प्रारंभिक परीक्षा
DRDO द्वारा SFDR टेक्नोलॉजी का सफल प्रदर्शन
चर्चा में क्यों?
रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) चांदीपुर, ओडिशा से सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) तकनीक का सफल उड़ान परीक्षण (फ्लाइट डिमॉन्स्ट्रेशन) संपन्न किया है।
- इस सफल परीक्षण के साथ ही भारत उन विशिष्ट राष्ट्रों के समूह में सम्मिलित हो गया है, जिनके पास SFDR तकनीक उपलब्ध है। यह तकनीक लंबी दूरी की हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइलों के विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) टेक्नोलॉजी क्या है?
- SFDR (सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट): यह एक अत्याधुनिक मिसाइल प्रणोदन प्रौद्योगिकी है। पारंपरिक रॉकेटों के विपरीत, जो ईंधन तथा ऑक्सीडाइज़र दोनों ले जाते हैं, SFDR एक “एयर-ब्रीदिंग” इंजन है। यह ठोस ईंधन के दहन हेतु वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग करता है, जिससे दीर्घकालिक सुपरसोनिक स्पीड तथा विस्तारित मारक-क्षमता प्राप्त होती है।
- SFDR की कार्यप्रणाली:
- नोज़ल-रहित बूस्टर: यह घटक मिसाइल को मात्र तीन सेकंड में सुपरसोनिक वेग तक त्वरित करता है, जो रैमजेट के संचालन के लिये आवश्यक पूर्वापेक्षा है।
- डक्टेड रैमजेट सस्टेनर: आवश्यक गति प्राप्त होने के पश्चात बोरॉन-आधारित ठोस ईंधन प्रज्वलित होता है। यह दहन के लिये वायुमंडल से ऑक्सीजन ग्रहण करता है, जिससे ऑक्सीडाइज़र वहन करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है तथा इसके भार में बचत के साथ 50 से 200 सेकंड तक संचालित उड़ान संभव होती है।
- हॉट गैस वॉल्व: कार्बन-कार्बन कंपोज़िट तथा टंगस्टन-कॉपर मिश्रधातुओं से विकसित यह वॉल्व ऊँचाई एवं गति के अनुसार दहन गैसों का विनियमन करता है।
- चीक-माउंटेड एयर इंटेक्स: ये उड़ान के दौरान प्रवेश करने वाली वायु का प्रभावी संपीडन करते हैं, जिससे सतत दहन सुनिश्चित होता है।
- मुख्य प्रदर्शन संकेतक:
- ऊँचाई की लचीलापन क्षमता: यह मिसाइल समुद्र तल से लेकर 20 किमी. की ऊँचाई तक प्रभावी रूप से संचालित हो सकती है।
- उच्च गतिशीलता: यह 10 किमी. तक के ऊर्ध्वाधर युद्धाभ्यास करने में सक्षम है।
- सटीक लक्ष्य निर्धारण: उच्च सटीकता सुनिश्चित करने के लिये इसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी सीकर, इनर्शियल नेविगेशन और जैम-प्रतिरोधी डेटा लिंक एकीकृत किये गए हैं।
- निरंतर सुपरसोनिक गति: सामान्य ठोस-ईंधन रॉकेटों के विपरीत, जो जल्दी ईंधन समाप्त कर लेते हैं, SFDR अधिक समय तक मैक 2 से मैक 3.8 की गति बनाए रखने में सक्षम होते हैं।
- विस्तारित मारक क्षमता: यह लड़ाकू विमानों को दृश्य सीमा से कहीं आगे स्थित लक्ष्यों को भेदने में सक्षम बनाता है, जिसकी परिचालन सीमा 50 किमी. से 340 किमी. के बीच है।
- घातक प्रभावशीलता: इसे उच्च गति वाले हवाई लक्ष्यों पर अधिकतम नुकसान पहुँचाने के लिये प्रॉक्सिमिटी फ्यूज़ से लैस विखंडन (फ्रैगमेंटेशन) वारहेड के साथ तैयार किया गया है।
- महत्त्व:
- विस्तृत नो‑एस्केप ज़ोन: अंतिम चरण तक गति और ऊर्जा बनाए रखने के कारण यह एक बड़ा “नो‑एस्केप ज़ोन” बनाता है, जिससे शत्रु विमानों के लिये बच निकलना मुश्किल हो जाता है।
- परिचालन बहुमुखी प्रतिभा: यह तकनीक हवा-से-हवा और सतह‑से‑हवा दोनों प्रकार की मिसाइल प्रणालियों में अपनाई जा सकती है, जिससे व्यापक वायु रक्षा क्षमताएँ और अधिक सुदृढ़ होती हैं।
- रणनीतिक बढ़त: यह तकनीक भारत की आगामी अस्त्र Mk‑3 का आधार है, जो एक सीमा से परे हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल (BVRAAM) है और जिसे यूरोपीय मीटिओर मिसाइल तथा चीनी PL‑15 के समकक्ष प्रतिस्पर्द्धी के रूप में विकसित किया जा रहा है।
- सामरिक बढ़त: यह भारतीय वायु सेना (IAF) को “फर्स्ट लुक, फर्स्ट किल” की क्षमता प्रदान करती है, जिससे वह सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए शत्रुओं को निशाना बना सकती है।
रैमजेट, SFDR और स्क्रैमजेट प्रौद्योगिकियाँ
|
विशेषता |
रैमजेट |
SFDR (सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट) |
स्क्रैमजेट (अतिध्वनिक दहन रैमजेट) |
|
दहन की अवस्था |
अवध्वनिक (इंजन के भीतर वायु की गति धीमी हो जाती है) |
अवध्वनिक (इंजन के भीतर वायु की गति धीमी हो जाती है) |
अतिध्वनिक (इंजन के भीतर वायु अत्यधिक तीव्र गति से प्रवाहित होती है) |
|
ईंधन का प्रकार |
द्रव ईंधन (प्रायः) |
ठोस ईंधन (बोरॉन-आधारित) |
द्रव हाइड्रोजन |
|
ऑक्सीडाइज़र |
वायुमंडलीय ऑक्सीजन |
वायुमंडलीय ऑक्सीजन |
वायुमंडलीय ऑक्सीजन |
|
मुख्य उपयोग |
क्रूज़ मिसाइलें (जैसे- ब्रह्मोस) |
हवा-से-हवा मार करने वाली मिसाइलें (जैसे- अस्त्र Mk-3) |
अतिध्वनिक वाहन (जैसे- हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेटर व्हीकल- HSTDV) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट (SFDR) टेक्नोलॉजी क्या है?
SFDR एक वायु-श्वासी (एयर-ब्रीदिंग) मिसाइल प्रणोदन प्रणाली है, जो ठोस ईंधन दहन हेतु वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग करती है। इससे निरंतर अधिध्वनिक गति तथा अधिक दूरी तक मारक क्षमता संभव होती है।
2. भारत के लिये SFDR टेक्नोलॉजी क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह दीर्घ-मारक हवा-से-हवा मिसाइलों के विकास में सहायक है, ‘नो-एस्केप ज़ोन’ को बढ़ाती है तथा भारत को उन्नत मिसाइल-टेक्नोलॉजी वाले चयनित देशों की श्रेणी में स्थापित करती है।
3. SFDR पारंपरिक सॉलिड रॉकेट मोटरों से किस प्रकार भिन्न है?
जहाँ पारंपरिक रॉकेट शीघ्र ही अपना ईंधन जला लेते हैं, वहीं SFDR वायुमंडलीय ऑक्सीजन का उपयोग कर ईंधन का सतत दहन करता है, जिससे दीर्घ समय तक स्थायी प्रणोदन प्राप्त होता है।
4. कौन-सी आगामी मिसाइल प्रणाली SFDR टेक्नोलॉजी का उपयोग करेगी?
SFDR भारत में विकसित की जा रही ‘अस्त्र Mk-3’ दृश्य-सीमा से परे हवा-से-हवा में मार करने वाली मिसाइल (BVRAAM) का प्रमुख आधार है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)
- बैलिस्टिक मिसाइल अपनी पूरी उड़ान में अवध्वनिक चाल पर प्रधार-नोदित होती हैं, जबकि क्रूज़ मिसाइल केवल उड़ान के आरंभिक चरण में रॉकेट संचालित होती हैं।
- अग्नि-V मध्यम दूरी की पराध्वनिक क्रूज़ मिसाइल है, जबकि ब्रह्मोस ठोस ईंधन चालित अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
प्रश्न. अग्नि-IV मिसाइल के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2014)
- यह सतह-से-सतह पर मार करने वाली मिसाइल है।
- यह केवल तरल प्रणोदक द्वारा संचालित होती है।
- यह लगभग 7500 किमी. दूरी तक एक टन परमाणु आयुध पहुँचाने में सक्षम है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
रैपिड फायर
अनुच्छेद 224A के अंतर्गत अस्थायी न्यायाधीश
न्यायिक लंबित मामलों से निपटने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम के रूप में, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की अस्थायी न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति को स्वीकृति प्रदान की है।
- ये नियुक्तियाँ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 224A के अंतर्गत की जाती हैं, जो उच्च न्यायालयों में प्रकरणों की लंबितता को कम करने हेतु सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीशों की अस्थायी नियुक्ति की अनुमति देता है।
- उल्लेखनीय है कि देशभर के उच्च न्यायालयों में मामलों का निरंतर बैकलॉग बने रहने के बावजूद, अनुच्छेद 224A का प्रयोग अब तक अत्यंत सीमित रूप में ही किया गया है।
- अनुच्छेद 224A: संविधान के अनुच्छेद 224A के अंतर्गत, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा संदर्भ प्रस्तुत किये जाने पर, राष्ट्रपति की पूर्वानुमति प्राप्त कर किसी सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से उस उच्च न्यायालय के अस्थायी न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध किया जा सकता है।
- इस दौरान ऐसे न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के सभी अधिकार-क्षेत्र, शक्तियाँ तथा विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं तथा राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित भत्तों का अधिकार भी होता है; हालाँकि, उन्हें उस उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नहीं माना जाता।
- महत्त्वपूर्ण रूप से, किसी भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की नियुक्ति उनकी सहमति के बिना नहीं की जा सकती।
- वर्ष 2021 में सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालयों में अभूतपूर्व लंबित मामलों की समस्या से निपटने के लिये अनुच्छेद 224A के अधिक व्यापक उपयोग को प्रोत्साहित करते हुए दिशा-निर्देश जारी किये थे।
- अस्थायी न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 127): यदि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों का आवश्यक कोरम उपलब्ध न हो, तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (राष्ट्रपति की सहमति से) किसी ऐसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से, जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिये योग्य हो, अस्थायी न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकते हैं।
- सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सुप्रीम कोर्ट की बैठकों में उपस्थिति (अनुच्छेद 128): संविधान के अनुच्छेद 128 के अंतर्गत, राष्ट्रपति की पूर्वानुमति प्राप्त कर, भारत के मुख्य न्यायाधीश किसी सेवानिवृत्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश अथवा योग्य सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुरोध कर सकते हैं।
रैपिड फायर
सैन्य अभ्यास खंजर
हाल ही में भारत-किर्गिज़स्तान संयुक्त विशेष बल सैन्य अभ्यास खंजर (Exercise KHANJAR) का 13वाँ संस्करण असम के मिसामारी में प्रारंभ हुआ है।
अभ्यास खंजर
- पृष्ठभूमि: अभ्यास ‘खंजर’ की शुरुआत वर्ष 2011 में की गई थी और इसे प्रतिवर्ष भारत तथा किर्गिज़स्तान में क्रमशः आयोजित किया जाता है, जिसका उद्देश्य दोनों देशों के विशेष बलों के बीच पारस्परिक संचालन-क्षमता (Interoperability) को सुदृढ़ करना है।
- प्रतिभागी इकाइयाँ: भारतीय सेना का दल पैराशूट रेजिमेंट (विशेष बल) के सैनिकों द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है, जबकि किर्गिज़स्तान का दल ILBRIS विशेष बल ब्रिगेड द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है।
- उद्देश्य एवं प्रमुख क्षेत्र: आतंकवाद-रोधी और विशेष बल अभियानों में सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान, शहरी तथा पर्वतीय भू-भाग में प्रशिक्षण, जिसमें स्नाइपिंग, भवनों में हस्तक्षेप तथा उच्च-ऊँचाई/पर्वतीय युद्धकौशल शामिल हैं।
- महत्त्व: यह रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करता है, अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद और अतिवाद से निपटने में सहयोग को बढ़ावा देता है तथा शांति, स्थिरता और क्षेत्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करता है।
किर्गिज़स्तान
- किर्गिज़स्तान मध्य एशिया का एक स्थलरुद्ध (Landlocked) देश है, जिसकी सीमाएँ कज़ाखस्तान, चीन, ताज़िकिस्तान और उज़्बेकिस्तान से लगती हैं तथा इसकी राजधानी बिश्केक है।
- यह उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान के साथ रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण फरगाना घाटी साझा करता है, जो क्षेत्रीय स्थिरता के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती है।
- फ़रगाना घाटी हाइड्रोकार्बन संसाधनों से समृद्ध है, जिससे मध्य एशिया में भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और व्यापक रणनीतिक हितों के लिये इसका महत्त्व और बढ़ जाता है।
|
और पढ़ें: अभ्यास खंजर-XII |
रैपिड फायर
बायोमैटेरियल्स
वैश्विक स्तर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था का मॉडल, निम्न-कार्बन विनिर्माण और जीवाश्म ईंधन आयात में कमी की ओर तेज़ी से बदलाव के मद्देनज़र, भारत में बायोमैटेरियल्स को अब नीतिगत व औद्योगिक स्तर पर एक स्वच्छ सामग्री विकल्प के रूप में अधिक महत्त्व दिया जा रहा है।
- परिचय: बायोमैटेरियल वे पदार्थ हैं जो पूर्णतः या आंशिक रूप से जैविक स्रोतों से प्राप्त होते हैं या जिनका निर्माण जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से किया जाता है।
- इन्हें इस प्रकार विकसित किया जाता है कि ये परंपरागत पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों का विकल्प बन सकें या उनके साथ संयोजित होकर कार्य कर सकें। इसका उपयोग पैकेजिंग, वस्त्र, निर्माण एवं स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।
- इसके सामान्य उदाहरणों में पौधों की शर्करा या स्टार्च से बने बायोप्लास्टिक, वस्त्रों में प्रयुक्त जैव-आधारित रेशे तथा जैव-अपघट्य शल्य-टाँके और ऊतक संरचना-आधार (टिश्यू स्कैफोल्ड) जैसे चिकित्सकीय बायोमैटेरियल शामिल हैं।
- ड्रॉप-इन बायोमैटेरियल्स: रासायनिक रूप से जीवाश्म-आधारित सामग्रियों के समान होते हैं और मौजूदा विनिर्माण प्रणालियों के साथ संगत (कंपैटिबल) रहते हैं (जैसे– Bio-PET)।
- प्रकार: बायोमैटेरियल्स को व्यापक रूप से उनके रासायनिक स्वरूप की जीवाश्म-आधारित (फॉसिल-बेस्ड) सामग्रियों से समानता और मौजूदा विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) प्रणालियों के साथ उनकी अनुकूलता (कंपैटिबिलिटी) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- ड्रॉप-आउट बायोमैटेरियल्स: पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों से रासायनिक रूप से भिन्न होते हैं और इनके लिये नई प्रसंस्करण, रीसाइक्लिंग या कंपोस्टिंग प्रणालियों की आवश्यकता होती है (जैसे– पॉलीलैक्टिक एसिड – PLA)।
- नॉवेल बायोमैटेरियल्स: उन्नत जैव-अभियंत्रित (Bio-engineered) सामग्री, जो आत्म-उपचार (Self-healing) क्षमता, जैव-सक्रिय इंप्लांट्स तथा उन्नत सम्मिश्र (Advanced Composites) जैसी नई विशेषताएँ प्रदान करती हैं।
- महत्त्व: स्वदेशी बायोमैटेरियल जीवाश्म-आधारित आयातों को कम कर सकते हैं, कृषि अवशेषों से अतिरिक्त मूल्य सृजित कर सकते हैं, जलवायु एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों को समर्थन प्रदान कर सकते हैं तथा भारतीय निर्यात की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ा सकते हैं।
- भारत में बायोमैटेरियल क्षेत्र एक रणनीतिक सततता और औद्योगिक अवसर के रूप में तेज़ी से विकसित हो रहा है। इसका आकलन केवल बायोप्लास्टिक के बाज़ार से ही लगाया जा सकता है, जिसका मूल्य वर्ष 2024 में लगभग 500 मिलियन डॉलर आँका गया था और इसमें आगामी वर्षों में प्रबल वृद्धि की अपेक्षा की जा रही है।
- उत्तर प्रदेश में बलरामपुर चीनी मिल्स के PLA संयंत्र जैसे बड़े निवेश और Phool.co तथा प्राज इंडस्ट्रीज़ जैसे स्टार्टअप्स के नवाचार, घरेलू प्रगति को उजागर करते हैं।
- बायोमैटेरियल्स को अपनाने के अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण: यूरोपीय यूनियन अपने पैकेजिंग और पैकेजिंग अपशिष्ट विनियमन के तहत कंपोस्टेबल पैकेजिंग को मान्यता प्रदान करता है।
- संयुक्त अरब अमीरात बायोटेक के माध्यम से विश्व की सबसे बड़ी PLA सुविधा विकसित कर रहा है और संयुक्त राज्य अमेरिका USDA बायोप्रिफर्ड कार्यक्रम के माध्यम से बायोमैटेरियल्स को बढ़ावा देता है।
|
और पढ़ें: चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना |
रैपिड फायर
यंत्र इंडिया लिमिटेड को मिनीरत्न का दर्जा
हाल ही में रक्षा मंत्री ने यंत्र इंडिया लिमिटेड को मिनीरत्न श्रेणी-I का दर्जा प्रदान किया। यह निर्णय कंपनी के चार वर्षों के भीतर एक लाभप्रद रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (DPSU) के रूप में तीव्र रूपांतरण को मान्यता देते हुए लिया गया।
- परिचय: यंत्र इंडिया लिमिटेड उन सात नए रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (DPSU) में से एक है, जिनका गठन 1 अक्तूबर, 2021 को तत्कालीन आयुध निर्माणी बोर्ड (OFB) के निगमीकरण के उपरांत किया गया था। यह रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत कार्य करता है।
- प्रमुख उत्पाद: यह कंपनी कार्बन फाइबर कंपोज़िट, ग्लास कंपोज़िट, एल्यूमिनियम अलॉय तथा असेंबली उत्पादों का निर्माण करती है, जिनका उपयोग मीडियम एवं लार्ज कैलिबर के गोला-बारूद, बख्तरबंद वाहनों, तोपखानों तथा मुख्य युद्धक टैंकों में होता है; इससे कंपनी रक्षा उत्पादन के महत्त्वपूर्ण खंडों में स्थापित होती है।
- महत्त्व: यह दर्जा यंत्र इंडिया लिमिटेड (YIL) के बोर्ड को नवीन परियोजनाओं, आधुनिकीकरण और उपकरणों की खरीद के लिये सरकारी पूर्व-अनुमोदन के बिना ₹500 करोड़ तक का पूंजीगत व्यय करने हेतु सशक्त बनाता है। इससे तीव्र निर्णय लेने और विस्तार में होने वाले विलंब को कम करने में सहायता मिलेगी।
- नीति का एकीकरण: यह स्वीकृति स्वदेशीकरण को प्रोत्साहन, आयात पर निर्भरता में कमी, रक्षा निर्यात में वृद्धि, उद्योग की व्यापक भागीदारी तथा भारत के वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में उभार को समर्थन देकर आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण को सुदृढ़ करती है।
|
श्रेणी |
लॉन्च |
मानदंड |
उदाहरण |
|
महारत्न |
महानवरत्न योजना को मई 2010 में CPSE के लिये शुरू किया गया था, ताकि प्रमुख CPSE को अपने संचालन का विस्तार करने और वैश्विक दिग्गज के रूप में उभरने के लिये सशक्त बनाया जा सके। |
|
|
|
नवरत्न |
नवरत्न योजना को वर्ष 1997 में शुरू किया गया था, ताकि ऐसे CPSE की पहचान की जा सके जिन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में तुलनात्मक लाभ प्राप्त है, और उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्द्धी बनने के प्रयास में समर्थन प्रदान किया जा सके। |
मिनीरत्न श्रेणी-I तथा अनुसूची ‘A’ की वे कंपनियाँ जिन्हें पिछले 5 वर्षों में समझौता ज्ञापन प्रणाली के तहत ‘उत्कृष्ट’ या ‘अत्यंत उत्तम’ रेटिंग प्राप्त हुई हो और जो नीचे दिये गए 6 में से कम-से-कम कुछ प्रदर्शन मानकों में कुल 60 या उससे अधिक स्कोर प्राप्त करती हों: 1. नेट प्रॉफिट टू नेटवर्थ 2. मानव संसाधन लागत का कुल लागत से अनुपात 3. मूल्यह्रास, ब्याज एवं कर पूर्व लाभ का पूंजी से अनुपात 4. ब्याज एवं कर पूर्व लाभ का टर्नओवर से अनुपात 5. प्रति शेयर आय 6. अंतर-क्षेत्रीय प्रदर्शन |
|
|
मिनीरत्न |
मिनीरत्न योजना को वर्ष 1997 में इस नीतिगत उद्देश्य के तहत शुरू किया गया था कि सार्वजनिक क्षेत्र को अधिक दक्ष और प्रतिस्पर्द्धी बनाया जा सके तथा लाभ कमाने वाले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को अधिक स्वायत्तता और अधिकारों का विकेंद्रीकरण प्रदान किया जा सके। |
|
|
|
और पढ़ें: 3 DPSU को मिनीरत्न का दर्जा |
रैपिड फायर
संपूर्णता अभियान 2.0
हाल ही में नीति आयोग ने संपूर्णता अभियान 2.0 शुरू किया, जो 28 जनवरी से 14 अप्रैल, 2026 तक चलने वाला तीन महीने का अभियान है। इसका उद्देश्य आकांक्षी ज़िलों और ब्लॉकों में प्रमुख विकास संकेतकों की पूर्ण कवरेज को तेज़ी से लागू करना है।
संपूर्णता अभियान 2.0
- परिचय: संपूर्णता अभियान 2.0 वर्ष 2024 के अभियान की सफलता पर आधारित है और इसका उद्देश्य आकांक्षी ज़िले और ब्लॉक्स कार्यक्रम के तहत 112 आकांक्षी ज़िलों में 5 प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPIs) और 513 आकांक्षी ब्लॉकों में 6 KPIs की पूरी तरह पहुँच सुनिश्चित करना है।
- केंद्रित क्षेत्र: आकांक्षी ब्लॉकों में मुख्य रूप से ध्यान दिया जा रहा है—संतान पोषण और समेकित बाल विकास सेवा (ICDS) के तहत मूल्यांकन, आंगनवाड़ी केंद्रों में बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता, विद्यालयों में बालिकाओं के लिये स्वच्छता सुविधाएँ और पशुओं में खुरपका-मुँहपका रोग के खिलाफ टीकाकरण।
- आकांक्षी ज़िलों के लिये प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPIs) में शामिल हैं—जन्म के समय शिशु का वज़न मापना, तपेदिक (टीबी) मामलों की सूचना देना, गाँव/शहर स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस का आयोजन, विद्यालयों में कार्यशील बालिकाओं के शौचालय और पशुओं के टीकाकरण का कवरेज।
- क्रियान्वयन रणनीति: ज़िले और ब्लॉक तीन महीने की कार्ययोजना तैयार करेंगे, मासिक प्रगति का ट्रैक रखेंगे, जागरूकता तथा व्यवहार परिवर्तन अभियानों का संचालन करेंगे एवं ज़िला अधिकारियों के माध्यम से क्षेत्र स्तरीय निगरानी सुनिश्चित करेंगे।
- संस्थागत समर्थन: नीति आयोग केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के समन्वय में योजना बनाना, क्रियान्वयन, क्षमता निर्माण तथा टिकाऊ सेवा वितरण के लिये सिस्टम तैयार करने में सहायता करेगा।
|
कार्यक्रम |
आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम |
आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम |
|
लॉन्च |
जनवरी 2018 |
जनवरी 2023 |
|
उद्देश्य |
देश भर के 112 ज़िलों को तेज़ी से और असरदार तरीके से बदलें। |
देश भर में 513 ब्लॉक्स (329 ज़िलों) में आवश्यक सरकारी सेवाओं की पूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित करना। |
|
विषय-वस्तु |
स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा कृषि और जल संसाधन वित्तीय समावेशन और कौशल विकास बुनियादी ढाँचा |
स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा कृषि और सहायक सेवाएँ बुनियादी ढाँचा सामाजिक विकास |
|
संकेतकों की संख्या |
49 |
40 |
|
और पढ़ें: संपूर्णता अभियान |
रैपिड फायर
NBDSA द्वारा सांप्रदायिक आचार संहिता उल्लंघनों की पहचान
हाल ही में सामने आए आँकड़ों से पता चला है कि पिछले तीन वर्षों में समाचार प्रसारण और डिजिटल मानक प्राधिकरण (NBDSA) द्वारा पारित लगभग 60% आदेश निजी टीवी और डिजिटल समाचार प्रसारकों द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द संबंधी आचार संहिता के उल्लंघन से संबंधित पाए गए।
समाचार प्रसारण और डिजिटल मानक प्राधिकरण (NBDSA)
- परिचय: यह न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल एसोसिएशन (NBDA) द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र स्व-नियामक निकाय है, जो भारत के निजी टीवी और डिजिटल समाचार प्रसारकों का प्रतिनिधित्व करता है और अपने सदस्यों द्वारा ही वित्तपोषित है।
- दायित्व एवं रूपरेखा: यह न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स रेगुलेशंस, 2008 के अंतर्गत निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता, संतुलन, शालीनता और ज़िम्मेदार पत्रकारिता के मानकों का पालन सुनिश्चित करता है, जिसमें सांप्रदायिक सौहार्द तथा नैतिक समाचार प्रस्तुति पर विशेष ज़ोर दिया जाता है।
- शक्तियाँ एवं अधिकार क्षेत्र: NBDSA समाचार प्रसारणों से सबंधित शिकायतों का निस्तारण करता है। यह स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर या व्यक्तियों तथा सरकारी संस्थाओं की शिकायतों पर कार्रवाई कर सकता है और चेतावनी जारी करने, फटकार लगाने, सामग्री में बदलाव या उसे हटाने का निर्देश देने, दंड आरोपित करने अथवा आचार संहिता के उल्लंघन न पाए जाने पर शिकायत को खारिज करने का अधिकार रखता है।
- संरचना: इस निकाय का नेतृत्व एक अध्यक्ष करता है, जो एक प्रतिष्ठित न्यायविद् होना चाहिये। इसके सदस्य समाचार संपादकों तथा कानून, शिक्षा, साहित्य एवं लोक प्रशासन जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते हैं, जिनका चयन बोर्ड के बहुमत द्वारा किया जाता है।
- दंड एवं शिकायत निवारण: यह द्वि-स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था का पालन करता है, जिसके तहत शिकायतकर्त्ता को पहले संबंधित प्रसारक से संपर्क करना होता है और उसके बाद ही प्राधिकरण के समक्ष अपील की जा सकती है।
|
और पढ़ें: टीवी न्यूज़ चैनलों के सुदृढ़ अनुशासन तंत्र के लिये सर्वोच्च न्यायालय का आह्वान |
