कृषि
भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि
- 02 Jan 2026
- 107 min read
प्रिलिम्स के लिये: बायोई3 नीति, कृषि वानिकी, जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार, सतत कृषि के लिये राष्ट्रीय मिशन
मेन्स के लिये: जलवायु अनुकूल कृषि, अनुकूलन रणनीति के रूप में जलवायु-सहिष्णु कृषि, कृषि सहनशीलता में जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल उपकरणों की भूमिका
चर्चा में क्यों?
भारत की भोजन सुरक्षा सुनिश्चित करने, किसानों की आजीविका सुरक्षित रखने और दीर्घकालीन स्थिरता प्राप्त करने के लिये जलवायु अनुकूल कृषि, (CRA) पर फिर से विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
- हाल ही के नीतिगत संकेतों, जैसे बायोई3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोज़गार के लिये जैवप्रौद्योगिकी), से यह स्पष्ट होता है कि देशभर में जलवायु-सहिष्णु कृषि (CRA) समाधान को बढ़ाने हेतु एक संगठित राष्ट्रीय रोडमैप की आवश्यकता है।
सारांश
- बढ़ते जलवायु जोखिम के बीच भारत में खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और पर्यावरण की स्थिरता को बनाए रखने के लिये जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) अत्यंत आवश्यक है, खासकर देश की खेती बारिश पर बहुत ज़्यादा निर्भर है और फसलों की पैदावार में नुकसान होने का अनुमान है।
- हालाँकि भारत के पास NICRA, NMSA, डिजिटल कृषि मिशन और BioE3 ढाँचे जैसी पहलों के माध्यम से मज़बूत जलवायु-सहिष्णु कृषि (CRA) आधार है, लेकिन इसे बढ़ाने के लिये एक संगठित राष्ट्रीय रोडमैप, वैश्विक सहयोग, डिजिटल समावेशन और मज़बूत मृदा–जल प्रबंधन की आवश्यकता है।
जलवायु-अनुकूल कृषि क्या है?
- परिचय: जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) एक ऐसी कृषि पद्धति है जो फसलों, मृदा और कृषि प्रणालियों की जलवायु परिवर्तनशीलता और अत्यधिक प्राकृतिक घटनाओं को सहन करने की क्षमता को मज़बूत करती है, साथ ही उत्पादन तथा पर्यावरणीय स्वास्थ्य को बनाए रखती है।
- उद्देश्य: भोजन सुरक्षा सुनिश्चित करना, कृषि आय को स्थिर करना, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करना और जलवायु परिवर्तन के प्रति कृषि की दीर्घकालीन सहनशीलता बनाना।
- जलवायु-अनुकूल कृषि की मुख्य रणनीतियाँ:
- जलवायु-अनुकूलित फसलें: ऐसी फसलें जो उच्च तापमान, उच्च लवणता (नमक) या लंबे सूखे में जीवित रहने के लिए विशेष रूप से विकसित की गई हैं (जैसे "स्कूबा राइस" जो हफ्तों तक पानी में जीवित रह सकती है), ताकि जलवायु-प्रेरित फसल नुकसान को कम किया जा सके।
- जल प्रबंधन (Water Stewardship): ड्रिप सिंचाई, वर्षा जल संचयन और सटीक सिंचाई को अपनाकर सूखे के समय में जल उपयोग को अधिकतम रूप से अनुकूलित करना।
- मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: कटाव को रोकने, नमी बनाए रखने और मृदा में कार्बन बढ़ाने के लिये बिना जुताई वाली खेती, कवर क्रॉपिंग और ऑर्गेनिक इनपुट जैसी प्रथाएँ।
- कृषि-वन प्रणाली: फसलों और पशुपालन के साथ वृक्षों का समन्वय करके छाया, हवा से सुरक्षा और बेहतर सूक्ष्मजलवायु प्रदान करना।
- फसल विविधीकरण: एक ही फसल की कृषि करने से हटकर कई फसलों की कृषि करना, जिससे जलवायु जोखिम फैले और किसान की आय स्थिर रहे।
- प्रारंभिक चेतावनी और डिजिटल उपकरण: मौसम पूर्वानुमान, AI-आधारित परामर्श और जलवायु चेतावनियों का उपयोग करके सही समय पर बुवाई, कटाई तथा जोखिम प्रबंधन में सहायता करना।
भारत को जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) की ओर क्यों बढ़ना चाहिये?
- कृषि की संवेदनशीलता: भारतीय कृषि अनियमित मानसून, सूखा, बाढ़, तापमान संबंधी तनाव और घटती मृदा तथा जल स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता दिखा रही है, जिससे परंपरागत कृषि पद्धतियाँ बदलते जलवायु हालात में कम भरोसेमंद हो गई हैं।
- वर्षा पर निर्भर कृषि पर निर्भरता: भारत के कुल बोए गए भूमि का लगभग 51% हिस्सा वर्षा पर निर्भर है और देश के लगभग 40% खाने का उत्पादन करता है, जिससे खेती की पैदावार का एक बड़ा हिस्सा जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे सहनशील कृषि प्रणालियों की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
- खाद्य सुरक्षा के लिये खतरा: जलवायु पूर्वानुमान संकेत देते हैं कि यदि अनुकूलन उपाय नहीं अपनाए गए तो भारत में वर्षा-आश्रित धान की उपज में वर्ष 2080 तक लगभग 47% की गिरावट आ सकती है, जबकि सिंचित धान की उपज में लगभग 5% की कमी हो सकती है।
- अनुमान है कि वर्ष 2080 तक गेहूँ के उत्पादन में 40% और खरीफ मक्का के उत्पादन में 23% की गिरावट दर्ज की जाएगी। कुल मिलाकर, जलवायु परिवर्तन से फसलों की उत्पादकता और पोषण गुणवत्ता में कमी आती है, जिससे खाद्य सुरक्षा के गंभीर खतरे उत्पन्न हो जाते हैं।
- जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबाव के बावजूद, भारत की बढ़ती जनसंख्या कृषि पर उच्च, स्थिर और विश्वसनीय उत्पादकता प्रदान करने के लिये निरंतर दबाव डालती है।
- परंपरागत खेती की सीमाएँ: इनपुट-आधारित और रसायनों पर अत्यधिक निर्भर कृषि पद्धतियाँ लगातार अधिक अस्थिर होती जा रही हैं, क्योंकि इनपुट लागत में वृद्धि और पर्यावरणीय क्षरण, जलवायु तनाव का सामना करने की उनकी क्षमता को कमज़ोर कर रहे हैं।
- आर्थिक, रणनीतिक और पर्यावरणीय अनिवार्यताएँ: जलवायु-अनुकूल कृषि भारत की खाद्य आयात पर निर्भरता को कम कर सकती है, किसानों की आजीविका की रक्षा कर सकती है और खाद्य क्षेत्र में देश की रणनीतिक स्वायत्तता को मज़बूत कर सकती है।
- जल, मिट्टी और पोषक तत्त्वों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देकर, जलवायु-अनुकूल कृषि उत्पादकता का समर्थन करती है, साथ ही पर्यावरणीय क्षति और कृषि उत्सर्जन को कम करती है।
जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिये सरकार की प्रमुख पहलें क्या हैं?
- जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलता विकसित करने के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) द्वारा 2011 में जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलता विकसित करने के उद्देश्य से जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को भारत ने शीघ्र ही स्वीकार कर लिया था।
- NICRA के तहत शून्य जुताई गेहूँ, प्रत्यक्ष बुवाई धान और जलवायु-सहिष्णु किस्मों जैसी स्थान-विशिष्ट जलवायु-अनुकूल प्रथाओं को 448 से अधिक जलवायु-अनुकूल गाँवों में लागू कर प्रदर्शित किया गया है।
- सतत कृषि के लिये राष्ट्रीय मिशन (NMSA): NMSA एकीकृत खेती, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, जल उपयोग दक्षता और संसाधन संरक्षण के माध्यम से जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा (विशेष रूप से वर्षा आधारित क्षेत्रों में) देता है।
- परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) और उत्तर पूर्वी क्षेत्र के लिये मिशन ऑर्गेनिक वैल्यू चेन डेवलपमेंट (MOVCDNER): जैव उर्वरकों, जैव कीटनाशकों और सूक्ष्मजीव मृदा संवर्द्धकों के उपयोग का समर्थन करके जैविक खेती को बढ़ावा देना, जिससे रासायनिक आगत पर निर्भरता कम हो, मृदा स्वास्थ्य में सुधार हो और सतत कृषि पद्धतियों को मज़बूती मिले।
- डिजिटल कृषि: भारत का डिजिटल कृषि पारिस्थितिकी तंत्र डिजिटल कृषि मिशन, एग्रीस्टैक, नामो ड्रोन दीदी और किसान ड्रोन, किसान सुविधा ऐप और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी पहलों के माध्यम से तेजी से विस्तार कर रहा है।
- प्रोजेक्ट फार्मवाइब्स जैसी निजी परियोजनाओं के साथ-साथ, जो डेटा-संचालित कृषि निर्णयों को सक्षम बनाती हैं, हालाँकि डिजिटल विभाजन के कारण इसका उपयोग अभी भी असमान बना हुआ है।
- जैव प्रौद्योगिकी और अनुसंधान: भारत में आईसीएआर, जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा समर्थित CAR अनुसंधान क्षमता है, जिसमें जलवायु-सहिष्णु और जीनोम-संपादित फसलों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
- BioE3: BioE3 ढाँचा CRA को एक प्रमुख प्राथमिकता क्षेत्र के रूप में चिन्हित करता है और एक राष्ट्रीय रोडमैप के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी-आधारित समाधानों के व्यापक क्रियान्वयन के इरादे को दर्शाता है।
भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि को बड़े पैमाने पर अपनाने में मुख्य चुनौतियाँ क्या हैं?
- लघु और सीमांत किसानों के बीच कम स्वीकृति: भारत की कृषि जोतों में से लगभग 86% लघु और सीमांत किसान हैं, फिर भी उनमें से कई में CAR प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिये जागरूकता, ऋण तक पहुँच और सामर्थ्य की कमी है, जो बड़े पैमाने पर अपनाने को सीमित करती है।
- जैविक आगत में गुणवत्ता और विश्वास की कमी: तीव्र वृद्धि के बावजूद, जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों की गुणवत्ता में असंगति बनी हुई है, जिससे किसानों का विश्वास कम हो रहा है।
- जलवायु-प्रतिरोधी और जीनोम-संपादित बीजों का धीमा प्रसार: यद्यपि जलवायु-सहिष्णु किस्में मौजूद हैं (ICAR द्वारा विकसित लगभग 109 खेत और बागवानी फसल किस्में), ज़मीन पर उनका कवरेज सीमित बना हुआ है।
- जलवायु-प्रतिरोधी और जीनोम-संपादित बीजों का सीमित प्रसार: यद्यपि जलवायु-सहिष्णु किस्में उपलब्ध हैं (ICAR द्वारा विकसित लगभग 109 कृषि एवं बागवानी फसल किस्में), फिर भी क्षेत्रीय स्तर पर उनका विस्तार अभी भी सीमित है।
- उदाहरण के लिये, वर्तमान कृषि परिदृश्य में, जलवायु-अनुकूल या तनाव-सहिष्णु फसलों की पहुँच अभी भी बीजों के कुल उपयोग के एक बहुत छोटे हिस्से तक सीमित है। वहीं दूसरी ओर, जीनोम-संपादित (Genome-Edited) फसलें अभी भी जटिल नियामक और विनियामक प्रक्रियाओं के शुरुआती दौर से गुजर रही हैं।
- परिशुद्ध कृषि को सीमित करने वाला डिजिटल विभाजन: यद्यपि 95.15% गाँवों में 3G/4G मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध है, फिर भी भारत एक गंभीर डिजिटल साक्षरता अंतर का सामना कर रहा है। केवल 38% परिवार ही डिजिटल रूप से साक्षर हैं, जिससे CRA के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण AIआधारित परामर्श, डिजिटल प्लेटफॉर्म और परिशुद्ध कृषि उपकरणों का प्रभावी उपयोग सीमित हो जाता है।
- मृदा और जल तनाव: भारत की लगभग 30% भूमि क्षरित हो चुकी है और 60% से अधिक ज़िले भूजल तनाव का सामना कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में, यदि तकनीकी अपनाने के साथ-साथ संसाधन पुनर्स्थापन नहीं किया गया तो CRA हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
- विखंडित नीति और संस्थागत समन्वय की कमी: CRA से जुड़े प्रयास कृषि, जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु और डिजिटल मिशनों में बिखरे हुए हैं, जिससे योजनाओं में ओवरलैप व रिक्तताएँ उत्पन्न होती हैं। एक एकीकृत राष्ट्रीय CRA रोडमैप के अभाव में यह स्थिति CRA के व्यापक विस्तार को धीमा कर देती है।
भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि को और बढ़ावा देने हेतु क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- राष्ट्रीय CRA रोडमैप: BioE3 फ्रेमवर्क के तहत एक समन्वित राष्ट्रीय CRA रोडमैप विकसित करें, जो जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु अनुकूलन और कृषि नीति को एकीकृत करे, ताकि बड़े पैमाने पर सहनशीलता सुनिश्चित की जा सके।
- यह मंत्रालयों और राज्यों के बीच नीति-सुसंगतता सुनिश्चित करता है, पायलट परियोजनाओं से परे सिद्ध प्रौद्योगिकियों के विस्तार की अनुमति देता है, उत्पादकता, स्थिरता और किसानों के कल्याण के बीच संतुलन बनाता है तथा भारतीय कृषि को बढ़ती जलवायु अस्थिरता का सामना करने योग्य बनाते हुए भविष्य में खाद्य मांग को पूरा करने के लिये तैयार करता है।
- वैश्विक सहयोग और सर्वोत्तम प्रथाएँ: खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के साथ साझेदारी करके जलवायु-स्मार्ट तकनीक, फसल प्रजनन और ज्ञान हस्तांतरण को बढ़ावा दें (जैसे FAO का जलवायु-स्मार्ट कृषि कार्यक्रम)।
- US, EU और चीन के सफल CRA मॉडल को भारतीय परिस्थितियों के अनुसार अपनाएँ।
- अमेरिका बड़े पैमाने पर निवेश के माध्यम से USDA जलवायु-स्मार्ट कृषि और वानिकी पहल के जरिये CRA को आगे बढ़ाता है, यूरोपीय संघ (EU) ग्रीन डील और फार्म टू फोर्क स्ट्रेटेजी में CRA को शामिल करके रासायनिक उपयोग को कम करता है तथा चीन जलवायु-सहिष्णु फसलें, जल-संरक्षण सिंचाई एवं डिजिटल कृषि पर ध्यान केंद्रित करता है।
- डिजिटल और परिशुद्ध कृषि का विस्तार: AI-आधारित परामर्श, सटीक सिंचाई तथा जलवायु जोखिम अलर्ट तक पहुँच बढ़ाएँ और डिजिटल साक्षरता (भाषिनी के माध्यम से) के जरिये डिजिटल विभाजन को दूर करें।
- मृदा और जल प्रबंधन में सुधार: भूमि क्षरण और भूजल तनाव को कम करने के लिये मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन, सूक्ष्म-सिंचाई, जल-संरक्षण तकनीकें तथा जलस्रोत विकास को बढ़ावा देना।
निष्कर्ष
CRA भारत की खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका और पारिस्थितिक स्थिरता की रक्षा के लिये अत्यंत आवश्यक है, विशेषकर तेज़ी से बढ़ते जलवायु जोखिमों के संदर्भ में। सतत विकास लक्ष्यों SDG 2 (शून्य भुखमरी), SDG 12 (ज़िम्मेदार उपभोग एवं उत्पादन) और SDG 13 (जलवायु कार्य) के अनुरूप एक समन्वित राष्ट्रीय CRA रोडमैप बड़े पैमाने पर सहनशील, उत्पादक तथा स्थायी कृषि को सक्षम बना सकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “जलवायु-अनुकूल कृषि भारत की खाद्य सुरक्षा और जलवायु अनुकूलन रणनीति का केंद्र है।” इस पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) क्या है?
CRA एक ऐसा दृष्टिकोण है जो फसलों और कृषि प्रणालियों की जलवायु अस्थिरता सहन करने की क्षमता को बढ़ाता है, साथ ही उत्पादनशीलता तथा पर्यावरणीय स्वास्थ्य को बनाए रखता है।
2. भारत के लिये CRA क्यों महत्त्वपूर्ण है?
भारत में 51% भूमि वर्षा पर निर्भर है और जलवायु जोखिम बढ़ रहे हैं, इसलिये CRA खाद्य सुरक्षा की रक्षा, किसानों की आय स्थिर करने तथा चरम मौसम की घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता कम करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
3. भारत में CRA का समर्थन करने वाली प्रमुख पहलों में कौन-कौन सी हैं?
मुख्य पहलें हैं: NICRA, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन, डिजिटल कृषि मिशन और BioE3 फ्रेमवर्क के तहत नीति समर्थन।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)
- भारत में 'जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)' दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (सी० सी० ए० एफ० एस०) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है।
- सी० सी० ए० एफ० एस० परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (सी० जी० आइ० ए० आर०) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय फ्राँस में है।
- भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्द्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आइ० सी० आर० आइ० एस० ए० टी०), सी० जी० आइ० ए० आर० के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
प्रश्न 2. 'जलवायु-अनुकूली कृषि के लिए वैश्विक सहबन्ध' (ग्लोबल एलायन्स फॉर क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) (GACSA) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं
- GACSA, 2015 में पेरिस में हुए जलवायु शिखर सम्मेलन का एक परिणाम है।
- GACSA में सदस्यता से कोई बन्धनकारी दायित्व उत्पन्न नहीं होता।
- GACSA के निर्माण में भारत की साधक भूमिका थी।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2,
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मेन्स:
प्रश्न. एकीकृत कृषि प्रणाली (आई. एफ. एस.) किस सीमा तक कृषि उत्पादन को संधारित करने में सहायक है? (2019)
