प्रारंभिक परीक्षा
स्टार्टअप मान्यता रूपरेखा में संशोधन
चर्चा में क्यों?
स्टार्टअप इंडिया कार्ययोजना के अंतर्गत भारत ने स्टार्टअप मान्यता रूपरेखा में संशोधन किया है, जो स्टार्टअप इंडिया पहल के दूसरे दशक में प्रवेश के साथ एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत संशोधन को चिह्नित करता है।
- वर्ष 2024 में उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) द्वारा मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से लगभग 10% ही डीप टेक श्रेणी से संबंधित थे। इस स्तर को अपर्याप्त मानते हुए भविष्य-उन्मुख वातावरण के निर्माण हेतु सुधारों के लिये पहल की गई है, ताकि भारत के नवाचार, विनिर्माण तथा उभरती प्रौद्योगिकियों से संबंधित लक्ष्यों के अनुरूप एक सुदृढ़ पारितंत्र विकसित किया जा सके।
भारत की स्टार्टअप मान्यता रूपरेखा में प्रमुख संशोधन क्या हैं?
- डीप टेक स्टार्टअप श्रेणी की शुरुआत: वास्तविक नवाचार की पहचान हेतु विशिष्ट मानदंडों के साथ “डीप टेक स्टार्टअप” के लिये स्टार्टअप की एक समर्पित उप-श्रेणी की शुरुआत की गई:
- परिभाषा: इस इकाई को नवीन वैज्ञानिक अथवा अभियांत्रिकी ज्ञान पर आधारित समाधान विकसित करने चाहिये, जिनमें दीर्घ विकास चक्र, विस्तारित परिपक्वता अवधि, उच्च पूंजी तथा अवसंरचना आवश्यकताएँ, साथ ही उल्लेखनीय तकनीकी अथवा वैज्ञानिक अनिश्चितता सम्मिलित हो।
- अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर केंद्रित: इकाई को अपने राजस्व या वित्तपोषण की तुलना में अनुसंधान एवं विकास पर व्यय का एक उच्च प्रतिशत व्यय करना चाहिये।
- बौद्धिक संपदा (IP) की आवश्यकता: इकाई के पास महत्त्वपूर्ण नवीन बौद्धिक संपदा का स्वामित्व होना चाहिये अथवा वह इसके सृजन की प्रक्रिया में हो, साथ ही उसके व्यवसायीकरण हेतु कदम उठाए जा रहे हों।
- परिसंपत्ति प्रतिबंध: मान्यता अवधि के दौरान डीप टेक स्टार्टअप को अपने मुख्य व्यवसाय से असंबद्ध परिसंपत्तियों अथवा गतिविधियों में निवेश की स्पष्ट अनुमति नहीं होगी।
- प्राधिकरण: उद्योग संवर्द्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) यह निर्धारित करने वाला अंतिम प्राधिकरण होगा कि कोई कंपनी स्टार्टअप अथवा डीप टेक स्टार्टअप के रूप में योग्य है या नहीं।
- यह निर्णय अंतर-मंत्रालयी प्रमाणन बोर्ड से प्राप्त “मार्गदर्शन” के आधार पर लिया जाएगा।
- कारोबार के टर्नओवर की सीमा और मान्यता अवधि: नए DPIIT मानदंडों के तहत स्टार्टअप मान्यता के लिये टर्नओवर की सीमा ₹100 करोड़ से बढ़ाकर ₹200 करोड़ कर दी गई है, जो स्थापना की तिथि से 10 वर्ष तक की इकाइयों पर लागू होगी।
- डीप टेक स्टार्टअप्स के लिये मान्यता अवधि को पंजीकरण की तिथि से 10 वर्ष से बढ़ाकर 20 वर्ष कर दी गई है और कारोबार की सीमा को बढ़ाकर 300 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
- सहकारी समितियाँ: अब बहु-राज्य सहकारी समितियाँ (बहु-राज्य सहकारी समितियाँ अधिनियम, 2002 के अंतर्गत) तथा राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों के सहकारी अधिनियमों के तहत पंजीकृत सहकारी समितियाँ दोनों स्टार्टअप मान्यता के लिये पात्र होंगी।
- यह कदम विशेष रूप से कृषि, ग्रामीण विकास और संबद्ध क्षेत्रों में नवाचार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।
- दुरुपयोग रोकने के लिये प्रतिबंध: यह सुनिश्चित करने हेतु कि लाभ केवल वास्तविक स्टार्टअप्स तक ही सीमित रहें, संशोधित ढाँचा कड़े सुरक्षा उपाय लागू करता है, जिनमें सरकार द्वारा अधिसूचित सट्टेबाजी या गैर-उत्पादक परिसंपत्तियों अथवा गतिविधियों में संलग्न इकाइयों पर प्रतिबंध शामिल है।
- यह प्रावधान मौजूदा उद्यमों के विभाजन या पुनर्गठन के माध्यम से गठित व्यवसायों को भी स्टार्टअप के रूप में मान्यता देने से स्पष्ट रूप से बाहर करता है।
नोट: अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) ₹1 लाख करोड़ के अनुसंधान एवं विकास नवाचार (RDI) कोष का संरक्षक है, जिसके तहत सात वर्षों में उभरती प्रौद्योगिकियों में निवेश और अनुसंधान को वित्तपोषित किये जाने की उम्मीद है।
- इन निवेशों का एक हिस्सा वित्तीय संस्थानों जैसे द्वितीयक फंड प्रबंधकों के माध्यम से किया जाएगा, जो डीप टेक स्टार्टअप्स को आवंटित होगा।
स्टार्टअप इंडिया पहल क्या है?
- परिचय: 16 जनवरी, 2016 को शुरू की गई 'स्टार्टअप इंडिया' पहल, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत DPIIT के नेतृत्व में है, अब एक 'फुल-स्टैक प्लेटफॉर्म' (व्यापक मंच) के रूप में विकसित हो चुकी है, जो स्टार्टअप्स को विचार से लेकर विस्तार तक सहायता प्रदान करती है।
- स्टार्टअप इंडिया कार्ययोजना: स्टार्टअप इंडिया के लिये एक कार्ययोजना वर्ष 2016 में प्रस्तुत की गई थी।
- कार्ययोजना में कुल 19 कार्य बिंदु शामिल हैं, जो ‘सरलीकरण एवं मार्गदर्शन’, ‘वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन’ तथा ‘उद्योग–अकादमिक साझेदारी और ऊष्मायन’ जैसे प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित हैं।
- कार्ययोजना ने देश में एक सशक्त और जीवंत स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्र विकसित करने के उद्देश्य से परिकल्पित सरकारी समर्थन, योजनाओं और प्रोत्साहनों की आधारशिला रखी।
- प्रमुख योजनाएँ और सहायता स्तंभ: स्टार्टअप्स के लिये 'फंड ऑफ फंड्स' (FFS), घरेलू जोखिम पूंजी के विस्तार हेतु सेबी में पंजीकृत 'वैकल्पिक निवेश कोष' (AIFs) के माध्यम से 10,000 करोड़ रुपये के कोष को संचालित करता है।
- स्टार्टअप्स के लिये क्रेडिट गारंटी योजना: यह योजना पात्र वित्तीय संस्थानों के माध्यम से बिना किसी जमानत के ऋण सुविधा प्रदान करती है।
- स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम: यह योजना प्रारंभिक चरण में ‘कॉन्सेप्ट के प्रमाण’, प्रोटोटाइप विकसित करने और बाज़ार में प्रवेश के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- स्टार्टअप इंडिया हब: यह एक सिंगल-विंडो डिजिटल प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करता है, जो स्टार्टअप्स को निवेशकों, मेंटर्स, इनक्यूबेटर्स, कॉर्पोरेट्स और सरकारी संस्थाओं से जोड़ता है।
- संघीय स्तर पर, राज्यों की स्टार्टअप रैंकिंग रूपरेखा राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों में स्टार्टअप नीति के प्रदर्शन का आकलन कर प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को प्रोत्साहित करती है।
- मेंटरशिप एवं नेटवर्किंग मंच, जैसे– मेंटॉरशिप, एडवाइज़री, असिस्टेंस, रेज़िलिएंस तथा ग्रोथ (MAARG) और स्टार्टअप इंडिया इन्वेस्टर कनेक्ट पोर्टल उद्यम संस्थापकों को मार्गदर्शकों तथा निवेशकों से जोड़ते हैं, जिससे समग्र स्टार्टअप ईकोसिस्टम सुदृढ़ होता है।
- प्रभाव एवं उपलब्धियाँ:
- विस्तार: भारत अब विश्व के सबसे बड़े स्टार्टअप पारिस्थितिक तंत्रों में से एक है, जहाँ 2 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स सक्रिय हैं।
- यूनिकॉर्न्स: यूनिकॉर्न्स (USD 1 बिलियन+ मूल्यांकन वाले स्टार्टअप्स) की संख्या वर्ष 2014 में केवल 4 से बढ़कर 120 से अधिक हो गई है।
- समावेशन: 45% से अधिक स्टार्टअप्स में कम-से-कम एक महिला निदेशक हैं, जबकि लगभग 50% मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स टियर II तथा टियर III नगरों से आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. स्टार्टअप मान्यता रूपरेखा में संशोधन का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
एक पूर्वानुमेय, समावेशी तथा नवाचार-केंद्रित ईकोसिस्टम का निर्माण करना, साथ ही यह सुनिश्चित करना कि लाभ वास्तविक स्टार्टअप्स तक ही पहुँचें।
2. नई रूपरेखा के अंतर्गत डीप टेक स्टार्टअप की पात्रता क्या है?
वे स्टार्टअप्स जो वैज्ञानिक अथवा अभियांत्रिकी प्रगति पर आधारित हों, जिनका अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय अधिक हो तथा जिनके पास नवीन बौद्धिक संपदा का स्वामित्व हो।
3. स्टार्टअप्स के टर्नओवर एवं आयु-सीमा में क्या परिवर्तन किये गए हैं?
सामान्य स्टार्टअप्स के लिये अब 10 वर्ष की आयु-सीमा तथा ₹200 करोड़ तक का टर्नओवर निर्धारित किया गया है, जबकि डीप टेक स्टार्टअप्स के लिये 20 वर्ष की आयु-सीमा तथा ₹300 करोड़ तक की सीमा प्रदान की गई है।
4. स्टार्टअप मान्यता में सहकारी समितियों को क्यों शामिल किया गया है?
कृषि, ग्रामीण विकास तथा संबद्ध क्षेत्रों में सहकारिता-आधारित उद्यमिता के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहित करने हेतु।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. 'स्टैंडअप इंडिया स्कीम' (Stand Up India Scheme) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
1. इसका प्रयोजन SC/ST एवं महिला उद्यमियों में उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है।
2. यह SIDBI के माध्यम से पुनर्वित्त का प्रावधान करता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2
उत्तर: C
प्रश्न. जोखिम पूंजी से क्या तात्पर्य है? (2014)
(a) उद्योगों को उपलब्ध कराई गई अल्पकालीन पूंजी
(b) नए उद्यमियों को उपलब्ध कराई गई दीर्घकालीन प्रारंभिक पूंजी
(c) उद्योगों को हानि उठाते समय उपलब्ध कराई गई निधियाँ
(d) उद्योगों के प्रतिस्थापन एवं नवीकरण के लिये उपलब्ध कराई गई निधियाँ
उत्तर: (b)
प्रारंभिक परीक्षा
RBI की मौद्रिक नीति समिति की अपरिवर्तित रेपो दर
चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने फरवरी 2026 की बैठक में रेपो दर को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया है। इससे पहले दिसंबर 2025 में इसमें 25 आधार अंकों की कटौती की गई थी।
- इस निर्णय का तात्पर्य ऋण और जमा दरों में तत्काल कोई बदलाव नहीं है। रेपो-लिंक्ड ऋणों (होम, पर्सनल लोन) पर EMI के स्थिर रहने की उम्मीद है।
RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) द्वारा की गई प्रमुख घोषणाएँ क्या हैं?
- मौद्रिक नीति का रुख: समिति ने "तटस्थ" (Neutral) मौद्रिक नीति रुख को बनाए रखने का निर्णय लिया है। इसका तात्पर्य है कि RBI भविष्य में ब्याज दरों को बढ़ाने या घटाने के लिये अभी प्रतिबद्ध नहीं है और यह निर्णय आने वाले आर्थिक आँकड़ों पर आधारित होगा।
- GDP वृद्धि का अनुमान (वित्त वर्ष 2025-26): RBI ने वित्त वर्ष 2025-26 (FY 26) के लिये सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि के अपने अनुमान को 7.3% से बढ़ाकर 7.4% कर दिया है।
- खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान (वित्त वर्ष 2025-26): RBI ने वित्त वर्ष 2026 के लिये खुदरा मुद्रास्फीति के अनुमान को भी पहले के 2.0% से मामूली रूप से बढ़ाकर 2.1% कर दिया है।
सकारात्मक घरेलू परिस्थितियाँ (नीति विराम को समर्थन देने वाली)
- मज़बूत और बढ़ती हुई वृद्धि: वित्त वर्ष 2026 में खपत लगभग 7% बढ़ने की उम्मीद के साथ, अर्थव्यवस्था में एक मज़बूत गति दिखाई दे रही है, जिसका अनुमानित विकास दर 7.4% (संशोधित) है। इस सकारात्मक रुझान को बजट में घोषित प्रोत्साहन (वित्त वर्ष 2026 में आयकर कटौती, GST का युक्तीकरण), पिछले 125 आधार अंकों की दर कटौती और नियंत्रित महंगाई जैसे कारकों का समर्थन मिल रहा है।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 के अनुसार, वित्त वर्ष 27 में मज़बूत घरेलू मांग के कारण GDP 6.8% से 7.2% के बीच बढ़ने का अनुमान है।
- अनुकूल और नियंत्रित मुद्रास्फीति: दिसंबर 2025 में हेडलाइन मुद्रास्फीति 1.33% रही, जो भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित 2-6% की सीमा से काफी कम है। मूल (अंतर्निहित) मुद्रास्फीति भी कम और स्थिर बनी हुई है और यह संभावना है कि निकट भविष्य में यह लक्ष्य के करीब बनी रहेगी।
- हालिया विकास और प्रोत्साहन: केंद्रीय बजट 2026-27 के विकासोन्मुख राजकोषीय उपायों से खपत बढ़ने की उम्मीद है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इन उपायों के प्रभाव का आकलन करने के लिये स्थिर करने की नीति अपना रहा है, क्योंकि पिछली मौद्रिक नीति का असर अभी भी अर्थव्यवस्था में महसूस किया जा रहा है, इस कारण, तत्काल किसी अतिरिक्त मौद्रिक कार्रवाई की आवश्यकता कम हो गई है।
बाहरी जोखिम और अनिश्चितताएँ (सावधानी का औचित्य)
- बढ़ती वैश्विक चुनौतियाँ: भू-राजनीतिक जोखिमों और वैश्विक व्यापार तनावों में वृद्धि स्थिरता के लिये खतरा उत्पन्न कर रही है, जिसके लिये सतर्क निगरानी आवश्यक है।
उदाहरण: मध्य-पूर्व की अस्थिरता (इज़रायल-हमास संघर्ष तथा उससे जुड़ी अमेरिका-ईरान-इज़रायल की गतिशीलताएँ)। - नए व्यापार समझौतों के प्रभाव का आकलन आवश्यक: अमेरिका, यूरोपीय संघ, ओमान और न्यूज़ीलैंड के साथ नए व्यापार समझौते मध्यम अवधि में विकास के लिये सहायक हो सकते हैं, लेकिन उनका पूरा प्रभाव अभी सामने नहीं आया है। यह विराम उनके प्रभाव के मूल्यांकन का अवसर प्रदान करता है।
RBI की मौद्रिक नीति का रुख
- उदार मौद्रिक नीति रुख: यह ऋण को सस्ता बनाकर विकास को प्रोत्साहित करने के लिये ब्याज दरों को कम करने की ओर एक सोची-समझी प्रवृत्ति का संकेत देता है। इसे आमतौर पर तब अपनाया जाता है जब मुद्रास्फीति नियंत्रण में होती है, लेकिन अर्थव्यवस्था को समर्थन की आवश्यकता होती है।
- तटस्थ मौद्रिक नीति रुख: यह एक संतुलित और डेटा पर आधारित स्थिति है जिसमें कोई पूर्व-निर्धारित झुकाव नहीं होता। यह RBI को आने वाले व्यापक आर्थिक आँकड़ों के आधार पर नीतिगत दरों को किसी भी दिशा में समायोजित करने का लचीलापन प्रदान करता है।
- कैलिब्रेटेड टाइटनिंग: यह मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिये नीति में धीरे-धीरे कड़ाई लाने की सतर्क दिशा को दर्शाता है, जिसका अर्थ है कि दरें घटाने की संभावना कम है, जबकि बढ़ोतरी अभी भी संभावित है।
- हॉकिश मौद्रिक नीति रुख: यह नीति मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को प्राथमिकता देती है, भले ही इसके कारण आर्थिक वृद्धि धीमी हो और यह अक्सर उच्च ब्याज दरों के माध्यम से लागू की जाती है।
- डोविश मौद्रिक नीति रुख: यह एक ऐसा नीतिगत दृष्टिकोण है जो विकास और रोज़गार को बढ़ावा देने का पक्षधर है, जो आमतौर पर कम ब्याज दरों के माध्यम से किया जाता है, भले ही मुद्रास्फीति (महंगाई) का जोखिम बढ़ा हुआ हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) का प्राथमिक दायित्व क्या है?
MPC का प्राथमिक दायित्व नीतिगत रेपो दर निर्धारित करना है, ताकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति को 4% के लक्ष्य के आसपास, 2–6% की सहनशीलता सीमा के भीतर बनाए रखा जा सके।
2. RBI की ‘तटस्थ’ मौद्रिक नीति रुख और ‘उदार’ (Accommodative) रुख में क्या अंतर है?
‘तटस्थ’ रुख RBI को प्राप्त होने वाले नवीन आँकड़ों के आधार पर ब्याज दरों में समायोजन के लिये लचीलापन प्रदान करता है, जबकि ‘उदार’ रुख विकास को समर्थन देने हेतु ब्याज दरों में कमी की स्पष्ट प्रवृत्ति का संकेत देता है।
3. फरवरी 2026 की समीक्षा में RBI की MPC को रेपो दर स्थिर रखने में कौन-से प्रमुख घरेलू कारक सहायक रहे?
रेपो दर को स्थिर रखने में वित्त वर्ष 2025–26 की सशक्त एवं ऊर्ध्वगामी संशोधित आर्थिक वृद्धि (7.4%), अनुकूल मुद्रास्फीति (दिसंबर वर्ष 2025 में 1.33%), सुदृढ़ उपभोग तथा पूर्व दर में कटौतियों तथा राजकोषीय उपायों के विलंबित प्रभाव प्रमुख रूप से सहायक रहे।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. यदि आरबीआई प्रसारवादी मौद्रिक नीति का अनुसरण करने का निर्णय लेता है, तो वह निम्नलिखित में से क्या नहीं करेगा? (2020)
- वैधानिक तरलता को घटाकर उसे अनुकूलित करना
- सीमांत स्थायी सुविधा दर को बढ़ाना
- बैंक दर को घटाना तथा रेपो दर को भी घटाना
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
प्रश्न. मौद्रिक नीति समिति (मोनेटरी पॉलिसी कमिटी/एमपीसी) के संबंध में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं ? (2017)
- यह आरबीआई की मानक (बेंचमार्क) ब्याज दरों का निर्धारण करती है।
- यह एक 12-सदस्यीय निकाय है जिसमें आरबीआई का गवर्नर शामिल है तथा प्रत्येक वर्ष इसका पुनर्गठन किया जाता है।
- यह केंद्रीय वित्त मंत्री की अध्यक्षता में कार्य करती है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 3
(d) केवल 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रारंभिक परीक्षा
केंद्रीय बजट वर्ष 2026-27 में केमिकल पार्क्स को प्रोत्साहन
चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बजट वर्ष 2026-27 में केमिकल पार्क अवसंरचना के लिये पहली बार समर्पित बजटीय सहायता की घोषणा की गई है। इसके अंतर्गत ₹600 करोड़ की एक चैलेंज-आधारित योजना प्रस्तावित की गई है, जिसके माध्यम से राज्यों को तीन केमिकल पार्क्स की स्थापना में सहायता प्रदान की जाएगी।
केमिकल पार्क्स क्या हैं?
- परिचय: केमिकल पार्क्स विशेष रूप से रसायन तथा पेट्रोकेमिकल विनिर्माण के लिये विकसित योजनाबद्ध औद्योगिक क्लस्टर होते हैं, जहाँ अनेक इकाइयाँ साझा अवसंरचना एवं सामान्य सुविधाओं का उपयोग करते हुए एक साथ संचालित होती हैं।
- मुख्य विशेषताएँ: ये पार्क्स क्लस्टर-आधारित, प्लग-एंड-प्ले मॉडल पर आधारित होंगे, जिनमें तत्पर औद्योगिक भूमि, सामान्य उपयोगिताएँ, लॉजिस्टिक्स समर्थन तथा अपशिष्ट उपचार एवं सुरक्षा प्रणालियों जैसी मानक पर्यावरणीय अनुपालन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।
- यह पहल प्लास्टिक पार्क्स, बल्क ड्रग पार्क्स तथा पेट्रोलियम, केमिकल्स एवं पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्र (PCPIR) जैसे सफल क्लस्टर मॉडलों पर आधारित है, जिन्होंने साझा अवसंरचना, पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं तथा परियोजनाओं के तीव्र निष्पादन के लाभों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है।
- उद्देश्य: यह पहल घरेलू रासायनिक विनिर्माण को सुदृढ़ करने, आयात पर निर्भरता कम करने, आपूर्ति-शृंखला एकीकरण में सुधार करने तथा बल्क एवं विशेष रसायनों में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने का लक्ष्य रखती है।
- भारत की स्थिति: भारत का रासायनिक उद्योग विनिर्माण का एक प्रमुख स्तंभ है, जो कृषि, औषधि, वस्त्र, ऑटोमोबाइल तथा निर्माण क्षेत्रों को आवश्यक इनपुट प्रदान करता है। यह सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 7% का योगदान देता है तथा वैश्विक स्तर पर छठे और एशिया में तीसरे स्थान पर है।
- महत्त्व: लक्षित नीतिगत समर्थन तथा प्रौद्योगिकी अपनाने, नवाचार एवं सततता को प्रोत्साहित करने वाले उपायों से समर्थित यह एकीकृत दृष्टिकोण आगामी दशक में घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को प्रबलता प्रदान करेगा तथा वैश्विक रासायनिक मूल्य शृंखलाओं में भारत के एकीकरण को सुदृढ़ करेगा।
संबंधित क्लस्टर-आधारित पहलें
- प्लास्टिक पार्क योजना: प्लास्टिक पार्क प्लास्टिक प्रसंस्करण के लिये समर्पित औद्योगिक क्षेत्र होते हैं, जिन्हें साझा अवसंरचना और सामान्य सुविधाओं के माध्यम से पुनर्चक्रण, मूल्य संवर्द्धन, निर्यात तथा रोज़गार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विकसित किया जाता है।
- बल्क ड्रग पार्कों के संवर्द्धन की योजना: बल्क ड्रग पार्कों का उद्देश्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र, परीक्षण प्रयोगशालाएँ और साझा उपयोगिताओं जैसी सामान्य अवसंरचना उपलब्ध कराकर घरेलू औषधि निर्माण को मज़बूत करना है, जिससे सक्रिय औषधीय अवयवों (APIs) के आयात पर निर्भरता कम हो। ये पार्क गुजरात, हिमाचल प्रदेश और आंध्र प्रदेश में स्थित हैं।
- पेट्रोलियम, रसायन एवं पेट्रोकेमिकल निवेश क्षेत्र: PCPIRs बड़े और एकीकृत औद्योगिक क्षेत्र होते हैं, जो पेट्रोलियम, रसायन और पेट्रोकेमिकल उत्पादन को प्रोत्साहित करते हैं, जहाँ उत्पादन इकाइयों को लॉजिस्टिक्स, उपयोगिताएँ और पर्यावरणीय अवसंरचना के साथ एक ही स्थान पर स्थापित किया जाता है। प्रमुख उदाहरण दहेज (गुजरात), विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) और पारादीप (ओडिशा) हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. केमिकल पार्क क्या हैं?
केमिकल पार्क नियोजित औद्योगिक क्लस्टर होते हैं, जिनमें साझा अवसंरचना और प्लग-एंड-प्ले सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं, ताकि रसायन तथा पेट्रोकेमिकल विनिर्माण को बढ़ावा मिल सके।
2. केंद्रीय बजट 2026–27 में कितने केमिकल पार्कों की घोषणा की गई है?
बजट में तीन केमिकल पार्कों के लिये समर्थन की घोषणा की गई है, जिन्हें राज्यों द्वारा चैलेंज-आधारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से स्थापित किया जाएगा।
3. केमिकल पार्कों के लिये बजटीय आवंटन कितना है?
केंद्रीय बजट वित्त वर्ष 2026–27 में केमिकल पार्कों की स्थापना के लिये ₹600 करोड़ का आवंटन किया गया है।
4. भारत के लिये केमिकल पार्क क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
ये घरेलू विनिर्माण को मज़बूत करते हैं, आयात पर निर्भरता कम करते हैं, पर्यावरणीय अनुपालन में सुधार करते हैं और रसायन क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. 'आठ मूल उद्योगों के सूचकांक' (इंडेक्स ऑफ एट कोर इंडस्ट्रीज़) में निम्नलिखित में से किसको सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है? (2015)
(a) कोयला उत्पादन
(b) विद्युत् उत्पादन
(c) उर्वरक उत्पादन
(d) इस्पात उत्पादन
उत्तर: (b)
रैपिड फायर
फ्रंटियर नागालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी
केंद्र सरकार, नगालैंड राज्य सरकार तथा ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइज़ेशन (ENPO) ने फ्रंटियर नगालैंड टेरिटोरियल अथॉरिटी (FNTA) की स्थापना हेतु एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। इसका उद्देश्य पूर्वी नगालैंड की राजनीतिक एवं विकासात्मक आकांक्षाओं की पूर्ति करना है।
- शांति के प्रयास: यह वर्ष 2019 के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र में हस्ताक्षरित 12 महत्त्वपूर्ण समझौतों में से एक है, जिसने क्षेत्र को विवादमुक्त बनाने में योगदान दिया है।
- पृष्ठभूमि एवं आवश्यकता: ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइज़ेशन (ENPO), जो नगालैंड के छह पूर्वी ज़िलों की आठ मान्यता प्राप्त नगा जनजातियों का शीर्ष संगठन है, वर्ष 2010 से पृथक् राज्य की मांग कर रहा था। इसका आधार राज्य के अन्य भागों की तुलना में लंबे समय से उपेक्षा, विकास का अभाव तथा सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन रहा है।
- राज्य के विभाजन के बजाय, केंद्र सरकार ने नगालैंड की भौगोलिक अखंडता को बनाए रखते हुए वित्तीय स्वायत्तता एवं निर्णय-निर्माण की क्षमता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से FNTA का प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
- क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र: FNTA नगालैंड के छह पूर्वी ज़िलों (तुएनसांग, मोन, किफिरे, लोंगलेंग, नोकलाक तथा शामतोर) को सम्मिलित करता है।
- FNTA की प्रमुख विशेषताएँ:
- स्वायत्तता: FNTA को स्थानीय मामलों के स्वतंत्र प्रबंधन हेतु 46 विषयों (जैसे– भूमि, ग्रामीण विकास, कृषि आदि) पर कार्यपालिका एवं विधायी अधिकार प्रदान किये गए हैं।
- प्रशासनिक संरचना: इस समझौते के अंतर्गत क्षेत्र में एक मिनी सचिवालय की स्थापना की जाएगी।
- प्रशासन का नेतृत्व अपर मुख्य सचिव अथवा प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा किया जाएगा।
- वित्तीय व्यवस्था: विकास निधियों का आवंटन क्षेत्र की जनसंख्या एवं क्षेत्रफल के अनुपात में किया जाएगा।
- प्रारंभिक स्थापना में होने वाला व्यय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा वहन किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि क्षेत्र के लिये निर्धारित निधियाँ राज्य की राजधानी के माध्यम से विलंबित अथवा अन्यत्र परिवर्तित न हों।
- संवैधानिक स्थिति: समझौते में स्पष्ट किया गया है कि FNTA की स्थापना से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(A) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- अनुच्छेद 371(A): यह अनुच्छेद नगा समुदाय की धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाओं, प्रथागत विधि तथा भूमि स्वामित्व को विशेष संरक्षण प्रदान करता है।
- FNTA इसी संवैधानिक ढाँचे के अंतर्गत कार्य करता है, जिससे नगा समुदाय के विशिष्ट सांस्कृतिक अधिकारों का अनुरक्षण सुनिश्चित होता है।
|
और पढ़ें: नगालैंड के सीमांत क्षेत्र की मांग |
रैपिड फायर
इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि-III
इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि-III’ का ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।
- इसके दौरान मिसाइल के सभी परिचालन एवं तकनीकी मापदंडों का सफलतापूर्वक सत्यापन हुआ। यह परीक्षण स्ट्रैटेजिक फोर्सेज़ कमांड के अधीन संपन्न किया गया।
- अग्नि-III: अग्नि-III का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा किया गया है। यह एक दो-चरणीय, ठोस ईंधन चालित बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी प्रहार-सीमा 3000 किमी. से अधिक है।
- यह मिसाइल पारंपरिक तथा नाभिकीय दोनों प्रकार के युद्धक ले जाने में सक्षम है।
- यह 1.5 टन का पेलोड वहन कर सकती है, जिसकी अनुमानित विस्फोट क्षमता 200-300 किलोटन है।
- अग्नि-III एक सतह-से-सतह पर मार करने वाली मिसाइल है, जिसे रेल एवं सड़क आधारित मोबाइल लॉन्चर से डिप्लॉय किया जा सकता है, जिससे इसकी उत्तरजीविता तथा परिचालन लचीलेपन में वृद्धि होती है।
अग्नि शृंखला
- अग्नि मिसाइल शृंखला, जिसे वर्ष 1980 के दशक में एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के अंतर्गत परिकल्पित किया गया था, भारत की विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की आधारशिला है।
- इसकी शुरुआत वर्ष 1989 में परीक्षण किये गए एक द्वि-चरणीय प्रौद्योगिकी प्रदर्शनकर्त्ता से हुई, जो आगे विकसित होकर अग्नि-I (700–1,250 किमी.), अग्नि-II (2,000-2,500 किमी.) तथा अग्नि-III (3,000-3,500 किमी.) में हुई। ये सभी ठोस ईंधन, गतिशील (मोबाइल) मिसाइलें हैं, जिन्हें भारतीय थलसेना में शामिल किया जा चुका है।
- इसके पश्चात भारत ने वर्ष 2014 में अग्नि-IV (3,000-4,000 किमी.) का परीक्षण किया, जो उन्नत स्वदेशी प्रणालियों से युक्त एक द्वि-चरणीय मध्यम दूरी बैलिस्टिक मिसाइल है तथा वर्तमान में फील्ड ट्रायल्स में है।
- अग्नि-V एक अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) श्रेणी की मिसाइल है, जिसकी मारक क्षमता लगभग 5,000 किमी. से अधिक है तथा इसमें कैनिस्टर में तैनात, सड़क-गतिशील प्रक्षेपण की क्षमता है।
- विकासाधीन अग्नि-VI को स्थल एवं पनडुब्बी दोनों से प्रक्षेपित किये जाने की अपेक्षा है, जिसकी संभावित मारक क्षमता 8,000-10,000 किमी. होगी। यह भारत की प्रतिघाती (Second-Strike) प्रहार क्षमता को उल्लेखनीय रूप से सुदृढ़ करेगी।
- अग्नि प्राइम अग्नि वर्ग की एक नवीन पीढ़ी की उन्नत, परमाणु-सक्षम मिसाइल है। यह द्वि-चरणीय कैनिस्टर मिसाइल है, जिसकी अधिकतम मारक क्षमता 1,000 से 2,000 किमी. है तथा यह पूर्ववर्ती अग्नि मिसाइलों की तुलना में हल्की है।
|
और पढ़ें: अग्नि-5 मिसाइल |
रैपिड फायर
निजी सदस्य विधेयक द्वारा 10-वर्षीय अनिवार्य जनगणना का प्रस्ताव
हाल ही में राज्यसभा में जनगणना अधिनियम, 1948 में संशोधन हेतु एक निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य प्रत्येक दस वर्ष में राष्ट्रव्यापी जनगणना को अनिवार्य बनाना है।
- विधेयक में यह रेखांकित किया गया है कि यद्यपि भारत में दशकीय जनगणना की परंपरा का पालन किया जाता रहा है, किंतु यह विधिक रूप से अनिवार्य नहीं है। साथ ही इसमें इस बात पर बल दिया गया है कि नियमित जनगणना आँकड़े कल्याणकारी योजनाओं तथा सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी आपूर्ति हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
निजी सदस्य विधेयक
- परिचय: निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) वे विधायी प्रस्ताव होते हैं, जिन्हें ऐसे संसद सदस्य प्रस्तुत करते हैं जो मंत्री नहीं होते (अर्थात सरकार का हिस्सा नहीं होते)। इसके माध्यम से सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों अथवा व्यापक सार्वजनिक महत्त्व के विषयों पर विधिक मुद्दे उजागर करने तथा नए कानूनों या संशोधनों का सुझाव देने का अवसर प्राप्त होता है।
- मुख्य विशेषताएँ: केवल निजी सदस्य सांसद (जो मंत्री नहीं हैं) ही ऐसे विधेयक प्रस्तुत कर सकते हैं, जिससे स्वतंत्र विधायी प्रस्तावों का अवसर मिलता है।
- सांसद विशिष्ट विषयों पर ध्यान आकर्षित करने हेतु प्रस्ताव (Resolutions) भी प्रस्तुत कर सकते हैं।
- प्रक्रिया:
- मसौदा निर्माण एवं सूचना: सांसद विधेयक का मसौदा तैयार कर कम-से-कम एक माह पूर्व सूचना देते हैं।
- प्रस्तुति: विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जाता है, जिसके पश्चात प्रारंभिक चर्चा होती है।
- वाद-विवाद: चयनित होने पर विधेयक पर सामान्यतः शुक्रवार अपराह्न के सीमित सत्रों में वाद-विवाद किया जाता है।
- निर्णय: विधेयक को वापस लिया जा सकता है अथवा मतदान की प्रक्रिया तक आगे बढ़ाया जा सकता है।
- निजी सदस्य विधेयकों (PMB) का ह्रास: स्वतंत्रता के पश्चात केवल 14 निजी सदस्य विधेयक ही संसद के दोनों सदनों से पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर सके हैं। वर्ष 1970 के बाद से कोई भी निजी सदस्य विधेयक दोनों सदनों से पारित नहीं हुआ है।
|
और पढ़ें: भारत में जनगणना |
रैपिड फायर
नियमित DGP की नियुक्तियों में विलंब पर चिंता
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि अनेक राज्य नियमित पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को टालते हुए “कार्यवाहक” DGP की व्यवस्था जारी रखे हुए हैं, जो कि प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (वर्ष 2006) के निर्णय में दिये गए निर्देशों का उल्लंघन है।
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (वर्ष 2006):
- इस मामले के निर्णय में न्यायालय ने यह व्यवस्था दी कि DGP की नियुक्तियाँ राजनीतिक प्रभाव से स्वतंत्र होनी चाहिये, “कार्यवाहक” DGP की अवधारणा का अस्तित्व नहीं होना चाहिये।
- निर्णय के अनुसार, DGP का चयन UPSC द्वारा सूचीबद्ध तीन वरिष्ठतम अधिकारियों में से किया जाना चाहिये, साथ ही उन्हें न्यूनतम दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल प्रदान किया जाना अनिवार्य है।
- इसके पश्चात वर्ष 2018 तथा वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों द्वारा एक विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित की गई, जिसके अंतर्गत राज्यों को वर्तमान DGP की सेवानिवृत्ति से तीन माह पूर्व अपने प्रस्ताव UPSC को भेजना आवश्यक है।
राज्य पुलिस पर्यवेक्षण:
- पुलिस संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्य सूची का विषय है।
- इसके अतिरिक्त, पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 3 के अनुसार प्रत्येक राज्य में पुलिस का पर्यवेक्षण राज्य सरकार में निहित होता है।
- ज़िला स्तर पर एक द्वैध व्यवस्था विद्यमान है, जहाँ ज़िला मजिस्ट्रेट तथा पुलिस अधीक्षक दोनों अधिकार साझा करते हैं।
- सामान्यतः राज्य पुलिस का नेतृत्व पुलिस महानिदेशक (DGP) रैंक के अधिकारी द्वारा किया जाता है।
|
और पढ़ें: राज्य पुलिस महानिदेशकों की नियुक्ति हेतु नियमों में सख्ती |
.webp)

.webp)

.webp)


