दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

डेली न्यूज़

भारतीय अर्थव्यवस्था

धान उत्पादन में संधारणीयता प्राप्त करना

स्रोत: बिज़नेस लाइन

चर्चा में क्यों? 

भारत ने 2025 में चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक बनने का गौरव प्राप्त किया है और अब यह वैश्विक धान निर्यात का 40% हिस्सा नियंत्रित करता है, जिसमें निर्यात 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक पहुँच गया है।

  • हालाँकि, यह चिंता भी उत्पन्न करता है कि धान एक जल-गहन फसल है और जल-संकट वाले क्षेत्रों में इसका निर्यात आभासी जल (Virtual Water) के निर्यात के रूप में माना जा सकता है।

सारांश

  • भारत विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक और निर्यातक बन गया है, जो वैश्विक निर्यात का 40% हिस्सा उपलब्ध कराता है। यद्यपि धान की कृषि कुल फसल क्षेत्र के 25% भूभाग पर की जाती है एवं यह अत्यधिक जल-गहन कृषि है।
  • भूजल क्षरण, उत्सर्जन, अवशेष दहन और जलवायु परिवर्तन धान-केंद्रित कृषि को असंधारणीय बनाते हैं।
  • सतत खाद्य सुरक्षा के लिये सब्सिडी सुधार, फसल विविधीकरण, DSR/SRI तकनीक और जलवायु-प्रतिरोधी जीनोम-संपादित फसलें अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

धान से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?

  • परिचय: धान (चावल) अधिकांश भारतीयों के लिये मुख्य आहार है, जिसमें लगभग 65% लोग इसे प्रतिदिन अपने भोजन में शामिल करते हैं और धान की कृषि कुल फसल क्षेत्र के 25% भूभाग पर की जाती है।
    • भारत विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक और निर्यातक है, इसके बाद चीन (दूसरा) और बांग्लादेश (तीसरा) हैं।
  • जलवायु एवं मृदा आवश्यकताएँ: धान एक खरीफ फसल है (जून-जुलाई में रोपी जाती है और सितंबर-अक्तूबर में काटी जाती है)।
    • इसके लिये अनुकूल तापमान (>25°C) आवश्यक है, जबकि आदर्श तापमान 30°C दिन/20°C रात है और अल्प समय के लिये 40°C तक सहन कर सकती है।
    • इसको उच्च आर्द्रता और 100 सेमी. से अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। भारत की प्रमुखतः उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु के कारण धान अधिकांश क्षेत्रों में उगाया जाता है, मुख्य रूप से सिंचाई के माध्यम से।
    • यह फसल 5.5-6.5 pH वाली मृदा में, जिसमें अच्छी जलधारण क्षमता और जलनिकासी हो, अच्छी तरह उगती है।
  • फसल की सघनता: दक्षिणी राज्यों और पश्चिम बंगाल में वार्षिक दो या तीन फसलें उगाई जा सकती हैं (जैसे– पश्चिम बंगाल में आउस, अमन और बोरो)।
    • वर्ष 2025-26 में धान उत्पादन में शीर्ष तीन राज्य हैं– उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल

  • धान की खेती की तकनीकें:
    • पारंपरिक प्रतिरोपण (Traditional Transplantation): बीज नर्सरी में बोए जाते हैं; 25-35 दिन बाद पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है। यह श्रम और जल-गहन विधि है, जिसमें लगभग 25-27 सिंचाइयाँ आवश्यक होती हैं, लेकिन इससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है। यह भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है।
    • धान का प्रत्यक्ष रोपण (Direct Seeding of Rice- DSR): पूर्व अंकुरित बीजों को मशीन के माध्यम से सीधे खेत में बोया जाता है, जिससे जल और श्रम की बचत होती है। यह विधि भारी/मध्यम बनावट वाली मिट्टियों (उच्च मृदायुक्त) में सबसे उपयुक्त है, जिनमें जल-धारण क्षमता अच्छी हो और पौधों के लिये उपलब्ध लोहा पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो।

सतत विकास से संबंधित सरकारी पहलें

  • जल-स्मार्ट कृषि प्रोत्साहन: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राज्य की कार्य- योजनाओं के तहत सरकार पंजाब-हरियाणा में प्रत्यक्ष बुवाई धान (DSR), सूक्ष्म-सिंचाई और जल-गहन धान से दूर फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है।
  • जलवायु-अनुकूल किस्में: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA) के तहत शुष्कता, लवणता और ताप-अनुकूल धान की किस्मों का विस्तार कर रही है।
  • कदन्न बनाम धान की नीति के संकेत: अंतर्राष्ट्रीय कदन्न वर्ष (2023) के अनुवर्ती प्रयासों के माध्यम से सरकार जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान से हटकर विविधीकरण को प्रोत्साहित कर रही है ताकि स्थिरता में सुधार हो।
  • फोर्टीफाइड (पोषकयुक्त) चावल विस्तार: एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी से निपटने के लिये NFSA और PM-POSHAN के तहत फोर्टीफाइड चावल के वितरण का देशव्यापी विस्तार किया गया है।
  • मीथेन उत्सर्जन की कमी पर ध्यान: भारत ने धान की खेती से मीथेन उत्सर्जन कम करने के लिये वैकल्पिक आर्द्र-शुष्क (AWD) पद्धति और बेहतर धान की खेती संबंधी प्रथाओं को जलवायु कार्ययोजना में शामिल करना शुरू कर दिया है।

भारत में धान की खेती से संबंधित प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?

  • जल-स्तर में तीव्र गिरावट: भारत में 1 किलोग्राम धान उत्पादन में 3,000–4,000 लीटर जल की खपत होती है, जो वैश्विक औसत की तुलना में 20–60% अधिक है। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में भूजल-स्तर लगभग 30 फीट से गिरकर 80–200 फीट तक पहुँच गया है, जहाँ अधिकांश जलाभृत (एक्वीफायर) अति-दोहित या गंभीर श्रेणी में आते हैं, क्योंकि वार्षिक पुनर्भरण की तुलना में 35–57% अधिक जल का निष्कर्षण किया जा रहा है।
    • भूजल-गहन धान की खेती पीढ़ीगत समानता (इंटर-जनरेशनल इक्विटी) का मुद्दा है, क्योंकि यह जलाभृत क्षय के माध्यम से पारिस्थितिक ऋण भावी पीढ़ियों पर डालती है।
  • पर्यावरणीय चिंताएँ: जल-भराव वाले धान के खेत अवायवीय (एनारोबिक) मृदा का निर्माण करने के साथ मीथेन गैस के एक प्रमुख स्रोत हैं, जो भारत के कृषि संबंधी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 10–20% का योगदान करते हैं। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से पार्टिकुलेट मैटर और कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है, जिससे वायु प्रदूषण और बढ़ जाता है।
  • स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: आर्सेनिक-संदूषित भूजल वाले क्षेत्रों में जल-भराव वाली धान की खेती के कारण अनाज में आर्सेनिक की उच्च मात्रा पाई जाती है, जिसका सेवन कैंसर जैसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है। साथ ही, कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से विषाक्तता बढ़ती है। अध्ययनों से बिहार के 11 हॉटस्पॉट ज़िलों में मुख्य खाद्य पदार्थों (चावल, गेहूँ और आलू) में आर्सेनिक की बढ़ी हुई मात्रा की पुष्टि हुई है।
  • आर्थिक चिंताएँ: किसानों को गहरे बोरवेल और पंप लगाने के लिये ऋण लेने को मजबूर होना पड़ता है, जिससे छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि यह लागत उनकी अल्प आय को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। पंजाब धान के लिये उर्वरक और विद्युत् सब्सिडी पर लगभग 39,000 रुपए प्रति हेक्टेयर खर्च करता है।
    • लंबे समय तक जल-भराव वाली धान की एकल फसल (मोनोकल्चर) से मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों (जैसे– ज़िंक और आयरन) का असंतुलन उत्पन्न हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ अधिक मात्रा में उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता बढ़ती जाती है।
  • जलवायवीय चिंताएँ: जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा से धान की उत्पादकता में 6–10% या अधिक की कमी आने का खतरा है, जिसमें उत्तर और पूर्वी भारत की वर्षा-आधारित प्रणालियाँ सबसे अधिक असुरक्षित हैं।
    • विश्व बैंक और नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित अध्ययनों से यह उजागर होता है कि उत्तर-पश्चिम भारत में धान की खेती एक ऊर्जा–जल–जलवायु संबंधी विषम चक्र को बढ़ावा देती है। यह सब्सिडीयुक्त विद्युत् भूजल के अत्यधिक दोहन को प्रोत्साहित करती है, पंपिंग से कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाती है और किसानों को अस्थिर कृषि प्रथाओं के बीच रोके रखती है।
  • वैश्विक खाद्य सुरक्षा के निहितार्थ: विश्व के 40% चावल निर्यात की आपूर्ति करने वाले देश के रूप में, जल संकट के कारण भारत के उत्पादन में किसी भी महत्त्वपूर्ण कमी का वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

भारत में सतत कृषि को बढ़ावा देने हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?

  • सब्सिडी ढाँचों में सुधार: इनपुट-आधारित सब्सिडी से प्रत्यक्ष आय और पारिस्थितिक सेवा भुगतान की ओर बदलाव करना, जो जल संरक्षण, मिट्टी में कार्बन बढ़ाना तथा फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करें। इसके अलावा कदन्न/श्री अन्न, दलहन एवं तिलहन जैसी विविध फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व मज़बूत सरकारी खरीद सुनिश्चित करना।
  • तकनीकी अपनाना और जल संरक्षण करना: चावल गहनता प्रणाली (SRI), ड्रिप/स्प्रिंकलर इरीगेशन जैसी जल-कुशल तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाएँ और जीनोम-संपादित फसलों (जैसे– सूखा-सहिष्णु कमला चावल) को तेज़ी लानी चाहिये। सटीक सिंचाई को डिजिटल सलाहकार सेवाओं (AI-आधारित मौसम तथा मिट्टी नमी सेंसर) के साथ मिलाकर, बिना पैदावार घटाए जल उपयोग को 30–40% तक कम किया जा सकता है।
  • नीति ढाँचों को मज़बूत करना: संवेदनशील क्षेत्रों में नए बोरवेल पर प्रतिबंध लागू करें और सहभागी भूमिगत जल प्रबंधन को बढ़ावा दें, साथ ही कृषक उत्पादक संगठन (FPOs) तथा सहकारी समितियों को सशक्त बनाकर सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से लागत कम करने में मदद करें। समुदाय-नेतृत्व वाले भूमिगत जल शासन (जिसमें जल बजट और फसल योजना शामिल हैं) केवल शीर्ष-स्तरीय नियमों की तुलना में अधिक प्रभावी है।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन: फसल विविधीकरण और कृषि वानिकी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दें ताकि चावल–गेहूँ की एक फसली प्रणाली टूटे और जलवायु लचीलापन बढ़े। इन-सिटु अवशेष प्रबंधन और एक्स-सिटु उपयोग का समर्थन करें, साथ ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड का प्रयोग करें, क्योंकि ये छोटे किसानों के लिये कम लागत, उच्च प्रभाव वाले अनुकूलन उपाय हैं।
  • किसानों की आय बढ़ाना और जोखिम कम करना: सतत तकनीक अपनाने के लिये ऋण की सुविधा प्रदान करें तथा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) को व्यापक रूप से लागू करें, साथ ही उत्तम मूल्य सुनिश्चित करने हेतु खाद्य प्रसंस्करण का समर्थन करें। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में शीत-शृंखला, गोदाम एवं कृषि प्रसंस्करण इकाइयाँ विकसित करें ताकि फसल कटाई के बाद नुकसान कम होगैर-कृषि रोज़गार सृजित हो सके।

निष्कर्ष

भारत का विश्व में अग्रणी धान उत्पादक के रूप में उभरना जल–ऊर्जा–जलवायु–स्वास्थ्य के आपसी संबंध की महत्त्वपूर्ण चुनौती को उजागर करता है, जिसमें संक्षिप्त अवधि की खाद्य सुरक्षा को दीर्घकालीन स्थिरता के साथ संतुलित करना आवश्यक है। इसे प्राप्त करने के लिये सब्सिडी सुधार, फसल विविधीकरण और जल-कुशल, जलवायु-अनुकूल कार्यप्रणाली को अपनाना आवश्यक है ताकि किसानों का कल्याण एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य सुरक्षित रहे।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. वैश्विक चावल उत्पादन में भारत के प्रभुत्व ने भूमिगत जल पर दबाव बढ़ा दिया है। कारणों का विश्लेषण कीजिये और धारणीय नीतिगत समाधानों का सुझाव दीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में धान की खेती चिंता का विषय क्यों है?
क्योंकि धान के 1 किलोग्राम उत्पादन के लिये 3,000–4,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे भूजल का अत्यधिक दोहन होता है और उसका स्तर तेज़ी से घटता है।

2. धान का प्रत्यक्ष बीजारोपण (DSR) क्या है?
यह एक जल और श्रम बचाने वाली तकनीक है, जिसमें बीजों को सीधे बोया जाता है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता और उत्सर्जन दोनों कम हो जाते हैं।

3. भारत का धान उत्पादन वैश्विक स्तर पर क्यों मायने रखता है?
भारत की वैश्विक धान निर्यात में 40% हिस्सेदारी होने के कारण, उत्पादन में होने वाला कोई भी व्यवधान विश्व भर में खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित में से किस/किन पद्धति/यों को पारितंत्र-अनुकूली कृषि माना जाता है?

  1. फसल विविधरूपण 
  2. शिंब आधिक्य (Legume intensification)
  3. टेंसियोमीटर का प्रयोग
  4. ऊर्ध्वाधर कृषि (Vertical farming)

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये :

(a) केवल 1, 2 और 3

(b) केवल 3

(c) केवल 4

(d) 1,2,3 और 4

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न. रिक्तीकरण परिदृश्य में विवेकी जल उपयोग के लिये जल भंडारण और सिंचाई प्रणाली में सुधार के उपायों को सुझाइये। (2020)

प्रश्न. जल-प्रतिबलित क्षेत्रों से कृषि उत्पादन में वृद्धि करने में राष्ट्रीय जल विभाजक परियोजना के प्रभाव को सविस्तार स्पष्ट कीजिये।  (2019)


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

वेनेज़ुएला में अमेरिकी दखल और पुनः प्रतिपादित मुनरो सिद्धांत

प्रिलिम्स के लिये: वेनेजुएला, मुनरो सिद्धांत, बहुपक्षवाद, संयुक्त राष्ट्र चार्टर

मेन्स के लिये: मुनरो सिद्धांत और 21वीं सदी में इसकी प्रासंगिकता, ग्लोबल साउथ पर बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का प्रभाव

स्रोत: इकॉनोमिक टाइम्स 

चर्चा में क्यों? 

संयुक्त राज्य अमेरिका ने वेनेजुएला में 'ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व' नामक एक सैन्य अभियान चलाया, जिसके परिणामस्वरूप राष्ट्रपति निकोलस मादुरो, उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को हिरासत में ले लिया गया। इस कार्रवाई को मुनरो सिद्धांत (1823) के ‘ट्रंप कोरोलरी’ के तहत उचित ठहराया गया, जो लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हस्तक्षेपवाद में एक तीव्र वृद्धि का संकेत है।

सारांश

  • वेनेज़ुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की हिरासत मुनरो सिद्धांत के पुनरुत्थान का संकेत देते हैं, जो पश्चिमी गोलार्द्ध में प्रतिद्वंद्वी शक्तियों का सामना करने और रणनीतिक हितों, विशेष रूप से ऊर्जा संसाधनों की सुरक्षा के लिये अमेरिकी हस्तक्षेपवाद की नवीन प्रवृत्ति को दर्शाता है।
  • भारत के लिये, न्यूनतम व्यापार और तेल आयात में कमी के कारण इस संघर्ष का आर्थिक प्रभाव सीमित है, लेकिन यह रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक संप्रभुता मानदंडों और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की स्थिरता पर चिंता व्यक्त करता है।

मुनरो सिद्धांत क्या है?

  • परिचय: मुनरो सिद्धांत, जिसे वर्ष 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो द्वारा स्पष्ट किया गया था, निम्नलिखित सिद्धांत स्थापित करता है:
    • औपनिवेशीकरण का विरोध: यूरोपीय शक्तियों को अमेरिकी महाद्वीपों में नवीन उपनिवेश स्थापित नहीं करने चाहिये।
    • हस्तक्षेप का विरोध: पश्चिमी गोलार्द्ध के देशों पर किसी भी बाहरी शक्ति द्वारा प्रभाव डालने या हस्तक्षेप करने के प्रयास को संयुक्त राज्य अमेरिका अपने प्रति शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के रूप में देखेगा।
    • यूरोप में अमेरिकी संयम: अमेरिका यूरोपीय युद्धों या आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • विकास:
    • रूज़वेल्ट कोरोलरी (1904): राष्ट्रपति थियोडोर रूज़वेल्ट ने मुनरो सिद्धांत का विस्तार करते हुए लैटिन अमेरिकी देशों में पुरानी गलतियों, अस्थिरता या शासन की विफलताओं को दूर करने के लिये ‘अंतर्राष्ट्रीय पुलिस शक्ति’ का प्रयोग करने के अमेरिकी अधिकार की पुष्टि की, जिससे प्रत्यक्ष अमेरिकी हस्तक्षेप को उचित ठहराया गया।
    • शीतयुद्ध काल: क्यूबा, मध्य अमेरिका और दक्षिण अमेरिका में सोवियत प्रभाव का सामना करने के लिये इसका आह्वान किया गया।
    • शीतयुद्धोत्तर काल: बहुपक्षवाद के रूप में इसे काफी हद तक कम महत्त्व दिया गया, जब तक कि हाल में इसका पुनरुत्थान नहीं हुआ।
    • समकालीन चरण: पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिका के रणनीतिक वर्चस्व को स्थापित करने के उद्देश्य से इस सिद्धांत को चयनात्मक रूप से पुनरुज्जी वित किया गया है, जैसा कि हाल के वर्षों में वेनेज़ुएला के प्रति अपनाई गई नीतियों और कार्रवाइयों में देखा जा सकता है।
      • मुनरो सिद्धांत के लिये ‘ट्रंप कोरोलरी’ को अमेरिकी शक्ति और रणनीतिक प्राथमिकताओं की पुनर्स्थापना के रूप में प्रक्षेपित किया गया है, जिसका उद्देश्य पश्चिमी गोलार्द्ध में अमेरिकी सुरक्षा हितों की रक्षा करना है।

अमेरिका ने वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप क्यों किया?

  • नार्को-आतंकवाद और सुरक्षा विमर्श: अमेरिका ने मादुरो तथा वरिष्ठ अधिकारियों पर नार्को-आतंकवाद एवं मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप लगाए हैं।अमेरिका ने इस शासन को अपने लिये प्रत्यक्ष सुरक्षा खतरा बताते हुए इसे देश में जारी 'फेंटानिल संकट' (Fentanyl Crisis) से जोड़ा है, जिससे उनके विरुद्ध किसी भी कार्रवाई के लिये एक कानूनी और राजनीतिक औचित्य प्राप्त हो सके।
  • तेल और संसाधन भू-राजनीति: वेनेज़ुएला के पास विश्व के सबसे बड़े प्रमाणित कच्चे तेल का भंडार हैं (300 अरब बैरल से अधिक, यानी वैश्विक प्रमाणित तेल भंडार का लगभग पाँचवा  हिस्सा), फिर भी यह वैश्विक तेल उत्पादन के 1% से भी कम का योगदान देता है।
    • अमेरिकी प्रतिबंधों, आर्थिक संकट और बुनियादी ढाँचे के क्षरण के वर्षों ने उत्पादन को गंभीर रूप से सीमित कर दिया है।
    • अमेरिका वेनेज़ुएला की  तेल अवसंरचना पर नियंत्रण को ऊर्जा सुरक्षा, मूल्य स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों में रणनीतिक प्रभाव के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानता है।
  • क्षेत्रीय बाहरी शक्तियों का मुकाबला: वेनेज़ुएला के चीन, रूस और ईरान के साथ बढ़ते संबंधों को अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्द्ध में अपनी प्रभुसत्ता के लिये चुनौती माना, जिससे वॉशिंगटन ने पुनरुज्जीवित मुनरो शैली के ढाँचे के तहत अपनी प्रधानता को दोबारा स्थापित करने का कदम उठाया।
    • हालाँकि अमेरिका–वेनेज़ुएला संघर्ष ने मेक्सिको, कोलंबिया और क्यूबा में गंभीर चिंता उत्पन्न कर दी है, जो इस क्षेत्र में अमेरिकी हस्तक्षेपवाद के नए दौर का संकेत देता है।
      • यह सैन्य दबाव, प्रतिबंधों और नशीली दवाओं व सुरक्षा के नाम पर दिये जाने वाले औचित्यों के माध्यम से संप्रभुता के ह्रास के डर को सामने लाता है।

अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत सैन्य बल का प्रयोग

  • सामान्य प्रतिबंध: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के तहत, राज्य किसी अन्य राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ सैन्य बल का प्रयोग या धमकी देने से वर्जित हैं।
  • आत्मरक्षा: संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के तहत, बल का प्रयोग केवल सशस्त्र हमले के जवाब में किया जा सकता है और यह आवश्यकता तथा अनुपात के अनुसार होना चाहिये। साथ ही की गई कार्रवाई से  UN सुरक्षा परिषद को सूचित करना  अनिवार्य है।
  • पूर्व शत्रु राज्य: संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 107 कभी द्वितीय विश्वयुद्ध के शत्रु राज्यों के खिलाफ बल प्रयोग की अनुमति देता था, लेकिन अब यह अप्रचलित है।
  • सामूहिक सुरक्षा: अनुच्छेद 24 और 25 के तहत, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अंतर्राष्ट्रीय शांति के खतरों से निपटने के लिये सामूहिक सैन्य कार्रवाई की अनुमति होती है।
  • मानवीय अभियान: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद शांति स्थापना या मानवीय मिशनों में सीमित बल के उपयोग की अनुमति दे सकती है।

अमेरिका-वेनेजुएला संघर्ष का भारत पर क्या असर होगा?

  • न्यूनतम व्यापार प्रभाव: ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के अनुसार, यह संघर्ष भारत के व्यापार को लगभग प्रभावित नहीं करेगा, क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण द्विपक्षीय वाणिज्य पहले ही बड़े पैमाने पर बंद हो चुका है
    • भारत के वेनेज़ुएला को निर्यात का मूल्य FY 2025 में केवल 95.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर था, जिसमें मुख्य रूप से दवा उद्योग का योगदान था।
  • ऊर्जा पर सीमित निर्भरता: भारत का वेनेज़ुएला से कच्चे तेल का आयात FY 2025 में 81.3% घटकर 255.3 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जबकि FY 2024 में यह 1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।
    • इसका परिणाम यह है कि वर्तमान संघर्ष संक्षिप्त अवधि में भारत की ऊर्जा सुरक्षा को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित नहीं करेगा
    • यदि वेनेज़ुएला पर प्रतिबंधों में छूट या संशोधन किया गया तो वहनीय वेनेज़ुएला कच्चा तेल वैश्विक बाज़ार में फिर से आ सकता है, जिससे भारत की दीर्घकालीन कच्चे तेल की आपूर्ति विविधता और खरीद में लचीलापन मज़बूत होगा।
    • इससे भारत की पश्चिम एशियाई आपूर्तिकर्त्ताओं के साथ सौदेबाज़ी  की क्षमता बढ़ेगी और रूसी तेल पर निर्भरता कम करने के लिये अमेरिकी दबाव के बीच एक विकल्प भी उपलब्ध होगा।
  • रणनीतिक स्वतंत्रता: भारत ने लगातार बाहरी सैन्य हस्तक्षेप के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से शासन परिवर्तन और गैर-हस्तक्षेप का समर्थन किया है।
    • अमेरिका की कार्रवाई भारत के लिये संतुलन बनाए रखने की चुनौती बन गई है, क्योंकि उसे हस्तक्षेप के खिलाफ ग्लोबल साउथ और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी के बीच संतुलन बनाए रखना है।

वेनेज़ुएला

  • स्थिति एवं सीमाएँ: वेनेज़ुएला दक्षिण अमेरिका के उत्तरी छोर पर स्थित एक देश है। इसकी तटरेखा कैरिबियन सागर तथा अटलांटिक महासागर से लगी हुई है। इसकी स्थल सीमाएँ पूर्व में गुयाना, दक्षिण में ब्राज़ील तथा दक्षिण-पश्चिम और पश्चिम में कोलंबिया से मिलती हैं।
  • राजनीतिक व्यवस्था एवं राजधानी: यह एक संघीय बहुदलीय गणराज्य है, जिसमें एक सदनीय विधायिका है। कराकास इसकी राजधानी है।
  • प्राकृतिक संसाधन एवं अर्थव्यवस्था: वेनेज़ुएला संसाधन-समृद्ध देश है, जहाँ पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, लौह अयस्क, सोना, बॉक्साइट और हीरे पाए जाते हैं। इसकी अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक रूप से तेल पर आधारित रही है।
    • अभी तक का प्रमाणित कच्चे तेल का सबसे बड़ा भंडार वेनेज़ुएला के पास है और यह OPEC का संस्थापक सदस्य भी है, जिससे यह वैश्विक ऊर्जा भू-राजनीति में रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण बन जाता है।
  • भौतिक भूगोल: वेनेज़ुएला में विविध स्थलरूप पाए जाते हैं, जिनमें एंडीज़ पर्वत, मराकाइबो झील, लानोस के मैदान, गुयाना हाइलैंड्स तथा ओरिनोको नदी तंत्र शामिल हैं, जो इसकी पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था को आकार देते हैं।
    • देश का सर्वोच्च शिखर पिको बोलिवार है और विश्व का सबसे ऊँचा जलप्रपात एंजेल फॉल्स गुयाना हाइलैंड्स में स्थित है।
    • इसकी प्रमुख नदियों में ओरिनोको और रियो नेग्रो शामिल हैं, जबकि मराकाइबो झील दक्षिण अमेरिका की सबसे बड़ी झील है।
  • सांस्कृतिक एवं पारिस्थितिक महत्त्व: वेनेज़ुएला में कैनाइमा राष्ट्रीय उद्यान और एंजेल फॉल्स जैसे यूनेस्को-मान्यता प्राप्त स्थल स्थित हैं, जो इसकी पारिस्थितिक और प्राकृतिक धरोहर को दर्शाते हैं।
  • द्वीप एवं क्षेत्रीय विवाद: यह मार्गरीटा और लॉस रोकेस जैसे कई कैरिबियन द्वीपों का प्रशासन करता है। इसके अतिरिक्त, एसेक्विबो क्षेत्र को लेकर गुयाना के साथ लंबे समय से क्षेत्रीय विवाद चला आ रहा है तथा कोलंबिया के साथ समुद्री विवाद भी मौजूद हैं।

निष्कर्ष

अमेरिका का हस्तक्षेप मुनरो सिद्धांत के एक साहसिक पुनरुत्थान को दर्शाता है, जिसके माध्यम से बाह्य प्रभावों का सामना करने और उभरती वैश्विक बहुध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती देने हेतु अमेरिकी प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने का प्रयास किया गया है। यद्यपि इसका उद्देश्य लोकतंत्र की बहाली बताया जाता है, फिर भी यह एकतरफा कार्रवाई लैटिन अमेरिका में अस्थिरता बढ़ा सकती है और ग्लोबल साउथ में संप्रभुता से संबंधित गंभीर समस्या उत्पन्न कर सकती है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: 21वीं सदी में मुनरो सिद्धांत का पुनरुत्थान उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिये एक चुनौती प्रस्तुत करता है। चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मुनरो सिद्धांत क्या है?
यह 1823 की अमेरिकी विदेश नीति का सिद्धांत है, जो पश्चिमी गोलार्द्ध में यूरोपीय उपनिवेशीकरण या  हस्तक्षेप का विरोध करता है और क्षेत्र में अमेरिकी सुरक्षा हितों को सुनिश्चित करता है।

2. मुनरो सिद्धांत में ‘ट्रंप कॉरोलेरी’ क्या है?
यह एक समकालीन व्याख्या है, जो लैटिन अमेरिका में प्रतिद्वंद्वी शक्तियों और प्रतिकूल शासन के विरुद्ध अमेरिकी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य प्रभुत्व को स्थापित करने की धारणा प्रस्तुत करती है।

3. अमेरिका ने वेनेज़ुएला में हस्तक्षेप क्यों किया?
अमेरिका ने नार्को-आतंकवाद के आरोप, ऊर्जा सुरक्षा संबंधी चिंताएँ और वेनेज़ुएला के चीन, रूस और ईरान से संबंधों को मुख्य औचित्य के रूप में प्रस्तुत किया।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये:  (2024)

कथन-I: हाल ही में, वेनेजुएला अपने आर्थिक संकट से तेज़ी से उबरने में सफल हुआ है और अपने लोगों को दूसरे देशों में पलायन/प्रवास करने से रोकने में सफल हुआ है।

कथन-II: वेनेजुएला के पास विश्व के सबसे बड़े तेल भंडार हैं।

उपर्युक्त कथनों के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन-सा सही है ?

(a) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं तथा कथन-II, कथन-I की व्याख्या करता है।

(b) कथन-I और कथन-II दोनों सही हैं, किंतु कथन-II, कथन-I की व्याख्या नहीं करता है।

(c) कथन-I सही है, किंतु कथन-II सही नहीं है।

(d) कथन-I सही नहीं है, किंतु कथन-II सही है।

उत्तर: D


close
Share Page
images-2
images-2