भारतीय अर्थव्यवस्था
स्टार्टअप इंडिया पहल का दशक
प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस, स्टार्टअप इंडिया पहल, उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग, भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक, MAARG पोर्टल
मुख्य परीक्षा: भारत में स्टार्टअप और उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये सरकारी पहल, आर्थिक विकास में स्टार्टअप की भूमिका, रोज़गार और नवाचार, भारत के स्टार्टअप ईकोसिस्टम के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय स्टार्टअप दिवस (16 जनवरी, 2026) के अवसर पर प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली के भारत मंडपम में स्टार्टअप इंडिया पहल के एक दशक पर प्रकाश डाला, जो वर्ष 2016 में उद्यमिता के लिये एक नीति-नेतृत्व वाले प्रयास से विश्व के सबसे बड़े स्टार्टअप ईकोसिस्टम में भारत के परिवर्तन को चिह्नित करता है, जो विकसित भारत 2047 के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
सारांश
- स्टार्टअप इंडिया पहल (जो 2016 में शुरू की गई थी) के एक दशक ने भारत को विश्व के सबसे बड़े स्टार्टअप ईकोसिस्टम में से एक में परिवर्तित कर दिया है, जिसमें 2 लाख से अधिक DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप, 120 से अधिक यूनिकॉर्न और लगभग 50% नए स्टार्टअप टियर II और टियर III शहरों से उभर रहे हैं , जो उद्यमिता को विकसित भारत 2047 की दृष्टि के साथ संरेखित करते हैं।
- मज़बूत नीतिगत समर्थन और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के बावज़ूद भारत के स्टार्टअप ईकोसिस्टम को अनुसंधान एवं विकास की तीव्रता में कमी (GDP का 0.64%), घरेलू पूंजी का सीमित जोखिम, वित्तपोषण में मंदी, महानगरों से परे बुनियादी ढाँचे की कमियाँ और कमज़ोर डीप-टेक स्केल-अप जैसी संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिये तीव्र विस्तार से परे सतत, नवाचार-संचालित विकास की ओर बदलाव की आवश्यकता है।
स्टार्टअप इंडिया पहल क्या है?
- परिचय: 16 जनवरी, 2016 को लॉन्च की गई स्टार्टअप इंडिया पहल का उद्देश्य उद्यमियों का समर्थन करना, स्टार्टअप ईकोसिस्टम को मज़बूत करना और भारत को रोज़गार की आकांक्षा वाली अर्थव्यवस्था के बजाय रोज़गार को सृजित करने वाली अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करना है।
- स्टार्टअप एक छोटी, नई या युवा कंपनी है जिसे उद्यमियों द्वारा नए उत्पाद या सेवा पेश करने, मौज़ूदा बाज़ार में बदलाव लाने या यहाँ तक कि एक नए बाज़ार का निर्माण करने के लिये स्थापित किया जाता है।
- स्टार्टअप इंडिया पहल को उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) के तहत एक समर्पित स्टार्टअप इंडिया टीम द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।
- मुख्य उद्देश्य:
- नवाचार को बढ़ावा देना: नवीन उत्पादों और समाधानों के विकास एवं विस्तार के लिये एक अनुकूल वातावरण का निर्माण करना।
- उद्यमिता को प्रोत्साहित करना: नियामक बोझ को सरल बनाना और उद्यमियों को उनके यात्रा के प्रत्येक चरण में समर्थन देना।
- निवेश सक्षम करना: स्टार्टअप के लिये धन और पूंजी तक पहुँच को सुविधाजनक बनाना।
- आर्थिक विकास: सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर रोज़गार के अवसर उत्पन्न करना।
- प्रमुख योजनाएँ:
- फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (FFS): स्टार्टअप इंडिया एक्शन प्लान के तहत DPIIT की एक प्रमुख पहल, जिसका प्रबंधन भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) द्वारा किया जाता है। इसमें ₹10,000 करोड़ का फंड शामिल है, जो SEBI-पंजीकृत वैकल्पिक निवेश कोष (AIF) के माध्यम से स्टार्टअप्स में निवेश का समर्थन करता है।
- इससे घरेलू जोखिम पूंजी का दायरा बढ़ता है एवं उद्यमिता पारिस्थितिक तंत्र को और अधिक मज़बूती मिलती है।
- स्टार्टअप्स के लिये क्रेडिट गारंटी योजना (CGSS): यह योग्य वित्तीय संस्थानों के माध्यम से स्टार्टअप्स को ज़मानत-मुक्त ऋण के लिये सक्षम बनाती है और नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट कंपनी (NCGTC) द्वारा क्रियान्वित की जाती है।
- स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना (SISFS): 945 करोड़ रुपये का कोष जो प्रारंभिक चरण की आवश्यकताओं, जैसे– प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट, प्रोटोटाइपिंग और बाज़ार प्रवेश के लिये वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- स्टार्टअप इंडिया हब: एक सिंगल-विंडो डिजिटल प्लेटफॉर्म जो स्टार्टअप्स को निवेशकों, मेंटर्स, इन्क्यूबेटर्स, शैक्षणिक संस्थानों, कॉर्पोरेट्स और सरकारी निकायों से जोड़ता है, जिससे भारत के उद्यमशील पारिस्थितिक तंत्र में सहयोग सक्षम होता है।
- स्टेट स्टार्टअप रैंकिंग फ्रेमवर्क (SRF): राज्य और केंद्रशासित प्रदेश स्टार्टअप-अनुकूल नीतियों और कार्यान्वयन पर आकलन करते हैं, उन्हें बेस्ट परफॉर्मर्स, टॉप परफॉर्मर्स, लीडर्स, एस्पायरिंग लीडर्स और इमर्जिंग स्टार्टअप ईकोसिस्टम के रूप में वर्गीकृत करके प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को बढ़ावा देते हैं।
- मेंटरशिप एंड नेटवर्किंग: मेंटरशिप, एडवाइज़री, असिस्टेंस, रेजिलिएंस एंड ग्रोथ (मार्ग) पोर्टल और स्टार्टअप इंडिया इन्वेस्टर कनेक्ट पोर्टल जैसी पहलें संस्थापकों, मेंटर्स और निवेशकों के बीच की खाई को समाप्त करती हैं।
- प्रभाव एवं उपलब्धियाँ (दिसंबर 2025 तक): भारत में DPIIT-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या 2 लाख से अधिक है, जिससे भारत विश्व के सबसे बड़े स्टार्टअप ईकोसिस्टम्स में शामिल हो गया है।
- वर्ष 2025 में सरकार के साथ लगभग 44,000 स्टार्टअप्स पंजीकृत हुए, जो स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के बाद किसी एक वर्ष में सबसे अधिक वार्षिक वृद्धि है।
- हालाँकि बेंगलुरु, हैदराबाद, मुंबई और दिल्ली-NCR जैसे प्रमुख केंद्र अब भी अग्रणी बने हुए हैं, लेकिन लगभग 50% स्टार्टअप्स अब टियर-II और टियर-III शहरों से उभर रहे हैं, जो स्टार्टअप ईकोसिस्टम में बढ़ते विकेंद्रीकरण को दर्शाता है।
- इसके साथ ही, ईकोसिस्टम में यूनिकॉर्न्स (USD 1 बिलियन या उससे अधिक मूल्यांकन वाले स्टार्टअप्स) की संख्या में तीव्र वृद्धि देखी गई है, जो वर्ष 2014 में 4 से बढ़कर 120 से अधिक हो गई है, जिनका संयुक्त मूल्यांकन USD 350 बिलियन से अधिक है।
भारत के स्टार्टअप ईकोसिस्टम को सशक्त करने वाली अन्य योजनाएँ कौन-सी हैं?
- अटल इनोवेशन मिशन (AIM): नीति आयोग द्वारा कार्यान्वित यह मिशन अटल टिंकरिंग लैब्स, कम्युनिटी इनोवेटर फेलोशिप (CIF), इन्क्यूबेटर्स, यूथ Co:Lab कार्यक्रम तथा मिशन-आधारित नवाचार कार्यक्रमों के माध्यम से नवाचार की संस्कृति को बढ़ावा देता है।
- AIM 2.0 नवाचार के विस्तार (स्केलिंग) और ईकोसिस्टम की कमियों को दूर करने पर केंद्रित है। इसके अंतर्गत भाषा समावेशी नवाचार कार्यक्रम (LIPI) जैसी पहलें शामिल हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय/भारतीय भाषाओं में नवाचार को प्रोत्साहित करना है।
- AIM 2.0 के अंतर्गत डीप-टेक रिएक्टर शामिल है, जिसका उद्देश्य दीर्घ-अवधि वाले डीप-टेक नवाचारों के व्यवसायीकरण को समर्थन देना है। इसके साथ ही अटल सेक्टोरल इनोवेशन लॉन्चपैड्स (ASIL) कार्यक्रम भी शामिल है, जिसका लक्ष्य केंद्रीय मंत्रालयों में iDEX जैसे प्लेटफॉर्म स्थापित करना है, ताकि स्टार्टअप्स से प्राप्त समाधानों को एकीकृत किया जा सके और उनकी खरीद/प्रोक्योरमेंट सुनिश्चित की जा सके।
- जेनिसिस (Gen-Next Support for Innovative Startups- GENESIS): इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) द्वारा विकसित यह एक डीप-टेक स्टार्टअप प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य विशेष रूप से टियर-II और टियर-III शहरों में प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स के विस्तार (स्केलिंग) को समर्थन देना है।
- MeitY स्टार्टअप हब (MSH): यह एक राष्ट्रीय मंच के रूप में कार्य करता है, जो इन्क्यूबेटर्स, उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence), अकादमिक संस्थानों और उद्योग को आपस में जोड़कर प्रौद्योगिकी-आधारित स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन प्रदान करता है।
- TIDE 2.0 योजना: प्रौद्योगिकी संवर्द्धन और उद्यमियों का विकास (TIDE) 2.0 योजना MeitY की एक पहल है, जो सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) तथा उभरती प्रौद्योगिकियों पर आधारित स्टार्टअप्स को समर्थन प्रदान करती है। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), ब्लॉकचेन, रोबोटिक्स, क्लीन टेक और स्वास्थ्य क्षेत्र जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
- निधि (National Initiative for Developing and Harnessing Innovations- NIDHI): विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा प्रारंभ की गई यह पहल इन्क्यूबेटर्स और सीड सपोर्ट के माध्यम से नवाचारों और विचारों को स्केलेबल स्टार्टअप्स में परिवर्तित करने पर केंद्रित है।
- स्टार्टअप विलेज़ एंटरप्रेन्योरशिप प्रोग्राम (SVEP): यह DAY-NRLM के अंतर्गत कार्यान्वित कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता और आत्म-रोज़गार को ज़मीनी स्तर पर बढ़ावा देना है।
- ASPIRE योजना: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) की यह पहल ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में लाइवलीहुड बिज़नेस इन्क्यूबेटर्स के माध्यम से नवाचार, कौशल विकास और उद्यमिता को प्रोत्साहित करती है।
- प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (PMEGP): यह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के अंतर्गत खादी और ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा कार्यान्वित एक क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी आधारित प्रमुख योजना है, जिसका उद्देश्य सूक्ष्म उद्यमों की स्थापना और स्वरोज़गार को प्रोत्साहन देना है।
- एक केंद्रीय क्षेत्र योजना के रूप में यह सामान्य श्रेणी के लाभार्थियों को मार्जिन मनी सहायता के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में 25% और शहरी क्षेत्रों में 15% की सब्सिडी प्रदान करती है। वहीं, विशेष श्रेणियों के लिये यह सहायता ग्रामीण क्षेत्रों में 35% तथा शहरी क्षेत्रों में 25% तक उपलब्ध है।
भारत में स्टार्टअप्स के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- बुनियादी ढाँचा संबंधी बाधाएँ: उच्च परिचालन लागत और अपर्याप्त अवसंरचना, विशेष रूप से टियर-II, टियर-III और ग्रामीण क्षेत्रों में स्टार्टअप्स की स्केलेबिलिटी (विस्तार क्षमता) में बाधा उत्पन्न करती हैं।
- निम्नस्तरीय इंटरनेट कनेक्टिविटी, कमज़ोर लॉजिस्टिक्स और अविश्वसनीय विद्युत आपूर्ति लागत को काफी बढ़ा देती हैं तथा प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम कर देती हैं।
- डीप-टेक नवाचार की तुलना में उपभोक्ता-केंद्रित झुकाव: अधिकांश भारतीय स्टार्टअप्स फिनटेक और फूड डिलीवरी जैसी उपभोक्ता-उन्मुख सेवाओं पर केंद्रित हैं, जबकि ईवी (EV), सेमीकंडक्टर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे डीप-टेक क्षेत्र अपेक्षाकृत कम विकसित बने हुए हैं।
- यह उद्यमिता की कमी के बजाय संरचनात्मक आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाता है।
- विभाजित मांग संरचना: भारत के स्टार्टअप मॉडल देश की असमान मांग संरचना को प्रतिबिंबित करते हैं, जिसमें धनी वर्ग मुख्य रूप से पूंजी प्रदान करता है, मध्यम आय वर्ग मुख्य मूल्य-संवेदनशील उपभोक्ता आधार बनता है तथा गरीब वर्ग अधिकांशतः मुद्रीकृत नहीं हो पाता जबकि श्रम प्रदान करता है।
- इसके परिणामस्वरूप, स्टार्टअप्स बड़े पैमाने पर उपभोक्ता-उन्मुख मॉडल पर ध्यान केंद्रित करते हैं, न कि अत्याधुनिक नवाचार पर, जिससे उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में प्रगति सीमित रह जाती है।
- सीमित घरेलू वेंचर कैपिटल: जोखिम से बचने वाली नीतियाँ और निवेश पर्यावरण दीर्घकालिक, उच्च पूंजी वाले निवेशों को डीप-टेक क्षेत्रों में प्रोत्साहित नहीं करता, जिससे विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ती है और स्टार्टअप्स वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
- निवेश में धीमापन और स्टार्टअप बंद होना: फंडिंग की कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के कारण ईकोसिस्टम में गिरावट देखी गई है, विशेष रूप से महाराष्ट्र में 5,000 से अधिक स्टार्टअप्स बंद हो गए हैं।
- वर्ष 2024 में सीड फंडिंग में 25% और D2C फंडिंग में 18% की गिरावट दर्ज की गई।
- वेंचर कैपिटल अब ई-कॉमर्स जैसे कम जोखिम और त्वरित लाभ वाले क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं, जिसके कारण मैक्रोइकोनॉमिक तथा राजनीतिक अनिश्चितता के बीच नवाचार-प्रधान उद्यमों के लिये फंडिंग सीमित हो गई है।
- निम्न अनुसंधान एवं विकास तीव्रता: भारत का अनुसंधान एवं विकास (R&D) व्यय केवल लगभग 0.64% GDP के आसपास है, जिसमें व्यावहारिक और वाणिज्यिक रूप से उपयोगी नवाचार की तुलना में बुनियादी अनुसंधान पर अधिक ज़ोर दिया जाता है, जिससे डीप-टेक (गहन तकनीकी) विकास पर प्रतिबंध लगता है।
- एक्ज़िट और IPO संबंधी चुनौतियाँ: कमज़ोर प्रदर्शन वाले स्टार्टअप IPOs, उच्च मूल्यांकन और लाभप्रदता को लेकर चिंताओं के कारण एक्ज़िट विकल्प सीमित हो गए हैं, जिससे निवेशकों की सतर्कता बढ़ी है और पूंजी प्रवाह कम हो गया है।
भारत के स्टार्टअप ईकोसिस्टम को सुदृढ़ बनाने हेतु क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
- घरेलू स्तर पर पूंजीगत जोखिमों को न्यून करना: पेंशन फंड, बीमा कंपनियाँ और स्वैरेन फंड्स को विशेष रूप से डीप-टेक और लंबी अवधि वाले क्षेत्रों में स्टार्टअप्स में निवेश करने की अनुमति दी जाए।
- उद्योग–शैक्षणिक जुड़ाव को मज़बूत करना: स्टार्टअप्स और संस्थानों के बीच संरचित सहयोग को बढ़ावा देना, जैसे– भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO), भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), ताकि व्यावहारिक अनुसंधान और वाणिज्यीकरण को प्रोत्साहन मिले।
- स्किल इंडिया और अटल टिंकरिंग लैब्स को AI, डेटा एनालिटिक्स और डीप-टेक में उन्नत कौशल के साथ संरेखित करना, साथ ही प्रतिभा पलायन (Brain Drain) को रोकना।
- व्यावहारिक R&D और मिशन-आधारित फंडिंग को बढ़ावा देना: इंडियाAI मिशन, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और नेशनल क्वांटम मिशन जैसी पहलों के तहत परिणाम-आधारित अनुदान प्रदान करके उच्च-जोखिम वाले नवाचारों के लिये सहयोगी तंत्र का निर्माण करना।
- डीप-टेक स्केल-अप को सहयोग प्रदान करना: AI, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs), रोबोटिक्स, अंतरिक्ष और क्लीन एनर्जी स्टार्टअप्स के लिये दीर्घकालिक निवेश (Patient Capital) और परीक्षण अवसंरचना का निर्माण करना।
- मेट्रो शहरों से परे अवसंरचना में सुधार: टियर-II, टियर-III और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक्स और विद्युत आपूर्ति को मज़बूत करना ताकि स्टार्टअप्स की लागत कम की जा सके।
- नियामकों को सरल बनाना: पूर्वानुमेय कर नीतियाँ, तेज़ IPR प्रक्रिया एवं IPO, अधिग्रहण और सेकेंडरी मार्केट्स के माध्यम से मज़बूत एक्ज़िट तंत्र सुनिश्चित करना।
- हरित और सतत नवाचार को बढ़ावा देना: इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, क्लीन एनर्जी और जलवायु प्रौद्योगिकियों में स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना, जो Mission LiFE के उद्देश्यों के अनुरूप हों।
निष्कर्ष
स्टार्टअप इंडिया के एक दशक बाद स्टार्टअप ईकोसिस्टम तीव्र वृद्धि से सतत स्केलिंग की ओर बढ़ रहा है। जनसांख्यिकीय लाभांश, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एवं निरंतर सुधारों पर आधारित यह ईकोसिस्टम नवाचार, रोज़गार तथा वैश्विक एकीकरण को बढ़ावा दे रहा है और वर्ष 2030 तक $7.3 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था व वर्ष 2047 तक विकसित भारत की दिशा में भारत की यात्रा में केंद्रीय भूमिका निभाएगा।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. तीव्र वृद्धि के बावजूद भारत का स्टार्टअप ईकोसिस्टम संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये और इन्हें दूर करने के उपाय सुझाएँ। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. स्टार्टअप इंडिया पहल क्या है?
यह वर्ष 2016 में लॉन्च किया गया एक प्रमुख कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य उद्यमिता, नवाचार और रोजगार सृजन को बढ़ावा देना है और इसे DPIIT द्वारा कार्यान्वित किया जाता है।
2. स्टार्टअप इंडिया के तहत प्रमुख फंडिंग समर्थन योजनाएँ कौन-सी हैं?
प्रमुख योजनाओं में शामिल हैं: फंड ऑफ फंड्स फॉर स्टार्टअप्स (₹10,000 करोड़), स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम (₹945 करोड़) और क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर स्टार्टअप्स।
3. राज्यों के स्टार्टअप रैंकिंग फ्रेमवर्क का क्या महत्त्व है?
यह स्टार्टअप-फ्रेंडली नीतियों और उनके कार्यान्वयन के आधार पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को रैंकिंग देकर प्रतिस्पर्द्धात्मक संघवाद को बढ़ावा देता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. 'स्टैंड अप इंडिया स्कीम' के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)
- इसका प्रयोजन SC/ST एवं महिला उद्यमियों में उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है।
- यह SIDBI के माध्यम से पुनर्वित्त का प्रावधान करता है।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
प्रश्न. जोखिम पूंजी से क्या तात्पर्य है? (2014)
(a) उद्योगों को उपलब्ध कराई गई अल्पकालिक पूंजी
(b) नए उद्यमियों को उपलब्ध कराई गई दीर्घकालिक प्रारंभिक पूंजी
(c) उद्योग को हानि उठाते समय उपलब्ध कराई गई निधियाँ
(d) उद्योगों के प्रतिस्थापन और नवीकरण के लिये उपलब्ध कराई गई निधियाँ
उत्तर: (b)

शासन व्यवस्था
WEF वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026
प्रिलिम्स के लिये: विश्व आर्थिक मंच, साइबर सुरक्षा, संरक्षणवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ट्रोजन, गिनी सूचकांक
मेन्स के लिये: उभरते वैश्विक जोखिम और भारत पर उनके प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और सुशासन की चुनौती के रूप में साइबर सुरक्षा, भू-आर्थिक विखंडन और भारत की आर्थिक प्रत्यास्थता, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिये जोखिम गुणक के रूप में असमानता
चर्चा में क्यों?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट,, 2026 के अनुसार, साइबर सुरक्षा को वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम बताया गया है, जबकि भू-आर्थिक टकराव वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर जोखिम के रूप में उभरा है, जिसने सशस्त्र संघर्ष और जलवायु संबंधी खतरों को पीछे छोड़ दिया है।
सारांश
- वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, साइबर सुरक्षा को भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम और भू-आर्थिक टकराव को वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर खतरा बताया गया है। साथ ही बढ़ती असमानता, कमज़ोर सार्वजनिक सेवाएँ तथा रणनीतिक अस्थिरता भारत के शासन एवं अर्थव्यवस्था पर बाहरी प्रभाव को और अधिक बढ़ा देती हैं।
- इन जोखिमों से निपटने के लिये मज़बूत डिजिटल और आर्थिक प्रत्यास्थता विकसित करना, असमानता को एक व्यापक (मैक्रो) जोखिम के रूप में देखना, बहुआयामी खतरे (हाइब्रिड थ्रेट) तथा दुष्प्रचार का मुकाबला करना एवं जलवायु प्रत्यास्थता को भारत की दीर्घकालिक विकास व सुरक्षा रणनीति में समाहित करना आवश्यक है।
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- वैश्विक जोखिम आउटलुक
- निकट अवधि (2026 तक) में भू-आर्थिक टकराव सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बनकर उभरा है, जिसने सशस्त्र संघर्ष और अत्यधिक मौसम घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए वैश्विक संकट के सबसे संभावित कारण के रूप में स्थान ले लिया है।
- भू-आर्थिक टकराव (Geoeconomic Confrontation) से तात्पर्य है कि देश व्यापार प्रतिबंधों, प्रतिबंधात्मक प्रतिबंधों (सैंक्शंस), निवेश नियंत्रणों और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों जैसे आर्थिक साधनों का रणनीतिक उपयोग करके भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाते हैं और प्रतिद्वंद्वियों को सीमित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बहुपक्षवाद कमज़ोर होता है तथा संरक्षणवाद बढ़ता है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष वैश्विक स्तर पर दूसरे सबसे बड़े जोखिम के रूप में सामने आया है, जो वर्तमान युद्धों और उनके क्षेत्रीय विस्तार (स्पिलओवर) की आशंकाओं को प्रतिबिंबित करता है।
- जलवायु संबंधी जोखिम, जैसे– मौसम की चरम घटनाएँ, अगले क्रम में आते हैं, साथ ही सामाजिक ध्रुवीकरण (Societal Polarisation) भी महत्त्वपूर्ण जोखिम के रूप में माना गया है।
- वैश्विक स्तर पर तकनीकी जोखिमों में वृद्धि देखी जा रही है, जिसमें भ्रामक सूचना और दुष्प्रचार दुनिया भर में पाँचवें स्थान पर हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक विश्वास पर बढ़ते खतरे को दर्शाता है।
- साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीकों के नकारात्मक प्रभाव अब वैश्विक शीर्ष 10 जोखिमों में शामिल हो गए हैं, जो रोज़गार में कमी, नैतिक दुरुपयोग और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों की बढ़ती चिंताओं को दर्शाते हैं।
- साइबर असुरक्षा (Cyber Insecurity) वैश्विक स्तर पर 9वें स्थान पर है, जो यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएँ और शासन प्रणाली अधिक डिजिटल होती जा रही हैं, उनकी डिजिटल संवेदनशीलता भी बढ़ रही है।
- दीर्घकालिक दृष्टि से (अगले दस वर्षों में) जलवायु संबंधी जोखिम प्रमुख बने रहेंगे, जिनमें अत्यधिक मौसम घटनाएँ, जैव विविधता की हानि और मृदा तंत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन शीर्ष पर हैं।
भारत जोखिम आउटलुक
- साइबर सुरक्षा वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम है, जो डिजिटल शासन, फिनटेक और महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना पर निर्भरता को दर्शाता है।
- आय और संपत्ति असमानता भारत के लिये दूसरे सबसे बड़े जोखिम के रूप में है, जो सामाजिक तथा क्षेत्रीय असमानताओं को उजागर करती है।
- भारत के लिये अन्य मुख्य जोखिमों में शामिल हैं:
- अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा: इसमें शिक्षा, बुनियादी ढाँचा और पेंशन जैसी चिंताएँ शामिल हैं।
- आर्थिक मंदी: इसमें मंदी या आर्थिक ठहराव (Recession/Stagnation) का डर शामिल है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष: इसमें प्रॉक्सी युद्ध, गृहयुद्ध, तख्तापलट या आतंकवाद जैसी घटनाएँ शामिल हैं।
- भारत की जोखिम प्रोफाइल में वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों की तुलना में सामाजिक और शासन संबंधी जोखिमों पर अधिक ध्यान दिखाई देता है।
- रिपोर्ट के निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत में मज़बूत डिजिटल सुरक्षा, समावेशी विकास और प्रत्यास्थ सार्वजनिक सेवाओं को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
विश्व आर्थिक मंच (WEF)
- विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum- WEF) एक अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक-निजी सहयोग संस्था है, जिसका मुख्यालय जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1971 में जर्मन प्रोफेसर क्लॉस श्वाब द्वारा की गई थी। यह स्टेकहोल्डर कैपिटलिज़्म को प्रोत्साहित करता है तथा आर्थिक, सामाजिक और शासन से जुड़े मुद्दों पर वैश्विक संवाद के लिये एक मंच प्रदान करता है, विशेष रूप से अपनी वार्षिक दावोस बैठक के माध्यम से।
- विश्व आर्थिक मंच (WEF) नियमित रूप से विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त रिपोर्टें प्रकाशित करता है, जिनमें वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता रिपोर्ट, वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, ऊर्जा संक्रमण सूचकांक तथा ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट शामिल हैं।
वैश्विक जोखिम
- इसे किसी ऐसी घटना या स्थिति के घटित होने की संभावना के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो यदि घटित होती है तो वैश्विक GDP, जनसंख्या या प्राकृतिक संसाधनों के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
उभरते वैश्विक जोखिम परिदृश्य में भारत के समक्ष प्रमुख जोखिम कौन-से हैं?
- प्रणालीगत राष्ट्रीय संवेदनशीलता के रूप में साइबर सुरक्षा जोखिम: डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में 369.01 मिलियन मैलवेयर डिटेक्शन दर्ज किये गए, जो साइबर जोखिमों के प्रति देश की निरंतर संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं।
- ट्रोजन (43.38%) और इन्फेक्टर्स (34.23%) हमलों में प्रमुख हैं, जो लक्षित और अधिक परिष्कृत अभियानों की ओर परिवर्तनों को दर्शाते हैं। साथ ही, मोबाइल जोखिमों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है, जहाँ मैलवेयर (42%) और एडवेयर (26%) का वर्चस्व है, जो साइबर अपराध के बढ़ते व्यवसायीकरण को प्रतिबिंबित करता है।
- भारत में डिजिटल उन्नति और साइबर जोखिम: भारत में शासन (DBT, आधार-लिंक्ड सेवाएँ), वित्त (UPI, फिनटेक) और महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में तीव्र डिजिटल प्रगति ने साइबर सुदृढ़ता की क्षमता से आगे बढ़कर देश को बढ़ते साइबर खतरों के प्रति संवेदनशील बना दिया है।
- साइबर खतरे अब प्रणालीगत जोखिमों में परिवर्तित हो गए हैं, जो चुनावों, वित्तीय प्रणालियों, विद्युत ग्रिड एवं सार्वजनिक विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं और केवल अलग-थलग आईटी विफलताओं से कहीं आगे हैं।
- डेटा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती एकाग्रता एकल-बिंदु संवेदनशीलताओं को जन्म देती है, जिससे साइबर असुरक्षा केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रहकर एक रणनीतिक राष्ट्रीय जोखिम बन जाती है।
- जोखिम बढ़ाने वाले कारक के रूप में आय और संपत्ति असमानता: हालाँकि विश्व बैंक के अनुसार भारत का गिनी सूचकांक लगभग 25.5 (2022-23) है, जो भारत को अपेक्षाकृत कम मापी गई आय असमानता वाले देशों में शामिल करता है।
- ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2022 में भारत के शीर्ष 1% लोगों ने राष्ट्रीय आय का 22.6% हिस्सा अपने पास रखा, जो दृढ़ और बढ़ती असमानताओं को दर्शाता है, जो केवल उपभोग आधारित गिनी सूचकांक में पूरी तरह परिलक्षित नहीं होतीं।
- भारत में बढ़ती असमानता अनौपचारिक और हाशिये पर रहने वाले श्रमिकों के लिये आर्थिक आघातों को और तीव्र कर देती है, जिससे सामाजिक अशांति, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत अविश्वास के जोखिम बढ़ते हैं। साथ ही, यह सामाजिक अनुबंध को प्रभावित करती है और संकट के समय जनता का सहयोग जुटाने में राज्य की क्षमता को कम करती है।
- अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा क्षमता: यह भारत के लिये एक प्रमुख संवेदनशीलता बनी हुई है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का केवल 1.9% है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के तहत वर्ष 2025 के लिये निर्धारित 2.5% के लक्ष्य से काफी कम है।
- भारत सामाजिक सुरक्षा (स्वास्थ्य को छोड़कर) पर GDP का लगभग 5% व्यय करता है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 13% है (विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट, 2024-26, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन)।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी बुनियादी ढाँचा और सामाजिक सुरक्षा में क्षमता की कमी के साथ मिलकर यह आघात सहन क्षमता को कमज़ोर करती है और चरम जलवायु घटनाएँ, आर्थिक अस्थिरता तथा बाह्य व्यवधानों को घरेलू शासन संबंधी चुनौतियों में बदल देती है।
- भू-अर्थव्यवस्थागत आघात (Geoeconomic Shocks): भारत का वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाज़ार और पूंजी प्रवाह के साथ गहरा एकीकरण इसे भू-अर्थव्यवस्थागत आघातों के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसका उदाहरण वर्ष 2025 में USD 18.9 बिलियन का रिकॉर्ड विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) बहिर्वाह है, जो वैश्विक व्यापार तनाव, मुद्रा अस्थिरता, अमेरिकी टैरिफ से संबंधित आशंकाएँ एवं उच्च बाज़ार मूल्यांकन के कारण उत्पन्न हुआ, जिससे इक्विटी और रुपये में अस्थिरता बढ़ गई।
- मुख्य वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में मंदी जल्दी ही भारत पर कमज़ोर निर्यात, निवेश असुरक्षा, रोज़गार में कमी और कल्याण तथा सब्सिडी पर बढ़ते राजकोषीय दबाव के माध्यम से फैल जाती है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष और रणनीतिक अस्थिरता: क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों ने भारत के सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा दिया है, जिसका प्रमाण वर्ष 2025 में पहलगाम हमला, दिल्ली के लाल किले के पास विस्फोट और पाकिस्तान समर्थित समूहों द्वारा जारी सीमा-पार आतंकवाद से मिलता है।
- साथ ही, शहरी आतंकवाद में वृद्धि, लोन-वुल्फ और व्हाइट-कॉलर आतंकवाद तथा लगातार चल रही आंतरिक विद्रोह की गतिविधियाँ सीमा सुरक्षा, रक्षा व्यय और निवेशक विश्वास पर दबाव डालती हैं।
- दीर्घकालिक अस्थिरता राज्य की विकास क्षमता को प्रभावित करती है और इसे साइबर युद्ध, गलत सूचना और आर्थिक दबाव जैसे हाइब्रिड थ्रेट के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।
भारत की उभरती वैश्विक जोखिमों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिये क्या कदम उठाए जाने की आवश्यकता है?
- आर्थिक आघात-सहिष्णुता मज़बूत करना: आपूर्ति शृंखला एवं पूंजी प्रवाह की संवेदनशीलता को कम करने के लिये ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ाकर आर्थिक लचीलापन मज़बूत करना।
- मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के माध्यम से व्यापार में विविधता लाना और IMF की सिफारिशों के अनुरूप विदेशी मुद्रा भंडार और प्रति-चक्रीय राजकोषीय नीति के माध्यम से मज़बूत बफर बनाए रखना।
- असमानता को एक स्थूल जोखिम के रूप में देखना: PM-JDY और आयुष्मान भारत का उपयोग करके औपचारिकीकरण और आय सुरक्षा के माध्यम से असमानता को दूर करना, क्योंकि उच्च असमानता के कारण महामारी और मुद्रास्फीति के दौरान अनौपचारिक श्रमिकों के बीच संकट में वृद्धि हुई है।
- हायब्रिड थ्रेट्स के विरुद्ध क्षमता निर्माण करना: भारत को आतंकवाद, साइबर हमलों, गलत सूचना और आर्थिक दबाव से मिलने वाले हायब्रिड थ्रेट्स का सामना करने के लिये संपूर्ण-सरकार और संपूर्ण-समाज के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिये।
- हाइब्रिड थ्रेट्स से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिये वास्तविक समय में खुफिया जानकारी का एकीकरण आवश्यक है, जिसे एक वैधानिक मल्टी एजेंसी सेंटर के माध्यम से किया जा सकता है; इसके साथ ही PMLA, 2002 के तहत साइबर और वित्तीय निगरानी को सशक्त बनाना और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत एकीकृत सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ सुनिश्चित करना विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण है।
- सत्यापित सूचनाओं का अनुरक्षण: भारत निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाए गए 'FACT सिद्धांत' की रणनीति, सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021, फैक्ट चेक मैकेनिज़्म और PM-DISHA जैसी डिजिटल साक्षरता पहलों के माध्यम से गलत सूचनाओं का सामना करना, जो OECD और EU के दृष्टिकोणों के अनुरूप हैं, जहाँ सूचना की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला माना जाता है।
- हाइब्रिड थ्रेट्स के साइबर और मनोवैज्ञानिक आयामों से निपटने के लिये गलत सूचना और सूचना युद्ध से बचना और उनका सामना करने की क्षमता को मज़बूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
- विकास में जलवायु लचीलापन को अंतर्निहित करना: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, मिशन लाइफ, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, गति शक्ति के तहत जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचा और स्मार्ट सिटीज के माध्यम से शहरी सुधारों द्वारा अनुकूलन को मुख्यधारा में लाना, जो दीर्घकालिक राजकोषीय और संघर्ष संबंधी जोखिमों को कम करने के साथ सुसंगत हो।
निष्कर्ष
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 स्पष्ट करती है कि भारत की सुभेद्यता साइबर असुरक्षा, असमानता, भू-आर्थिक टकरावों और सुरक्षा खतरों समाहित करती है। अतः बाह्य व्यवधानों को प्रबंधित करने हेतु सुदृढ़ अनुकूलित तंत्रों और सुशासन क्षमता अपरिहार्य है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. आतंकवाद, साइबर हमलों और गलत सूचना को एक साथ मिलाने वाले हाइब्रिड थ्रेट्स से निपटने के लिये भारत की तैयारी का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
डिजिटल गवर्नेंस, फिनटेक और महत्त्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर भारत की अधिक निर्भरता के कारण साइबर सुरक्षा को भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम माना गया है।
2. भू-आर्थिक मतभेद को सबसे गंभीर वैश्विक जोखिम क्यों माना जाता है?
बढ़ते संरक्षणवाद, व्यापार विखंडन और पूंजी प्रवाह की अस्थिरता वैश्विक आर्थिक आघातों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर इसके दुष्प्रभावों के जोखिम को बढ़ाती है।
3. असमानता किस प्रकार वैश्विक आघातों के प्रति भारत की संवेदनशीलता को बढ़ाती है?
उच्च आय संकेंद्रण सामाजिक सामंजस्य को कमज़ोर करता है, अनौपचारिक श्रमिकों के बीच संकट को बढ़ाता है और संकट के दौरान सार्वजनिक विश्वास को कम करता है।
4. साइबर थ्रेट्स को प्रणालीगत जोखिम क्यों कहा जाता है?
साइबर हमले चुनावों, वित्तीय प्रणालियों, विद्युत् व्यवस्थाओं और लोक विश्वास को बाधित कर सकते हैं, जिससे शासन और अर्थव्यवस्था में एकल-बिंदु विफलताएँ उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है।
5. भारत के वैश्विक जोखिम को कम करने के लिये कौन-से उपाय महत्त्वपूर्ण हैं?
डिजिटल सुरक्षा को मज़बूत करना, असमानता को कम करना, आर्थिक लचीलापन बढ़ाना, हाइब्रिड थ्रेट्स का सामना करना और विकास में जलवायु लचीलेपन को शामिल करना प्रमुख उपाय हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. वैश्विक प्रतियोगित्व रिपोर्ट (ग्लोबल कम्पिटिटिवनेस रिपोर्ट) कौन प्रकाशित करता है? (2019)
(a) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(b) संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फरेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट)
(c) विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम)
(d) विश्व बैंक
उत्तर: (c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन, विश्व के देशों के लिये 'सार्वभौम लैंगिक अंतराल सूचकांक' (ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स) का श्रेणीकरण प्रदान करता है ? (2017)
(a) विश्व आर्थिक मंच
(b) UN मानव अधिकार परिषद
(c) UN वूमन
(d) विश्व स्वास्थ्य संगठन
उत्तर: (a)

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