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सामाजिक न्याय

भारत में एसिड अटैक

  • 07 Jan 2026
  • 101 min read

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, भारतीय न्याय संहिता

मेन्स के लिये: लैंगिक हिंसा एवं महिलाओं के विरुद्ध अपराध, आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार और न्यायिक विलंब

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2009 में शाहीन मलिक एसिड अटैक मामले में अभियुक्तों के बरी होने ने पीड़ितों के सामने आने वाली कठोर चुनौतियों को एक बार फिर उजागर कर दिया है। 16 वर्षों तक चली उनकी कानूनी लड़ाई ने भारतीय न्याय प्रणाली में जाँच, अभियोजन और न्यायिक संवेदनशीलता से जुड़ी गंभीर कमियों को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है।

सारांश

  • शाहीन मलिक एसिड अटैक मामले में अभियुक्तों के बरी होने से भारत की एसिड हिंसा प्रतिक्रिया में गंभीर कमियाँ उजागर हुई हैं। इनमें दोषपूर्ण जाँच, लंबित मुकदमे, कम दोषसिद्धि दर, एसिड बिक्री का अपर्याप्त नियमन और मुआवज़े में विलंब शामिल हैं तथा यह सब सशक्त कानूनों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद मौजूद है।
  • एसिड हमलों के निवारण हेतु एसिड बिक्री पर सख्त नियंत्रण, त्वरित एवं संवेदनशील न्यायिक प्रक्रियाएँ, समयबद्ध मुआवज़ा तथा व्यापक और निरंतर पुनर्वास आवश्यक है; इस संदर्भ में बांग्लादेश के सफल रोकथाम मॉडल से महत्त्वपूर्ण सबक लिये जा सकते हैं।

एसिड अटैक क्या है?

  • परिचय: एसिड अटैक किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने के आशय से उस पर सल्फ्यूरिक, हाइड्रोक्लोरिक या नाइट्रिक एसिड जैसे संक्षारक पदार्थों को जानबूझकर फेंकने की हिंसक घटना है। ऐसे हमलों में गंभीर जलन और स्थायी विकृति होती है, विशेषकर चेहरे पर, जिससे अक्सर अंधत्व और दीर्घकालिक शारीरिक विकलांगता/दिव्यांगता हो जाती है।
    • शारीरिक पीड़ा से कहीं आगे, बचे हुए लोग गहन मनोवैज्ञानिक आघात, सामाजिक कलंक और बहिष्कार का सामना करते हैं। 
    • अनेक अपनी आजीविका खो देते हैं और आजीवन चिकित्सा देखभाल पर निर्भर हो जाते हैं, साथ ही न्याय की तलाश में उन्हें दीर्घकालिक कानूनी लड़ाइयों में भी धकेल दिया जाता है।
    • भारत के विधि आयोग की 226वीं रिपोर्ट (2009) ने एसिड हमलों को स्थायी शारीरिक एवं मानसिक क्षति पहुँचाने वाले अपराधों के रूप में मान्यता दी, उनके लैंगिक स्वरूप पर बल दिया तथा पृथक् दंडात्मक प्रावधानों और पुनर्वास सहायता की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
  • पीड़ित और अपराधी: एसिड हमलों से मुख्यतः महिलाएँ और किशोरियाँ पीड़ित होती हैं, जबकि पुरुष प्रायः अपराधी होते हैं, जिससे यह लैंगिक हिंसा का एक रूप बन जाता है।
    • एसिड सर्वाइवर्स ट्रस्ट इंटरनेशनल (ASTI) द्वारा वर्ष 2024 में भारतीय मामलों के विश्लेषण में पाया गया कि महिलाओं पर हुए लगभग तीन-चौथाई एसिड हमलों के पीछे व्यक्तिगत संबंधों से जुड़े संघर्ष प्रमुख कारण थे; साथ ही दहेज़ विवाद, व्यभिचार का संदेह और घरेलू हिंसा को भी कारणों के रूप में चिह्नित किया गया।
      • इसके विपरीत, पुरुषों पर हुए हमले अधिकतर संपत्ति विवाद, पेशेवर ईर्ष्या या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़े पाए गए।
  • भारत में एसिड हमलों की समस्या: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, भारत में वर्ष 2023 में 207 एसिड हमले दर्ज किये गए, जो वर्ष 2022 में 202 और 2021 में 176 थे; इसके साथ ही 65 एसिड हमले के प्रयास भी सामने आए।
    • यह अपराध गंभीर रूप से कम रिपोर्ट किया जाता है, मुख्यतः सामाजिक कलंक, पारिवारिक दबाव और प्रतिशोध के भय के कारण; ASTI के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष लगभग 1,000 एसिड हमले होते हैं।
    • पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और गुजरात सबसे अधिक प्रभावित राज्य रहे, जहाँ शोधकर्त्ताओं ने अधिक घटनाओं की दर को औद्योगिक क्षेत्रों में एसिड की सुलभ उपलब्धता और अप्रभावी कानून प्रवर्तन से जोड़ा है।

भारत में एसिड हमलों के विरुद्ध कौन-कौन से कानून हैं?

  • भारतीय न्याय संहिता, 2023: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 124 के अंतर्गत एसिड हमलों को एक विशिष्ट और गंभीर अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके तहत न्यूनतम 10 वर्ष का कारावास, जिसे आजीवन कारावास तक बढ़ाया जा सकता है, का प्रावधान है, साथ ही पीड़ित के चिकित्सा व्ययों की पूर्ति हेतु न्यायसंगत और उचित ज़ुर्माना लगाने का भी प्रावधान किया गया है।
    • इस कानून में एसिड हमले के प्रयास को पाँच से सात वर्ष के कारावास से दंडित करने का प्रावधान भी है और यह अनिवार्य करता है कि सभी सार्वजनिक और निजी अस्पताल पीड़ितों को निशुल्क प्राथमिक उपचार और चिकित्सा उपचार प्रदान करें, इससे इनकार करने पर आपराधिक मामला दर्ज होगा।
  • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (एसिड हमले के पीड़ितों के लिये कानूनी सेवाएँ) योजना, 2016: विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत एसिड हमले के पीड़ितों और उनके उत्तराधिकारियों को प्राथमिकता आधारित विधिक सहायता, समर्थन और सहयोग प्रदान करती है।
  • मॉडल पॉइज़न पोज़ेशन एंड सेल रूल, 2013: भारत के सर्वोच्च न्यायालय के वर्ष 2013 के आदेश ने एसिड की बिक्री और उपलब्धता के सख्त विनियमन का निर्देश दिया, जिसमें खरीदारों से फोटो पहचान प्रमाण प्रस्तुत करने और विक्रेताओं से विस्तृत खरीद रजिस्टर बनाए रखने की आवश्यकता को रेखांकित किया।
    • इस आदेश के अनुसरण में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक एडवाइज़री जारी की और पॉइज़न एक्ट, 1919 के तहत मॉडल पॉइज़न पोज़ेशन एंड सेल रूल, 2013 तैयार किये, जिसमें राज्यों को अपने स्वयं के नियम बनाने का निर्देश दिया गया क्योंकि यह विषय राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है।
    • हालाँकि, इन निर्देशों और मॉडल संबंधी नियमों के बावज़ूद, अधिकांश राज्यों में कार्यान्वयन कमज़ोर और असमान बना हुआ है, जिससे एसिड तक आसान पहुँच बनी रहती है।

न्यायिक उदाहरण

  • लक्ष्मी बनाम भारत संघ (2013): सर्वोच्च न्यायालय ने एसिड हमलों को आपराधिक कानून में एक विशिष्ट मान्यता दी, उन्हें सामान्य क्षतिपूर्ति प्रावधानों से बाहर ले जाकर एक अलग और गंभीर अपराध के रूप में माना।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि एसिड हमले से बचे लोग न्यूनतम 3 लाख रुपये मुआवज़े के हकदार हैं, जिसमें 1 लाख रुपये तत्काल चिकित्सा उपचार के लिये 15 दिनों के भीतर और शेष 2 लाख रुपये उपचार सर्जरी सहित देखभाल और पुनर्वास के लिये 2 माह के भीतर देय हैं।
    • इसने खुदरा बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया, जब तक कि विक्रेता खरीदार का विवरण और बेची गई मात्रा दर्ज करते हुए एक रजिस्टर/लॉगबुक न रखे।
  • परिवर्तन केंद्र बनाम भारत संघ (2015): सर्वोच्च न्यायालय ने एसिड बिक्री विनियमों के खराब कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित किया और राज्यों को इससे प्रभावित लोगों के लिये प्रभावी प्रवर्तन और समय पर मुआवज़ा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
  • न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (2013): निर्भया मामले के बाद, न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा से निपटने में संरचनात्मक विफलताओं की जाँच की और स्पष्ट रूप से एसिड हमलों को लैंगिक अपराध के रूप में उजागर किया।
    • समिति ने सख्त सज़ा और मुआवज़े के लिये राष्ट्रीय सर्वाइवर फंड की सिफारिश की, जिससे एसिड हमलों पर बाद में हुए सुधारों पर सीधे प्रभाव पड़ा।

भारत में एसिड हमले से बचे लोगों को न्याय दिलाने में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • पुलिस जाँच की कमज़ोरी: एसिड हमले के मामलों में प्रायः FIR में विलंब, अपर्याप्त फोरेंसिक साक्ष्य संग्रह, चिकित्सकीय साक्ष्य की अनदेखी और एसिड के स्रोत का पता लगाने में विफलता जैसी समस्याएँ होती हैं, जिससे मुकदमा कमज़ोर पड़ता है और दोषियों को बरी किया जाता है।
  • न्याय को पराजित करता न्यायिक विलंब: एसिड हमलों को गंभीर अपराध माने जाने के बावज़ूद, मुकदमे वर्षों तक चलते रहते हैं। 
    • शाहीन मलिक मामले में 16 वर्ष के विलंब से पता चलता है कि प्रक्रियात्मक विलंब किस प्रकार न्याय की आकांक्षा वाले लोगों के लिये एक लंबी पीड़ा में बदल देता है।
    • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, वर्ष 2023 में न्यायालयों में लंबित 703 एसिड हमले के मामलों में से केवल 16 दोषसिद्धि और 27 दोषमुक्ति दर्ज की गई, जो दोषियों के लगभग दंडमुक्ति का संकेत देती है।
  • पीड़ित-दोषारोपण: पीड़ित लोगों को प्रायः चरित्र हनन और लैंगिक संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया की कमी का सामना करना पड़ता है, जिससे उनकी गवाही कमज़ोर पड़ती है और वे कानूनी कार्रवाई करने से हतोत्साहित होते हैं।
    • सामाजिक कलंक, प्रतिशोध का भय और पारिवारिक दबाव रिपोर्टिंग को रोकते हैं। जहाँ आधिकारिक आँकड़े वार्षिक रूप से कुछ सौ मामले दिखाते हैं, वहीं स्वतंत्र अनुमान प्रति वर्ष लगभग 1,000 हमलों का संकेत देते हैं।
  • एसिड बिक्री विनियमों का अनुचित कार्यान्वयन: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य एसिड बिक्री पर नियंत्रण कागज़ों तक ही सीमित रह गया है।
    • विशेषतः वस्त्र, रबर और रसायन उद्योग वाले क्षेत्रों में एसिड की आसान उपलब्धता बनी हुई है, जिससे दोहराए जाने वाले अपराध संभव होते हैं।
  • आउट-ऑफ-कोर्ट सेटलमेंट का सामान्यीकरण: पुलिस और आरोपी प्रायः अपराधियों पर मुकदमा चलाने के बजाय पीड़ितों पर बड़े मौद्रिक मुआवज़े को स्वीकार करने का दबाव डालते हैं, जिससे अपराधी आपराधिक जवाबदेही से बच जाते हैं।
  • विलंबित और अपर्याप्त पीड़ित मुआवज़ा: तत्काल चिकित्सा और पुनर्वास आवश्यकताओं के लिये राज्य द्वारा मुआवज़ा प्रायः कई वर्ष बाद मिलता है, जिससे पीड़ित लोग वित्तीय संकट में पड़ जाते हैं, इससे उनकी न्याय तक पहुँच कमज़ोर होती है।

भारत एसिड हमलों को प्रभावी ढंग से कैसे रोक सकता है और पीड़ित लोगों का समर्थन कैसे कर सकता है?

  • एसिड बिक्री का सख्त विनियमन (निवारक उपाय): खुदरा एसिड बिक्री पर व्यापक प्रतिबंध या सख्त नियंत्रण लागू करना।
    • एसिड बिक्री की निगरानी के लिये ज़िम्मेदार उप-विभागीय मजिस्ट्रेटों की प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करना।
    • एसिड सर्वाइवर्स फाउंडेशन के अनुसार, भारत बांग्लादेश के उस मॉडल से सीख ले सकता है जिसके तहत 30 दिनों के भीतर अवैध एसिड बेचने वाली दुकानों को सील कर दिया जाता है। वर्ष 2002 से सार्वजनिक जागरूकता अभियानों के साथ अपनाई गई इस नीति के कारण वहाँ एसिड हमलों के मामले 494 (2002 में) से घटकर वर्ष 2024 तक मात्र 13 रह गए हैं।
  • न्यायिक संवेदनशीलता और त्वरित सुनवाई (न्याय वितरण): न्यायाधीशों और लोक अभियोजकों हेतु अनिवार्य लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए, साथ ही एसिड हमले के मामलों के लिये फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना की जाए।
    • दोषसिद्धि दर बढ़ाने और निवारक प्रभाव सुनिश्चित करने हेतु अनुचित न्यायिक देरी पर दंडात्मक प्रावधान किये जाएँ।
  • कानूनी और मनोवैज्ञानिक सहायता को सुदृढ़ करना (पीड़ित-केंद्रित न्याय): निशुल्क कानूनी सहायता, परामर्श और मुकदमे की पूरी प्रक्रिया के दौरान सहयोग सुनिश्चित किया जाए। पीड़ितों पर अदालत के बाहर समझौता करने के दबाव को कम किया जाए।
    • दिव्यांगता आकलन मानदंडों में संशोधन: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत दिव्यांगता आकलन के नियमों में बदलाव किया जाए, ताकि एसिड अटैक पीड़ितों को कठोर 40% दिव्यांगता की सीमा तक सीमित न किया जाए। उनका मूल्यांकन दैनिक कार्य करने की क्षमता, मानसिक आघात तथा जीवन भर की चिकित्सकीय व पुनर्निर्माण उपचार आवश्यकताओं के आधार पर किया जाए, यह स्वीकार करते हुए कि एसिड अटैक से होने वाले जलन को मात्र त्वचा के प्रतिशत से नहीं आँका जा सकता।
    • मुआवज़े का त्वरित वितरण: मुआवज़ा वर्षों के बजाय कुछ ही महीनों में दिया जाए, ताकि समय पर शल्य-चिकित्सा और उपचार संभव हो सके। मुआवज़े को केवल अनुग्रह राशि तक सीमित न रखते हुए उसे सीधे चिकित्सकीय उपचार और पुनर्वास आवश्यकताओं से जोड़ा जाए।
  • दीर्घकालिक पुनर्वास ढाँचा (सतत पुनर्प्राप्ति): न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति (2013) की सिफारिशों को लागू करते हुए एक राष्ट्रीय पीड़ित सहायता कोष की स्थापना की जाए, जो आजीवन चिकित्सकीय देखभाल, मनोवैज्ञानिक परामर्श, शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और आजीविका सहायता को सुनिश्चित करे।

निष्कर्ष

शाहीन मलिक मामला यह दर्शाता है कि भारत में सख्त क़ानूनों के बावजूद एसिड अटैक कम नहीं हो पाए हैं, जिसका मुख्य कारण कमज़ोर प्रवर्तन और कम दोषसिद्धि दर है। एसिड की बिक्री पर कड़े नियंत्रण, फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना तथा पीड़ितों को समयबद्ध मुआवज़ा देना प्रभावी प्रतिरोध के लिये अत्यंत आवश्यक है। एसिड अटैक को समाप्त करने हेतु पीड़ित-केंद्रित न्याय और पुनर्वास ढाँचा अनिवार्य है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. सख्त कानूनों के बावजूद भारत में एसिड अटैक होते रहते हैं। कम सज़ा दर के पीछे संस्थागत और न्यायिक कारणों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में फिलहाल कौन-सा कानूनी प्रावधान एसिड अटैक को नियंत्रित करता है?

एसिड अटैक भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 124 के तहत आते हैं, जो कम-से-कम 10 वर्ष की कैद से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा के साथ-साथ चिकित्सा खर्च के लिये जुर्माने का प्रावधान करती है।

2. लक्ष्मी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2013) का क्या महत्त्व था?

सर्वोच्च न्यायालय ने एसिड अटैक को एक अलग अपराध के रूप में मान्यता दी, एसिड की बिक्री के नियमन का आदेश दिया, पीड़ितों के लिये निशुल्क चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित की और जीवित बचे हुए पीड़ितों को न्यूनतम 3 लाख रुपये की मुआवजे की राशि तय की।

3. भारत में एसिड अटैक की घटनाएँ कम रिपोर्ट क्यों होती हैं?

सामाजिक निंदा, प्रतिशोध का भय, पारिवारिक दबाव और न्याय व्यवस्था में विश्वास की कमी के कारण, वास्तविक एसिड अटैक के मामले लगभग 1,000 वार्षिक हो सकते हैं, जो आधिकारिक NCRB आँकड़ों से कहीं अधिक हैं।

4. NALSA एसिड अटैक पीड़ितों को क्या सहायता प्रदान करती है?

NALSA (एसिड हमलों के पीड़ितों को कानूनी सेवा) योजना, 2016 के तहत, पीड़ितों को प्राथमिकता के आधार पर कानूनी सहायता, परामर्श और मुआवज़ा तथा पुनर्वास प्राप्त करने में मदद प्रदान की जाती है।

https://youtu.be/k-iKabK-2P0 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स

प्रश्न. हमें देश में महिलाओं के प्रति यौन-उत्पीड़न के बढ़ते हुए दृष्टांत दिखाई दे रहे हैं। इस कुकृत्य के विरुद्ध विद्यमान विधिक उपबंधों के होते हुए भी ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। इस संकट से निपटने के लिये कुछ नवाचारी उपाय सुझाइये। (2014)

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