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फसल विविधीकरण

  • 10 Feb 2022
  • 10 min read

प्रिलिम्स के लिये:

फसल विविधीकरण, कृषि वानिकी।

मेन्स के लिये:

फसल विविधीकरण और इसके लाभ, फसल विविधीकरण का अभ्यास करने की आवश्यकता।

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में आर्थिक मामलों के विभाग ने वार्षिक आर्थिक सर्वेक्षण में कहा कि जिन क्षेत्रों में धान, गेहूंँ और गन्ना उगाए जाते हैं वहांँ पानी की गंभीर कमी के साथ-साथ तिलहन उत्पादन को बढ़ाने और खाना पकाने के तेल के आयात पर निर्भरता को कम करने हेतु फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को अपनाने की तत्काल आवश्यकता है।

प्रमुख बिंदु 

फसल विविधीकरण:

  • फसल विविधीकरण से तात्पर्य नई फसलों या फसल प्रणालियों से कृषि उत्पादन को जोड़ने से है, जिसमें एक विशेष कृषि क्षेत्र पर कृषि उत्पादन की पूरक मूल्यवर्द्धित फसलों के विपणन से लाभ प्राप्त किया जाता है।
    • फसल प्रणाली: यह फसलों, उनके अनुक्रम और प्रबंधन तकनीकों को संदर्भित करती है जिसका उपयोग किसी विशेष कृषि क्षेत्र में वर्षों से किया जाता रहा है। 
    • प्रकार: भारत में प्रमुख फसल प्रणाली इस प्रकार है- क्रमिक फसल, एकल फसली व्यवस्था (Mono-Cropping), अंतर फसली (Intercropping), रिले क्रॉपिंग (Relay Cropping), मिश्रित अंतर फसली (Mixed Intercropping) और अवनालिका फसल (Alley Cropping)।
  • अधिकतर किसान आजीविका और आय के साधनों को बढ़ाने के लिये मिश्रित फसल-पशुधन प्रणाली का भी उपयोग करते हैं।
    • पशुपालन या पशु कृषि, विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अंतर्गत पालतू पशुओं (जैसे-गाय-भैस, कुत्ते, भेड़ और घोड़ा) के विभिन्न पक्षों जैसे भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य, प्रजनन आदि का अध्ययन किया जाता है। 
    • पशुपालन से तात्पर्य पशुधन को बढ़ाने और इनके चयनात्मक प्रजनन से है। यह कृषि की एक शाखा है।

फसल विविधीकरण की आवश्यकता:

  • प्रतिकूलता और जलवायु परिवर्तन:
    • एक किसान कृषि उत्पादन के दौरान कई प्रतिकूलताओं और जलवायु संबंधी अनिश्चितताओं का सामना कर सकता है, जैसे कि अनियमित वर्षा, ओले, सूखा, बाढ़ आदि।
    • इसके अलावा कटाई के बाद के नुकसान, भंडारण और सुलभ उचित विपणन की अनुपलब्धता जैसी चुनौतियाँ भी मौजूद हैं।
      • वर्तमान में मानव-वन्यजीव और/या मानव-फसल संघर्ष, वनाग्नि, कार्बनिक पदार्थ की कमी वाली मिट्टी, मोनोकल्चर, पौधों की बीमारी व संक्रमण, प्रवास एवं कृषि के प्रति युवाओं की अनिच्छा जैसी समस्याएँ भी काफी गंभीर रूप धारण कर रही हैं।
  • इनपुट लागत को बनाए रखने में समस्या:
    • भारतीय कृषि पाँच दशकों से भी अधिक समय से उत्पादकता बढ़ाने के लिये इनपुट लागत में वृद्धि से संबंधित गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है।
    • हालाँकि इनपुट की आनुपातिक उत्पादकता स्थिर बने रहने और फिर नीचे गिरने से पहले एक निश्चित समय के लिये बढ़ोतरी भी दर्ज करती है।
  • निम्नलिखित समान पैटर्न मिट्टी से विशिष्ट पोषक तत्त्वों का निष्कर्षण करते हैं:
    • उत्पादकता बढ़ाने के लिये किसान लंबे समय से सरकार द्वारा प्रचारित हरित क्रांति फसल पैटर्न - चावल-गेहूँ-चावल का उपयोग कर रहे हैं।
    • लंबे समय तक एक ही फसल पैटर्न का उपयोग करने से मिट्टी से विशिष्ट पोषक तत्त्व निकल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की आबादी में भी कमी आई है।
      • फसल के राइज़ोस्फीयर में विशेष पोषक तत्त्वों को एकत्र और अवशोषित करने में माइक्रोफ्यूनल (Microfaunal) की उपस्थिति अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होती है।
      • मृदा में सूक्ष्मजीवों की आबादी में कमी एक गंभीर मुद्दा है क्योंकि सूक्ष्म जीवों की गतिविधियों के बिना मिट्टी फसल उत्पादन के लिये स्थायी आवश्यक पारिस्थितिकी को खो सकती है।
    • एकल फसल पैटर्न संसाधन-उपयोग दक्षता को भी कम करता है।
    • इसके अलावा एकल फसल पैटर्न में एक ही प्रकार के कीड़ों और कीटों द्वारा हमला करने की अधिक संभावना होती है, जो बदले में कीटनाशकों का प्रयोग करके नियंत्रित किये जाते हैं।

कृषि वानिकी और सतत् फसल विविधीकरण में इसकी भूमिका:

  • परिचय:
    • यह स्वदेशी तकनीकी ज्ञान से पोषित आदिम और आदिवासी कृषि का एक हिस्सा है।
    • कृषि वानिकी एक भूमि-उपयोग प्रणाली है जिसमें पेड़, फसल और/या पशुधन को स्थानिक व अस्थायी तरीके से शामिल किया जाता है, जो जैविक एवं अजैविक घटकों के पारिस्थितिक तथा आर्थिक दोनों प्रकार के संबंधों को संतुलित करता है। यह उपलब्ध संसाधनों के कुशल उपयोग के लिये पेड़ों और फसलों के बीच पूरकता का उपयोग करता है।
    • जैविक, पारिस्थितिक, आर्थिक और सामाजिक विचारों के विभिन्न क्षेत्रों में दुनिया भर में विविधीकरण के लिये कृषि वानिकी का प्रयोग किया जाता है।
      • उदाहरण के लिये उत्तरी अमेरिका में किसानों ने अपने आर्थिक लाभ और प्राकृतिक संसाधन संरक्षण में सुधार के लिये कृषि वानिकी को प्राथमिकता दी।
      • यूरोप में कृषि वानिकी से संबंधित पेड़ों में ओक, चीड़, जुनिपर और देवदार का प्रभुत्व है। ऑस्ट्रेलिया में पीनस रेडियाटा और यूकेलिप्टस ग्लोब्युलस, जबकि अफ्रीकी महाद्वीप में कॉफी, कोको, नारियल, पाम ऑयल और रबर के खेतों पर आम के वृक्ष कृषि वानिकी के हिस्से हैं।
      • भारत के दक्षिणी भाग के घरेलू उद्यान फसल विविधता के लिये अस्थायी और स्थानिक व्यवस्था को बनाए रखने के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिसके परिणामस्वरूप इकाई क्षेत्र से स्थायी उत्पादकता होती है।
  • फसल विविधीकरण को बनाए रखने में भूमिका:
    • कृषि वानिकी के तहत खाद्य और पोषण सुरक्षा के लिये भोजन, चारा, फल, फाइबर, ईंधन, मछली, स्वाद, सुगंध, गोंद और रेज़िन के साथ-साथ अन्य गैर-लकड़ी उत्पाद उत्पन्न किये जा सकते हैं। यह आजीविका का समर्थन भी कर सकती है और सभी पारिस्थितिकी में कृषि वातावरण को बढ़ावा दे सकती है।
    • कृषि वानिकी एक बहुक्रियाशील उत्पादन प्रणाली में योगदान करती है जो मैक्रो और सूक्ष्मजीवों के लिये विविध आवासों के निर्माण एवं भावी पीढ़ियों हेतु भू-आकृतियों को बनाए रखने के कारण जैव विविधता को बढ़ाती है।
    • यह परंपरागत रूप से उगाई जाने वाली फसलों को अन्य व्यावसायिक फसलों जैसे- अनाज, तिलहन, दालें, सब्जियाँ, कृषि बागवानी (Horti Silviculture), सिल्वोलेरीकल्चर (Silvaolericulture), सिल्वोफ्लोरीकल्चर (Silver Floriculture), सिल्विमेडिसिनल (Silvimedicinal), जलीय वानिकी (Aquaforestry), सिल्विपाश्चर  तथा बागवानी के साथ एकीकृत करने का अवसर प्रदान करती है।

आगे की राह

  • हालाँकि ऐसी चुनौतियाँ हैं जिन्हें नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है, लेकिन फसल विविधीकरण किसानों की आय दोगुनी करने और राष्ट्र को खाद्य सुरक्षा संपन्न बनाने का एक अवसर प्रदान करता है।
  • इसलिये सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूँ और चावल के अलावा अन्य उत्पादित फसलों को खरीदकर फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना चाहिये। इससे घटते भूमिगत जलस्तर की आपूर्ति द्वारा इसके संरक्षण में भी मदद मिल सकती है।
  • कृषि उत्सर्जन को स्मार्ट पशुधन प्रबंधन, उर्वरक अनुप्रयोग में प्रौद्योगिकी-सक्षम निगरानी तंत्र, ​​क्षेत्रीय ढाँचे में सरल परिवर्तन और अन्य अधिक कुशल कृषि तकनीकों के माध्यम से भी सीमित किया जा सकता है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ

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