: यह निर्णय इस सिद्धांत को सुदृढ़ करता है कि किसी व्यक्ति को (या अक्षम स्थिति में उसके वैध अभिभावकों को) ऐसे चिकित्सकीय हस्तक्षेप को अस्वीकार करने का अधिकार है जो केवल अनिवार्य मृत्यु को टालने का कार्य करता हो।

और पढ़ें: निष्क्रिय इच्छामृत्यु


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