अंतर्राष्ट्रीय संबंध
भारत-यूरोपीय यूनियन मुक्त व्यापार समझौता
- 28 Jan 2026
- 139 min read
प्रिलिम्स के लिये: यूरोपीय संघ, मुक्त व्यापार समझौता (FTA), TRIPS, G20, G7, ऑपरेशन अटलांटा, इंडो-पैसिफिक महासागर पहल (IPOI), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO), गैर-शुल्क बाधाएँ, शेंगेन क्षेत्र
मेन्स के लिये: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते तथा भारत–EU संबंधों की प्रमुख विशेषताएँ, भारत-EU FTA से जुड़ी अवसर एवं चुनौतियाँ तथा आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
भारत एवं यूरोपीय संघ (EU) के मध्य एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के संबंध में वार्ताएँ सफलतापूर्वक संपन्न हो गई हैं, जो इनके आर्थिक संबंधों में एक परिवर्तनकारी कदम है। यूरोपीय संघ भारत का 22वाँ FTA भागीदार है।
- समाप्त किया गया भारत-EU FTA अब भाषा के अंतिम रूप (Language Finalisation) और विधिक परिशोधन (Legal Scrubbing) की प्रक्रिया से गुज़रेगा। इसके बाद अनुवाद तथा सभी 27 यूरोपीय संघ सदस्य देशों और यूरोपीय संसद द्वारा अनुमोदन (Ratification) किया जाएगा, जिसके पश्चात यह प्रभावी होगा।
सारांश
- भारत-EU ने एक ऐसे FTA पर वार्ताएँ पूरी की हैं, जो अभूतपूर्व बाज़ार पहुँच प्रदान करता है तथा श्रम-प्रधान क्षेत्रों और सेवाओं को बढ़ावा देता है।
- इसकी सफलता को EU के कठोर नियामक प्रावधानों (CBAM, EUDR) से चुनौती मिलती है, जो गैर-शुल्क बाधाओं के रूप में कार्य करते हैं।
- दीर्घकालिक स्थिरता के लिये असमानताओं का प्रबंधन, न्यायसंगत अपवाद (Carve-outs) सुनिश्चित करना तथा रणनीतिक सहयोग को और दृढ़ करना आवश्यक होगा।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (India-EU FTA) की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?
यूरोपीय संघ की प्रतिबद्धताएँ
- व्यापक बाज़ार पहुँच: यूरोपीय संघ ने अपनी 97% टैरिफ लाइनों को उपलब्ध करवाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है, जिससे मूल्य के आधार पर भारत के 99.5% निर्यात को कवर किया जाएगा। यह भारत को प्राप्त अब तक की सबसे दृढ़ वरीयतापूर्ण बाज़ार पहुँच व्यवस्थाओं में से एक होगी।
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ: वस्त्र, परिधान, चमड़ा, जूते, समुद्री उत्पाद, रत्न एवं आभूषण, खिलौने तथा खेल सामग्री जैसे प्रमुख रोज़गार-सृजन क्षेत्रों जो वर्तमान में EU में 4-26% शुल्क का सामना कर रहे हैं, शून्य शुल्क पर EU बाज़ार में प्रवेश कर सकेंगे। इससे लगभग 33 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के निर्यात को लाभ होने की संभावना है।
- सेवा बाज़ार का उदारीकरण: यूरोपीय संघ ने IT/ITeS, डिजिटल सेवाएँ, पेशेवर सेवाएँ, शिक्षा तथा व्यापारिक सेवाओं सहित 144 सेवा उप-क्षेत्रों में बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ की हैं, जिससे भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिये नियामक निश्चितता तथा गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित होगा।
- कृषि निर्यात: यह FTA भारत को प्रमुख कृषि तथा प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के लिये EU बाज़ार में वरीयतापूर्ण पहुँच प्रदान करता है, जिससे उनकी प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी। इससे किसानों की आय में वृद्धि, मूल्य-संवर्द्धित कृषि निर्यात को प्रोत्साहन तथा ग्रामीण और महिला-नेतृत्व वाली आजीविकाओं को सुदृढ़ करने की अपेक्षा है।
- पेशेवर गतिशीलता ढाँचा: यह FTA अंतः-कॉर्पोरेट स्थानांतरणकर्त्ताओं, संविदात्मक सेवा प्रदाताओं तथा स्वतंत्र पेशेवरों के अस्थायी आवागमन के लिये एक स्पष्ट ढाँचा स्थापित करता है। इसके साथ ही आश्रितों, छात्रों तथा भविष्य की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्थाओं से संबंधित प्रावधान भी शामिल किये गए हैं।
- नियामक एवं मानक सहयोग: गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने, अनुरूपता मूल्यांकन की मान्यता को सक्षम बनाने तथा बाज़ार की पूर्वानुमेयता बढ़ाने के लिये स्वच्छता एवं पादप-स्वास्थ्य (Sanitary and Phytosanitary- SPS) तथा व्यापार में तकनीकी बाधाओं (Technical Barriers to Trade- TBT) पर सहयोग को सुदृढ़ करने पर सहमति हुई है।
भारत की प्रतिबद्धताएँ
- संतुलित शुल्क उदारीकरण: भारत ने अपनी 92.1% टैरिफ लाइनों पर बाज़ार पहुँच देने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे EU के 97.5% निर्यात को कवर किया जाएगा। दुग्ध उत्पाद, अनाज, कुक्कुट, सोयामील तथा कुछ चयनित कृषि उत्पाद जैसे संवेदनशील क्षेत्र संरक्षित रहेंगे, जबकि ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट्स को MSME और किसानों की सुरक्षा हेतु क्रमिक उदारीकरण के अंतर्गत रखा गया है।
- सेवा क्षेत्र का उदारीकरण: भारत ने दूरसंचार, वित्तीय, समुद्री, पर्यावरणीय, पेशेवर तथा व्यापारिक सेवाओं सहित 102 सेवा उप-क्षेत्रों को खोला है, जिससे EU कंपनियों को एक स्थिर और पूर्वानुमेय परिचालन वातावरण उपलब्ध होगा।
- MSME-अनुकूल उत्पत्ति नियम: वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के अनुरूप उत्पाद-विशिष्ट उत्पत्ति नियम अपनाए गए हैं, जिनमें उद्गम विवरण (Statement of Origin) के माध्यम से स्व-प्रमाणन की सुविधा तथा झींगा, प्रॉन और डाउनस्ट्रीम एल्युमिनियम उत्पाद जैसे MSME-प्रधान क्षेत्रों के लिये विशेष लचीलापन शामिल है।
- संतुलित IPR एवं डिजिटल व्यापार ढाँचा: भारत ने जनहित की रक्षा करते हुए TRIPS-संगत बौद्धिक संपदा संरक्षण को पुनः पुष्ट किया है। इसके साथ ही जेनेरिक औषधि उद्योग की सुरक्षा, पारंपरिक ज्ञान डिजिटल लाइब्रेरी की मान्यता तथा सीमा पार डिजिटल व्यापार को डेटा स्थानीयकरण और डिजिटल संप्रभुता के साथ संतुलित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।
भारत-यूरोपीय यूनियन FTA का क्या महत्त्व है?
- भू-आर्थिक विविधीकरण: यह FTA चाइना-प्लस-वन रणनीति को मज़बूती देता है और भारत को यूरोपीय संघ के लिये विनिर्माण तथा सेवाओं के एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित करता है। ऐसे वैश्विक परिदृश्य में, जहाँ व्यापार और प्रौद्योगिकी को प्रतिबंधों तथा निर्यात नियंत्रणों के माध्यम से तेज़ी से हथियार बनाया जा रहा है, यह समझौता दो लोकतांत्रिक समूहों के बीच नियम-आधारित “विश्वास क्षेत्र” का निर्माण करता है, विशेषकर सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा विनिर्माण और हरित प्रौद्योगिकियों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में।
- भारतीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता में वृद्धि: यूरोपीय संघ के बाज़ार तक पहुँच के लिये भारतीय विनिर्माण को गुणवत्ता के स्तर (स्वच्छता एवं पादप-स्वच्छता उपाय, तकनीकी मानक) में व्यापक सुधार करना होगा। यह “मानक उन्नयन” (ब्रुसेल्स प्रभाव) भारतीय वस्तुओं को न केवल यूरोप में, बल्कि अमेरिकी और जापानी बाज़ारों में भी वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्द्धी बनाएगा।
- रणनीतिक प्रभावशीलता: यह मुक्त व्यापार समझौता (FTA) विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भारत को दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था यूरोपीय संघ से जोड़ता है। दोनों मिलकर वैश्विक GDP का लगभग 25% और वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे एक विशाल आर्थिक समूह का निर्माण होता है, जो भारत को रणनीतिक महत्त्व प्रदान करता है तथा एक अग्रणी प्रौद्योगिकी महाशक्ति के साथ गहन एकीकरण संभव बनाता है।
- हरित और डिजिटल आधुनिकीकरण का इंजन: यह FTA डिजिटल व्यापार नियमों तथा हरित संक्रमण पर केंद्रित है, जिसका उद्देश्य सुरक्षित डेटा प्रवाह एवं AI-आधारित हरित औद्योगिक विकास के माध्यम से भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति देना है।
भारत-यूरोपीय यूनियन संबंध
- ऐतिहासिक आधार: द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत वर्ष 1962 से होती है। वर्ष 1993 के संयुक्त राजनीतिक वक्तव्य और वर्ष 1994 के समझौते के माध्यम से इस संबंध को संस्थागत रूप दिया गया, जिसे वर्ष 2004 में ‘रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक उन्नत किया गया।
- संस्थागत ढाँचा: द्विपक्षीय संबंधों का मार्गदर्शन ‘भारत–EU रणनीतिक साझेदारी: 2025 के लिये रोडमैप’ द्वारा किया जाता है। बहु-स्तरीय संस्थागत ढाँचे की अध्यक्षता उनकी वार्षिक शिखर बैठकों द्वारा की जाती है, जिसकी शुरुआत जून 2000 में लिस्बन में आयोजित प्रथम बैठक से हुई थी।
- उच्च-स्तरीय संवाद: इसे G20 और G7 शिखर बैठकों के दौरान नेताओं की नियमित बैठकों द्वारा परिभाषित किया जाता है। दोनों पक्षों ने वर्ष 2022 में भारत-यूरोपीय संघ व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (TTC) की स्थापना की, जो एक प्रमुख रणनीतिक तंत्र के रूप में कार्य करता है।
- आर्थिक और व्यापारिक संबंध: यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा वस्तु व्यापारिक साझेदार (वित्तीय वर्ष 2023–24 में 135 अरब अमेरिकी डॉलर) है। वर्ष 2023 में द्विपक्षीय सेवा व्यापार रिकॉर्ड 53 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है। यूरोपीय संघ का भारत में निवेश 117 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक है।
- रणनीतिक और सुरक्षा सहयोग: भारत और यूरोपीय संघ ने EUNAVFOR अटलांटा (ऑपरेशन अटलांटा) के साथ संयुक्त अभ्यास, जैसे– समुद्री साझेदारी अभ्यास के माध्यम से नौसैनिक सहयोग को मज़बूत किया है। यूरोपीय संघ 2023 में इंडो-पैसिफिक ओशंस इनिशिएटिव (IPOI) में शामिल हुआ और यह इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) का संवाद साझेदार भी है।
- जलवायु और कनेक्टिविटी पहल: भारत–EU स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु भागीदारी (CECP), जिसकी स्थापना वर्ष 2016 में हुई थी, स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु-अनुकूल तकनीकों पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन का भागीदार है और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे के लिये गठबंधन (CDRI) का सदस्य भी है।
- दोनों पक्षों ने वर्ष 2021 में भारत–EU कनेक्टिविटी पार्टनरशिप की शुरुआत की और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) में सह-भागीदार हैं।
- बहु-आयामी क्षेत्रीय सहयोग: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में व्यापक साझेदारी (भारत CERN का सहयोगी सदस्य है), अंतरिक्ष क्षेत्र में (ISRO ने 2024 में ESA का प्रोबा-3 मिशन लॉन्च किया), डिजिटल परिवर्तन, जल संसाधन (भारत–ईयू वॉटर पार्टनरशिप) और प्रवास (प्रवासन और गतिशीलता पर सामान्य एजेंडा) जैसे क्षेत्रों में सहयोग शामिल है।
यूरोपीय यूनियन
- परिचय: द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद शांति तथा आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिये स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक एवं आर्थिक संघ, विशेष रूप से फ्राँस और जर्मनी के बीच।
- ऐतिहासिक विकास: इसकी शुरुआत वर्ष 1951 के यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC) से हुई। प्रमुख संधियाँ शामिल हैं:
- 1951: यूरोपीय कोयला और इस्पात समुदाय (ECSC) की स्थापना।
- 1957: रोम संधियाँ द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) और यूरोपीय परमाणु ऊर्जा समुदाय का निर्माण।
- 1992: मास्ट्रिच संधि के तहत औपचारिक रूप से यूरोपीय यूनियन (EU) की स्थापना।
- 2020: संयुक्त राज्य ब्रिटेन ने संघ से वापसी की (ब्रेक्ज़िट), जिससे सदस्य संख्या 28 से घटकर 27 हो गई।
- उद्देश्य: प्रमुख उद्देश्यों में चार स्वतंत्रताओं (वस्तुएँ, सेवाएँ, पूंजी, लोग) के साथ एक एकल आंतरिक बाज़ार स्थापित करना और सतत विकास को बढ़ावा देना शामिल है।
- मुख्य विशेषताएँ: यह एकल बाज़ार और कस्टम्स यूनियन के रूप में कार्य करता है। शेंगेन क्षेत्र बिना सीमाओं के यात्रा की सुविधा प्रदान करता है। चार गैर-यूरोपीय संघ देश (आइसलैंड, नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड और लिकटेंस्टीन) भी शेंगेन का हिस्सा हैं।
- 20 सदस्य देश यूरोज़ोन के तहत यूरो मुद्रा का उपयोग करते हैं और बुल्गारिया वर्ष 2026 में इसमें शामिल होने वाला है।
भारत-यूरोपीय यूनियन FTA से संबंधित चिंताएँ क्या हैं?
- EU की नियम-आधारित आक्रामकता और गैर-शुल्कीय बाधाएँ (NTBs): व्यापार समझौतों में पर्यावरण तथा श्रम मानकों को शामिल करने से ग्रीन प्रोटेक्शनिज़्म की संभावना उत्पन्न होती है, जहाँ ये मानक तटस्थ नियमों के बजाय वास्तविक रूप में गैर-व्यापारिक बाधाओं के रूप में काम कर सकते हैं।
- कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM): यह कार्बन कर सीधे भारतीय प्रमुख निर्यात, जैसे– इस्पात, एल्युमिनियम और रसायनों को प्रभावित करता है। वर्ष 2026 से, भारतीय इस्पात निर्यात पर 20–35% तक का कर लागू हो सकता है, जिससे शुल्क समाप्ति से मिलने वाले लाभ प्रभावित हो सकते हैं।
- यूरोपीय संघ वनोन्मूलन विनियमन (EUDR): EUDR 2020 के बाद वनों की कटाई वाले क्षेत्रों में उत्पादित कॉफी, रबर और लकड़ी जैसी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाता है। छोटे भारतीय किसानों को अपने खेतों का जियो-टैग करना तथा ट्रेसबिलिटी साबित करनी होती है, जो अधिकांश छोटे किसानों के लिये पालन करना आर्थिक रूप से असंभव है।
- कॉर्पोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस डायरेक्टिव (CSDDD): वर्ष 2027 से लागू होने वाला यह निर्देश कंपनियों को उनकी मूल्य शृंखला में मानवाधिकार और पर्यावरणीय जोखिमों की जाँच (ऑडिट) करने के लिये बाध्य करता है। भारतीय निर्माता इसे संवेदनशील आपूर्तिकर्त्ता डेटा साझा करने के रूप में एक व्यावसायिक जोखिम मानते हैं।
- इंडस्ट्रियल एक्सलेरेटर एक्ट: इस प्रस्तावित अधिनियम में स्थानीय सामग्री मानक (न्यूनतम घरेलू मूल्य संवर्द्धन) लागू किये जा सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप भारत से होने वाले आयात सहित समस्त आयात पर दबाव पड़ेगा।
- बाज़ार पहुँच और टैरिफ संबंधी रियायतों में असमानता:
- पूर्व-निर्धारित यूरोपीय संघ के कम टैरिफ: भारत के 75% से अधिक निर्यात पहले से ही बिना मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के 1% से कम टैरिफ पर यूरोपीय संघ को निर्यात किये जाते हैं। इसलिये, भारतीय वस्तुओं के लिये बाज़ार पहुँच में महत्त्वपूर्ण लाभ सीमित हैं।
- भारत के उच्च टैरिफ: यूरोपीय यूनियन (EU) की वस्तुओं पर भारत की औसत टैरिफ (10–12%) दरें भारतीय वस्तुओं पर EU के शुल्क (3–4%) की तुलना में कहीं अधिक हैं। इसलिये भारत को विभिन्न यूरोपीय वस्तुओं पर शुल्क में बड़ी कटौती करनी होगी, जबकि EU बाज़ार पहुँच से मिलने वाला लाभ अपेक्षाकृत कम रहेगा।
- बांग्लादेश, वियतनाम और इथियोपिया जैसे प्रतिस्पर्द्धी देशों को पहले से ही अन्य योजनाओं के माध्यम से यूरोपीय यूनियन के बाज़ार में शून्य-टैरिफ पहुँच प्राप्त है, जिससे मुक्त व्यापार समझौते (FTA) होने पर भी भारतीय निर्यातों को संभावित नुकसान हो सकता है।
- समानता और छूट की कमी: यूरोपीय यूनियन (EU) ने कुछ पर्यावरणीय नियमों से अमेरिका को छूट प्रदान की है। भारतीय विशेषज्ञों का तर्क है कि बड़े प्रदूषक देशों को छूट देना और साथ ही भारत जैसे विकासशील देशों पर अनुपालन का दबाव डालना संभावित टैरिफ एडवांटेज को कम कर सकता है। इसलिये भारत ने संभवतः ऐसी छूटों में समानता की मांग की है।
- भारतीय स्थानीय कानूनों पर यूरोपीय यूनियन की चिंताएँ: यूरोपीय संघ भारत के गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (QCO) को प्रमुख गैर-टैरिफ बाधाओं के रूप में देखता है, जिनमें फैसिलिटी ऑडिट अनिवार्य हैं। यूरोपीय यूनियन इनका सख्त विरोध करता है, यह तर्क देते हुए कि ये बाज़ार पहुँच में बाधा उत्पन्न करते हैं।
भारत-यूरोपीय यूनियन आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु क्या उपाय आवश्यक हैं?
- मूल असमानताओं का सक्रियता से समाधान: व्यापारिक असंतुलन को संतुलित करने के लिये भारत को 144 सेवा उप-क्षेत्रों और पेशेवर गतिशीलता तक अपनी पहुँच का सक्रिय रूप से लाभ उठाना होगा, साथ ही मूल्य शृंखला में ऊपर बढ़ने के लिये EU के विनिर्माण संबंधी निवेश को आकर्षित करना होगा।
- संवाद और विवाद निवारण तंत्र: प्रस्तावित 'त्वरित प्रतिक्रिया मंच' की स्थापना करके यूरोपीय संघ के नियमों और गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों जैसी नवीन गैर-टैरिफ बाधाओं का वरिष्ठ स्तरीय हस्तक्षेप से तुरंत समाधान किया जाना आवश्यक है, ताकि विवादों को बढ़ने से रोका जा सके।
- समान छूट और परिवर्तन अवधि: स्टील और एल्युमिनियम जैसे प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रों की रक्षा के लिये भारत को कार्बन सीमा समायोजन तंत्र जैसे नियमों से अमेरिका को दी गई छूट के समान छूट सुनिश्चित करनी चाहिये। साथ ही, यूरोपीय संघ के वनोपज नियम और कॉर्पोरेट संधारणीयता संबंधी देखभाल निर्देश जैसे नियमों के लिये विस्तारित परिवर्तन अवधि पर बातचीत करनी चाहिये ताकि अनुकूलन सुविधाजनक हो।
- व्यापार से परे रणनीतिक साझेदारी का निर्माण: व्यापार समझौते को IMEC कॉरिडोर के साथ एकीकृत करना सुदृढ़ आपूर्ति शृंखला का निर्माण करेगा और लॉजिस्टिक लागतों को कम करेगा। साथ ही, IPOI और TTC के माध्यम से हिंद-प्रशांत सहयोग को सुदृढ़ करना साझा भौगोलिक-राजनीतिक हितों को बढ़ाएगा, जो दीर्घकालिक साझेदारी को संधारणीय बनाएगा।
निष्कर्ष
भारत–यूरोपीय यूनियन (EU) मुक्त व्यापार समझौता एक रणनीतिक मील का पत्थर है, जिसमें अपार संभावनाएँ निहित हैं। किंतु इसकी दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि नियामकीय असमानताओं का प्रभावी प्रबंधन किया जाए, उचित छूट (कार्व-आउट्स) सुनिश्चित की जाए तथा सेवाओं और श्रम-आवागमन से मिलने वाले लाभों का समुचित उपयोग कर केवल टैरिफ-लिबरलाइज़ेशन से आगे बढ़ते हुए एक संतुलित, पारस्परिक रूप से साझेदारी का निर्माण किया जाए।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत–यूरोपीय यूनियन (EU) मुक्त व्यापार समझौता भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) के लिये जो अवसर और चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, उनका मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. FTA के अंतर्गत भारत ने किस स्तर का टैरिफ लिबरलाइज़ेशन हासिल किया है?
व्यापार मूल्य के 99.5% हिस्से को कवर करने वाली यूरोपीय संघ की 97% टैरिफ सीमाएँ भारतीय निर्यात को पहुँच प्रदान करती हैं।
2. FTA के अंतर्गत भारत के लिये प्रमुख नियामक संबंधी चिंताएँ क्या हैं?
CBAM, EUDR, CSDDD और अन्य गैर-टैरिफ बाधाओं (NTB) जैसे यूरोपीय संघ के उपाय भारतीय निर्यातकों के लिये टैरिफ एडवांटेज को निष्क्रिय कर सकते हैं।
3. FTA में प्रस्तावित 'रैपिड रिस्पांस फोरम' का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
'रैपिड रिस्पांस फोरम' का प्रस्ताव उच्च स्तरीय हस्तक्षेप के माध्यम से उभरती गैर-टैरिफ बाधाओं और व्यापार विवादों को शीघ्रता से संबोधित करने के लिये किया गया है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
- यूरोपीय संघ का ‘स्थिरता एवं संवृद्धि समझौता’ (स्टेबिलिटी एंड ग्रोथ पैक्ट) ऐसी संधि है, जो:
- यूरोपीय संघ के देशों के बजटीय घाटे के स्तर को सीमित करती है
- यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी आधारिक संरचना सुविधाओं को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
- यूरोपीय संघ के देशों के लिये अपनी प्रौद्योगिकियों को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं
उत्तर: (a)
प्रश्न. समाचारों में इस्तेमाल होने वाला शब्द 'डिजिटल सिंगल मार्केट स्ट्रैटेजी' किससे संबंधित है? (2017)
(a) ASEAN
(b) BRICS
(c) EU
(d) G20
उत्तर:(c)
प्रश्न. समाचारों में कभी-कभी देखा जाने वाला ‘यूरोपियन स्थिरता तंत्र’, क्या है? (2016)
(a) मध्य पूर्व से लाखों शरणार्थियों के आने के प्रभाव से निपटने के लिये यूरोपीय संघ द्वारा बनाई गई एक एजेंसी
(b) यूरोपीय संघ की एजेंसी, जो यूरोक्षेत्र (यूरोज़ोन) के देशों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है
(c) सभी द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय व्यापार समझौतों को सुलझाने के लिये यूरोपीय संघ की एक एजेंसी
(d) सदस्य राष्ट्रों के बीच मतभेद सुलझाने के लिये यूरोपीय संघ की एक एजेंसी
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. 'नाटो का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण और एक मज़बूत अमेरिका-यूरोप रणनीतिक साझेदारी भारत के लिये अच्छा काम करती है।' इस कथन के बारे मे आपकी क्या राय है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण और उदाहरण दीजिये। (2023)

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