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डेली न्यूज़

जैव विविधता और पर्यावरण

वर्षांत समीक्षा-2025: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय

स्रोत: पी. आई. बी.

चर्चा में क्यों?

वर्षांत समीक्षा 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने भारत की पर्यावरण संरक्षण, जलवायु समुत्थानशीलता और संस्थागत सुधारों में प्रमुख उपलब्धियों का विस्तार से विवरण प्रस्तुत किया।

  • दस्तावेज़ 2025 को राष्ट्र के सतत और पारिस्थितिक रूप से पुनर्स्थापकीय विकास की दिशा में संक्रमण को सुदृढ़ करने का वर्ष बताता है।

सारांश

  • भारत ने वन क्षेत्र, वन्यजीव अभयारण्य और शहरी हरित क्षेत्र को बढ़ाया, जिससे उसे वनों में वृद्धि के लिये वैश्विक पहचान प्राप्त की।
  • मुख्य सुधारों में ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम, वन संशोधन नियम, परिवेश 2.0 और पर्यावरणीय मंज़ूरी प्रक्रियाओं को सरल बनाना शामिल थे।
  • भविष्य की प्राथमिकताएँ कानूनी प्रवर्तन, सर्कुलर इकोनॉमी, नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु-सहिष्णु ढाँचा और समुदाय-नेतृत्व वाले पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापना पर केंद्रित है।

वर्ष 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की मुख्य उपलब्धियाँ क्या हैं?

  • वन संरक्षण और हरित आवरण: भारत ने वन क्षेत्र में वैश्विक रैंकिंग में 9वाँ स्थान प्राप्त किया (FAO 2025) और वार्षिक शुद्ध वन वृद्धि में विश्व में तीसरे स्थान पर बना रहा।
    • अरावली परिदृश्य पुनर्स्थापन के लिये विस्तृत कार्ययोजना जारी की गई और वर्ष 2025 में 36,025 हेक्टेयर क्षेत्र का पुनर्स्थापन किया गया।
  • वन्यजीव संरक्षण: नया माधव टाइगर रिज़र्व (मध्य प्रदेश) घोषित किया गया; छठा अखिल भारतीय बाघ आकलन अभियान शुरू किया गया। हाथी अभयारण्य 2025 में बढ़कर 33 हो गए (2014 में 26 थे)।
  • जलवायु परिवर्तन में नेतृत्व: जून 2025 तक गैर-जीवाश्म ईंधनों से स्थापित ऊर्जा क्षमता 50% पार कर गई, जो निर्धारित लक्ष्य (2030) से 5 साल पहले है। कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) को लागू किया गया।
  • वायु गुणवत्ता और शहरी पर्यावरण: 103 शहरों में PM10 स्तर में कमी दर्ज की गई (2024-25 की तुलना में 2017-18 से), 22 शहरों ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) को पूरा किया
    • नगर वन योजना के तहत वर्ष 2025 में 75 नई परियोजनाएँ स्वीकृत की गईं।
  • तटीय, आर्द्रभूमि एवं मैंग्रोव संरक्षण: MISHTI कार्यक्रम के तहत वर्ष 2025 में 4,536 हेक्टेयर मैंग्रोव क्षेत्र का पुनर्स्थापन किया गया। 
    • 11 नए रामसर स्थलों को जोड़ा गया, जिससे भारत की कुल संख्या 96 हो गई, जो एशिया में सबसे अधिक है। उदयपुर और इंदौर को भारत के पहले रामसर वेटलैंड शहरों के रूप में नामित किया गया है।
    • वर्ष 2025–26 तक 18 समुद्र तटों को ब्लू फ्लैग प्रमाणन प्राप्त हुआ।
  • अपशिष्ट प्रबंधन एवं परिपत्र अर्थव्यवस्था: विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) पोर्टल पर 71,401 उत्पादक और 4,447 पुनर्चक्रणकर्ता पंजीकृत हैं (दिनांक 03.12.2025 तक)लगभग 375.11 लाख टन अपशिष्ट का पुनर्चक्रण किया गया।
  • पर्यावरणीय जागरूकता: मिशन LiFE के अंतर्गत 34 लाख से अधिक LiFE कार्यक्रमों के माध्यम से 6 करोड़ से अधिक प्रतिभागियों को जोड़ा गया तथा मेरी LiFE पोर्टल के अनुसार 4.96 करोड़ प्रतिज्ञाएँ ली गईं।

वर्ष 2025 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा किये गए प्रमुख सुधार क्या हैं?

  • GCP के लिये संशोधित ढाँचा: संशोधित ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) में अवनत वन भूमि के पुनर्स्थापन के लिये सार्वजनिक और निजी संस्थाओं की भागीदारी को बढ़ाया गया।
    • ग्रीन क्रेडिट केवल 5 वर्ष बाद जारी किये जाते हैं, जब ≥40% वितान (कैनोपी) घनत्व प्राप्त हो (5 वर्ष से अधिक आयु वाले प्रत्येक वृक्ष के लिये  1 क्रेडिट)।
  • वन (संरक्षण एवं संवर्द्धन) संशोधन नियम, 2025: अवनत/सरकारी/रिकॉर्डेड वन क्षेत्रों (≤0.4 वितान) में भूमि बैंक निर्माण का दायरा बढ़ाया गया।
    • महत्त्वपूर्ण/रणनीतिक/गहन/परमाणु खनिज खनन के अनुमोदन को सरल बनाया गया और इसके लिये प्रतिपूरक वनीकरण (CA) मानदंडों को बढ़ाया गया।
  • पर्यावरण संरक्षण (प्रदूषित स्थलों का प्रबंधन) नियम, 2025: प्रदूषित स्थलों की पहचान, मूल्यांकन और सुधार के लिये रूपरेखा प्रदान की गई।
  • पर्यावरण ऑडिट नियम, 2025: सत्यापन और अनुपालन ऑडिट के लिये प्रमाणित तृतीय-पक्ष पर्यावरण ऑडिटर्स की कैडर पेश की गई, जिससे विश्वास आधारित अनुपालन को मज़बूत किया गया।
  • PARIVESH 2.0: PARIVESH 2.0 ने क्लियरेंस प्रबंधन में पूर्ण स्वचालन प्राप्त किया और वास्तविक समय निर्णय समर्थन के लिये GIS को एकीकृत किया। यह एक सिंगल-विंडो इंटरफेस के रूप में कार्य करता है, जो PM गति शक्ति NMP, राष्ट्रीय सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS), CAMPA की डिजिटल भुगतान गेटवे और QCI-NABET के मान्यता पोर्टल से जुड़ा है।
  • पर्यावरणीय मंज़ूरी एवं कारोबार की सुगमता में सुधार: खनिज परियोजनाओं को ‘छोटे’ से ‘मुख्य’ श्रेणी में पुनर्वर्गीकृत किया गया तथा 5 हेक्टेयर तक के पट्टेदार क्षेत्र को EIA अधिसूचना, 2006 के तहत श्रेणी ‘B2’ में आँका गया।
    • औद्योगिक परिसरों/पार्कों और व्यक्तिगत उद्योगों के लिये ग्रीन बेल्ट आवश्यकताओं को प्रदूषण क्षमता के आधार पर युक्तिसंगत बनाया गया।

भारत में पर्यावरण संरक्षण को सुदृढ़ करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

  • कानूनी व्यवस्था और प्रवर्तन को सशक्त बनाना: प्रदूषण की निगरानी के लिये AI आधारित सेंसरों को सुदृढ़ किया जाए, साथ ही नियामक संस्थाओं के स्वतंत्र ऑडिट के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाए और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के अधिकार क्षेत्र का विस्तार किया जाए। इसके अतिरिक्त स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को एक स्वतंत्र मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए तथा प्रदूषक भुगतान सिद्धांत जैसे नियमों को विधिक रूप से संहिताबद्ध किया जाएँ।
  • हरित वित्तपोषण एवं आर्थिक साधन: एक सुदृढ़ घरेलू कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम (CCTS) विकसित किया जाए और इस्पात, सीमेंट तथा ताप विद्युत जैसे उच्च प्रदूषणकारी क्षेत्रों के लिये ऑफसेट को अनिवार्य बनाया जाए, साथ ही संप्रभु हरित बॉण्डों का विस्तार किया जाए। इसके अलावा, यह अनिवार्य किया जाए कि कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) व्यय का कम-से-कम 50% पर्यावरणीय परियोजनाओं पर व्यय हो।
  • शहरी नियोजन: जलवायु-केंद्रित शहरी नियोजन को लागू किया जाए, जिसमें अनिवार्य ग्रीन बेल्ट, नेट-ज़ीरो भवन संहिता और मिश्रित भूमि उपयोग शामिल हों। इसके लिये स्पंज सिटी ढाँचे और प्रकृति-आधारित समाधान (NbS) को ब्लू–ग्रीन अवसंरचना हेतु मास्टर प्लानों में संस्थागत रूप से शामिल किया जाए। AMRUT 2.0 और स्मार्ट सिटीज़ मिशन जैसी पहलों को सतत जल निकासी, शहरी वानिकी और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित सार्वजनिक परिवहन के साथ एकीकृत किया जाए।
  • तटीय एवं वन क्षेत्रीय अनुकूलन विकसित करना: वन धन विकास केंद्रों को वनीकरण कार्यक्रमों के साथ एकीकृत किया जाए तथा अवनत पारिस्थितिकी तंत्रों के पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को प्राथमिकता दी जाए।
  • ऊर्जा, परिवहन, कृषि एवं उद्योग में संक्रमण: इलेक्ट्रिक वाहनों, हाइड्रोजन ईंधन-सेल वाहनों और बायो-CNG बसों को बढ़ावा देकर परिवहन क्षेत्र का डी-कार्बोनाइज़ेशन करना। परिशुद्ध कृषि, संरक्षण जुताई और जलवायु-सहिष्णु बीज किस्मों के माध्यम से जलवायु-स्मार्ट कृषि को प्रोत्साहित करना, साथ ही महत्त्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण हेतु घरेलू ‘अर्बन माइनिंग’ क्लस्टरों का विकास करना।

निष्कर्ष:

वर्ष 2025 में भारत के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने हरित आवरण, वन्यजीव संरक्षण और जलवायु कार्रवाई में उल्लेखनीय प्रगति को सुदृढ़ किया, साथ ही महत्त्वपूर्ण नियामक एवं डिजिटल शासन सुधारों की शुरुआत की गई, जिससे पारिस्थितिक स्थिरता को रूपांतरकारी आर्थिक विकास के साथ एकीकृत करने में देश को वैश्विक नेतृत्व की स्थिति प्राप्त हुई।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत के पर्यावरण संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण तथा जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना को सुदृढ़ करने हेतु आवश्यक नीतिगत उपायों का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. FAO 2025 के अनुसार वन क्षेत्र के मामले में भारत की वैश्विक रैंकिंग क्या है? 
भारत वन क्षेत्र के मामले में विश्व स्तर पर 9वें स्थान पर है और वार्षिक शुद्ध वन लाभ (Annual Net Forest Gain) के संदर्भ में तीसरे स्थान पर है।

2. 2025 में भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता में कौन-सा महत्त्वपूर्ण लक्ष्य हासिल किया गया? 
जून 2025 में गैर-जीवाश्म ईंधनों से स्थापित क्षमता 50% से अधिक है। भारत ने अपने इस NDC लक्ष्य को वर्ष 2030 की निर्धारित समय-सीमा से पाँच साल पहले ही प्राप्त कर लिया है।

3. वर्ष 2025 में मिष्टी (MISHTI) कार्यक्रम के तहत कितने मैंग्रोव का पुनरुद्धार किया गया? 
वर्ष 2025 में MISHTI कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 4,536 हेक्टेयर मैंग्रोव क्षेत्र का पुनरुद्धार (Restoration) किया गया है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः (2023)

  1. भारत में जैवविविधता प्रबंधन समितियाँ नागोया प्रोटोकॉल के उद्देश्यों को हासिल करने के लिये प्रमुख कुंजी है।   
  2. जैवविविधता प्रबंधन समितियों के अपने क्षेत्राधिकार के अंतर्गत जैविक संसाधनों तक पहुँच के लिये संग्रह शुल्क लगाने की शक्ति सहित पहुँच और लाभ सहभागिता निर्धारित करने के लिये महत्त्वपूर्ण प्रकार्य हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


प्रश्न. भारतीय कृषि परिस्थितियों के संदर्भ में ‘संरक्षण कृषि’ की संकल्पना का महत्त्व बढ़ जाता है। निम्नलिखित में से कौन-कौन से संरक्षण कृषि के अंतर्गत आते हैं? (2018)

  1. एकधान्य कृषि पद्धतियों का परिहार  
  2. न्यूनतम जोत को अपनाना  
  3. बागानी फसलों की खेती का परिहार  
  4. मृदा धरातल को ढकने के लिये फसल अवशिष्ट का उपयोग 
  5. स्थानिक एवं कालिक फसल अनुक्रमण/फसल आवर्तनों को अपनाना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) 1, 3 और 4

(b) 2, 3, 4 और 5

(c) 2, 4 और 5

(d) 1, 2, 3 और 5

उत्तर: (c)


मेन्स: 

प्रश्न. ‘’भारत में आधुनिक कानून की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पर्यावरणीय समस्याओं का संविधानीकरण है।" सुसंगत वाद विधियों की सहायता से इस कथन की विवेचना कीजिये। (150 शब्दों में उत्तर दीजिये)

प्रश्न.. भारत में जैवविविधता किस प्रकार अलग-अलग पाई जाती है? वनस्पतिजात और प्राणिजात के संरक्षण में जैवविविधता अधिनियम, 2002 किस प्रकार सहायक है? (2018)


जैव विविधता और पर्यावरण

पेरिस समझौते के 10 वर्ष

प्रिलिम्स के लिये: पेरिस समझौता, UNFCCC, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs), क्योटो प्रोटोकॉल बनाम पेरिस समझौता, जलवायु वित्त, सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियाँ (CBDR)

मेन्स के लिये: वैश्विक जलवायु शासन: UNFCCC, पेरिस समझौता, क्योटो प्रोटोकॉल, भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ और ऊर्जा परिवर्तन

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

पेरिस समझौते (2015) ने नवंबर 2025 में अपने दस वर्ष पूरे किये, जिससे इसकी प्रभावशीलता और प्रासंगिकता का वैश्विक स्तर पर पुनर्मूल्यांकन शुरू हुआ।

सारांश:

  • पेरिस समझौते ने जलवायु कार्रवाई में सार्वभौमिक भागीदारी सुनिश्चित की और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC), पारदर्शिता व्यवस्था तथा वैश्विक स्टॉकटेक के माध्यम से शमन, अनुकूलन तथा जलवायु वित्त को मुख्यधारा में शामिल किया।
  • हालाँकि, यह समझौता अब भी कमज़ोर जवाबदेही, निरंतर वित्तीय एवं समानता संबंधी अंतराल तथा अपर्याप्त महत्त्वाकांक्षा जैसी चुनौतियों से ग्रस्त है। इससे अधिक मज़बूत प्रतिबद्धताओं, पूर्वानुमेय जलवायु वित्त तथा विकास प्राथमिकताऍं और जलवायु कार्रवाई के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता रेखांकित होती है।

 पेरिस समझौता क्या है?

  • परिचय: यह जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) के तहत विधिक रूप से बाध्यकारी वैश्विक समझौता है जिसका अंगीकार वर्ष 2015 (COP 21) में किया गया था।
    • इसने क्योटो प्रोटोकॉल का स्थान लिया जो जलवायु परिवर्तन के शमन हेतु एक पूर्व समझौता था।
  • उद्देश्य: इसका लक्ष्य वैश्विक तापवृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में 2°C से काफी नीचे सीमित रखना है तथा इसे 1.5°C तक सीमित करने के प्रयास करना है।
  • कार्यप्रणाली: पेरिस समझौता क्रमिक रूप से अधिक मज़बूत जलवायु कार्रवाई के पाँच-वर्षीय चक्र का अनुसरण करता है।
    • पेरिस समझौते के अंतर्गत, प्रत्येक देश को हर पाँच वर्ष में अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) प्रस्तुत करना और उसे अद्यतन करना होता है, जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने तथा जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने की उनकी योजनाओं की रूपरेखा होती है
    • वर्ष 2023 में पहला ग्लोबल स्टॉकटेक COP28 में संपन्न हुआ, जिसमें वर्ष 2030 तक शमन, अनुकूलन और जलवायु वित्त पर तीव्र कार्रवाई का आह्वान किया गया, साथ ही जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को क्रमशः समाप्त करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया।
    • देशों को दीर्घकालिक निम्न-उत्सर्जन विकास रणनीतियाँ प्रस्तुत करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है। हालाँकि ये स्वैच्छिक होती हैं।
    • COP24 (काटोविस, पोलैंड) और COP26 (ग्लासगो, स्कॉटलैंड) में पेरिस रूलबुक ने समझौते के कार्यान्वयन हेतु विस्तृत नियम निर्धारित किये।
  • मुख्य उपलब्धियाँ:
    • सार्वभौमिक भागीदारी: लगभग सभी देशों (194 देश तथा यूरोपीय संघ) ने एक ही ढाँचे के अंतर्गत जलवायु कार्रवाई के प्रति प्रतिबद्धता जताई।
    • जलवायु वित्त प्रतिबद्धता: विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु शमन और अनुकूलन में सहायता देने हेतु वर्ष 2025 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता की।
      • COP29 (बाकू, अज़रबैजान, 2024) में एक नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य (NCQG) तय किया गया, जिसके अंतर्गत वर्ष 2035 तक प्रतिवर्ष कम-से-कम 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर का उच्च लक्ष्य निर्धारित किया गया।
    • समानता का सिद्धांत: पेरिस समझौते में सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियों (CBDR) के सिद्धांत को अंतर्निहित किया गया, जिससे विभिन्न देशों की क्षमताओं और ज़िम्मेदारियों को मान्यता मिली।
    • जलवायु नीति का मुख्यधारा में समावेशन: जलवायु कार्रवाई को राष्ट्रीय कानूनों, बजटों और विकास योजनाओं में समाहित किया गया (जैसे—यूरोपीय संघ का ग्रीन डील, भारत का मिशन LiFE)।
    • जलवायु वित्त और बाज़ारों को बढ़ावा: ग्रीन बॉण्ड, कार्बन बाज़ारों और जलवायु निवेशों का विस्तार हुआ। हालाँकि यह अब भी अपर्याप्त है।

भारत और पेरिस समझौता

  • भारत ने वर्ष 2015 में UNFCCC के समक्ष अपना इच्छित आधारित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (INDC) प्रस्तुत किया था, जिसे पेरिस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2030 तक की अवधि के लिये इसके प्रथम राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के रूप में स्वीकार किया गया।
  • अद्यतन NDC के तहत भारत ने LIFE (पर्यावरण के लिये जीवनशैली) के माध्यम से सतत जीवनशैली को बढ़ावा देने, स्वच्छ और जलवायु-अनुकूल विकास पथ अपनाने, वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में वर्ष 2030 तक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी लाने तथा स्थापित विद्युत क्षमता का लगभग 50% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
    • यह 2.5–3 बिलियन टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करने, संवेदनशील क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन को सुदृढ़ करने, घरेलू तथा विकसित देशों के स्रोतों से वित्त जुटाने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं जलवायु अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देने का भी लक्ष्य रखता है।
    • भारत ने UNFCCC और पेरिस समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुनः पुष्टि करते हुए कहा कि यह अद्यतन वर्ष 2070 तक अपने दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो लक्ष्य की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
  • उपलब्धियाँ: भारत ने वर्ष 2025 में गैर-जीवाश्म स्रोतों से अपनी विद्युत उत्पादन क्षमता का 50% हासिल कर लिया, जो वर्ष 2030 के लक्ष्य से काफी अधिक है तथा COP26 में वर्ष 2070 तक नेट ज़ीरो उत्सर्जन के लिये प्रतिबद्धता जताई। 
    • इसने इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA), कोएलिशन फॉर डिज़ास्टर रेजिलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर (CDRI) और LiFE आंदोलन जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक नेतृत्व का प्रदर्शन किया है, साथ ही अपने जलवायु दृष्टिकोण को ‘विकसित भारत 2047’ के साथ संरेखित किया है तथा सौर और हरित हाइड्रोजन को विकास और रोज़गार के प्रमुख चालक के रूप में स्थापित किया है।

पेरिस समझौते से संबंधित क्या-क्या चिंताएँ हैं?

  • स्वैच्छिक प्रतिबद्धताएँ: पेरिस समझौते ने क्योटो प्रोटोकॉल के तहत विकसित देशों के लिये कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों को स्वैच्छिक राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों से बदल दिया, जिससे जवाबदेही कमज़ोर हो गई।
  • समानता संबंधी चिंताएँ: उत्सर्जन में समान रूप से कटौती की अपेक्षाएँ साझा लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व (CBDR) के सिद्धांत को कमज़ोर करती हैं और विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन की अनदेखी करती हैं तथा कम विकसित देशों (LDC) एवं छोटे द्वीप विकासशील राज्यों (SIDS) को पर्याप्त समर्थन के बिना अस्तित्व संबंधी जोखिमों का सामना करना पड़ता है।
  • जलवायु वित्त की कमी: भारत ने NCQG को अपर्याप्त मानते हुए अस्वीकार कर दिया और यह स्पष्ट किया कि विकासशील देशों के समक्ष मौजूद जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिये 300 अरब अमेरिकी डॉलर की प्रतिबद्धता पर्याप्त नहीं है।
    • भारत, अन्य वैश्विक दक्षिण देशों के साथ मिलकर, विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन की बढ़ती मांगों को पूरा करने के लिये सालाना कम-से-कम 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का समर्थन कर रहा है, जिसमें से 600 बिलियन अमेरिकी डॉलर अनुदान या अनुदान-समकक्ष संसाधनों के रूप में होंगे। 
  • शमन-केंद्रित दृष्टिकोण: उत्सर्जन कटौती पर अत्यधिक ध्यान देने से अनुकूलन और लचीलेपन की अनदेखी होती है, जो कमज़ोर देशों के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
  • विकास संबंधी बाधाएँ: जलवायु संबंधी दायित्व और कार्बन सीमा कर (जैसे कि (CABM)) जैसे उपाय विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा और औद्योगिक विकल्पों को सीमित करते हैं।
  • अपर्याप्त महत्त्वाकांक्षा: वर्तमान राष्ट्रीय लक्ष्यों में महत्वाउकांक्षा का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वर्तमान 'राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान' (NDCs) विश्व को 2.5°C से 2.9°C की तापमान वृद्धि की ओर धकेल रहे हैं, जो पेरिस समझौते के 1.5°C या 2°C के अनिवार्य लक्ष्यों से काफी दूर है। यह अंतराल वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र के लिये विनाशकारी जलवायु जोखिम उत्पन्न करता है।

जलवायु परिवर्तन संबंधी कार्रवाई को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • स्वैच्छिक से लागू करने योग्य कार्रवाई की ओर बदलाव: जलवायु प्रतिबद्धताओं को अब मात्र 'स्वैच्छिक प्रतिज्ञाओं' तक सीमित नहीं रहना चाहिये, बल्कि इन्हें कानूनी रूप से बाध्यकारी और समयबद्ध राष्ट्रीय नीतियों का रूप दिया जाना चाहिये। इसके लिये प्रत्येक क्षेत्र हेतु विशिष्ट 'कार्बन बजट' निर्धारित करना और प्रगति के मूल्यांकन के लिये मापने योग्य मानक तय करना अनिवार्य है।
  • जलवायु परिवर्तन के शमन और अनुकूलन के बीच संतुलन: जलवायु संबंधी कार्रवाई में अनुकूलन को समान प्राथमिकता दी जानी चाहिये, साथ ही जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढाँचे, कृषि, जल प्रणालियों और प्रारंभिक चेतावनी तंत्रों में अधिक निवेश किया जाना चाहिये।
  • जलवायु वित्त अंतर को कम करना: विकसित देशों को अपनी जलवायु वित्त संबंधी प्रतिबद्धताओं को न केवल पूरा करना चाहिये बल्कि उनका विस्तार भी करना चाहिये, वहीं बहुपक्षीय बैंकों, ग्रीन बॉन्ड और मिश्रित वित्त तंत्र में सुधार के माध्यम से विकासशील देशों के लिये वित्तीय लागत को कम किया जाना चाहिये।
  • समानता और जलवायु न्याय को सुदृढ़ बनाना: सामान्य लेकिन विभेदित ज़िम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) के सिद्धांत कार्यान्वयन का मार्गदर्शन करना चाहिये, जिससे विकासशील देशों के लिये नीतिगत कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके और कार्बन सीमा कर जैसे व्यापार उपायों में निष्पक्षता बनी रहे।
  • प्रौद्योगिकी तक पहुँच को गति प्रदान करना: नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण, हरित हाइड्रोजन और ग्रिड प्रौद्योगिकियों तक किफायती पहुँच को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, पेटेंट साझाकरण और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से विस्तारित किया जाना चाहिये।
  • जलवायु विज्ञान और शासन को मज़बूत करना: प्रभावी जलवायु कार्रवाई की आधारशिला विश्वसनीय विज्ञान और पारदर्शी डेटा पर टिकी है। इसके लिये एक सुदृढ़ निगरानी और सत्यापन तंत्र अनिवार्य है, जो न केवल नीतियों की सटीकता सुनिश्चित करे बल्कि जलवायु संबंधी भ्रामक सूचनाओं का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने में भी सक्षम हो।

जलवायु कार्रवाई में चीन मॉडल

  • जलवायु कार्रवाई का चीन मॉडल विकास-प्रथम दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें तीव्र औद्योगिकीकरण के चरण के दौरान उत्सर्जन में वृद्धि की अनुमति दी जाती है, साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा, विद्युतीकरण और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों में बड़े पैमाने पर क्षमताओं का समानांतर विकास किया जाता है।
  • आर्थिक पैमाने और ऊर्जा सुरक्षा हासिल करने के बाद चीन ने वर्ष 2030 से पहले अपने उत्सर्जन को चरम तक पहुँचाने और वर्ष 2060 तक नेट ज़ीरो लक्ष्य हासिल करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे यह दिखाया गया है कि स्वच्छ ऊर्जा में प्रारंभिक निवेश बाद में तेज़ी से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद कर सकता है।

UNFCCC_COP

UNFCC_COP_29

निष्कर्ष

पेरिस समझौते ने विश्व भर के देशों को साथ लाने में मदद की, लेकिन इसमें कम जवाबदेही, वित्तीय अंतर और समानता के मुद्दे हैं। जलवायु कार्रवाई को मज़बूत बनाने के लिये लागू होने वाली प्रतिबद्धताएँ, सुनिश्चित वित्त, अनुकूलन तथा उत्सर्जन कमी पर समान ध्यान देना आवश्यक है। भारत के लिये अपने जलवायु लक्ष्य को विकास के साथ जोड़ना एक संतुलित और व्यावहारिक मार्ग है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. एक दशक बाद पेरिस समझौते की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। कौन-सी संरचनात्मक सीमाएँ इसकी सफलता में बाधा उत्पन्न करती हैं?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. पेरिस समझौता क्या है और इसे कब अपनाया गया था?
 पेरिस समझौता एक कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक जलवायु संधि है, जिसे वर्ष 2015 में COP21 के दौरान UNFCCC के तहत अपनाया गया था। इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2°C से नीचे और संभव हो तो 1.5°C तक सीमित करना है।

2. राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?
NDCs यानी राष्ट्रीय स्तर पर तय किये गए योगदान, हर देश द्वारा हर पाँच वर्ष में प्रस्तुत किये जाने वाले जलवायु कार्रवाई योजनाएँ हैं। इनमें मुख्य रूप से उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य और अनुकूलन के उपाय बताए जाते हैं।

3. COP28 में पहले ग्लोबल स्टॉकटेक का क्या महत्त्व था?
ग्लोबल स्टॉकटेक (2023) ने विश्व भर के देशों की सामूहिक प्रगति का मूल्यांकन किया और वर्ष 2030 तक उत्सर्जन कम करने, अनुकूलन और जलवायु वित्त में तेज़ कदम उठाने की आवश्यकता जताई।

4. पेरिस समझौते की कमज़ोर जवाबदेही के लिये आलोचना क्यों की जाती है?
यह कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्यों पर नहीं, बल्कि स्वैच्छिक NDCs पर निर्भर करता है और पालन न करने पर कोई दंड नहीं है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. ‘अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित अंशदान (Intended Nationally Determined Contributions)’ पद को कभी-कभी समाचारों में किस संदर्भ में देखा जाता है? (2016)

(a) युद्ध-प्रभावित मध्य-पूर्व के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय देशों द्वारा दिये गए वचन 

(b) जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्य-योजना

(c) एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक) की स्थापना करने में सदस्य राष्ट्रों द्वारा किया गया पूंजी योगदान 

(d) धारणीय विकास लक्ष्यों के बारे में विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्य-योजना

उत्तर : (B)


प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
  2. यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विकं तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2 °C या कोशिश करें कि 1.5 °C से भी अधिक न होने पाए।
  3. विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3

(b)  केवल 2

(c)  केवल 2 और 3

(d)  1, 2 और 3

उत्तर: (b)


मेन्स

प्रश्न 1. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आई.पी.सी.सी.) ने वैश्विक समुद्र स्तर में 2100 ईस्वी तक लगभग एक मीटर की वृद्धि का पूर्वानुमान लगाया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत और दूसरे देशों में इसका क्या प्रभाव होगा? (2023) 

प्रश्न 2. ग्लोबल वार्मिंग (वैश्विक तापन) की चर्चा कीजिये और वैश्विक जलवायु पर इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिये। क्योटो प्रोटोकॉल, 1997 के आलोक में ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनने वाली ग्रीनहाउस गैसों के स्तर को कम करने के लिये नियंत्रण उपायों को समझाइये। (2022) 

प्रश्न 3. संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई प्रतिबद्धताएँ क्या हैं? (2021)


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