अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत की विदेश नीति और बहुपक्षवाद का कमज़ोर होना
प्रिलिम्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन, QUAD, AUKUS, अफ्रीकी संघ, भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता
मेन्स के लिये: बहुपक्षवाद का पतन और वैश्विक शासन पर इसके प्रभाव, भारत की विदेश नीति का गुटनिरपेक्षता से बहु-गठबंधन की ओर विकास, वैश्विक दक्षिण का नेता और विश्व राजनीति में ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में भारत
चर्चा में क्यों?
राज्यसभा में भारत के प्रधानमंत्री ने औपचारिक रूप से नई विश्व व्यवस्था को स्वीकार किया। वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव और बहुपक्षीय संरचनाओं के लगातार कमज़ोर होने के साथ भारत को अपने भविष्य के हितों को सुरक्षित करने के लिये अपनी राष्ट्रीय पहचान और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के प्रति अपने दृष्टिकोण को फिर से परिभाषित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
सारांश
- एकतरफा कार्रवाइयाँ, महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और विश्व व्यापार संगठन में गतिरोध, और क्वाड तथा औकुस जैसे लघुपक्षीय समूहों का उभरना वैश्विक शासन को कमज़ोज़ोर कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप, विश्व नियम-आधारित व्यवस्था से दूर होकर शक्ति-संचालित भू-राजनीति की ओर बढ़ रही है।
- भारत दृढ़ बहुसंरेखण, आपूर्ति शृंशृंखला विविधीकरण, तकनीकी संप्रभुता और वैश्विक दक्षिण नेतृत्व के माध्यम से अनुकूलन कर रहा है, जिसका लक्ष्य चीन, व्यापारिक दबाव और क्षेत्रीय अस्थिरता से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करते हुए एक स्थिर ‘तीसरे ध्रुव’ के रूप में उभरना है।
उभरती हुई विश्व व्यवस्था के प्रमुख पहलू क्या हैं?
एकतरफावाद का उदय और ‘महाशक्तियों’ की प्रतिद्वंद्विता:
- अमेरिकी ‘अलगाववाद’: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), पेरिस जलवायु समझौते और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से अमेरिका की वापसी जैसी महत्त्वत्त्वपूर्ण कार्रवाइयों ने इन संस्थानों को कमज़ोर कर दिया है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका, जो कभी संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख वित्तपोषकों में से एक था, 31 संयुक्त राष्ट्र निकायों से अपनी सदस्यता वापस ले चुका है। यह कदम बहुपक्षीय मंचों पर उसकी भागीदारी में आ रही कमी को दर्शाता है।
- रणनीतिक दबाव: भारत ने प्रमुख शक्तियों द्वारा आर्थिक दबाव के रणनीतिक उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी, जिसमें टैरिफ अस्थिरता और आपूर्ति शृंखला में दबाव डालने वाली प्रथाएँ शामिल हैं, क्योंकि यह अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था में विश्वास को कमज़ोर करता है तथा वैश्विक दक्षिण की स्वायत्तता को नुकसान पहुँचाता है।
- उदाहरण के लिये, अमेरिका ने रूस के साथ भारत के ऊर्जा व्यापार को प्रभावित करने के लिये टैरिफ का इस्तेमाल किया है।
- प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ ‘अमेरिका फर्स्ट’ या ‘चीन फर्स्ट’ नीतियों की ओर अग्रसर हो गई हैं और बहुपक्षीय व्यापार मानदंडों को दरकिनार करते हुए एकतरफा टैरिफ और व्यापार बाधाओं का उपयोग कर रही हैं।
संस्थागत गतिरोध:
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गतिरोध: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) अक्सर वैश्विक संघर्षों (जैसे– यूक्रेन या गाज़ा में) पर कार्रवाई करने में विफल रहती है, क्योंकि इसके स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति होती है।
- भारत जैसी उभरती शक्तियों और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों को शामिल करने के लिये सुधारों की मांग लगातार बढ़ रही है।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) का विवाद निपटान तंत्र, विशेष रूप से इसका अपीलीय निकाय, बाधित होने के कारण संगठन गहरे संकट में है। इससे सदस्य देशों के लिये व्यापार युद्धों को कानूनी रूप से हल करने के रास्ते बंद हो गए हैं, जिससे वैश्विक व्यापार व्यवस्था में गतिरोध उत्पन्न हो गया है।
- अनेक देश विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मुक्त व्यापार सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए शुल्क लगाने के लिये 'राष्ट्रीय सुरक्षा' को एक बहाने के तौर पर तेज़ी से इस्तेमाल कर रहे हैं।
- चीन का उदय: वर्ष 2010 से चीन ने पश्चिमी नेतृत्व वाली ‘नियम-आधारित व्यवस्था’ को चुनौती देते हुए वैकल्पिक आर्थिक और सुरक्षा संरचनाएँ (जैसे– BRE, NDB, RCEP) बनाई हैं।
- चीन अब संयुक्त राष्ट्र की 15 विशेष एजेंसियों में से चार का नेतृत्व कर रहा है और उसकी सहायता राशि अब पश्चिमी देशों से अधिक हो गई है।
- बहुपक्षवाद की तुलना में लघुपक्षवाद: बड़े सार्वभौमिक संगठनों (बहुपक्षवाद) के बजाय, देश छोटे लक्षित समूहों की ओर बढ़ रहे हैं जिन्हें बहुपक्षीय मंच के रूप में जाना जाता है।
- QUAD, AUKUS और I2U2 जैसे कार्यात्मक समूह रणनीतिक और सुरक्षा समन्वय के लिये सार्वभौमिक प्लेटफॉर्मों की जगह तेज़ी से ले रहे हैं।
- व्यापार क्षेत्रीय और बहुपक्षीय समझौतों जैसे कि क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी और द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) की ओर बढ़ रहा है, जो विश्व व्यापार संगठन के तहत सार्वभौमिक बहुपक्षीय व्यापार शासन से दूर जाने का संकेत देता है।
- ‘युद्धोत्तर दृष्टिकोण’ की विफलता: संयुक्त राष्ट्र का मूल वर्ष 1945 का ‘युद्धोत्तर दृष्टिकोण’ (जो समानता, अहिंसा और आत्मनिर्णय पर आधारित था) अब वास्तविकता की कसौटी पर विफल हो रहा है। रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण जैसे संघर्ष इस दृष्टिकोण की सीमाओं और सामूहिक सुरक्षा की अपर्याप्तता को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय संधियों द्वारा निर्देशित 'विधि का शासन' और सैन्य एवं आर्थिक बल पर आधारित 'शक्ति का शासन' के बीच का अंतर पर्याप्त रूप से बढ़ गया है।
- परस्पर निर्भरता का शस्त्रीकरण: बड़ी शक्तियाँ, आपूर्ति शृंखलाओं, SWIFT जैसे वित्तीय नेटवर्कों, सेमीकंडक्टरों और ऊर्जा प्रवाह पर नियंत्रण तथा प्रतिबंधों का उपयोग करके प्रत्यक्ष सैन्य संघर्ष के बिना ही अपने प्रतिद्वंद्वियों को अपनी बात मानने पर मजबूर कर सकती हैं।
बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की विदेश नीति किस प्रकार विकसित हुई है?
- आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता (1947-64): प्रारंभिक वर्षों में भारत ने संप्रभुता को बनाए रखते हुए शीतयुद्ध के गुटों में शामिल होने से बचने के लिये गुटनिरपेक्षता को अपनाया।
- पंचशील के सिद्धांतों और अफ्रीकी-एशियाई एकजुटता से प्रेरणा लेते हुए भारत ने उपनिवेशवाद से मुक्ति और निरस्त्रीकरण का समर्थन किया, जिसमें ‘कमज़ोरों के सार्वभौमिकतावाद’ को केंद्रीय महत्त्व दिया गया।
हालाँकि, वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध ने आदर्शवाद की सीमाओं को उजागर किया और मज़बूत रक्षा तथा रणनीतिक योजना की आवश्यकता पर बल दिया।
- सुरक्षा और शक्ति संतुलन (1964–91): भारत यथार्थवाद (realism) की ओर बढ़ा, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी गई।
- वर्ष 1971 की भारत-सोवियत संधि और बांग्लादेश की मुक्ति में समर्थन, सुरक्षा हितों के लिये रणनीतिक संरेखण को दर्शाते हैं।
- भारत के वर्ष 1974 के परमाणु परीक्षण (पोखरण-I) ने तकनीकी क्षमता और निवारण का संकेत दिया, जो नैतिक राजनीति से शक्ति-आधारित कूटनीति की ओर एक स्पष्ट बदलाव को दर्शाता है।
- आर्थिक कूटनीति (1991–2000): वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन, शीतयुद्ध की समाप्ति और आर्थिक संकट के कारण भारत को आर्थिक कूटनीति अपनाने के लिये मज़बूर होना पड़ा।
- वर्ष 1991 के LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधारों ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ जोड़ा, जबकि 'लुक ईस्ट' नीति ने दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ संबंधों को सुदृढ़ किया।
- इज़राइल के साथ संबंध स्थापित करना और वर्ष 1998 के परमाणु परीक्षणों ने भारत की रणनीतिक और आर्थिक स्वायत्तता की खोज को प्रदर्शित किया।
- बहु-संरेखण (2000–2014): भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौता (2008), ASEAN के साथ जुड़ाव और BRICS तथा G20 में भागीदारी ने एक वैश्विक हितधारक के रूप में भारत के उदय को दर्शाया।
- ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों के साथ जुड़ाव और व्यापारिक साझेदारी विदेश नीति के केंद्र बन गए।
- मुखर बहु-क्षेत्रीय कूटनीति (2014–वर्तमान): भारत ने अधिक मुखर और बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण को अपनाया है। "रणनीतिक स्वायत्तता" का उपयोग वैकल्पिक मुद्दों के लिये एक तर्कसंगत उपकरण के रूप में किया जाता है:
- दोहरा संतुलन: अमेरिकी नेतृत्व वाले क्वाड (क्वाड-2017) में भारत की भागीदारी, साथ ही रूसी S-400 प्रणाली (2018) की खरीद, रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिये साझेदारियों को संतुलित करने की इसकी रणनीति का उदाहरण है।
- डी-हाइफेनेटेड कूटनीति: भारत देशों के साथ अपने रिश्तों को द्वैध रूप (जैसे– अमेरिका-रूस या इज़रायल-फिलिस्तीन) से देखने के बजाय प्रत्येक देश के साथ उसकी अपनी विशिष्टताओं के आधार पर जुड़ रहा है।
- वैश्विक दक्षिण की "वॉयस (आवाज़)" से "लीडर (नेतृत्वकर्त्ता)" तक: भारत ने 'वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ समिट' जैसे मंचों के माध्यम से और अपनी वर्ष 2023 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को G20 में शामिल करके अपने नेतृत्व को संस्थागत रूप दिया है।
- सामरिक लघुपक्षवाद: धीमे और वृहद् बहुपक्षवाद (जैसे– संयुक्त राष्ट्र) से हटकर तीव्र, मुद्दा-आधारित समूहों जैसे क्वाड (सुरक्षा/प्रौद्योगिकी), I2U2 और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) की ओर बढ़ना।
- तकनीकी संप्रभुता: भारत अब डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) में वैश्विक मानक स्थापित कर रहा है और नैतिक AI गवर्नेंस (जैसे कि नई दिल्ली में 2026 AI इंपैक्ट समिट) के लिये दबाव बना रहा है।
- विश्व बंधु: ध्रुवीकृत पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के बीच एक "सेतु" के रूप में स्वयं को स्थापित करना।
- एक "संतुलनकारी शक्ति" से वैश्विक शक्ति के एक स्वतंत्र केंद्र ("तीसरे ध्रुव") के रूप में परिवर्तन।
बदलते वैश्विक क्रम में भारत की विदेश नीति के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?
- "संव्यवहार आधारित" व्यापार संबंधी चुनौती: बहुपक्षवाद से परे 'असममित संबंधों' की ओर झुकाव ने व्यापार को राजनीतिक दबाव के एक उपकरण के रूप में परिवर्तित कर दिया है।
- यूरोपीय संघ (EU) के व्यापार समझौते के विपरीत, जो चरणबद्ध पारस्परिक कटौती का उपयोग करता है, भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में "पहले रियायतें" (concessions first) का प्रयोग होता है, जिसमें टैरिफ में राहत का निर्णय केवल तभी लिया जाता है जब भारत औद्योगिक आयात को दोगुना करता है या अपने सामरिक संबंधों को समायोजित करता है।
- एक्स्पेक्टेशन-रिस्पॉन्सिबिलिटी गैप: एक प्रमुख शक्ति बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा के साथ गंभीर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर निर्णायक रुख अपनाने की बढ़ी हुई वैश्विक अपेक्षाएँ भी जुड़ी हुई हैं।
- उभरती हुई विश्व व्यवस्था में विश्वसनीयता और प्रभाव बनाए रखने के लिये भारत को 'सामरिक स्वायत्तता' और अधिक 'वैचारिक एवं रणनीतिक स्पष्टता' के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी।
- निरंतर चीन से मिलने वाली चुनौती:
- सीमा तनाव: दोनों देशों के बीच चल रही वार्त्ता के बावज़ूद, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर 60,000 से अधिक सैनिक तैनात हैं। सामरिक पृथकता ने बुनियादी 'विश्वास की कमी' को दूर नहीं किया है।
- आर्थिक विषमता: भारत की फार्मास्यूटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के लिये चीनी आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
- चीन ने पहले भी इन आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार बनाया है, जैसे कि वर्ष 2025 में दुर्लभ मृदा चुंबक निर्यात पर रोक।
- समुद्री घेराबंदी: हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में चीन के बढ़ते नौसैनिक पदचिह्न और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से उसका निवेश इस क्षेत्र के 'शुद्ध सुरक्षा प्रदाता' के रूप में भारत की पारंपरिक भूमिका को चुनौती देता है।
- पड़ोस में अस्थिरता: भारत की "पड़ोस प्रथम" नीति एक दशक में अपनी सबसे कठिन परीक्षा का सामना कर रही है।
- "आयरन-क्लाड" अलायंस: पाकिस्तान का (ऑपरेशन सिंदूर के बाद) उग्र रुख और एक अस्थिर बांग्लादेश के साथ पारस्परिक रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करने की उसकी इच्छा भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को बढ़ा सकती है।
- क्षेत्रीय घेराबंदी: मालदीव से म्याँमार तक, चीन की "निवेश-संचालित कूटनीति" प्रायः भारत की परियोजना वितरण से आगे निकल जाती है, जिससे नई दिल्ली अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र को बनाए रखने के लिये संघर्ष कर रही है।
- प्रौद्योगिकी एवं ऊर्जा संप्रभुता अंतराल: वर्ष 2026 में शक्ति को चिप्स और AI तथा ऊर्जा संक्रमण पर नियंत्रण द्वारा परिभाषित किया गया है।
- महत्त्वपूर्ण खनिज पर निर्भरता: दुर्लभ मृदा तत्त्वों (भारत के मिसाइल और एयरोस्पेस कार्यक्रमों के लिये आवश्यक) पर चीन की पकड़ एक प्रमुख भेद्यता है।
- डिजिटल भेद्यता: भारत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में अग्रणी है, किंतु "मैलवेयर डिटेक्शन" हॉटस्पॉट बना हुआ है और मुख्य AI विकास के लिये पश्चिमी प्लेटफॉर्मों पर निर्भर है।
बदलते वैश्विक क्रम में भारत को अपनी विदेश नीति को कैसे बदलना चाहिये?
- विकसित भारत 2047 की दिशा में: भारत को अपनी पुरानी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति को छोड़कर उद्देश्यपरक विदेश नीति अपनानी चाहिये, जो स्पष्ट रूप से ‘विकसित भारत 2047’ के आर्थिक परिवर्तन लक्ष्यों के साथ समन्वित हो।
- आपूर्ति शृंखलाओं का जोखिम कम करना: वर्तमान में भारत महत्त्वपूर्ण घटकों (इलेक्ट्रॉनिक्स, API) का बड़ा हिस्सा चीन से आयात करता है।
- विदेश नीति को सप्लाई चैन रेज़ीलिएंस इनीशिएटिव (SCRI) जैसी पहलों के माध्यम से फ्रेंड-शोरिंग को प्राथमिकता देनी चाहिये और पैक्स सिलिका पहल जैसी साझेदारियों का विस्तार करके सेमीकंडक्टर और प्रौद्योगिकी मूल्य शृंखलाओं को मज़बूत बनाना चाहिये।
- आंतरिक क्षमताओं का निर्माण: 1900 के दशक की शुरुआत में अमेरिका और चीन के उदाहरण से सीख लेते हुए भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम उपस्थिति बनाए रखते हुए पूरी तरह से घरेलू तकनीकी तथा औद्योगिक क्षमताओं के विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये, ताकि यह एक ‘साइबर महाशक्ति’ बन सके।
- भारत अपनी विदेश नीति को युवाओं और तकनीक-संचालित कार्यबल के आधार पर पुनः आकार दे सकता है तथा एक साइबर और AI शक्ति के रूप में उभर सकता है। महत्त्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा और AI, सेमीकंडक्टर एवं क्वांटम तकनीकों में साझेदारियाँ बनाना भारत को डिजिटल युग में नियम बनाने वाले के रूप में स्थापित करने में मदद करेंगे।
- आक्रामक व्यापार विविधीकरण: अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों में कमज़ोरियों को देखते हुए भारत के लिये व्यापार कूटनीति को प्राथमिकता देना अनिवार्य है। भारत को अपने निर्यात को सक्रिय और व्यापक रूप से विविध बनाना चाहिये तथा एशिया व अफ्रीका के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) स्थापित करने चाहिये।
- चीन की विशाल “चेकबुक कूटनीति” (BRI) के साथ हर डॉलर की बराबरी करने की कोशिश करने के बजाय भारत को अपनी सिद्ध डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) को अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यात करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये जिससे विश्वास तथा साझा विकास का एक पारिस्थितिक तंत्र बन सके।
- रूस के साथ संबंध बनाए रखना: पश्चिमी दबाव के बावजूद रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए रखना महत्त्वपूर्ण है, ताकि मॉस्को पूरी तरह से बीजिंग के अधीन न हो जाए।
- पड़ोसी संबंधों को पुनः आकार देना: पाकिस्तान के साथ संबंधों को केवल सुरक्षा चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक विदेश नीति के मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिये।
- आर्थिक प्रोत्साहन, जैसे– नया जल-साझा समझौता, व्यापार समझौता या ईरान‑पाकिस्तान‑भारत पाइपलाइन का पुनरुद्धार क्षेत्र को स्थिर कर सकते हैं।
- BRICS का पुनर्स्थापन: BRICS की अध्यक्षता करते हुए भारत के पास इस समूह को केवल राजनीतिक बहुपक्षीय निकाय से आर्थिक सहयोग समुदाय के रूप में पुनर्स्थापित करने का अवसर है, जैसे कि सरकारी डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने जैसी पहलों से सीमा-पार व्यापार को आसान बनाना।
निष्कर्ष
बहुपक्षवाद का कमज़ोर होना केवल संकट नहीं है, बल्कि भारत के लिये अवसर भी है कि वह अपनी “प्रतिक्रियाशील वास्तविकता” को छोड़कर “उद्देश्यपूर्ण रणनीति” अपनाए। घरेलू सामर्थ्य पर ध्यान केंद्रित करके और लचीलापन, हित-आधारित संरेखण के माध्यम से भारत अपने रणनीतिक क्षेत्र की सुरक्षा कर सकता है एवं खंडित विश्व में स्थिरीकरणकर्त्ता के रूप में उभर सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. एक खंडित वैश्विक क्रम में, भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ असंपर्क नीति से कम और संतुलित बहु-संरेखण से अधिक संबंधित है। चर्चा कीजिये। |
1. वैश्विक स्तर पर बहुपक्षवाद क्यों कमज़ोर हो रहा है?
बढ़ती एकतरफा नीतियाँ, महाशक्तियों के बीच विरोधाभास, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वीटो गतिरोध, WTO विवादों में ठहराव और लघुपक्षवाद समूहों की ओर रुझान बहुपक्षीय संस्थाओं को कमज़ोर कर रहे हैं।
2. लघुपक्षवाद क्या है और यह क्यों बढ़ रहा है?
लघुपक्षवाद छोटे, मुद्दा-आधारित गठबंधनों को दर्शाता है, जैसे– QUAD और I2U2, जो बड़े बहुपक्षीय निकायों की तुलना में तेज़ी से निर्णय लेने तथा रणनीतिक समन्वय की सुविधा प्रदान करते हैं।
3. वैश्विक बदलावों के प्रति भारत की विदेश नीति कैसे विकसित हुई है?
भारत ने असंपर्क नीति (Non-Alignment) से बहु-संरेखण (Multi-Alignment) और सशक्त रणनीतिक स्वायत्तता की ओर कदम बढ़ाया है, अमेरिका, रूस और ग्लोबल साउथ नेतृत्व के साथ साझेदारियों का संतुलन बनाते हुए।
4. नए वैश्विक क्रम में भारत के लिये प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
चीन की रणनीतिक आक्रामकता, व्यापारिक दबाव, आपूर्ति शृंखला पर निर्भरता, पड़ोसी क्षेत्रों में अस्थिरता और प्रौद्योगिकी संबंधी कमज़ोरियाँ मुख्य चुनौतियाँ हैं।
5. भारत अपनी स्थिति को बदलते वैश्विक क्रम में कैसे मज़बूत कर सकता है?
व्यापार में विविधता लाकर, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा करके, घरेलू तकनीकी क्षमता बढ़ाकर, ग्लोबल साउथ में नेतृत्व करके और रणनीतिक प्रभाव के लिये लघुपक्षवाद प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करके।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. ‘‘संयुक्त राष्ट्र प्रत्यय समिति’’ (यूनाइटेड नेशंस क्रेडेंशियल्स कमिटी) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2022)
- यह संयुक्त राष्ट्र (UN) सुरक्षा परिषद द्वारा स्थापित समिति है और इसके पर्यवेक्षण के अधीन काम करती है।
- पारंपरिक रूप से प्रतिवर्ष मार्च, जून और सितंबर में इसकी बैठक होती है।
- यह महासभा को अनुमोदन हेतु रिपोर्ट प्रस्तुत करने से पूर्व सभी UN सदस्यों के प्रत्ययों का आकलन करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 3
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) केवल 1 और 2
उत्तर: (a)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2019)
- भ्रष्टाचार के विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNCAC) का 'भूमि, समुद्र और वायुमार्ग से प्रवासियों की तस्करी के विरुद्ध एक प्रोटोकॉल' होता है।
- UNCAC अब तक का सबसे पहला विधितः बाध्यकारी सार्वभौम भ्रष्टाचार-निरोधी लिखत है।
- सीमा पार संगठित अपराध के विरुद्ध सयुंक्त राष्ट्र कन्वेंशन (UNTOC) की एक विशिष्टता ऐसे एक विशिष्ट अध्याय का समावेशन है, जिसका लक्ष्य उन संपत्तियों को उनके वैध स्वामियों को लौटाना है, जिनसे वे अवैध तरीके से ले ली गई थीं।
- मादक द्रव्य और अपराध विषयक संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNODC) सयुंक्त राष्ट्र के सदस्य राज्यों द्वारा UNCAC और UNTOC दोनों के कार्यान्वयन में सहयोग करने के लिये अधिदेशित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन से सही है?
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 2 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. कोविड-19 महामारी के दौरान वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान करने में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2020)
प्रश्न. संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) के प्रमुख कार्य क्या हैं? इसके साथ संलग्न विभिन्न प्रकार्यात्मक आयोगों को स्पष्ट कीजिये। (2017)

भारतीय राजव्यवस्था
न्यायिक विविधता पर निजी सदस्य विधेयक
प्रिलिम्स के लिये: निजी सदस्य विधेयक, भारत का सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक नियुक्तियाँ, भारत के मुख्य न्यायाधीश, कॉलेजियम प्रणाली
मेन्स के लिये: न्यायिक नियुक्तियाँ और कॉलेजियम प्रणाली में सुधार, उच्च न्यायपालिका में विविधता और प्रतिनिधित्व, न्याय तक पहुँच और सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें
स्रोत: TH
चर्चा में क्यों?
संसद में एक निजी सदस्य विधेयक पेश किया गया है जिसमें संविधान में संशोधन करके उच्च न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक विविधता को अनिवार्य बनाने और भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना करने की मांग की गई है, जिसका उद्देश्य देश भर के नागरिकों के लिये सर्वोच्च न्यायालय को अधिक सुलभ बनाना है।
न्यायिक विविधता के लिये नए निजी सदस्य विधेयक में क्या प्रस्ताव हैं?
- चालू घाटा: आनुपातिक प्रतिनिधित्व: विधेयक में यह अनिवार्य किया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिये।
- आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2018 और वर्ष 2024 के बीच उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में से केवल लगभग 20% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
- इसके अलावा, महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व क्रमशः 15% और 5% से कम है।
- आँकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2018 और वर्ष 2024 के बीच उच्च न्यायपालिका में नियुक्त होने वाले व्यक्तियों में से केवल लगभग 20% अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग से थे।
- समयबद्ध नियुक्तियाँ: इसमें मनमानी देरी को रोकने के लिये यह प्रस्ताव है कि केंद्र सरकार कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों को अधिकतम 90 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से अधिसूचित करे।
- सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों का प्रस्ताव: विधेयक में यह प्रस्ताव किया गया है कि नियमित अपीलों का निपटारा करने के उद्देश्य से सर्वोच्च न्यायालय की स्थायी क्षेत्रीय अपीलीय पीठें नई दिल्ली, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई में स्थापित की जाएँगी।
- राष्ट्रीय संवैधानिक महत्त्व के मामले विशेष रूप से दिल्ली स्थित संविधान पीठ के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे।
- वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय की बैठक केवल नई दिल्ली में होती है, जिससे सुदूर दक्षिणी, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहने वाले आम नागरिकों और वादियों के लिये न्याय तक पहुँच गंभीर रूप से प्रतिबंधित हो जाती है।
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ और न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 130: इस अनुच्छेद के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में स्थापित होगा या ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर होगा जिन्हें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) राष्ट्रपति की पूर्व स्वीकृति से समय-समय पर नियत करें।
- अनुच्छेद 124: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य न्यायाधीशों से परामर्श करके की जाती है।
- अनुच्छेद 217: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करके की जाती है।
- अस्थायी न्यायाधीश (अनुच्छेद 127): यदि उच्चतम न्यायालय (SC) के न्यायाधीशों का कोरम नहीं है, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) (राष्ट्रपति की सहमति से) किसी उच्च न्यायालय (HC) के न्यायाधीश से उच्चतम न्यायालय में बैठने का अनुरोध कर सकते हैं।
- अनुच्छेद 224A: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा भेजे गए संदर्भ पर, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के तदर्थ (Ad hoc) न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध किया जा सकता है।
- कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश (अनुच्छेद 126): पद रिक्त होने या न्यायाधीश की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय के उपलब्ध सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को नियुक्त किया जाता है।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीश (अनुच्छेद 128): राष्ट्रपति की सहमति से मुख्य न्यायाधीश (CJI) उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से एक निर्दिष्ट अवधि के लिये उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने का अनुरोध कर सकते हैं।
- नियुक्ति प्रक्रिया:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI): निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने उत्तराधिकारी की सिफारिश करते हैं, जो आमतौर पर वरिष्ठता के आधार पर होती है।
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश: मुख्य न्यायाधीश (CJI) कॉलेजियम के सदस्यों और उम्मीदवार से संबंधित उच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश से परामर्श करके सिफारिश करते हैं। उनकी राय लिखित रूप में दर्ज की जाती है।
- कॉलेजियम की सिफारिश कानून मंत्री को प्रेषित की जाती है, तत्पश्चात प्रधानमंत्री को, जो नियुक्ति के लिये राष्ट्रपति को सलाह देते हैं।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश: किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
- पुइस्ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी समान है, इसमें संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को रोकने वाली चुनौतियाँ क्या हैं?
- पारदर्शिता की कमी: कॉलेजियम, जिसके पास उच्च न्यायपालिका के लिये न्यायाधीशों की सिफारिश करने की शक्ति है, बंद दरवाज़ों के पीछे कार्य करता है।
- चूँकि इन चयनों के लिये कोई सार्वजनिक रूप से परिभाषित मानदंड, बाध्यकारी विविधता मानक या बैठक का विवरण प्रकाशित नहीं किया जाता है, इसलिये यह प्रक्रिया 'अचेतन पूर्वाग्रहों' के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- "अंकल जज" सिंड्रोम: भाई-भतीजावाद और पारिवारिक प्रभाव निरंतर आलोचना के विषय रहे हैं। उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों का एक महत्त्वपूर्ण प्रतिशत पूर्व न्यायाधीशों या संभ्रांत कानूनी परिवारों से संबंधित है।
- यह पहली पीढ़ी के वकीलों, विशेष रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि से आने वालों के लिये एक अदृश्य और बहिष्करणकारी बाधा उत्पन्न करता है।
- कोई संवैधानिक अधिदेश नहीं: विधायिका या सार्वजनिक रोज़गार के विपरीत, भारतीय संविधान (अनुच्छेद 124 और 217 के तहत) उच्च न्यायपालिका में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) या महिलाओं के लिये आरक्षण अनिवार्य नहीं करता है।
- औपचारिक कोटा न होने के कारण विविधता पूरी तरह से कॉलेजियम के विवेक पर निर्भर करती है, जिससे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अल्पसंख्यक समुदायों का प्रतिनिधित्व बेहद कम बना हुआ है।
- "लीकी पाइपलाइन" (The Leaky Pipeline): हालाँकि महिलाएँ कानून की पढ़ाई और अवर न्यायपालिका में बड़ी संख्या में प्रवेश करती हैं (प्रायः राज्य-स्तरीय आरक्षण की सहायता से), लेकिन उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के स्तर पर उनकी उपस्थिति कम हो जाती है।
- दिसंबर 2024 तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में केवल लगभग 14% महिलाएँ थीं। 25 उच्च न्यायालयों में से केवल दो में महिला मुख्य न्यायाधीश हैं।
- कार्यस्थल की वास्तविकताएँ: वाद की चुनौतीपूर्ण प्रकृति, देखभाल संबंधी विषम ज़िम्मेदारियों और संस्थागत समर्थन की कमी (जैसे कि कुछ अधीनस्थ न्यायालयों में बाल देखभाल सुविधाएँ या बुनियादी ढाँचा) के कारण कई महिलाओं को न्यायाधीश बनने के लिये आवश्यक पारंपरिक, निर्बाध कॅरियर मार्ग से वियुक्त होना पड़ता है।
- "ओल्ड बॉयज़ क्लब" मानसिकता: बार से न्यायाधीश बनने तक का सफर काफी हद तक पेशेवर प्रतिष्ठा, वरिष्ठ पदों और विशिष्ट विधिक वर्गों से प्राप्त सिफारिशों पर निर्भर करता है।
- ये वर्ग परंपरागत रूप से पुरुष-प्रधान एवं पितृसत्तात्मक रहे हैं। इन स्थापित नेटवर्कों से बाहर के अधिवक्ताओं को न्यायाधीश पद के विचारार्थ किये जाने हेतु आवश्यक पहचान प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
- भौगोलिक और आर्थिक केंद्रीकरण: सर्वोच्च न्यायालय से संबंधित विधिक क्रियाकलाप व्यापक रूप से नई दिल्ली में केंद्रीकृत हैं।
- राजधानी में स्थानांतरण तथा वकालत करने में अत्यधिक वित्तीय एवं व्यवस्थागत लागत दूरस्थ क्षेत्रों (जैसे– पूर्वोत्तर या दक्षिणी भारत के सुदूर भागों) के अत्यंत प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं को सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति हेतु आवश्यक पहचान अर्जित करने से वंचित कर देती है।
- विविधता मानकों एवं लेखापरीक्षण का अभाव: न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये वर्तमान प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) में अभ्यर्थियों के जनसांख्यिकीय आँकड़ों के प्रकटीकरण की आवश्यकता नहीं है। नियमित लेखापरीक्षण के अभाव में प्रगति की निगरानी करना अथवा समावेशन के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना कठिन बना रहता है।
न्यायिक नियुक्तियों में विविधता को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- अनुच्छेद 130 के माध्यम से क्षेत्रीय पीठों का कार्यान्वयन: जैसा कि पूर्व में भारत के विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट (वर्ष 2009) तथा संसदीय स्थायी समितियों (वर्ष 2021–22) द्वारा अनुशंसित किया गया है, क्षेत्रीय पीठों की स्थापना के लिये सर्वोच्च न्यायालय को आवश्यक रूप से संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है।
- मुख्य न्यायाधीश अनुच्छेद 130 के वर्तमान प्रावधानों के अंतर्गत इन्हें चरणबद्ध एवं समयबद्ध तरीके से स्थापित कर सकते हैं।
- कार्यस्थल अवसंरचना: अधीनस्थ एवं उच्च न्यायालयों में बुनियादी आधारभूत संरचना (जैसे– क्रेच, सुरक्षित शौचालय तथा सख्त उत्पीड़न-निरोधी समितियाँ) में सुधार करना अत्यंत आवश्यक है, ताकि महिलाएँ न्यायाधीश बनने हेतु आवश्यक वरिष्ठता प्राप्त करने से पूर्व वाद-विवाद क्षेत्र से बाहर न हों।
- औपचारिक मार्गदर्शन: प्रथम पीढ़ी के दलित, आदिवासी तथा अल्पसंख्यक अधिवक्ताओं के लिये संस्थागत मार्गदर्शन कार्यक्रमों की स्थापना, जिससे वे अपनी वकालत को सुदृढ़ कर सकें, पहचान प्राप्त कर सकें तथा न्यायिक भूमिकाओं के लिये तैयार हो सकें।
- NJAC: विशेषज्ञ राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के संशोधित स्वरूप को पुनः लागू करने की वकालत करते हैं।
- न्यायपालिका, कार्यपालिका, बार काउंसिलों तथा नागरिक समाज/शैक्षणिक जगत के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करने से चयन प्रक्रिया लोकतांत्रिक बनती है, जिससे पक्षपात में कमी आती है तथा प्रतिभा की खोज का दायरा व्यापक होता है।
- औपचारिक मानक: वर्तमान प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) (न्यायाधीशों की नियुक्ति की नियम-पुस्तिका) मुख्यतः योग्यता एवं वरिष्ठता पर केंद्रित है, किंतु इसमें विविधता से संबंधित बाध्यकारी प्रावधानों का अभाव है।
- प्रक्रिया ज्ञापन (MoP) में संशोधन कर जनसांख्यिकीय विविधता (जाति, लिंग, धर्म एवं क्षेत्र) को प्रमुख मानदंड के रूप में सम्मिलित करने से कॉलेजियम को विविध पृष्ठभूमि के अभ्यर्थियों की सक्रिय पहचान एवं चयन के लिये बाध्य किया जा सकता है।
निष्कर्ष
भारत की उच्च न्यायपालिका में विविधता सुनिश्चित करना एक ऐसी विधिक व्यवस्था के निर्माण के लिये आवश्यक है जो वास्तव में अपने सभी नागरिकों के वास्तविक अनुभवों और वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करती हो। पारदर्शी चयन के मानदंड और क्षेत्रीय पीठों जैसे संरचनात्मक सुधारों को लागू करने से न्यायालयों में ऐतिहासिक बाधाओं और अभिजात वर्ग के उन्मूलन में सहायता मिलेगी। अंततः एक प्रतिनिधित्वपूर्ण न्यायपीठ विधि के शासन को सुदृढ़ करती है, संवैधानिक न्यायशास्त्र को समृद्ध करती है और न्याय प्रणाली में लोक विश्वास को गहरा करती है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "न्यायपालिका में विविधता पर्याप्त न्याय के लिये आवश्यक है।" भारत की उच्च न्यायिक नियुक्तियों के संदर्भ में इसका परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संविधान का अनुच्छेद 130 क्या प्रावधान करता है?
यह दिल्ली को उच्चतम न्यायालय के मुख्यालय के रूप में घोषित करता है, हालाँकि मुख्य न्यायाधीश को, राष्ट्रपति के अनुमोदन से, कहीं अन्य स्थान पर भी न्यायालय की बैठकों का आयोजन करने की अनुमति देता है।
2. प्रस्तावित निजी सदस्य विधेयक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उच्च न्यायपालिका की नियुक्तियों में सामाजिक विविधता को अनिवार्य करना और न्याय तक बेहतर पहुँच के लिये उच्चतम न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना करना।
3. न्यायपालिका में विविधता को महत्त्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
यह प्रतिनिधित्व में सुधार करती है, संवैधानिक व्याख्या को समृद्ध करती है और न्याय व्यवस्था में लोक विश्वास को सुदृढ़ करती है।
4. कॉलेजियम प्रणाली की मुख्य आलोचना क्या है?
पारदर्शिता की कमी, विविधता संबंधी मानकों का अभाव और भाई-भतीजावाद ("अंकल जज" सिंड्रोम) के प्रति संवेदनशीलता।
5. क्षेत्रीय पीठें न्यायिक रूप से लंबित मामलों को कैसे कम कर सकती हैं?
अपीलीय कार्यभार का विकेंद्रीकरण करके, सुलभता में सुधार करके और मामलों के तेज़ी से निपटान को सक्षम बनाकर।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न. भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- भारत के राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर बैठने और कार्य करने हेतु बुलाया जा सकता है।
- भारत में किसी भी उच्च न्यायालय को अपने निर्णय के पुनर्विलोकन की शक्ति प्राप्त है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय के पास है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: A
मेंस
प्रश्न. भारत में उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014' पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (2017)

