भारतीय अर्थव्यवस्था
धान उत्पादन में संधारणीयता प्राप्त करना
- 06 Jan 2026
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प्रिलिम्स के लिये: धान, खरीफ फसल, गोल्डन राइस, CRISPR-Cas9, मीथेन, GHG, पार्टिकुलेट मैटर, बाजरा/श्री अन्न, तिलहन, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (SRI), ड्रिप/स्प्रिंकलर सिंचाई, जीनोम-संपादित फसलें, FPO, SDG, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
मेन्स के लिये: धान से संबंधित मुख्य तथ्य, धान की खेती से संबंधित चिंताएँ और संधारणीय कृषि हेतु आवश्यक कदम
चर्चा में क्यों?
भारत ने 2025 में चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक बनने का गौरव प्राप्त किया है और अब यह वैश्विक धान निर्यात का 40% हिस्सा नियंत्रित करता है, जिसमें निर्यात 20 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक पहुँच गया है।
- हालाँकि, यह चिंता भी उत्पन्न करता है कि धान एक जल-गहन फसल है और जल-संकट वाले क्षेत्रों में इसका निर्यात आभासी जल (Virtual Water) के निर्यात के रूप में माना जा सकता है।
सारांश
- भारत विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक और निर्यातक बन गया है, जो वैश्विक निर्यात का 40% हिस्सा उपलब्ध कराता है। यद्यपि धान की कृषि कुल फसल क्षेत्र के 25% भूभाग पर की जाती है एवं यह अत्यधिक जल-गहन कृषि है।
- भूजल क्षरण, उत्सर्जन, अवशेष दहन और जलवायु परिवर्तन धान-केंद्रित कृषि को असंधारणीय बनाते हैं।
- सतत खाद्य सुरक्षा के लिये सब्सिडी सुधार, फसल विविधीकरण, DSR/SRI तकनीक और जलवायु-प्रतिरोधी जीनोम-संपादित फसलें अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
धान से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: धान (चावल) अधिकांश भारतीयों के लिये मुख्य आहार है, जिसमें लगभग 65% लोग इसे प्रतिदिन अपने भोजन में शामिल करते हैं और धान की कृषि कुल फसल क्षेत्र के 25% भूभाग पर की जाती है।
- भारत विश्व का सबसे बड़ा धान उत्पादक और निर्यातक है, इसके बाद चीन (दूसरा) और बांग्लादेश (तीसरा) हैं।
- जलवायु एवं मृदा आवश्यकताएँ: धान एक खरीफ फसल है (जून-जुलाई में रोपी जाती है और सितंबर-अक्तूबर में काटी जाती है)।
- इसके लिये अनुकूल तापमान (>25°C) आवश्यक है, जबकि आदर्श तापमान 30°C दिन/20°C रात है और अल्प समय के लिये 40°C तक सहन कर सकती है।
- इसको उच्च आर्द्रता और 100 सेमी. से अधिक वर्षा की आवश्यकता होती है। भारत की प्रमुखतः उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु के कारण धान अधिकांश क्षेत्रों में उगाया जाता है, मुख्य रूप से सिंचाई के माध्यम से।
- यह फसल 5.5-6.5 pH वाली मृदा में, जिसमें अच्छी जलधारण क्षमता और जलनिकासी हो, अच्छी तरह उगती है।
- फसल की सघनता: दक्षिणी राज्यों और पश्चिम बंगाल में वार्षिक दो या तीन फसलें उगाई जा सकती हैं (जैसे– पश्चिम बंगाल में आउस, अमन और बोरो)।
- वर्ष 2025-26 में धान उत्पादन में शीर्ष तीन राज्य हैं– उत्तर प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल।
- धान की खेती की तकनीकें:
- पारंपरिक प्रतिरोपण (Traditional Transplantation): बीज नर्सरी में बोए जाते हैं; 25-35 दिन बाद पौधों को मुख्य खेत में रोपा जाता है। यह श्रम और जल-गहन विधि है, जिसमें लगभग 25-27 सिंचाइयाँ आवश्यक होती हैं, लेकिन इससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त होता है। यह भारत में व्यापक रूप से प्रचलित है।
- धान का प्रत्यक्ष रोपण (Direct Seeding of Rice- DSR): पूर्व अंकुरित बीजों को मशीन के माध्यम से सीधे खेत में बोया जाता है, जिससे जल और श्रम की बचत होती है। यह विधि भारी/मध्यम बनावट वाली मिट्टियों (उच्च मृदायुक्त) में सबसे उपयुक्त है, जिनमें जल-धारण क्षमता अच्छी हो और पौधों के लिये उपलब्ध लोहा पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो।
सतत विकास से संबंधित सरकारी पहलें
- जल-स्मार्ट कृषि प्रोत्साहन: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राज्य की कार्य- योजनाओं के तहत सरकार पंजाब-हरियाणा में प्रत्यक्ष बुवाई धान (DSR), सूक्ष्म-सिंचाई और जल-गहन धान से दूर फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है।
- जलवायु-अनुकूल किस्में: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (NICRA) के तहत शुष्कता, लवणता और ताप-अनुकूल धान की किस्मों का विस्तार कर रही है।
- कदन्न बनाम धान की नीति के संकेत: अंतर्राष्ट्रीय कदन्न वर्ष (2023) के अनुवर्ती प्रयासों के माध्यम से सरकार जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में धान से हटकर विविधीकरण को प्रोत्साहित कर रही है ताकि स्थिरता में सुधार हो।
- फोर्टीफाइड (पोषकयुक्त) चावल विस्तार: एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी से निपटने के लिये NFSA और PM-POSHAN के तहत फोर्टीफाइड चावल के वितरण का देशव्यापी विस्तार किया गया है।
- मीथेन उत्सर्जन की कमी पर ध्यान: भारत ने धान की खेती से मीथेन उत्सर्जन कम करने के लिये वैकल्पिक आर्द्र-शुष्क (AWD) पद्धति और बेहतर धान की खेती संबंधी प्रथाओं को जलवायु कार्ययोजना में शामिल करना शुरू कर दिया है।
भारत में धान की खेती से संबंधित प्रमुख चिंताएँ क्या हैं?
- जल-स्तर में तीव्र गिरावट: भारत में 1 किलोग्राम धान उत्पादन में 3,000–4,000 लीटर जल की खपत होती है, जो वैश्विक औसत की तुलना में 20–60% अधिक है। पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख धान उत्पादक राज्यों में भूजल-स्तर लगभग 30 फीट से गिरकर 80–200 फीट तक पहुँच गया है, जहाँ अधिकांश जलाभृत (एक्वीफायर) अति-दोहित या गंभीर श्रेणी में आते हैं, क्योंकि वार्षिक पुनर्भरण की तुलना में 35–57% अधिक जल का निष्कर्षण किया जा रहा है।
- भूजल-गहन धान की खेती पीढ़ीगत समानता (इंटर-जनरेशनल इक्विटी) का मुद्दा है, क्योंकि यह जलाभृत क्षय के माध्यम से पारिस्थितिक ऋण भावी पीढ़ियों पर डालती है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: जल-भराव वाले धान के खेत अवायवीय (एनारोबिक) मृदा का निर्माण करने के साथ मीथेन गैस के एक प्रमुख स्रोत हैं, जो भारत के कृषि संबंधी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 10–20% का योगदान करते हैं। पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने से पार्टिकुलेट मैटर और कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है, जिससे वायु प्रदूषण और बढ़ जाता है।
- स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: आर्सेनिक-संदूषित भूजल वाले क्षेत्रों में जल-भराव वाली धान की खेती के कारण अनाज में आर्सेनिक की उच्च मात्रा पाई जाती है, जिसका सेवन कैंसर जैसे गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है। साथ ही, कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से विषाक्तता बढ़ती है। अध्ययनों से बिहार के 11 हॉटस्पॉट ज़िलों में मुख्य खाद्य पदार्थों (चावल, गेहूँ और आलू) में आर्सेनिक की बढ़ी हुई मात्रा की पुष्टि हुई है।
- आर्थिक चिंताएँ: किसानों को गहरे बोरवेल और पंप लगाने के लिये ऋण लेने को मजबूर होना पड़ता है, जिससे छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित होते हैं क्योंकि यह लागत उनकी अल्प आय को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। पंजाब धान के लिये उर्वरक और विद्युत् सब्सिडी पर लगभग 39,000 रुपए प्रति हेक्टेयर खर्च करता है।
- लंबे समय तक जल-भराव वाली धान की एकल फसल (मोनोकल्चर) से मृदा में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों (जैसे– ज़िंक और आयरन) का असंतुलन उत्पन्न हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप समय के साथ अधिक मात्रा में उर्वरकों के उपयोग की आवश्यकता बढ़ती जाती है।
- जलवायवीय चिंताएँ: जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा से धान की उत्पादकता में 6–10% या अधिक की कमी आने का खतरा है, जिसमें उत्तर और पूर्वी भारत की वर्षा-आधारित प्रणालियाँ सबसे अधिक असुरक्षित हैं।
- विश्व बैंक और नेचर सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित अध्ययनों से यह उजागर होता है कि उत्तर-पश्चिम भारत में धान की खेती एक ऊर्जा–जल–जलवायु संबंधी विषम चक्र को बढ़ावा देती है। यह सब्सिडीयुक्त विद्युत् भूजल के अत्यधिक दोहन को प्रोत्साहित करती है, पंपिंग से कार्बन उत्सर्जन को बढ़ाती है और किसानों को अस्थिर कृषि प्रथाओं के बीच रोके रखती है।
- वैश्विक खाद्य सुरक्षा के निहितार्थ: विश्व के 40% चावल निर्यात की आपूर्ति करने वाले देश के रूप में, जल संकट के कारण भारत के उत्पादन में किसी भी महत्त्वपूर्ण कमी का वैश्विक खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
भारत में सतत कृषि को बढ़ावा देने हेतु किन कदमों की आवश्यकता है?
- सब्सिडी ढाँचों में सुधार: इनपुट-आधारित सब्सिडी से प्रत्यक्ष आय और पारिस्थितिक सेवा भुगतान की ओर बदलाव करना, जो जल संरक्षण, मिट्टी में कार्बन बढ़ाना तथा फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करें। इसके अलावा कदन्न/श्री अन्न, दलहन एवं तिलहन जैसी विविध फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व मज़बूत सरकारी खरीद सुनिश्चित करना।
- तकनीकी अपनाना और जल संरक्षण करना: चावल गहनता प्रणाली (SRI), ड्रिप/स्प्रिंकलर इरीगेशन जैसी जल-कुशल तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाएँ और जीनोम-संपादित फसलों (जैसे– सूखा-सहिष्णु कमला चावल) को तेज़ी लानी चाहिये। सटीक सिंचाई को डिजिटल सलाहकार सेवाओं (AI-आधारित मौसम तथा मिट्टी नमी सेंसर) के साथ मिलाकर, बिना पैदावार घटाए जल उपयोग को 30–40% तक कम किया जा सकता है।
- नीति ढाँचों को मज़बूत करना: संवेदनशील क्षेत्रों में नए बोरवेल पर प्रतिबंध लागू करें और सहभागी भूमिगत जल प्रबंधन को बढ़ावा दें, साथ ही कृषक उत्पादक संगठन (FPOs) तथा सहकारी समितियों को सशक्त बनाकर सामूहिक कार्रवाई के माध्यम से लागत कम करने में मदद करें। समुदाय-नेतृत्व वाले भूमिगत जल शासन (जिसमें जल बजट और फसल योजना शामिल हैं) केवल शीर्ष-स्तरीय नियमों की तुलना में अधिक प्रभावी है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन: फसल विविधीकरण और कृषि वानिकी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दें ताकि चावल–गेहूँ की एक फसली प्रणाली टूटे और जलवायु लचीलापन बढ़े। इन-सिटु अवशेष प्रबंधन और एक्स-सिटु उपयोग का समर्थन करें, साथ ही मृदा स्वास्थ्य कार्ड का प्रयोग करें, क्योंकि ये छोटे किसानों के लिये कम लागत, उच्च प्रभाव वाले अनुकूलन उपाय हैं।
- किसानों की आय बढ़ाना और जोखिम कम करना: सतत तकनीक अपनाने के लिये ऋण की सुविधा प्रदान करें तथा प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) को व्यापक रूप से लागू करें, साथ ही उत्तम मूल्य सुनिश्चित करने हेतु खाद्य प्रसंस्करण का समर्थन करें। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में शीत-शृंखला, गोदाम एवं कृषि प्रसंस्करण इकाइयाँ विकसित करें ताकि फसल कटाई के बाद नुकसान कम हो व गैर-कृषि रोज़गार सृजित हो सके।
निष्कर्ष
भारत का विश्व में अग्रणी धान उत्पादक के रूप में उभरना जल–ऊर्जा–जलवायु–स्वास्थ्य के आपसी संबंध की महत्त्वपूर्ण चुनौती को उजागर करता है, जिसमें संक्षिप्त अवधि की खाद्य सुरक्षा को दीर्घकालीन स्थिरता के साथ संतुलित करना आवश्यक है। इसे प्राप्त करने के लिये सब्सिडी सुधार, फसल विविधीकरण और जल-कुशल, जलवायु-अनुकूल कार्यप्रणाली को अपनाना आवश्यक है ताकि किसानों का कल्याण एवं पर्यावरणीय स्वास्थ्य सुरक्षित रहे।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. वैश्विक चावल उत्पादन में भारत के प्रभुत्व ने भूमिगत जल पर दबाव बढ़ा दिया है। कारणों का विश्लेषण कीजिये और धारणीय नीतिगत समाधानों का सुझाव दीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारत में धान की खेती चिंता का विषय क्यों है?
क्योंकि धान के 1 किलोग्राम उत्पादन के लिये 3,000–4,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिससे भूजल का अत्यधिक दोहन होता है और उसका स्तर तेज़ी से घटता है।
2. धान का प्रत्यक्ष बीजारोपण (DSR) क्या है?
यह एक जल और श्रम बचाने वाली तकनीक है, जिसमें बीजों को सीधे बोया जाता है, जिससे सिंचाई की आवश्यकता और उत्सर्जन दोनों कम हो जाते हैं।
3. भारत का धान उत्पादन वैश्विक स्तर पर क्यों मायने रखता है?
भारत की वैश्विक धान निर्यात में 40% हिस्सेदारी होने के कारण, उत्पादन में होने वाला कोई भी व्यवधान विश्व भर में खाद्य कीमतों और खाद्य सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत के संदर्भ में निम्नलिखित में से किस/किन पद्धति/यों को पारितंत्र-अनुकूली कृषि माना जाता है?
- फसल विविधरूपण
- शिंब आधिक्य (Legume intensification)
- टेंसियोमीटर का प्रयोग
- ऊर्ध्वाधर कृषि (Vertical farming)
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये :
(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 3
(c) केवल 4
(d) 1,2,3 और 4
उत्तर: (a)
मेन्स
प्रश्न. रिक्तीकरण परिदृश्य में विवेकी जल उपयोग के लिये जल भंडारण और सिंचाई प्रणाली में सुधार के उपायों को सुझाइये। (2020)
प्रश्न. जल-प्रतिबलित क्षेत्रों से कृषि उत्पादन में वृद्धि करने में राष्ट्रीय जल विभाजक परियोजना के प्रभाव को सविस्तार स्पष्ट कीजिये। (2019)
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