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पवित्र उपवन

  • 06 Feb 2026
  • 45 min read

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस 

चर्चा में क्यों? 

ओडिशा के कापेना गाँव में जनजातीय समुदायों और ईसाइयों के मध्य उत्पन्न सांप्रदायिक तनाव ने जनजातीय 'पवित्र उपवनों' की परंपरा और पवित्रता को प्रभावित किया है।

पवित्र उपवन क्या हैं?

  • परिचय: पवित्र उपवन प्राकृतिक वनों के वे खंड होते हैं, जिन्हें स्थानीय समुदायों द्वारा उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्त्व के कारण संरक्षित किया जाता है।
    • ये उपवन प्रायः देवताओं, पूर्वजों की आत्माओं, श्मशान घाटों या जलस्रोतों से संबंध रखते हैं। समुदाय-आधारित संरक्षण ने इनमें मानवीय हस्तक्षेप को रोका है, जिसके परिणामस्वरूप किसी औपचारिक विधिक सुरक्षा के बिना भी समृद्ध जैव विविधता का संरक्षण संभव हो सका है।
  • विस्तार और वितरण: भारत में 10 लाख से अधिक पवित्र वन और लगभग 1,00,000 से 1,50,000 पवित्र उपवन विद्यमान हैं।
    • ये पवित्र उपवन संपूर्ण भारत में पाए जाते हैं, विशेष रूप से पश्चिमी घाट, हिमालय, पूर्वोत्तर और मध्य भारत में। इनका उच्च संकेंद्रण महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में है।
    • स्थानीय रूप से इन्हें विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे– सरना (बिहार), देव वन (हिमाचल प्रदेश), देवरकाडु (कर्नाटक), कावु (केरल), देवराई (महाराष्ट्र), लॉ क्यंतंग (मेघालय) तथा ओरन (राजस्थान)।
    • अन्य स्थानों पर स्थित वन-आधारित उपवनों से भिन्न, पवित्र उपवन प्रायः हिमालय की तलहटी में अल्पाइन घास के मैदानों के रूप में भी पाए जाते हैं।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक आधार: हिंदू धर्म में निहित और जनजातीय एवं स्वदेशी विश्वास प्रणालियों जैसे कि जीववाद/एनिमिज़्म, पूर्वजों का पूजन और प्रकृति की आत्माओं के प्रति श्रद्धा के साथ जुड़े इन वनांकों को कानून द्वारा नहीं बल्कि प्रकृति पूजन और संरक्षण करने के एक शक्तिशाली नैतिक कर्त्तव्य द्वारा संरक्षित किया जाता है।
    • ये समुदाय सभी प्राणियों के सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, यह विचार एक स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र की वैज्ञानिक क्रिया को प्रतिबिंबित करता है।
  • पारिस्थितिक महत्त्व:
    • जैव विविधता शरणस्थल: ‘संरक्षण के गुप्त जादूगरों’ (Secret Wizards of Conservation) के रूप में जाने जाने वाले ये वनांक विभिन्न पौधों और पशुओं की प्रजातियों के लिये शरणस्थल के रूप में कार्य करते हैं, जो छोटे प्राकृतिक वनों के समान हैं।
    • जल संरक्षण: ये उपवन उच्च जल गुणवत्ता बनाए रखते हैं (जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के पेयजल मानकों को पूरा करती है) और विविध वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिये अविकृत आवास प्रदान करते हैं।
    • मृदा संरक्षण: घनी वनस्पति और न्यूनतम व्यवधान से मृदा अपरदन रोका जाता है, मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती है और दीर्घकालिक पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता सुनिश्चित होती है।
  • सख्त निषेध: पवित्रता बनाए रखने के लिये लकड़ी काटना और शिकार जैसी गतिविधियाँ सख्ती से प्रतिबंधित हैं। इन क्षेत्रों का प्रबंधन सामान्यतः स्थानीय धार्मिक समुदायों, संयुक्त परिवारों या मंदिर न्यासों/ट्रस्टों द्वारा किया जाता है।
  • आधुनिक चुनौतियाँ: युवा पीढ़ी की घटती रुचि के साथ-साथ वनोन्मूलन, शहरीकरण और औद्योगिक विकास से उत्पन्न खतरों का भी सामना करना पड़ रहा है।
  • संरक्षण: वन्यजीवों और उनके आवास के प्रबंधन की प्राथमिक ज़िम्मेदारी संबंधित राज्य सरकार की होती है।
    • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 राज्यों को जैव विविधता और पारंपरिक सांस्कृतिक प्रथाओं के संरक्षण हेतु निजी या सामुदायिक भूमि को सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र (Community Reserves) घोषित करने का अधिकार देता है।
    • पवित्र उपवन, यद्यपि आकार में छोटे और समुदाय द्वारा संरक्षित होते हैं, फिर भी स्थानीय संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। केंद्र प्रायोजित वन्यजीव आवास विकास योजना के अंतर्गत केरल को 2020-23 के बीच कदलुंडी-वल्लिकुन्नु सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र के लिये वित्तीय सहायता प्राप्त हुई।
    • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के अंतर्गत पवित्र उपवन ‘सामुदायिक वन संसाधन (Community Forest Resources) की श्रेणी में आते हैं, अर्थात पारंपरिक सीमाओं के भीतर स्थित प्रथागत सामुदायिक वन भूमि।
      • वन अधिकार अधिनियम (FRA) ग्राम सभा को वन विभाग से स्वतंत्र रहते हुए अपनी  सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समितियों के माध्यम से इन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और संवर्द्धन हेतु वैधानिक प्राधिकरण के रूप में सशक्त बनाता है।
      • हालाँकि, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (WLPA) राज्यों को पवित्र उपवनों को सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र घोषित करने की अनुमति देता है, जिससे वे वन विभाग के नियंत्रण में आ जाते हैं।
        • यह एक कानूनी संघर्ष उत्पन्न करता है, क्योंकि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) के तहत गठित सामुदायिक रिज़र्व वनाधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत ग्राम सभा को दी गई स्वायत्तता को कमज़ोर और बाधित करते हैं।
  • वैश्विक मान्यता: इन उपवनों का संरक्षण 'IUCN ग्रीन लिस्ट स्टैंडर्ड' के अनुरूप है, जो सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण को अनिवार्य बनाता है।
    • ये क्षेत्र संभावित रूप से 'अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों' (OECMs) के रूप में पात्र हो सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पवित्र उपवन क्या होते हैं?
धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के कारण संरक्षित प्राकृतिक वनों के समुदाय-रक्षित हिस्से, जहाँ मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम होता है।

2. किस कानून के तहत पवित्र उपवनों को सामुदायिक वन संसाधन के रूप में मान्यता दी गई है?

वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत पवित्र उपवन 'सामुदायिक वन संसाधनों' के अंतर्गत आते हैं, जिनका प्रबंधन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है।

3. पवित्र उपवनों को लेकर शासन में टकराव क्यों है?
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WLPA) के नेतृत्व में बनने वाले 'सामुदायिक रिज़र्व' वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत सामुदायिक वनों के प्रबंधन के लिये ग्राम सभा को प्राप्त वैधानिक अधिकार को कमज़ोर करते हैं।

4. पवित्र उपवनों का वैश्विक संरक्षण में क्या महत्त्व है?
ये 'IUCN ग्रीन लिस्ट' के मानकों के अनुरूप हैं और OECMs (अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपाय) के रूप में पात्र हैं, जो सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए जैव विविधता का संरक्षण करते हैं।

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