भारतीय राजव्यवस्था
भारत में मृत्युदंड
प्रिलिम्स के लिये: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, मृत्युदंड, क्षमादान की शक्ति, अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 39
मेंस के लिये: भारत में मृत्युदंड संबंधी न्यायशास्त्र तथा “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” सिद्धांत, मृत्युदंड निर्धारण में न्यायिक संरक्षण तथा प्रक्रिया-सम्मत निष्पक्षता।
चर्चा में क्यों?
हैदराबाद के NALSAR विधि विश्वविद्यालय की एक आपराधिक न्याय पहल, स्क्वायर सर्कल क्लिनिक द्वारा भारत में मृत्युदंड पर वार्षिक सांख्यिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पिछले तीन वर्षों में किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की गई है, जो त्रुटिपूर्ण दोषसिद्धि और मृत्युदंड में निष्पक्षता के बारे में चिंताओं को उजागर करता है।
सारांश
- पिछले तीन वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी को भी मृत्युदंड देने की पुष्टि नहीं की गई है। उच्च स्तर पर रिहाई तथा और सज़ा कम करने की दरें निचली अदालतों की त्रुटियों, प्रक्रियात्मक उल्लंघनों और मृत्युदंड के मामलों में त्रुटिपूर्ण दोषसिद्धि के जोखिमों को उजागर करती हैं।
- निष्पक्षता, निवारण संबंधी साक्ष्यों की कमी और मानवाधिकारों के मुद्दों को लेकर बढ़ती चिंताओं ने सज़ा संबंधी सुरक्षा उपायों का कठोरता से पालन, मानकीकृत दिशानिर्देश और मृत्युदंड के विकल्प के रूप में बिना किसी छूट के आजीवन कारावास के अधिक उपयोग जैसे सुधारों की मांग को तीव्र कर दिया है।
भारत में मृत्युदंड संबंधी रिपोर्ट के मुख्य बिंदु क्या हैं?
- शून्य पुष्टि: सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले 3 वर्षों में किसी भी मृत्युदंड की पुष्टि नहीं की। वर्ष 2025 में, इसने 10 मृत्युदंड प्राप्त कैदियों को रिहा किया, जो एक दशक में सर्वाधिक है।
- मुकदमे और अपील के बीच का अंतर:
- सत्र न्यायालयों ने वर्ष 2025 में 128 मृत्युदंड दिये (वर्ष 2016 से अब तक 1,310)।
- उच्च न्यायालयों ने अपने समक्ष प्रस्तुत मामलों में से केवल 8.31% मामलों की पुष्टि की।
- मृत्युदंड की सज़ा प्राप्त करने वालों की संख्या में भारी वृद्धि: दिसंबर 2025 तक मृत्युदंड की सज़ा प्राप्त करने वालों की संख्या 574 है (जो वर्ष 2016 के बाद से सबसे अधिक है)।
- दोषमुक्त होने से पहले मृत्युदंड की सज़ा के तहत बिताया गया औसत समय पाँच वर्ष से अधिक था, कुछ कैदियों को रिहा होने से पहले लगभग एक दशक तक प्रतीक्षा करनी पड़ी।
- प्रक्रियात्मक उल्लंघन एवं गैर-अनुपालन: रिपोर्ट में कहा गया है कि बार-बार होने वाली रिहाई निचली अदालतों की गंभीर त्रुटियों को उजागर करती हैं, जिनके कारण त्रुटिपूर्ण दोषसिद्धि और मृत्युदंड दिये जाते हैं।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) और वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, जेल आचरण रिपोर्ट और शमन सुनवाई अनिवार्य कर दी गई है।
- हालाँकि, वर्ष 2025 में मृत्युदंड के लगभग 95% मामलों में इन सुरक्षा उपायों का अनुपालन किये बिना ही दंडादेश दिया गया।
- दोषसिद्धि के कुछ ही दिनों के भीतर दंडादेश सुना दिया जाता था, जिससे प्रतिरक्षा संबंधी तैयारी के लिये पर्याप्त समय नहीं मिल पाता था तथा निष्पक्ष सुनवाई के अधिकारों के उल्लंघन की आशंकाएँ उत्पन्न होती थीं।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) और वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, जेल आचरण रिपोर्ट और शमन सुनवाई अनिवार्य कर दी गई है।
- उदीयमान वैकल्पिक दंड-विधियाँ: न्यायालयों द्वारा “परिवीक्षा/रियायत के बिना आजीवन कारावास” अथवा दीर्घ निश्चित-अवधि के दंड (कुछ मामलों में 60 वर्ष तक) को मध्य मार्ग के रूप में अपनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे यह प्रश्न उत्पन्न हो रहा है कि क्या ऐसे दंड पुनर्वास की किसी भी संभावना की अनुमति देते हैं।
मृत्युदंड क्या है?
- परिभाषा: मृत्युदंड या कैपिटल पनिशमेंट किसी ऐसे अपराधी को फाँसी देना है जिसे न्यायालय द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद मौत की सज़ा सुनाई गई हो।
- यह गैर-न्यायिक हत्याओं से भिन्न है, जिनमें उचित कानूनी प्रक्रिया का अभाव होता है।
- दार्शनिक आधार: यह प्रतिशोधात्मक न्याय के सिद्धांत पर आधारित है - यह विचार कि गंभीर अपराध, विशेष रूप से हत्या, आनुपातिक दंड के हकदार हैं।
- भारतीय इतिहास: मनुस्मृति में चोरी सहित कई अपराधों के लिये मृत्युदंड (जैसे– हाथियों द्वारा) निर्धारित किया गया था।
- भारतीय दंड संहिता (1860) में मृत्युदंड का प्रावधान था, जिसे स्वतंत्रता के बाद भी बनाए रखा गया।
- भारत में कानूनी स्थिति:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: इसमें मृत्युदंड को बरकरार रखा गया है और इसका दायरा बढ़ाकर इसमें भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या (यदि इससे मृत्यु होती है) और नाबालिग के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को भी शामिल किया गया है।
- हत्या, आतंकवाद और विद्रोह को उकसाने सहित लगभग 14 प्रकार के अपराधों में मृत्युदंड का प्रावधान है।
- अपवाद: नाबालिगों, गर्भवती महिलाओं और मानसिक रूप से बीमार व्यक्तियों को फाँसी नहीं दी जा सकती।
- अपीलीय प्रक्रिया: सत्र न्यायालय द्वारा दी गई मृत्युदंड की सज़ा की उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि की जानी आवश्यक है। आरोपी सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: इसमें मृत्युदंड को बरकरार रखा गया है और इसका दायरा बढ़ाकर इसमें भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या (यदि इससे मृत्यु होती है) और नाबालिग के साथ बलात्कार जैसे अपराधों को भी शामिल किया गया है।
- मृत्युदंड वाले कैदियों के लिये कानूनी उपायः
- दया याचिकाः यह राष्ट्रपति या राज्यपाल से दया की मांग करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किया गया औपचारिक अनुरोध है, जो इस मामले में मृत्युदंड या कारावास की सज़ा पा चुका है।
- क्षमादान की शक्ति: क्षमादान की शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
- राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72): इसके अंतर्गत क्षमा, राहत या सज़ा परिवर्तन कर सकते हैं।
- गवर्नर (अनुच्छेद 161): समान अधिकार हैं, हालाँकि प्रमुख मामलों को राष्ट्रपति को सौंप दिया जाता है।
- उपचारात्मक याचिका: रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) में विकसित, यह अवधारणा उच्चतम न्यायालय को "न्याय की विफलता" को सुधारने हेतु अपने अंतिम निर्णय पर पुनर्विचार करने की अनुमति देती है।
मृत्युदंड से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख फैसले
- जगमोहन सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1973): सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
- बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980): मृत्युदंड की संवैधानिकता को बरकरार रखा लेकिन इसे "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" सिद्धांत तक सीमित रखा।
- इसमें कहा गया है कि न्यायाधीशों को अपराध की प्रकृति के खिलाफ अपराधी की प्रकृति, जैसे– उम्र, पृष्ठभूमि, सुधार की संभावना पर विचार करना चाहिये।
- मृत्युदंड केवल तभी दिया जाना चाहिये जब "वैकल्पिक विकल्प (आजीवन कारावास) निर्विवाद रूप से बंद हो चुका हो।"
- मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): सर्वोच्च न्यायालय ने उन विशिष्ट मामलों की पहचान के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश दिये, जिन्हें “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” माना जाता है और जिनमें मृत्युदंड दिया जा सकता है।
- न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिये पाँच श्रेणियाँ स्थापित कीं कि क्या कोई मामला इस चरम सीमा को पूरा करता है: अपराध की प्रकृति, अपराध का उद्देश्य/प्रेरणा, अपराध का सामाजिक रूप से घृणास्पद स्वभाव, अपराध की व्यापकता और पीड़ित का व्यक्तित्व/सुरक्षाहीनता।
- शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014): इस मामले में इस बात को रेखांकित किया गया कि निष्पादन में अनुचित, अत्यधिक विलंब यातना के समान है और प्रतिस्थापन का आधार है। इसने मानसिक रूप से बीमार लोगों को फाँसी देने को भी असंवैधानिक माना।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022): उच्चतम न्यायालय ने मृत्युदंड की सज़ा सुनाने से पहले प्रोबेशन अधिकारियों, जेल अधिकारियों और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों से प्रतिकूल परिस्थितियों की रिपोर्ट प्राप्त करने के लिये अवर न्यायालयों को अनिवार्य कर दिया, यह सुनिश्चित किया कि सज़ा में आरोपी की पृष्ठभूमि और सुधार की क्षमता पर विचार किया जाए।
- वसंत संपत दुपेरे बनाम भारत संघ (2025): सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि जब प्रक्रियात्मक सुरक्षा का उल्लंघन हो जाता है तो वह अनुच्छेद 32 के तहत मृत्युदंड की सज़ा पर पुनर्विचार कर सकता है।
- न्यायालय ने आदेश दिया कि मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य के दिशानिर्देशों का सज़ा सुनाने में पालन किया जाना चाहिये और ऐसी समीक्षा को गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटियों से संबंधित दुर्लभ मामलों तक सीमित रखा जाना चाहिये।
मृत्युदंड पर विधि आयोग का रुख
- 35वीं रिपोर्ट, 1967: मृत्युदंड का दृढ़ता से समर्थन किया।
- 187वीं रिपोर्ट, 2003: सज़ा में प्रक्रियात्मक खामियों को स्वीकार किया, हालाँकि इसने उन्मूलन का समर्थन नहीं किया।
- 262वीं रिपोर्ट, 2015: आतंकवाद और संबंधित अपराधों को छोड़कर सभी अपराधों के लिये मृत्युदंड को समाप्त करने का आह्वान किया।
भारत में मृत्युदंड के पक्ष और विपक्ष में क्या तर्क हैं?
पक्ष में तर्क
- प्रतिशोधी न्यायः लैक्स टैलीओनिस (एक आँख के बदले एक आँख) के सिद्धांत पर आधारित है।
- चरम क्रूरता के अपराधों (जैसे– निर्भया गैंगरेप मामले) के लिये समाज का मानना है कि सज़ा पीड़ित को हुई पीड़ा के आनुपातिक होनी चाहिये।
- यह पीड़ित के परिवार को "नैतिक संतुष्टि" प्रदान करता है और समाज की सामूहिक अंतरात्मा को संतुष्ट करता है।
- निवारण सिद्धांत: संभावित अपराधियों को रोकने के लिये प्राथमिक दंडात्मक लक्ष्य है। मृत्यु का भय गंभीर अपराधों को करने के खिलाफ अंतिम निवारक माना जाता है।
- एक तर्कसंगत व्यक्ति अपराध के लाभ के विरुद्ध उसकी लागत (मृत्युदंड) का आकलन करेगा और स्वयं को उस अपराध से दूर रखेगा।
- "कर संबंधी बोझ" के रूप में तर्क: दशकों तक उच्च जोखिम वाले हिंसक अपराधियों को आवास देना सार्वजनिक संसाधनों पर भारी वित्तीय दबाव डालता है, क्योंकि राज्य को उनके दीर्घकालिक भोजन, आश्रय और चिकित्सा देखभाल के लिये धन देना पड़ता है।
- सार्वजनिक इच्छा: अधिकांश नागरिक प्रायः प्रतिधारण का समर्थन करते हैं। उदाहरण के लिये, दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप मामले के बाद एक सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 70% भारतीयों ने मृत्युदंड को जारी रखने का समर्थन किया।
विपक्ष में तर्क
- निवारण का कोई अनुभवजन्य प्रमाण नहींः जस्टिस वर्मा समिति (2013) ने कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मृत्युदंड बलात्कार के लिये एक निवारक के रूप में कार्य करता है।
- वैश्विक अध्ययन (जैसे– संयुक्त राष्ट्र द्वारा किये गए अध्ययन) दर्शाते हैं कि जिन देशों में मृत्युदंड का प्रावधान नहीं है, वहाँ आवश्यक रूप से उन देशों की तुलना में अपराध दर अधिक नहीं है जहाँ इसे बरकरार रखा गया है।
- न्यायिक संप्रभुता:“रेयरेस्ट ऑफ रेयर” सिद्धांत का लागू होना स्वभावतः व्यक्तिपरक रहता है।
- हालाँकि मच्छी सिंह मामले में यह निर्धारित करने के लिए दिशानिर्देश दिए गए थे कि कौन सा मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” माना जाएगा, न्यायाधीश इन सिद्धांतों की व्याख्या अक्सर भिन्न-भिन्न रूप से करते हैं, जिससे इस मानदंड का व्यवहार में लचीलापन और परिवर्तनशीलता बनी रहती है।
- वर्ष 2012 में 14 पूर्व न्यायाधीशों ने राष्ट्रपति से अपील की कि वे 13 दोषियों को माफ कर दें, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं माना था कि उन्हें गलती से मृत्युदंड की सज़ा सुनाई गई थी।
- न्याय प्रणाली त्रुटिपूर्ण है। एक निर्दोष व्यक्ति को मारना न्याय का दुरुपयोग है जिसे पलट नहीं सकते।
- सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहः गरीबों में प्रायः गुणवत्तापूर्ण कानूनी प्रतिनिधित्व की कमी होती है, जिससे धनाढ्य प्रतिवादियों की तुलना में दोषसिद्धि की उच्च संभावना होती है।
- सुधारवादी न्याय: आधुनिक न्याय प्रतिशोध के बजाय सुधार पर केंद्रित है। अपराध से घृणा करो अपराधी से नहीं" (महात्मा गांधी)।
- "डेथ रो फेनोमेनन" (मृत्युदंड की प्रतीक्षा में लंबे समय तक एकांत कारावास) को यातना के एक रूप के रूप में माना जाता है (शत्रुघ्न चौहान बनाम यू ओआई, 2014)।
मृत्युदंड की वैश्विक स्थिति
- यूनाइटेड नेशन पुश फॉर एबोलिशन: वर्ष 2007 के बाद से संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्तावों से पता चलता है कि फाँसी पर रोक लगाने के लिये वैश्विक समर्थन बढ़ रहा है, जो उन्मूलन की ओर एक स्पष्ट अंतर्राष्ट्रीय रुझान को दर्शाता है।
- क्षेत्रीय रुझानः यूरोप और मध्य एशिया लगभग मृत्युदंड-मुक्त हैं, जबकि अधिकांश अफ्रीकी और अमेरिकी देशों ने इसे कानून में समाप्त कर दिया है।
- प्रतिधारण क्षेत्रः पश्चिम एशिया और दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और पूर्वी एशिया के कुछ ऐसे भाग, जहाँ मृत्युदंड बरकरार है, जिसमें चीन विश्व का सबसे बड़ा मृत्युदंड देने वाला देश है।
- दक्षिण एशिया की स्थितिः नेपाल और भूटान ने मृत्युदंड को समाप्त कर दिया है, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान इसे बरकरार रखे हुए हैं।
कैपिटल पनिशमेंट फ्रेमवर्क में सुधार के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- "मनोज" गाइडलाइन का कड़ाई से पालन: उच्च न्यायालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि अवर न्यायालय मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के जनादेश का सख्ती से अनुपालन करें।
- व्यापक 'मिटिगेशन एनालिसिस' के बिना कोई भी मृत्युदंड नहीं दिया जाना चाहिये।
- दंड निर्धारण का मानकीकरण: मृत्युदंड के दिशा-निर्देशों को संहिताबद्ध करने के लिये (UK मॉडल के समान) एक सज़ा परिषद की स्थापना करना।
- इससे न्यायिक मनमानी कम होगी और "रेयरेस्ट ऑफ रेयर" सिद्धांत का सभी पीठों में समान रूप से अनुप्रयोग सुनिश्चित होगा, जिससे "न्यायिक लॉटरी" का अंत होगा।
- साक्ष्य-आधारित पुलिसिंग: जाँच का ध्यान "स्वीकारोक्ति-केंद्रित" (जो प्रायः दबाव/यातना से प्राप्त होती है) से हटाकर "वैज्ञानिक और फोरेंसिक-आधारित" साक्ष्य संग्रहण पर केंद्रित करना। यह अपीलीय चरण में बरी करने की उच्च दर को कम करता है।
- अनुच्छेद 39ए के अनुसार, राज्य को निर्धन अभियुक्तों के लिये मुकदमे के चरण में ही सक्षम कानूनी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहिये, जिससे गैर-न्यायिक बचाव के कारण गलत दोषसिद्धि को रोका जा सके।
- बिना राहत के आजीवन कारावास: मृत्युदंड के वैधानिक विकल्प के रूप में "बिना राहत के आजीवन कारावास" (25-30 वर्ष या प्राकृतिक जीवन तक) को विधिवत रूप से संहिताबद्ध करें।
- यह जीवन लिये बिना अक्षमता और प्रतिशोध की सामाजिक आवश्यकता को पूरा करता है।
- दीर्घकालिक दृष्टिकोण: संसद को विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट पर विचार करना चाहिये, जिसमें सामान्य अपराधों के लिये मृत्युदंड को समाप्त करने तथा केवल आतंकवाद और राज्य के विरुद्ध कोई अपराध करने पर इसे बनाए रखने की सिफारिश की गई है।
निष्कर्ष
"मृत्युदंड एक अपरिवर्तनीय दंड है, जबकि न्याय प्रणाली परिवर्तनीय है।" भारत को प्रतिशोधात्मक न्याय प्रणाली से पुनर्स्थापनात्मक न्याय प्रणाली की ओर बढ़ना होगा। तब तक "रेयरेस्ट ऑफ द रेयर" सिद्धांत को उच्चतम स्तर की न्यायिक जाँच के साथ लागू किया जाना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि "वैकल्पिक विकल्प को निर्विवाद रूप से समाप्त कर दिया जाए।"
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत में मृत्युदंड की सज़ा में निष्पक्षता और एकरूपता सुनिश्चित करने में "रेयरेस्ट ऑफ द रेयर" सिद्धांत की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. “रेयरेस्ट ऑफ द रेयर” सिद्धांत क्या है?
यह बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) मामले का एक सिद्धांत है जो मृत्युदंड को उन असाधारण मामलों तक सीमित करता है जहाँ आजीवन कारावास निस्संदेह अपर्याप्त है।
2. मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) मामले में कौन-से सुरक्षा उपाय अनिवार्य किये गए थे?
न्यायालय को मृत्युदंड देने से पहले मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन, जेल आचरण और सामाजिक पृष्ठभूमि सहित शमन रिपोर्ट प्राप्त करनी होगी।
3. संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 का क्या महत्त्व है?
ये अनुच्छेद राष्ट्रपति और राज्यपालों को क्षमादान की शक्तियाँ प्रदान करते हैं, जिनमें न्यायिक समीक्षा के अधीन मृत्युदंड को कम करना या क्षमादान देना शामिल है।
4. “डेथ रो फेनोमेनन” क्या है?
यह फाँसी की प्रतीक्षा कर रहे कैदियों द्वारा व्यतीत किये जाने वाले लंबे एकांत कारावास और मनोवैज्ञानिक आघात को संदर्भित करता है, जिसे क्रूर और अमानवीय व्यवहार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
5. न्यायालयों द्वारा मृत्युदंड के किस विकल्प का अधिकाधिक उपयोग किया जा रहा है?
बिना किसी छूट के आजीवन कारावास या लंबी अवधि के निश्चित दंड, जिसका उद्देश्य सुधार की संभावना के साथ-साथ दंडात्मक कार्रवाई को संतुलित करना है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
मेन्स
प्रश्न: राष्ट्रपति द्वारा मृत्युदंड की सज़ाओं को कम करने में देरी के मामलों पर सार्वजनिक बहस छिड़ी है, जिसे न्याय से वंचित करना माना जा रहा है। क्या राष्ट्रपति द्वारा ऐसी याचिकाओं को स्वीकार/अस्वीकार करने के लिये कोई समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिये? विश्लेषण कीजिये। (2014)

भारतीय अर्थव्यवस्था
बैंक-केंद्रित से कॉरपोरेट बॉण्ड-आधारित वित्त की ओर
प्रिलिम्स के लिये: केंद्रीय बजट 2026–27, कॉरपोरेट बॉण्ड, डेरिवेटिव्स, रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (REIT), लघु एवं मध्यम उद्यम (SME), ग्रीन कॉरपोरेट बॉण्ड।
मेन्स के लिये: केंद्रीय बजट 2026–27 में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने के लिये प्रस्तुत सुधार, कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार की सीमित पैठ के कारण बैंकों के समक्ष उत्पन्न प्रमुख चुनौतियाँ तथा भारत में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को और सुदृढ़ एवं विस्तृत करने के लिये अपेक्षित अतिरिक्त कदम।
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट 2026–27 में भारत के कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने तथा बैंकों पर विद्यमान संरचनात्मक बोझ को कम करने के उद्देश्य से वित्तीय क्षेत्र में अनेक सुधारात्मक उपाय प्रस्तुत किये गए हैं।
- ये उपाय अप्रत्यक्ष रूप से इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारत में बैंक ऐसे जोखिमों का वहन कर रहे हैं, जिन्हें विकसित अर्थव्यवस्थाओं में सुविकसित वित्तीय बाज़ारों द्वारा अवशोषित तथा व्यापक रूप से वितरित किया जाता है।
सारांश
- बजट 2026 में भारत के अपेक्षाकृत उथले कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार (जो सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 15–16% है) को मज़बूत बनाने हेतु मार्केट-मेकिंग, डेरिवेटिव तथा गारंटी कोष की शुरुआत की गई है।
- वर्तमान में बैंक अत्यधिक बोझ वहन कर रहे हैं, क्योंकि वे कुल कॉरपोरेट ऋण का लगभग 60–65% वहन करते हैं। इसके परिणामस्वरूप परिसंपत्ति-देयता असंतुलन की समस्या उत्पन्न हुई है तथा वर्ष 2017 से अब तक लगभग 3.2 लाख करोड़ रुपए के पुनर्पूंजीकरण की आवश्यकता पड़ी है।
- प्रस्तावित सुधारों का उद्देश्य ऋण जोखिम को बाज़ार तंत्र के माध्यम से व्यापक रूप से वितरित करना, तरलता में सुधार लाना तथा सतत अवसंरचना वित्तपोषण के लिये REIT के माध्यम से CPSE परिसंपत्तियों के मुद्रीकरण को प्रोत्साहित करना है।
केंद्रीय बजट 2026–27 में कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को मज़बूत बनाने के लिये कौन-से सुधार प्रस्तुत किये गए हैं?
- मार्केट-मेकिंग फ्रेमवर्क: कॉरपोरेट बॉण्ड के लिये निरंतर द्विपक्षीय उद्धरण (क्रय एवं विक्रय) उपलब्ध कराने हेतु नामित मध्यस्थों की व्यवस्था की गई है, जिन्हें बॉण्ड सूचकांकों पर डेरिवेटिव साधनों तथा वित्तपोषण तक बेहतर पहुँच द्वारा समर्थित किया जाएगा।
- टोटल-रिटर्न स्वैप्स (TRS): ऐसे सिंथेटिक व्यापारिक साधनों की शुरुआत की गई है, जो निवेशकों को मूल परिसंपत्ति का स्वामित्व लिये बिना किसी बॉण्ड के कुल प्रतिफल (ब्याज तथा मूल्य परिवर्तन) में सहभागिता का अवसर प्रदान करते हैं, जिससे जोखिम बचाव-व्यवस्था में सुविधा मिलती है।
- बॉण्ड-इंडेक्स डेरिवेटिव्स: कॉरपोरेट बॉण्ड सूचकांकों पर आधारित डेरिवेटिव साधनों के माध्यम से सहभागिता का दायरा विस्तृत किया गया है तथा जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ किया गया है, जिससे स्थिर आय बाज़ार की व्यापकता में वृद्धि होगी।
- अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष: अवसंरचना परियोजनाओं के विकास एवं निर्माण चरणों के दौरान ऋणदाताओं को विवेकपूर्ण रूप से विनियमित आंशिक ऋण गारंटी प्रदान करने की व्यवस्था की गई है।
- CPSE परिसंपत्ति मुद्रीकरण: केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (CPSE) की अल्प-उपयोगित रियल एस्टेट होल्डिंग्स को समर्पित रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (REIT) के माध्यम से बाज़ार में लाकर पूंजी पुनर्चक्रण को गति देने का प्रावधान किया गया है।
- अवसंरचना जोखिम न्यूनीकरण: निजी क्षेत्र के डेवलपर्स का विश्वास सुदृढ़ करने, परियोजनाओं की बैंक-योग्यता बढ़ाने तथा उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु वित्तपोषण संबंधी बाधाओं को कम करने का प्रयास किया गया है।
कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार की सीमित पैठ के कारण बैंकों के समक्ष उत्पन्न प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- जोखिम का संरचनात्मक अतिभार: गहन कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार के अभाव में बैंक ऋण जोखिम के डिफाॅल्ट भंडारगृह के रूप में कार्य करने के लिये विवश हैं। वे गैर-वित्तीय कॉरपोरेट ऋण का लगभग 60–65% वहन करते हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में यह अनुपात लगभग 30% है।
- गंभीर परिसंपत्ति-देयता असंतुलन: बैंकों को दीर्घ-परिपक्वता वाली अवसंरचना परियोजनाओं, जैसे– राजमार्ग एवं विद्युत संयंत्र का वित्तपोषण अल्पकालिक जमाओं के माध्यम से करना पड़ता है, जिससे प्रणालीगत आघातों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है।
- आवर्ती राजकोषीय निर्भरता: निजी क्षेत्र के ऋण घाटे के संचय ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक पुनर्पूंजीकरण (2017 से 3.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक) को आवश्यक बना दिया है, जिससे प्रभावी रूप से निजी हानि सार्वजनिक बैलेंस शीट पर स्थानांतरित हो गई है ।
- सीमित ऋण प्रदान करने की क्षमता (अवसर लागत): दीर्घकालिक कॉर्पोरेट ऋणों में बँधी हुई पूंजी, पूंजी शोधन (capital clean-ups) के उपरांत भी, लघु एवं मध्यम उद्यमों (SMEs), निर्यातकों तथा प्रथम बार ऋण लेने वाले उधारकर्त्ताओं जैसे उत्पादक क्षेत्रों हेतु निधियों की उपलब्धता को सीमित कर देती है।
- मौद्रिक नीति संचरण में बाधा: दीर्घकालिक ऋण जोखिमों के कारण बैंक दरों को सुचारु रूप से समायोजित करने में अनिच्छुक होते हैं - उच्च लागतों को ग्राहकों पर डालने में संकोच करते हैं अथवा दरों में गिरावट आने पर नए ऋण देने से विवश होते हैं - जिससे नीतिगत संकेतों का संचरण विकृत हो जाता है ।
भारत में कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार की स्थिति
- .प्रभावशाली विकास पथ: भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार में उल्लेखनीय विस्तार देखा गया है, जो वित्त वर्ष 2015 में 17.5 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 53.6 ट्रिलियन रुपये हो गया है, जिसमें लगभग 12% की CAGR वृद्धि हुई है, जो कॉर्पोरेट वित्तपोषण पैटर्न में क्रमिक बदलाव का संकेत देता है ।
- अंतर्राष्ट्रीय मानकों की तुलना में सतही: विकास के बावजूद बाज़ार जीडीपी का केवल 15-16% है, जो संयुक्त राज्य अमेरिका (80% से अधिक), दक्षिण कोरिया (79%) , जर्मनी (55-60%), मलेशिया (54%) और चीन (45-50%) जैसी अर्थव्यवस्थाओं से पीछे है।
- केंद्रित निर्गम संरचना: बाज़ार में निजी प्लेसमेंट (98% निर्गम) और शीर्ष रेटिंग वाले (AAA/AA) उधारकर्त्ताओं का वर्चस्व है, जो सीमित गहराई और जोखिम विविधीकरण को दर्शाता है ।
- सीमित भागीदारी आधार: महत्त्वपूर्ण वर्गों की भागीदारी न्यूनतम बनी हुई है - खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 2% से कम है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की उपस्थिति भी सीमित है, जबकि MSME बॉण्ड बाज़ार तक पहुँच से काफी हद तक वंचित हैं।
- गंभीर तरलता संबंधी बाधाएँ: बीमा कंपनियों और पेंशन फंडों जैसे संस्थागत निवेशकों द्वारा अपनाए गए "खरीदो और रखो" दृष्टिकोण के कारण द्वितीयक बाज़ार कम वार्षिक कारोबार अनुपात (0.3) से ग्रस्त है, जो मूल्य निर्धारण और बाज़ार दक्षता में बाधा उत्पन्न करता है।
- भविष्य की क्षमता: भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार में वर्ष 2030 तक 100-120 ट्रिलियन रुपये से अधिक होने की क्षमता है, जो वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरेगा ।
भारत में कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार को और अधिक मज़बूत बनाने के लिये कौन-से कदम उठाने की आवश्यकता है?
- कॉर्पोरेट बॉण्ड रेपो बाज़ार की स्थापना: कॉर्पोरेट बॉण्ड के लिये एक समर्पित, केंद्रीय रूप से स्वीकृत रेपो बाज़ार स्थापित करना, जिससे धारक अपने बॉण्ड पोर्टफोलियो के आधार पर ऋण प्राप्त कर सकें। इससे कॉर्पोरेट बॉण्ड "खरीदें और रखें" वाले साधनों से सक्रिय संपार्श्विक में परिवर्तित हो जाएंगे, जिससे तरलता में नाटकीय रूप से सुधार होगा और लीवरेज्ड ट्रेडिंग रणनीतियों को सक्षम बनाया जा सकेगा।
- ESG बॉण्ड के लिये "ग्रीनियम" प्रोत्साहन योजना शुरू करना: प्रमाणित ग्रीन कॉर्पोरेट बॉण्ड में निवेश करने वाले बैंकों को कम लिस्टिंग शुल्क, त्वरित अनुमोदन प्रक्रिया या कम आरक्षित आवश्यकता जैसे नियामक प्रोत्साहन प्रदान करना। इससे वैश्विक ESG मांग को पूरा किया जा सकेगा और एक विशिष्ट, तरल ग्रीन कॉर्पोरेट बॉण्ड सेगमेंट का निर्माण होगा।
- अवसंरचना परियोजनाओं के लिये "केवल बॉण्ड-आधारित" वित्तपोषण अनिवार्य करना: धीरे-धीरे यह अनिवार्य करना कि नई अवसंरचना परियोजनाओं के वित्तपोषण का एक निश्चित प्रतिशत (जैसे– 20-30%) बैंक ऋणों के बजाय सार्वजनिक बॉण्ड जारी करके एकत्रित किया जाए। इससे बॉण्ड जारीकर्त्ताओं को परियोजना की शुरुआत से ही बाज़ार-अनुशासित, मूल्यांकित और व्यापार योग्य साधन बनाने के लिये बाध्य होना पड़ेगा।
- "कॉर्पोरेट बॉण्ड क्रेडिट डिफॉल्ट स्वैप" (CDS) इंडेक्स लॉन्च करना: इससे निवेशकों को व्यक्तिगत बॉण्ड चुने बिना व्यापक बाज़ार जोखिम से बचाव करने अथवा कॉर्पोरेट क्रेडिट चक्र पर विचार करने की सुविधा प्राप्त होगी, जिससे मैक्रो-ओरिएंटेड निवेशकों का एक नया वर्ग आकर्षित होगा।
- रिटेल-केंद्रित "कॉरपोरेट बॉण्ड बचत प्रमाणपत्र" लॉन्च करना: एक सरल, कम मूल्य श्रेणी वाले कॉरपोरेट बॉण्ड के उत्पाद को डिज़ाइन करना, जिसमें कर संबंधी लाभ (टैक्स-सेविंग फिक्स्ड डिपॉज़िट के समान) हों, लेकिन यह हाई-रेटिंग वाले कॉरपोरेट्स के विविध समूहों से जुड़ा हो। यह प्रत्यक्ष रूप में घरेलू बचत को कॉरपोरेट ऋण की ओर ले जाएगा और साथ ही रिटेल की मांग को बढ़ावा देगा।
निष्कर्ष
बजट 2026 दीर्घकालिक वित्त के लिये बैंकों पर भारत की अत्यधिक निर्भरता को दूर करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का प्रतीक है। अभिनव वित्तीय उपकरणों और जोखिम-साझाकरण तंत्र के माध्यम से कॉरपोरेट बॉण्ड बाज़ार को गहरा करके इन सुधारों का लक्ष्य अधिक लचीला वित्तीय ढाँचा तैयार करना है। इसकी सफलता निरंतर कार्यान्वयन और रिटेल निवेशकों तथा विदेशी निवेशकों की व्यापक भागीदारी पर निर्भर करेगी।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. "भारत की वित्तीय प्रणाली संरचनात्मक रूप से बैंक-केंद्रित बनी हुई है।" बैंकों के समक्ष शैलो कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ारों से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का परीक्षण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार का वर्तमान आकार क्या है?
भारत का कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार वित्त वर्ष 2015 में 17.5 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2025 में 53.6 ट्रिलियन रुपये हो गया है, जो लगभग 12% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है।
2. भारत के कॉर्पोरेट बॉण्ड बाज़ार की डेप्थ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कैसे तुलना करती है?
सकल घरेलू उत्पाद के 15-16% पर भारत का बाज़ार अमेरिका (80% से अधिक), दक्षिण कोरिया (79%), जर्मनी (55-60%) और चीन (45-50%) की तुलना में काफी उथला है।
3. बजट 2026 में कॉर्पोरेट बॉण्ड के लिये कौन-से प्रमुख सुधार पेश किये गए हैं?
प्रमुख सुधारों में बाज़ार-निर्माण ढाँचा, टोटल-रिटर्न स्वैप, बॉण्ड-इंडेक्स डेरिवेटिव, अवसंरचना जोखिम गारंटी कोष और रियल एस्टेट निवेश ट्रस्ट (REIT) के माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम परिसंपत्ति मुद्रीकरण शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रारंभिक परीक्षा
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)
- पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CAR) वह राशि है जिसे बैंकों को अपनी निधियों के रूप में रखना होता है जिससे वे, यदि खाता-धारकों द्वारा देयताओं का भुगतान नहीं करने से कोई हानि होती है, तो उसका प्रतिकार कर सकें।
- CAR का निर्धारण प्रत्येक बैंक द्वारा अलग-अलग किया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: (a)
प्रश्न. समाचारों में प्रायः आने वाला 'बासल III (Basel III) समझौता' या सरल शब्दों में 'बासल III': (2015)
(a) जैव विविधता के संरक्षण और धारणीय (सस्टेनेबल) उपयोग के लिये राष्ट्रीय कार्यनीतियाँ विकसित करने का प्रयास करता है
(b) बैंकिंग क्षेत्रों के वित्तीय और आर्थिक दबावों का सामना करने के सामर्थ्य को उन्नत करने तथा जोखिम प्रबंधन को उन्नत करने का प्रयास करता है
(c) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने का प्रयास करता है किंतु विकसित देशों पर अपेक्षाकृत भारी बोझ रखता है
(d) विकसित देशों से निर्धन देशों को प्रौद्योगिकी के अंतरण का प्रयास करता है ताकि वे प्रशीतन में प्रयुक्त होने वाले क्लोरोफ्लुओरोकार्बन के स्थान पर हानिरहित रसायनों का प्रयोग कर सकें
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की स्थायी संवृद्धि तथा निम्न मुद्रास्फीति के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण दीजिये। (2019)
