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जस्टिस वर्मा समिति द्वारा यौन उत्पीड़न कानून में बदलाव की सिफारिश

  • 15 Oct 2018
  • 5 min read

चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार ने हाल ही में सोशल मीडिया पर #MeToo अभियान के बाद कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिये कानूनी और संस्थागत ढाँचे को देखने के लिये न्यायाधीशों का एक पैनल स्थापित करने की अपनी योजना की घोषणा की।

प्रमुख बिंदु

  • उल्लेखनीय है कि हाल ही में भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने मी टू अभियान के विस्तार को देखते हुए मामले की गंभीरता से जाँच के लिये जाने-माने कानूनविदों की समिति गठित करने का फैसला लिया है।
  • सरकार एक ‘तथ्य-खोज आयोग’ नियुक्त करेगी जो सार्वजनिक सुनवाई करेगा। पीड़ित महिलाएँ समिति के सामने गवाही भी दे सकती हैं। इसके बाद, समिति कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की व्यापक प्रकृति के कारणों और परिणामों की पहचान करेगी जो कानून में बदलाव का कारण बन सकता है।
  • हालाँकि वर्ष 2013 की शुरुआत में न्यायमूर्ति जेएस वर्मा समिति ने लैंगिक कानूनों पर सौपी गई अपनी ऐतिहासिक रिपोर्ट में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) विधेयक में महत्त्वपूर्ण बदलाव करते हुए आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) की बजाय राज्य स्तरीय रोज़गार अधिकरण की स्थापना की सिफारिश की थी।
  • इस समिति का गठन 16 दिसंबर के निर्भया गैंगरेप और उसके प्रतिरोध में हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के बाद हुआ था तथा 23 जनवरी, 2013 को समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट जमा कर दी गई थी।
  • न्यायमूर्ति लीला सेठ और वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम समेत, न्यायमूर्ति वर्मा की अध्यक्षता वाली इस समिति ने यौन उत्पीड़न विधेयक को ‘असंतोषजनक’ बताया था और कहा था कि यह विशाखा दिशानिर्देशों की भावना को प्रतिबिंबित नहीं करता है।
  • विशाखा दिशानिर्देश कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिये वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायलय द्वारा तैयार किया गया था।
  • रिपोर्ट में कहा गया था कि तत्कालीन प्रस्तावित कानून के तहत निर्धारित एक आंतरिक शिकायत समिति ‘अनुत्पादक’ होगी क्योंकि ऐसी आंतरिक शिकायतों से निपटने से महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने से हतोत्साहित किया जा सकता है।
  • इसके बजाय समिति ने सभी शिकायतों को प्राप्त करने और निर्णय लेने के लिये रोज़गार अधिकरण बनाने का प्रस्ताव रखा था।
  • शिकायतों के शीघ्र निपटान को सुनिश्चित करने के लिये न्यायमूर्ति वर्मा समिति ने प्रस्तावित किया था कि अधिकरण को सिविल कोर्ट के रूप में कार्य नहीं करना चाहिये, लेकिन प्रत्येक शिकायत से निपटने के लिये वे अपनी प्रक्रिया का चयन कर सकते हैं।

नियोक्ता पर दायित्व

  • समिति ने कहा था कि यौन उत्पीड़न की परिभाषा का दायरा बढ़ाते हुए किसी भी ‘अवांछित व्यवहार’ को शिकायतकर्त्ता की व्यक्तिपरक धारणा से देखा जाना चाहिये।
  • वर्मा समिति ने कहा था कि यदि एक नियोक्ता यौन उत्पीड़न को प्रोत्साहन देता है, ऐसे माहौल की अनुमति देता है जहाँ यौन दुर्व्यवहार व्यापक और व्यवस्थित हो जाता है, जहाँ नियोक्ता यौन उत्पीड़न पर कंपनी की नीति का खुलासा करने और जिस तरीके से कर्मचारी शिकायत दर्ज कर सकते हैं, उस में विफल रहता है, साथ ही ट्रिब्यूनल को शिकायत अग्रेषित करने में विफल रहता है तो इसके लिये नियोक्ता को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। कंपनी शिकायतकर्त्ता को मुआवजे का भुगतान करने के लिये भी उत्तरदायी होगी।
  • समिति ने महिलाओं को आगे आने और शिकायत दर्ज करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिये कई सुझाव भी दिये थे। मिसाल के तौर पर, समिति ने झूठी शिकायतों के लिये महिलाओं को दंडित करने का विरोध किया और इसे ‘कानून के उद्देश्य को खत्म करने से प्रेरित एक अपमानजनक प्रावधान’ कहा।
  • वर्मा समिति ने यह भी कहा था कि शिकायत दर्ज करने के लिये तीन महीने की समय सीमा को समाप्त किया जाना चाहिये और शिकायतकर्त्ता को उसकी सहमति के बिना स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिये।
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