शासन व्यवस्था
WEF वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026
- 17 Jan 2026
- 111 min read
प्रिलिम्स के लिये: विश्व आर्थिक मंच, साइबर सुरक्षा, संरक्षणवाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ट्रोजन, गिनी सूचकांक
मेन्स के लिये: उभरते वैश्विक जोखिम और भारत पर उनके प्रभाव, राष्ट्रीय सुरक्षा और सुशासन की चुनौती के रूप में साइबर सुरक्षा, भू-आर्थिक विखंडन और भारत की आर्थिक प्रत्यास्थता, सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता के लिये जोखिम गुणक के रूप में असमानता
चर्चा में क्यों?
विश्व आर्थिक मंच (WEF) की वैश्विक जोखिम रिपोर्ट,, 2026 के अनुसार, साइबर सुरक्षा को वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम बताया गया है, जबकि भू-आर्थिक टकराव वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर जोखिम के रूप में उभरा है, जिसने सशस्त्र संघर्ष और जलवायु संबंधी खतरों को पीछे छोड़ दिया है।
सारांश
- वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, साइबर सुरक्षा को भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम और भू-आर्थिक टकराव को वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर खतरा बताया गया है। साथ ही बढ़ती असमानता, कमज़ोर सार्वजनिक सेवाएँ तथा रणनीतिक अस्थिरता भारत के शासन एवं अर्थव्यवस्था पर बाहरी प्रभाव को और अधिक बढ़ा देती हैं।
- इन जोखिमों से निपटने के लिये मज़बूत डिजिटल और आर्थिक प्रत्यास्थता विकसित करना, असमानता को एक व्यापक (मैक्रो) जोखिम के रूप में देखना, बहुआयामी खतरे (हाइब्रिड थ्रेट) तथा दुष्प्रचार का मुकाबला करना एवं जलवायु प्रत्यास्थता को भारत की दीर्घकालिक विकास व सुरक्षा रणनीति में समाहित करना आवश्यक है।
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- वैश्विक जोखिम आउटलुक
- निकट अवधि (2026 तक) में भू-आर्थिक टकराव सबसे बड़ा वैश्विक जोखिम बनकर उभरा है, जिसने सशस्त्र संघर्ष और अत्यधिक मौसम घटनाओं को पीछे छोड़ते हुए वैश्विक संकट के सबसे संभावित कारण के रूप में स्थान ले लिया है।
- भू-आर्थिक टकराव (Geoeconomic Confrontation) से तात्पर्य है कि देश व्यापार प्रतिबंधों, प्रतिबंधात्मक प्रतिबंधों (सैंक्शंस), निवेश नियंत्रणों और प्रौद्योगिकी प्रतिबंधों जैसे आर्थिक साधनों का रणनीतिक उपयोग करके भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाते हैं और प्रतिद्वंद्वियों को सीमित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बहुपक्षवाद कमज़ोर होता है तथा संरक्षणवाद बढ़ता है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष वैश्विक स्तर पर दूसरे सबसे बड़े जोखिम के रूप में सामने आया है, जो वर्तमान युद्धों और उनके क्षेत्रीय विस्तार (स्पिलओवर) की आशंकाओं को प्रतिबिंबित करता है।
- जलवायु संबंधी जोखिम, जैसे– मौसम की चरम घटनाएँ, अगले क्रम में आते हैं, साथ ही सामाजिक ध्रुवीकरण (Societal Polarisation) भी महत्त्वपूर्ण जोखिम के रूप में माना गया है।
- वैश्विक स्तर पर तकनीकी जोखिमों में वृद्धि देखी जा रही है, जिसमें भ्रामक सूचना और दुष्प्रचार दुनिया भर में पाँचवें स्थान पर हैं, जो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं तथा सामाजिक विश्वास पर बढ़ते खतरे को दर्शाता है।
- साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीकों के नकारात्मक प्रभाव अब वैश्विक शीर्ष 10 जोखिमों में शामिल हो गए हैं, जो रोज़गार में कमी, नैतिक दुरुपयोग और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों की बढ़ती चिंताओं को दर्शाते हैं।
- साइबर असुरक्षा (Cyber Insecurity) वैश्विक स्तर पर 9वें स्थान पर है, जो यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्थाएँ और शासन प्रणाली अधिक डिजिटल होती जा रही हैं, उनकी डिजिटल संवेदनशीलता भी बढ़ रही है।
- दीर्घकालिक दृष्टि से (अगले दस वर्षों में) जलवायु संबंधी जोखिम प्रमुख बने रहेंगे, जिनमें अत्यधिक मौसम घटनाएँ, जैव विविधता की हानि और मृदा तंत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन शीर्ष पर हैं।
भारत जोखिम आउटलुक
- साइबर सुरक्षा वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम है, जो डिजिटल शासन, फिनटेक और महत्त्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना पर निर्भरता को दर्शाता है।
- आय और संपत्ति असमानता भारत के लिये दूसरे सबसे बड़े जोखिम के रूप में है, जो सामाजिक तथा क्षेत्रीय असमानताओं को उजागर करती है।
- भारत के लिये अन्य मुख्य जोखिमों में शामिल हैं:
- अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा: इसमें शिक्षा, बुनियादी ढाँचा और पेंशन जैसी चिंताएँ शामिल हैं।
- आर्थिक मंदी: इसमें मंदी या आर्थिक ठहराव (Recession/Stagnation) का डर शामिल है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष: इसमें प्रॉक्सी युद्ध, गृहयुद्ध, तख्तापलट या आतंकवाद जैसी घटनाएँ शामिल हैं।
- भारत की जोखिम प्रोफाइल में वैश्विक भू-राजनीतिक जोखिमों की तुलना में सामाजिक और शासन संबंधी जोखिमों पर अधिक ध्यान दिखाई देता है।
- रिपोर्ट के निष्कर्ष इस बात को रेखांकित करते हैं कि भारत में मज़बूत डिजिटल सुरक्षा, समावेशी विकास और प्रत्यास्थ सार्वजनिक सेवाओं को सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
विश्व आर्थिक मंच (WEF)
- विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum- WEF) एक अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक-निजी सहयोग संस्था है, जिसका मुख्यालय जिनेवा (स्विट्ज़रलैंड) में स्थित है। इसकी स्थापना वर्ष 1971 में जर्मन प्रोफेसर क्लॉस श्वाब द्वारा की गई थी। यह स्टेकहोल्डर कैपिटलिज़्म को प्रोत्साहित करता है तथा आर्थिक, सामाजिक और शासन से जुड़े मुद्दों पर वैश्विक संवाद के लिये एक मंच प्रदान करता है, विशेष रूप से अपनी वार्षिक दावोस बैठक के माध्यम से।
- विश्व आर्थिक मंच (WEF) नियमित रूप से विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त रिपोर्टें प्रकाशित करता है, जिनमें वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता रिपोर्ट, वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, ऊर्जा संक्रमण सूचकांक तथा ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट शामिल हैं।
वैश्विक जोखिम
- इसे किसी ऐसी घटना या स्थिति के घटित होने की संभावना के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो यदि घटित होती है तो वैश्विक GDP, जनसंख्या या प्राकृतिक संसाधनों के एक महत्त्वपूर्ण हिस्से पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
उभरते वैश्विक जोखिम परिदृश्य में भारत के समक्ष प्रमुख जोखिम कौन-से हैं?
- प्रणालीगत राष्ट्रीय संवेदनशीलता के रूप में साइबर सुरक्षा जोखिम: डेटा सिक्योरिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के अनुसार, वर्ष 2025 में भारत में 369.01 मिलियन मैलवेयर डिटेक्शन दर्ज किये गए, जो साइबर जोखिमों के प्रति देश की निरंतर संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं।
- ट्रोजन (43.38%) और इन्फेक्टर्स (34.23%) हमलों में प्रमुख हैं, जो लक्षित और अधिक परिष्कृत अभियानों की ओर परिवर्तनों को दर्शाते हैं। साथ ही, मोबाइल जोखिमों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है, जहाँ मैलवेयर (42%) और एडवेयर (26%) का वर्चस्व है, जो साइबर अपराध के बढ़ते व्यवसायीकरण को प्रतिबिंबित करता है।
- भारत में डिजिटल उन्नति और साइबर जोखिम: भारत में शासन (DBT, आधार-लिंक्ड सेवाएँ), वित्त (UPI, फिनटेक) और महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे में तीव्र डिजिटल प्रगति ने साइबर सुदृढ़ता की क्षमता से आगे बढ़कर देश को बढ़ते साइबर खतरों के प्रति संवेदनशील बना दिया है।
- साइबर खतरे अब प्रणालीगत जोखिमों में परिवर्तित हो गए हैं, जो चुनावों, वित्तीय प्रणालियों, विद्युत ग्रिड एवं सार्वजनिक विश्वास को प्रभावित कर सकते हैं और केवल अलग-थलग आईटी विफलताओं से कहीं आगे हैं।
- डेटा और डिजिटल प्लेटफॉर्म की बढ़ती एकाग्रता एकल-बिंदु संवेदनशीलताओं को जन्म देती है, जिससे साइबर असुरक्षा केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रहकर एक रणनीतिक राष्ट्रीय जोखिम बन जाती है।
- जोखिम बढ़ाने वाले कारक के रूप में आय और संपत्ति असमानता: हालाँकि विश्व बैंक के अनुसार भारत का गिनी सूचकांक लगभग 25.5 (2022-23) है, जो भारत को अपेक्षाकृत कम मापी गई आय असमानता वाले देशों में शामिल करता है।
- ऑक्सफैम की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि वर्ष 2022 में भारत के शीर्ष 1% लोगों ने राष्ट्रीय आय का 22.6% हिस्सा अपने पास रखा, जो दृढ़ और बढ़ती असमानताओं को दर्शाता है, जो केवल उपभोग आधारित गिनी सूचकांक में पूरी तरह परिलक्षित नहीं होतीं।
- भारत में बढ़ती असमानता अनौपचारिक और हाशिये पर रहने वाले श्रमिकों के लिये आर्थिक आघातों को और तीव्र कर देती है, जिससे सामाजिक अशांति, राजनीतिक ध्रुवीकरण और संस्थागत अविश्वास के जोखिम बढ़ते हैं। साथ ही, यह सामाजिक अनुबंध को प्रभावित करती है और संकट के समय जनता का सहयोग जुटाने में राज्य की क्षमता को कम करती है।
- अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएँ और सामाजिक सुरक्षा क्षमता: यह भारत के लिये एक प्रमुख संवेदनशीलता बनी हुई है, क्योंकि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय GDP का केवल 1.9% है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के तहत वर्ष 2025 के लिये निर्धारित 2.5% के लक्ष्य से काफी कम है।
- भारत सामाजिक सुरक्षा (स्वास्थ्य को छोड़कर) पर GDP का लगभग 5% व्यय करता है, जबकि वैश्विक औसत लगभग 13% है (विश्व सामाजिक संरक्षण रिपोर्ट, 2024-26, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन)।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, शहरी बुनियादी ढाँचा और सामाजिक सुरक्षा में क्षमता की कमी के साथ मिलकर यह आघात सहन क्षमता को कमज़ोर करती है और चरम जलवायु घटनाएँ, आर्थिक अस्थिरता तथा बाह्य व्यवधानों को घरेलू शासन संबंधी चुनौतियों में बदल देती है।
- भू-अर्थव्यवस्थागत आघात (Geoeconomic Shocks): भारत का वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाज़ार और पूंजी प्रवाह के साथ गहरा एकीकरण इसे भू-अर्थव्यवस्थागत आघातों के प्रति संवेदनशील बनाता है। इसका उदाहरण वर्ष 2025 में USD 18.9 बिलियन का रिकॉर्ड विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) बहिर्वाह है, जो वैश्विक व्यापार तनाव, मुद्रा अस्थिरता, अमेरिकी टैरिफ से संबंधित आशंकाएँ एवं उच्च बाज़ार मूल्यांकन के कारण उत्पन्न हुआ, जिससे इक्विटी और रुपये में अस्थिरता बढ़ गई।
- मुख्य वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में मंदी जल्दी ही भारत पर कमज़ोर निर्यात, निवेश असुरक्षा, रोज़गार में कमी और कल्याण तथा सब्सिडी पर बढ़ते राजकोषीय दबाव के माध्यम से फैल जाती है।
- राज्य-आधारित सशस्त्र संघर्ष और रणनीतिक अस्थिरता: क्षेत्रीय भू-राजनीतिक तनावों ने भारत के सुरक्षा जोखिमों को बढ़ा दिया है, जिसका प्रमाण वर्ष 2025 में पहलगाम हमला, दिल्ली के लाल किले के पास विस्फोट और पाकिस्तान समर्थित समूहों द्वारा जारी सीमा-पार आतंकवाद से मिलता है।
- साथ ही, शहरी आतंकवाद में वृद्धि, लोन-वुल्फ और व्हाइट-कॉलर आतंकवाद तथा लगातार चल रही आंतरिक विद्रोह की गतिविधियाँ सीमा सुरक्षा, रक्षा व्यय और निवेशक विश्वास पर दबाव डालती हैं।
- दीर्घकालिक अस्थिरता राज्य की विकास क्षमता को प्रभावित करती है और इसे साइबर युद्ध, गलत सूचना और आर्थिक दबाव जैसे हाइब्रिड थ्रेट के प्रति अधिक संवेदनशील बना देती है।
भारत की उभरती वैश्विक जोखिमों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिये क्या कदम उठाए जाने की आवश्यकता है?
- आर्थिक आघात-सहिष्णुता मज़बूत करना: आपूर्ति शृंखला एवं पूंजी प्रवाह की संवेदनशीलता को कम करने के लिये ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के तहत घरेलू विनिर्माण को बढ़ाकर आर्थिक लचीलापन मज़बूत करना।
- मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) के माध्यम से व्यापार में विविधता लाना और IMF की सिफारिशों के अनुरूप विदेशी मुद्रा भंडार और प्रति-चक्रीय राजकोषीय नीति के माध्यम से मज़बूत बफर बनाए रखना।
- असमानता को एक स्थूल जोखिम के रूप में देखना: PM-JDY और आयुष्मान भारत का उपयोग करके औपचारिकीकरण और आय सुरक्षा के माध्यम से असमानता को दूर करना, क्योंकि उच्च असमानता के कारण महामारी और मुद्रास्फीति के दौरान अनौपचारिक श्रमिकों के बीच संकट में वृद्धि हुई है।
- हायब्रिड थ्रेट्स के विरुद्ध क्षमता निर्माण करना: भारत को आतंकवाद, साइबर हमलों, गलत सूचना और आर्थिक दबाव से मिलने वाले हायब्रिड थ्रेट्स का सामना करने के लिये संपूर्ण-सरकार और संपूर्ण-समाज के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिये।
- हाइब्रिड थ्रेट्स से निपटने की क्षमता बढ़ाने के लिये वास्तविक समय में खुफिया जानकारी का एकीकरण आवश्यक है, जिसे एक वैधानिक मल्टी एजेंसी सेंटर के माध्यम से किया जा सकता है; इसके साथ ही PMLA, 2002 के तहत साइबर और वित्तीय निगरानी को सशक्त बनाना और राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के तहत एकीकृत सुरक्षा प्रतिक्रियाएँ सुनिश्चित करना विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण है।
- सत्यापित सूचनाओं का अनुरक्षण: भारत निर्वाचन आयोग द्वारा अपनाए गए 'FACT सिद्धांत' की रणनीति, सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021, फैक्ट चेक मैकेनिज़्म और PM-DISHA जैसी डिजिटल साक्षरता पहलों के माध्यम से गलत सूचनाओं का सामना करना, जो OECD और EU के दृष्टिकोणों के अनुरूप हैं, जहाँ सूचना की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला माना जाता है।
- हाइब्रिड थ्रेट्स के साइबर और मनोवैज्ञानिक आयामों से निपटने के लिये गलत सूचना और सूचना युद्ध से बचना और उनका सामना करने की क्षमता को मज़बूत करना भी उतना ही आवश्यक है।
- विकास में जलवायु लचीलापन को अंतर्निहित करना: राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, मिशन लाइफ, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना, गति शक्ति के तहत जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचा और स्मार्ट सिटीज के माध्यम से शहरी सुधारों द्वारा अनुकूलन को मुख्यधारा में लाना, जो दीर्घकालिक राजकोषीय और संघर्ष संबंधी जोखिमों को कम करने के साथ सुसंगत हो।
निष्कर्ष
वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 स्पष्ट करती है कि भारत की सुभेद्यता साइबर असुरक्षा, असमानता, भू-आर्थिक टकरावों और सुरक्षा खतरों समाहित करती है। अतः बाह्य व्यवधानों को प्रबंधित करने हेतु सुदृढ़ अनुकूलित तंत्रों और सुशासन क्षमता अपरिहार्य है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. आतंकवाद, साइबर हमलों और गलत सूचना को एक साथ मिलाने वाले हाइब्रिड थ्रेट्स से निपटने के लिये भारत की तैयारी का मूल्यांकन कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वैश्विक जोखिम रिपोर्ट, 2026 के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
डिजिटल गवर्नेंस, फिनटेक और महत्त्वपूर्ण डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर भारत की अधिक निर्भरता के कारण साइबर सुरक्षा को भारत के लिये सबसे बड़ा जोखिम माना गया है।
2. भू-आर्थिक मतभेद को सबसे गंभीर वैश्विक जोखिम क्यों माना जाता है?
बढ़ते संरक्षणवाद, व्यापार विखंडन और पूंजी प्रवाह की अस्थिरता वैश्विक आर्थिक आघातों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर इसके दुष्प्रभावों के जोखिम को बढ़ाती है।
3. असमानता किस प्रकार वैश्विक आघातों के प्रति भारत की संवेदनशीलता को बढ़ाती है?
उच्च आय संकेंद्रण सामाजिक सामंजस्य को कमज़ोर करता है, अनौपचारिक श्रमिकों के बीच संकट को बढ़ाता है और संकट के दौरान सार्वजनिक विश्वास को कम करता है।
4. साइबर थ्रेट्स को प्रणालीगत जोखिम क्यों कहा जाता है?
साइबर हमले चुनावों, वित्तीय प्रणालियों, विद्युत् व्यवस्थाओं और लोक विश्वास को बाधित कर सकते हैं, जिससे शासन और अर्थव्यवस्था में एकल-बिंदु विफलताएँ उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है।
5. भारत के वैश्विक जोखिम को कम करने के लिये कौन-से उपाय महत्त्वपूर्ण हैं?
डिजिटल सुरक्षा को मज़बूत करना, असमानता को कम करना, आर्थिक लचीलापन बढ़ाना, हाइब्रिड थ्रेट्स का सामना करना और विकास में जलवायु लचीलेपन को शामिल करना प्रमुख उपाय हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. वैश्विक प्रतियोगित्व रिपोर्ट (ग्लोबल कम्पिटिटिवनेस रिपोर्ट) कौन प्रकाशित करता है? (2019)
(a) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(b) संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास सम्मेलन (यूनाइटेड नेशंस कॉन्फरेंस ऑन ट्रेड एंड डेवलपमेंट)
(c) विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम)
(d) विश्व बैंक
उत्तर: (c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन, विश्व के देशों के लिये 'सार्वभौम लैंगिक अंतराल सूचकांक' (ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स) का श्रेणीकरण प्रदान करता है ? (2017)
(a) विश्व आर्थिक मंच
(b) UN मानव अधिकार परिषद
(c) UN वूमन
(d) विश्व स्वास्थ्य संगठन
उत्तर: (a)
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