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प्रिलिम्स फैक्ट्स

प्रारंभिक परीक्षा

पवित्र उपवन

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

ओडिशा के कापेना गाँव में जनजातीय समुदायों और ईसाइयों के मध्य उत्पन्न सांप्रदायिक तनाव ने जनजातीय 'पवित्र उपवनों' की परंपरा और पवित्रता को प्रभावित किया है।

पवित्र उपवन क्या हैं?

  • परिचय: पवित्र उपवन प्राकृतिक वनों के वे खंड होते हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व के कारण संरक्षित किया जाता है।
    • ये उपवन प्रायः देवताओं, पूर्वजों की आत्माओं, श्मशान घाटों या जलस्रोतों से संबंध रखते हैं। समुदाय-आधारित संरक्षण ने इनमें मानवीय हस्तक्षेप को रोका है, जिसके परिणामस्वरूप किसी औपचारिक विधिक सुरक्षा के बिना भी समृद्ध जैव विविधता का संरक्षण संभव हो सका है।
  • विस्तार और वितरण: भारत में 10 लाख से अधिक पवित्र वन और लगभग 1,00,000 से 1,50,000 पवित्र उपवन विद्यमान हैं।
    • ये पवित्र उपवन संपूर्ण भारत में पाए जाते हैं, विशेष रूप से पश्चिमी घाट, हिमालय, पूर्वोत्तर और मध्य भारत में। इनका उच्च संकेंद्रण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में है।
    • स्थानीय रूप से इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे– सरना (बिहार), देव वन (हिमाचल प्रदेश), देवरकाडु (कर्नाटक), कावु (केरल), देवराई (महाराष्ट्र), लॉ क्यंतंग (मेघालय) तथा ओरन (राजस्थान)।
    • अन्य स्थानों पर स्थित वन-आधारित उपवनों से भिन्न, पवित्र उपवन प्रायः हिमालय की तलहटी में अल्पाइन घास के मैदानों के रूप में भी पाए जाते हैं।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक आधार: हिंदू धर्म में निहित और जनजातीय एवं स्वदेशी विश्वास प्रणालियों जैसे कि जीववाद/एनिमिज़्म, पूर्वजों का पूजन और प्रकृति की आत्माओं के प्रति श्रद्धा के साथ जुड़े इन वनांकों को कानून द्वारा नहीं बल्कि प्रकृति पूजन और संरक्षण करने के एक शक्तिशाली नैतिक कर्त्तव्य द्वारा संरक्षित किया जाता है।
    • ये समुदाय सभी प्राणियों के सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, यह विचार एक स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र की वैज्ञानिक क्रिया को प्रतिबिंबित करता है।
  • पारिस्थितिक महत्त्व:
    • जैव विविधता शरणस्थल: ‘संरक्षण के गुप्त जादूगरों’ (Secret Wizards of Conservation) के रूप में जाने जाने वाले ये वनांक विभिन्न पौधों और पशुओं की प्रजातियों के लिये शरणस्थल के रूप में कार्य करते हैं, जो छोटे प्राकृतिक वनों के समान हैं।
    • जल संरक्षण: ये उपवन उच्च जल गुणवत्ता बनाए रखते हैं (जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल मानकों को पूरा करती है) और विविध वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिये अविकृत आवास प्रदान करते हैं।
    • मृदा संरक्षण: घनी वनस्पति और न्यूनतम व्यवधान से मृदा अपरदन रोका जाता है, मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती है और दीर्घकालिक पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता सुनिश्चित होती है।
  • सख्त निषेध: पवित्रता बनाए रखने के लिये लकड़ी काटना और शिकार जैसी गतिविधियाँ सख्ती से प्रतिबंधित हैं। इन क्षेत्रों का प्रबंधन सामान्यतः स्थानीय धार्मिक समुदायों, संयुक्त परिवारों या मंदिर न्यासों/ट्रस्टों द्वारा किया जाता है।
  • आधुनिक चुनौतियाँ: युवा पीढ़ी की घटती रुचि के साथ-साथ वनोन्मूलन, शहरीकरण और औद्योगिक विकास से उत्पन्न खतरों का भी सामना करना पड़ रहा है।
  • संरक्षण: वन्यजीवों और उनके आवास के प्रबंधन की प्राथमिक ज़िम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है।
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 राज्यों को जैव विविधता और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं के संरक्षण हेतु निजी या सामुदायिक भूमि को सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र (Community Reserves) घोषित करने का अधिकार देता है।
    • पवित्र उपवन, यद्यपि आकार में छोटे और समुदाय द्वारा संरक्षित होते हैं, फिर भी स्थानीय संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केंद्र प्रायोजित वन्यजीव आवास विकास योजना के अंतर्गत केरल को 2020-23 के बीच कदलुंडी-वल्लिकुन्नु सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र के लिये वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
    • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के अंतर्गत पवित्र उपवन ‘सामुदायिक वन संसाधन (Community Forest Resources) की श्रेणी में आते हैं, अर्थात पारंपरिक सीमाओं के भीतर स्थित प्रथागत सामुदायिक वन भूमि।
      • वन अधिकार अधिनियम (FRA) ग्राम सभा को वन विभाग से स्वतंत्र रहते हुए अपनी  सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों के माध्यम से इन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और संवर्द्धन हेतु वैधानिक प्राधिकरण के रूप में सशक्त बनाता है।
      • हालाँकि, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (WLPA) राज्यों को पवित्र उपवनों को सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र घोषित करने की अनुमति देता है, जिससे वे वन विभाग के नियंत्रण में आ जाते हैं।
        • यह एक कानूनी संघर्ष उत्पन्न करता है, क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) के तहत गठित सामुदायिक रिज़र्व वनाधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत ग्राम सभा को दी गई स्वायत्तता को कमज़ोर और बाधित करते हैं।
  • वैश्विक मान्यता: इन उपवनों का संरक्षण 'IUCN ग्रीन लिस्ट स्टैंडर्ड' के अनुरूप है, जो सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण को अनिवार्य बनाता है।
    • ये क्षेत्र संभावित रूप से 'अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों' (OECMs) के रूप में पात्र हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पवित्र उपवन क्या होते हैं?
धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के कारण संरक्षित प्राकृतिक वनों के समुदाय-रक्षित हिस्से, जहाँ मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।

2. किस कानून के तहत पवित्र उपवनों को सामुदायिक वन संसाधन के रूप में मान्यता दी गई है?

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत पवित्र उपवन 'सामुदायिक वन संसाधनों' के अंतर्गत आते हैं, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है।

3. पवित्र उपवनों को लेकर शासन में टकराव क्यों है?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) के नेतृत्व में बनने वाले 'सामुदायिक रिज़र्व' वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत सामुदायिक वनों के प्रबंधन के लिये ग्राम सभा को प्राप्त वैधानिक अधिकार को कमज़ोर करते हैं।

4. पवित्र उपवनों का वैश्विक संरक्षण में क्या महत्त्व है?
ये 'IUCN ग्रीन लिस्ट' के मानकों के अनुरूप हैं और OECMs (अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय) के रूप में पात्र हैं, जो सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए जैव विविधता का संरक्षण करते हैं।


प्रारंभिक परीक्षा

न्यू START ट्रीटी की समाप्ति

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

न्यू स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी (न्यू START) 5 फरवरी, 2026 को समाप्त हो गई, जिससे अमेरिका और रूस के बीच परमाणु हथियार नियंत्रण से संबंधित अंतिम कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता भी समाप्त हो गया।

  • वर्ष 1972 के बाद इसकी समाप्ति के बाद अमेरिका और रूस के रणनीतिक परमाणु हथियारों पर कोई कानूनी सीमाएँ नहीं रहतीं, जिससे हथियारों के निर्माण, मिथ्या गणना और बढ़ोतरी के जोखिम बढ़ जाते हैं, जबकि भविष्य के हथियार नियंत्रण की संभावनाएँ अप्रभावी हो जाती हैं।

न्यू स्टार्ट ट्रीटी क्या है?

  • परिचय: START का अर्थ है ‘स्ट्रेटेजिक आर्म्स रिडक्शन ट्रीटी’ (रणनीतिक हथियार कटौती संधि)। मूल START-I पर अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच वर्ष 1991 में हस्ताक्षर किये गए थे और यह वर्ष 1994 में लागू हुई।
    • बाद में इसे सामरिक आक्रामक कटौती संधि (SORT) द्वारा प्रतिस्थापित किया गया और फिर न्यू स्टार्ट ट्रीटी अस्तित्व में आई, जिस पर वर्ष 2010 में हस्ताक्षर हुए और यह वर्ष 2011 में प्रभाव में आई।
  • विस्तार और निलंबन: यद्यपि वर्ष 2021 में इसे वर्ष 2026 तक बढ़ाया गया था, लेकिन यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में रूस ने वर्ष 2023 में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी, जिसके बाद दोनों पक्षों ने निरीक्षण और डेटा साझाकरण बंद कर दिया।
  • प्रमुख प्रावधान: यह ट्रीटी उन लॉन्ग-रेंज वेपन की सीमा निर्धारित करती है, जो युद्ध के परिणाम को प्रभावित करने, टारगेट सेंटर, कमांड फेसिलिटी अथवा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना को लक्षित करने के लिये बनाई गई हैं, इससे सामरिक शस्त्रों में सत्यापन योग्य कमी सुनिश्चित की जाती है।
    • रूस एवं संयुक्त राज्य अमेरिका के पास विश्व के 87% न्यूक्लियर वॉरहेड हैं, जो वैश्विक विनाश के लिये पर्याप्त हैं।
  • शस्त्र सीमाएँ: इस ट्रीटी ने संयुक्त राज्य अमेरिका एवं रूस के लिये सत्यापन योग्य सीमाएँ निर्धारित कीं जिसमें 700 डिप्लॉयड अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें, पनडुब्बी से प्रक्षेपित बैलिस्टिक मिसाइलें तथा बमवर्षक विमान, 1,550 न्यूक्लियर वॉरहेड तथा 800 डिप्लॉयड एवं नॉन-डिप्लॉयड लॉन्चर तथा बमवर्षक विमान शामिल हैं।
  • सतत मतभेद: संयुक्त राज्य अमेरिका की मिसाइल रक्षा एवं पारंपरिक आघात प्रणालियों पर मतभेदों के साथ-साथ रूस द्वारा किंजाल मिसाइलों एवं अवनगार्ड हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल जैसे एडवांस वेपन के विकास ने न्यू स्टार्ट ट्रीटी को तनावपूर्ण बना दिया, क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे की सामरिक क्षमताओं को अस्थिर मानते थे।
    • वर्ष 2024–25 में न्यू स्टार्ट के पश्चात् किसी नए ढाँचे पर वार्त्ताएँ पारस्परिक अविश्वास और दायरे तथा शर्तों पर असहमति के कारण बंद हो गईं।
  • वैश्विक निहितार्थ: ट्रीटी की समाप्ति से, चीन तथा अन्य परमाणु-सशस्त्र देशों को व्यापक आयुध-नियंत्रण एवं अप्रसार ढाँचे में सम्मिलित करने के प्रयास और अधिक जटिल हो जाते हैं, जिससे व्यापक हथियार-नियंत्रण की संभावनाएँ और कमज़ोर पड़ती हैं।

परमाणु हथियारों के प्रबंधन से संबंधित वैश्विक पहल

  • परमाणु अप्रसार संधि (NPT), 1968: इसका उद्देश्य परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, निरस्त्रीकरण को बढ़ावा देना और परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग का समर्थन करना है। यह पाँच परमाणु-हथियार संपन्न देशों (NWS) अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्राँस और चीन को मान्यता देती है।
  • व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT), 1996: परीक्षण उद्देश्यों के लिये सभी परमाणु विस्फोटों पर प्रतिबंध लगाती है। (अभी तक लागू नहीं हुई है)।
  • परमाणु हथियारों के निषेध पर संधि (TPNW), 2017: अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत परमाणु हथियारों के उपयोग, स्वामित्व, परीक्षण और हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. न्यू स्टार्ट ट्रीटी क्या है?
न्यू स्टार्ट ट्रीटी अमेरिका और रूस के बीच एक रणनीतिक हथियार नियंत्रण समझौता है, जिस पर वर्ष 2010 में हस्ताक्षर किये गए थे और इसे वर्ष 2011 में लागू किया गया था, जिसके तहत तैनात ICBM, SLBM, बमवर्षक (Bombers) और परमाणु हथियारों को सीमित किया गया था, ताकि रणनीतिक हथियारों में सत्यापन योग्य कमी सुनिश्चित की जा सके।

2. न्यू स्टार्ट ट्रीटी के अंतर्गत प्रमुख सीमाएँ क्या हैं?
ट्रीटी के तहत 700 तैनात ICBM, SLBM और बमवर्षक, 1,550 परमाणु हथियार और 800 तैनात/गैर-तैनात लांचर तथा बमवर्षक की सीमा तय की गई है, जिनका सत्यापन निरीक्षण, डेटा साझाकरण एवं द्विपक्षीय परामर्श आयोग के माध्यम से किया जाएगा।

3. न्यू स्टार्ट ट्रीटी को वैश्विक सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण क्यों माना गया?
यह महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह अंतिम प्रमुख ट्रीटी थी, जिसने वैश्विक परमाणु शस्त्रागार के 87% पर कब्ज़ा  करने वाले दोनों देशों के बीच सत्यापन योग्य कटौती और पारदर्शिता सुनिश्चित की, जिससे हथियारों की दौड़ धीमी हुई और गलत अनुमानों को रोका गया।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रश्न. "न्यू स्टार्ट संधि" (New START treaty) समाचारों में रही थी। यह संधि क्या है? (2011)

(a) यह संयुक्त राज्य अमेरिका तथा रूसी संघ के बीच नाभिकीय शस्त्रों की कटौती करने की द्विपक्षीय सामरिक महत्त्व की संधि है।

(b) यह पूर्वी एशिया शीर्ष सम्मेलन के सदस्यों के बीच बहुपक्षीय ऊर्जा सुरक्षा सहयोग संधि है।

(c) यह रूसी संघ तथा यूरोपीय संघ के बीच ऊर्जा सुरक्षा सहयोग संधि है।

(d) यह ब्रिक्स (BRICS) देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने के लिये की गई बहुपक्षीय सहयोग संधि है।

उत्तर: (a)


रैपिड फायर

भारत और GCC ने FTA की संदर्भ शर्तों पर हस्ताक्षर किये

स्रोत: पीआईबी

भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लिये बातचीत को निर्देशित करने हेतु आधिकारिक तौर पर 'संदर्भ शर्तों' (ToR) पर हस्ताक्षर किये हैं, जो आर्थिक संबंधों और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

  • उद्देश्य: ToR आगामी FTA (मुक्त व्यापार समझौता) वार्त्ताओं के दायरे और कार्यप्रणाली को परिभाषित करता है।
  • आर्थिक प्रभाव: इस समझौते का उद्देश्य वस्तुओं और सेवाओं के निर्बाध प्रवाह को सक्षम बनाना, निवेश आकर्षित करना, रोज़गार के अवसरों का विस्तार करना और खाद्य तथा ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
  • व्यापार आँकड़े:
    • द्विपक्षीय व्यापार: भारत और GCC के बीच FY 2024-25 में व्यापार 178.56 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया (निर्यात: 56.87 बिलियन USD; आयात: 121.68 बिलियन USD), जो भारत के वैश्विक व्यापार का 15.42% है।
    • वृद्धि दर: पिछले पाँच वर्षों में यह व्यापार औसतन 15.3% प्रतिवर्ष की दर से बढ़ा है।
    • भारत का प्रमुख निर्यात: इंजीनियरिंग उत्पाद, चावल, वस्त्र, मशीनरी, रत्न और आभूषण।
    • भारत का प्रमुख आयात: कच्चा तेल, LNG, पेट्रोकेमिकल्स और सोना।
  • निवेश और प्रवासी समुदाय: GCC भारत के लिये विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) का एक प्रमुख स्रोत है, जिसकी संचयी राशि 31.14 बिलियन अमेरिकी डॉलर (सितंबर 2025 तक) है और यहाँ लगभग 1 करोड़ भारतीय निवास करते हैं।

खाड़ी सहयोग परिषद (GCC)

  • GCC, जिसे 1981 में स्थापित किया गया था, छह अरब देशों (सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, कतर, कुवैत और ओमान) का एक क्षेत्रीय समूह है, जिसे साझा इस्लामी मूल्यों, जनजातीय संबंधों और सामान्य सुरक्षा हितों के आधार पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक एकता को प्रोत्साहन प्रदान करने हेतु बनाया गया है।
  • GCC अपने संचालन के लिये सुप्रीम काउंसिल, मिनिस्टीरियल काउंसिल और रियाद स्थित सचिवालय के माध्यम से कार्य करता है। यह फारस की खाड़ी के किनारे एक रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थान पर स्थित है, जो प्रमुख वैश्विक व्यापार मार्गों से जुड़ता है।
  • यह समूह लगभग 61.5 मिलियन लोगों की संयुक्त जनसंख्या और लगभग 2.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के GDP वाला बाज़ार प्रस्तुत करता है, जो वैश्विक स्तर पर नौवें स्थान पर है और वैश्विक ऊर्जा तथा व्यापार बाज़ारों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

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और पढ़ें: भारत GCC आर्थिक और सामरिक संबंध


रैपिड फायर

इंडिया AI स्टैक

स्रोत: पीआईबी

भारत ने AI को लोकतांत्रिक बनाने और स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा एवं शासन के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर इसके कार्यान्वयन को सक्षम बनाने के लिये इंडिया AI स्टैक प्रस्तुत किया है।

इंडिया AI स्टैक

  • परिचय: AI स्टैक आपस में जुड़ा पाँच लेयर वाला एक एकीकृत ढाँचा है, जो AI अनुप्रयोगों के   कार्यान्वयन विस्तार को विश्वसनीय, किफायती और समावेशी तरीके से संभव बनाता है।
    • यह AI को केवल प्रयोगों के दायरे से बाहर निकालकर विभिन्न क्षेत्रों में वास्तविक और व्यापक स्तर पर प्रभाव डालने में सक्षम बनाता है।
  • मुख्य लेयर: 
    • एप्लीकेशन लेयर: यह स्टैक के यूज़र-फेसिंग कंपोनेंट को दर्शाती है। इसमें रोग निदान उपकरण, कृषि परामर्श प्लेटफॉर्म, चैटबॉट्स और भाषा अनुवाद एप्‍लीकेशन जैसी AI-संचालित ऐप और सेवाएँ शामिल हैं।
    • AI मॉडल लेयर: यह स्टैक का बौद्धिक/इंटेलिजेंस कोर है, जिसके अंतर्गत इंडियाAI मिशन, भारतजेन, भाषिणी और इंडियाAI कोष जैसी पहलों के माध्यम से भारत-केंद्रित, सॉवरेन AI मॉडल विकसित किये जा रहे हैं, जो भारतीय भाषाओं, लोक सेवाओं तथा राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का समर्थन करते हैं।
    • कंप्यूटिंग लेयर: यह AI मॉडलों के प्रशिक्षण और संचालन के लिये आवश्यक कंप्यूटिंग शक्ति प्रदान करती है। इसे इंडियाAI कंप्यूट पोर्टल के माध्यम से सब्सिडीयुक्त GPU और TPU तक पहुँच, राष्ट्रीय GPU क्लस्टर, सुपरकंप्यूटर तथा विकसित हो रहे घरेलू सेमीकंडक्टर ईकोसिस्टम का समर्थन प्राप्त है।
    • डेटा सेंटर और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर लेयर: यह AI की तैनाती की रीढ़ (बैकबोन) के रूप में कार्य करती है, जो देशव्यापी ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी, लगभग सार्वभौमिक 5G कवरेज और मुंबई, बंगलुरु तथा हैदराबाद जैसे केंद्रों के साथ तेज़ी से बढ़ती घरेलू डेटा सेंटर क्षमता द्वारा संचालित है।
    • एनर्जी लेयर: यह 500+ गीगावाट संस्थापित क्षमता का 51% से अधिक गैर-जीवाश्म स्रोतों, बैटरी स्टोरेज, पंप्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स और परमाणु ऊर्जा समर्थन के माध्यम से विश्वसनीय तथा सतत विद्युत आपूर्ति करती है।
  • महत्त्व: यह समावेशी, सॉवरेन और किफायती AI को सक्षम बनाकर 'मानवता के लिये AI' को बढ़ावा देता है। यह विदेशी मॉडल और कंप्यूट पर निर्भरता कम करता है, साथ ही AI के विकास को स्थिरता, आत्मनिर्भरता और जन कल्याण के अनुरूप बनाता है।

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और पढ़ें: इंडियाAI मिशन और AI ईकोसिस्टम


रैपिड फायर

झोड़िया समुदाय और सौरा (सोरा) भाषा

स्रोत: पीआईबी 

हाल ही में, ओडिशा के झोड़िया समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची में सम्मिलित करने और 'सौरा'  भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग चर्चा में आई। केंद्र सरकार ने लोकसभा को सूचित किया कि भारत के महापंजीयक कार्यालय (ORGI) ने इस मांग का समर्थन नहीं किया है और इसे पुन: राज्य सरकार को प्रेषित किया है।

झोड़िया समुदाय

  • परिचय: झोड़िया (झोड़िया परोजा) समुदाय मुख्य रूप से ओडिशा के कोरापुट, रायगढ़ और कालाहांडी ज़िलों के कुछ भागों में निवास करता है। पूर्व में इन्हें 'परोजा' जनजाति के पर्याय के रूप में मान्यता प्राप्त थी, हालाँकि वर्ष 1997 तक इन्हें अनुसूचित जनजाति के लाभ प्राप्त होते थे।
  • यह समुदाय सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा है, जो भौगोलिक रूप से पृथक्/दुर्गम क्षेत्रों में निवास करता है, इनकी आजीविका मुख्यतः निर्वाह-उन्मुख कृषि तथा वन उपज पर निर्भर है। शिक्षा एवं आर्थिक अवसरों की गंभीर कमी के कारण ये सामाजिक पूर्वाग्रहों एवं अभावों का सामना कर रहे हैं।

सौरा भाषा

  • सौरा भाषा सौरा जनजाति द्वारा बोली जाती है। यह ऑस्ट्रो-एशियाई (मुंडा) भाषा परिवार से संबंधित है और इसे सोरा, सवरा या सौरा के नाम से भी जाना जाता है।
  • इसकी अपनी एक विशिष्ट लिपि है, जिसे 'सोरंग सोमपेंग' कहा जाता है। इसका विकास वर्ष 1936 में मंगेई गोमांगो द्वारा किया गया था। यह लिपि समुदाय के लिये गहन सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व रखती है।
  • यह भाषा आठवीं अनुसूची में सम्मिलित नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप इसकी आधिकारिक मान्यता, संस्थागत समर्थन तथा संरक्षण के प्रयास सीमित रह जाते हैं।
    • सरकार ने स्पष्ट किया है कि भाषाओं को शामिल करने के लिये कोई निश्चित मानदंड अथवा समय-सीमा निर्धारित नहीं है, क्योंकि इस संबंध में पाहवा समिति (वर्ष 1996) तथा सीताकांत मोहापात्र समिति (वर्ष 2003) द्वारा ऐसे मानदंड निर्धारित करने के पूर्व में किये गए प्रयास अनिर्णायक रहे थे।

और पढ़ें: भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची


रैपिड फायर

सूर्य-प्रकाश से स्वतः चार्ज होने वाला ऊर्जा उपकरण

स्रोत: डीडी 

हाल ही में, भारतीय वैज्ञानिकों ने सूर्य-प्रकाश से चलने वाला एक ऊर्जा भंडारण उपकरण विकसित किया है, जो एक ही इकाई में सौर ऊर्जा का अवशोषण तथा भंडारण दोनों कर सकता है, जिससे स्व-चार्जिंग विद्युत प्रणालियों का विकास संभव हुआ है।

  • परिचय: यह नवोन्मेष, जिसे फोटो-कैपेसिटर कहा जाता है, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत बंगलुरु स्थित सेंटर फॉर नैनो एंड सॉफ्ट मैटर साइंसेज़ (CeNS) द्वारा विकसित किया गया है।
    • पारंपरिक सौर प्रणालियों के विपरीत, यह उपकरण ऊर्जा के अवशोषण और भंडारण की प्रक्रियाओं का समेकित समाधान प्रदान करता है। जिससे प्रणाली का आकार, जटिलता, लागत तथा ऊर्जा हानियाँ कम होती हैं।
  • प्रयुक्त तकनीक: इस तकनीक में बाइंडर-मुक्त निकेल–कोबाल्ट ऑक्साइड (NiCo₂O₄) नैनोवायरों का उपयोग किया गया है, जिन्हें एक सरल हाइड्रोथर्मल प्रक्रिया के माध्यम से निकेल फोम पर विकसित किया जाता है।
    • ये नैनोवायर एक छिद्रयुक्त तथा चालक त्रि-आयामी नेटवर्क का निर्माण करते हैं, जो सूर्य-प्रकाश को कुशलतापूर्वक अवशोषित करने के साथ-साथ विद्युत आवेश को संगृहीत भी करता है।
  • प्रदर्शन: यह इलेक्ट्रोड सूर्यप्रकाश की उपस्थिति में उच्च धारिता प्रदर्शित करता है, हज़ारों चार्ज-डिस्चार्ज चक्रों में उच्च स्थायित्व दर्शाता है तथा विभिन्न प्रकाश परिस्थितियों में स्थिर प्रदर्शन बनाए रखता है।
  • अनुप्रयोग: यह तकनीक पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, वियरेबल उपकरणों तथा ऑफ-ग्रिड ऊर्जा समाधानों के लिये उपयुक्त कॉम्पैक्ट एवं स्व-चार्जिंग पावर सिस्टम के विकास को सक्षम बनाती है।

और पढ़ें:  स्वच्छ ऊर्जा: भारत के सतत विकास का मार्ग


रैपिड फायर

भारत में कवच 4.0 प्रणाली के दायरे का विस्तार

स्रोत: पीआईबी

भारतीय रेल ने हाल ही में एक ही दिन में कवच संस्करण 4.0 के रिकॉर्ड 472.3 रूट किलोमीटर का कमीशन किया, जो किसी एक दिन और एक महीने में अब तक का सर्वाधिक विस्तार है।

  • यह कमीशनिंग पश्चिमी, उत्तरी और पूर्व मध्य रेलवे के प्रमुख खंडों को कवर करती है, जिससे पाँच रेलवे ज़ोन में कवच 4.0 का कुल कवरेज बढ़कर 1,306.3 रूट किलोमीटर हो गया है।

कवच

  • परिचय: कवच भारत की स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा (Automatic Train Protection- ATP) प्रणाली है, जिसे वर्ष 2012 से ट्रेन टक्कर परिहार प्रणाली (Train Collision Avoidance System- TCAS) के रूप में विकसित किया गया था और बाद में इसका नाम बदलकर कवच (‘Armour’) रखा गया।
    • कवच संस्करण 4.0: कवच 4.0 भारत की स्वदेशी स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली का अब तक का सबसे उन्नत संस्करण है, जिसे परिचालन अनुभव के आधार पर निरंतर उन्नत करते हुए विकसित किया गया है।
  • डिज़ाइन एवं उपयुक्तता: इसे भारत के उच्च-घनत्व, बहु-लाइन रेल नेटवर्क के लिये डिज़ाइन किया गया है, जो तीव्र प्रतिक्रिया, अधिक विश्वसनीयता तथा मौजूदा सिग्नलिंग और इंटरलॉकिंग प्रणालियों के साथ निर्बाध एकीकरण प्रदान करता है।
  • प्रौद्योगिकी आधार: कवच माइक्रोप्रोसेसरों, वैश्विक स्थिति निर्धारण प्रणाली (GPS) और रेडियो संचार को एकीकृत करता है, ताकि ट्रेन की स्थिति, गति और सिग्नलिंग स्थिति की निरंतर निगरानी की जा सके।
  • सुरक्षा कार्य: यह प्रणाली सिग्नल को जोखिम की स्थिति में पार करने (Signal Passing at Danger- SPAD) से स्वतः रोकती है, अधिक गति पर नियंत्रण करती है, टक्कर से बचाव हेतु ब्रेक लगाती है, कम दृश्यता/प्रतिकूल मौसम में सुरक्षित संचालन सुनिश्चित करती है तथा गलत दिशा में होने वाली गति और समपार फाटकों (लेवल-क्रॉसिंग गेट्स) के बारे में लोको पायलट को सतर्क करती है।
    • यह सेफ्टी इंटीग्रिटी लेवल (SIL)-4, जो वैश्विक रेलवे सुरक्षा का सर्वोच्च मानक है, का अनुपालन करता है और इसे रिसर्च डिज़ाइंस एंड स्टैंडर्ड्स ऑर्गनाइज़ेशन (RDSO) द्वारा अनुमोदित किया गया है।

और पढ़ें: कवच: स्वचालित ट्रेन सुरक्षा प्रणाली


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