प्रारंभिक परीक्षा
जैव विविधता अभिसमय के समक्ष भारत की 7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट
स्रोत: डाउन टू अर्थ
चर्चा में क्यों?
भारत ने जैव विविधता पर कन्वेंशन (CBD) को अपनी 7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) के अनुरूप 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों (NBT) और 142 संकेतकों की दिशा में देश की प्रगति का व्यापक मूल्यांकन प्रदान किया गया है।
- 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों में से केवल 2 ही सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में शेष लक्ष्यों के लिये नीतियों की रूपरेखा दी गई है, लेकिन इसमें मात्रात्मक साक्ष्य या वर्ष 2030 के लिये स्पष्ट अनुमानों का अभाव है।
जैव विविधता पर कन्वेंशन को प्रस्तुत की गई 7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट के संबंध में प्रमुख तथ्य क्या हैं ?
- परिचय: वर्ष 2022 में KMGBF के अंगीकरण के बाद से यह भारत का पहला ‘पूर्ण प्रगति आकलन’ है, जो वर्ष 2030 तक जैव विविधता के ह्रास को रोकने के लिये राष्ट्र की प्रतिबद्धता पर एक महत्त्वपूर्ण ‘रियलिटी चेक’ के रूप में कार्य करता है।
- तैयारी और कार्यक्षेत्र: यह रिपोर्ट केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा 33 केंद्रीय मंत्रालयों, भारतीय वन्यजीव संस्थान, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण से प्राप्त सुझावों और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) से प्राप्त तकनीकी सहायता के साथ तैयार की गई है।
- रिपोर्ट का महत्त्व: विश्व के सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में से एक होने के नाते भारत का प्रदर्शन वैश्विक जैव विविधता परिणामों के लिये महत्त्वपूर्ण है। रिपोर्ट के आँकड़े KMGBF के 23 वैश्विक लक्ष्यों की दिशा में हुई प्रगति पर नज़र रखने वाले अंतर्राष्ट्रीय आकलन में सहायक होंगे, जिनमें '30×30' लक्ष्य (वर्ष 2030 तक भूमि और समुद्र के 30% हिस्से का संरक्षण) भी शामिल है।
- लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में प्रगति: डिजिटल NR7 डेटा पोर्टल के माध्यम से संकलित 142 राष्ट्रीय संकेतकों का उपयोग करके प्रगति का आकलन किया जाता है।
- NBT1 (जैव विविधता-समावेशी योजना): वन और वृक्ष आवरण में निरंतर प्रगति हुई है और अब यह 25.17% (827,357 वर्ग किमी.) है, जो वर्ष 2021 और 2023 के दौरान 1,445.81 वर्ग किमी. की वृद्धि को दर्शाती है। आर्द्रभूमि सूचीकरण पूर्ण किया जा चुका है, PARIVESH 2.0 पोर्टल ने पर्यावरणीय स्वीकृतियों को सुव्यवस्थित किया है तथा पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों को अधिसूचित किया गया है।
- NBT2 (पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापन): भारत ने अपने 'बॉन चैलेंज' संकल्प के तहत 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि के लक्ष्य के मुकाबले 24.1 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को पुनर्स्थापित किया है अथवा पुनर्स्थापन की प्रक्रिया में रखा है।
- भारत के वन कार्बन भंडार में लगभग 81.5 मिलियन टन की वृद्धि हुई और यह बढ़कर 7,285.5 मिलियन टन हो गया, जबकि मैंग्रोव क्षेत्र में मामूली वृद्धि हुई तथा बाँस क्षेत्र में 1,540 वर्ग किमी. का विस्तार दर्ज किया गया है।
- समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है और सरकार अब औपचारिक संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क से परे अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECM) की पहचान कर रही है।
- महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ और चिंताएँ:
- भूमि अपक्षय: पुनर्स्थापना प्रयासों के बावजूद भारत के भौगोलिक क्षेत्र का 29.77% (97 मिलियन हेक्टेयर) अपक्षय के अधीन है, जिससे यह संकेत मिलता है कि नए अपक्षय की दर पुनर्स्थापना की तुलना में अधिक हो सकती है।
- संरक्षण कवरेज (30x30 लक्ष्य): भारत के भौगोलिक क्षेत्र का केवल 5% से थोड़ा अधिक हिस्सा औपचारिक रूप से संरक्षित क्षेत्रों के रूप में नामित है। रिपोर्ट यह स्पष्ट नहीं करती कि क्या भारत 2030 तक वैश्विक 30% संरक्षण लक्ष्य प्राप्त करेगा।
- प्रजातियों के पुनरुद्धार में पक्षपात: प्रमुख प्रजातियों (जैसे– बाघ 3,167, एशियाई शेर, गैंडे और पहली राष्ट्रीय हिम तेंदुआ मूल्यांकन) की सफलता को अधिक महत्त्व दिया गया है। हालाँकि कम परिचित प्रजातियों के बारे में डेटा सीमित है।
- डेटा अंतराल और निगरानी: जैव विविधता का डेटा विभिन्न विभागों में बिखरा हुआ है और नए संकेतकों के लिये कोई एक समान विधि नहीं है। अलग-अलग संग्रह अंतराल और तेज़ी से हो रहे तकनीकी बदलावों के कारण दीर्घकालिक रुझानों की तुलना करना कठिन है।
- आर्थिक और तकनीकी क्षमता: रिपोर्ट में सीमित वित्तीय संसाधन और तकनीकी क्षमता को संरचनात्मक बाधाओं के रूप में दर्शाया गया है, साथ ही पारिस्थितिक तंत्रों पर जलवायु परिवर्तन (बाढ़, सूखा, वनाग्नि) के बढ़ते प्रभाव को भी उजागर किया गया है।
- कृषि और आक्रामक प्रजातियाँ: हालाँकि देश के 8.65% हिस्से पर कृषि-वानिकी का विस्तार है, लेकिन रिपोर्ट में कीटनाशकों की कमी, पोषक तत्त्वों के अपवाह तथा आक्रामक प्रजातियों के नियंत्रण जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर मात्रात्मक विश्लेषण का अभाव है, जो जैव विविधता के नुकसान के प्रमुख कारक हैं।
कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा
- परिचय: KMGBF एक महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जिसे दिसंबर 2022 में जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (CBD) के पार्टीज़ की कॉन्फ्रेंस (COP15) में अपनाया गया।
- इसका उद्देश्य 2030 तक जैव विविधता हानि को रोकना और पलटना तथा वर्ष 2050 तक प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन सुनिश्चित करना है। यह पूर्व के आइची जैव विविधता लक्ष्यों (2011-20) की जगह लेता है।
- ढाँचा: यह चार दीर्घकालिक लक्ष्यों के इर्द-गिर्द बनाया गया है जो वर्ष 2050 के लिये हैं (प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन की दृष्टि) और 23 क्रियात्मक लक्ष्यों हेतु 2030 तक (वैश्विक उपलब्धि) निर्धारित किये गए हैं, जो पारिस्थितिक तंत्र संरक्षण, सतत उपयोग और लाभ-साझाकरण जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को शामिल करते हैं।
- 30x30" लक्ष्य (लक्ष्य 3): इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वर्ष 2030 तक विश्व के कम-से-कम 30% स्थलीय, अंतर्देशीय जल और तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों को संरक्षित क्षेत्रों तथा 'अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों' (OECMs) के माध्यम से प्रभावी ढंग से संरक्षित एवं प्रबंधित किया जाए। यह वर्तमान वैश्विक कवरेज के लगभग 16% से एक महत्वपूर्ण वृद्धि दर्शाता है।
- कार्यान्वयन तंत्र: जैव विविधता अभिसमय (CBD) के सभी पक्षों, जिसमें भारत भी शामिल है, के लिये यह आवश्यक है कि वे GBF के अनुरूप अपने राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित करें और उन्हें लागू करें, अपनी 'राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीतियों और कार्ययोजनाओं' (NBSAPs) को अद्यतन (Update) करें तथा प्रगति की निगरानी के लिये मज़बूत निगरानी प्रणालियाँ स्थापित करें।
जैव विविधता पर अभिसमय
- परिचय: जैव विविधता पर अभिसमय (CBD) 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन से उत्पन्न एक ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जो जैविक संसाधनों के संरक्षण और सतत उपयोग के लिये प्राथमिक वैश्विक ढाँचा प्रदान करती है।
- तीन मुख्य उद्देश्य: CBD तीन परस्पर संबंधित लक्ष्यों पर आधारित है:
- जैव विविधता का संरक्षण,
- इसके घटकों का सतत उपयोग, और
- आनुवंशिक संसाधनों से उत्पन्न लाभों का उचित व न्यायसंगत साझाकरण।
- व्यापक क्षेत्र: यह अभिसमय जैव विविधता को सभी स्तरों पर कवर करता है, जिसमें प्रजातियों में विविधता (आनुवंशिक) और पारिस्थितिक तंत्र शामिल है। यह स्थलीय, समुद्री और अन्य जलीय पारिस्थितिक तंत्रों पर लागू होता है।
- प्रमुख पूरक प्रोटोकॉल:
- कार्टाजेना जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल (2000): आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी से उत्पन्न सजीव संशोधित जीवों (LMO) के सुरक्षित संचालन, परिवहन और उपयोग पर केंद्रित है।
- नागोया अभिगम और लाभ साझाकरण प्रोटोकॉल (2010): आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से उत्पन्न लाभों के उचित और न्यायसंगत साझाकरण के लिये एक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है, जिससे CBD के तीसरे उद्देश्य को क्रियान्वित किया जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा (KMGBF) क्या है?
यह CBD के 15वें अभिसमय (COP15, 2022) में अपनाया गया एक वैश्विक समझौता है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक जैव विविधता के नुकसान को कम करना है, जो वर्ष 2030 के लिये 23 लक्ष्यों और वर्ष 2050 के लिये चार दीर्घकालिक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया गया है।
2. KMGBF के तहत "30x30 लक्ष्य" क्या है?
इसका उद्देश्य वर्ष 2030 तक संरक्षित क्षेत्रों और अन्य प्रभावी क्षेत्र-आधारित संरक्षण उपायों (OECM) के माध्यम से विश्व की कम-से-कम 30% भूमि, अंतर्देशीय जल और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण करना है।
3. 7वीं राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार भारत में कौन-से जैव विविधता लक्ष्य वर्तमान में सही दिशा में हैं?
NBT1 (जैव विविधता-समावेशी भूमि और समुद्री उपयोग योजना) और NBT2 (पारिस्थितिक तंत्र बहाली) को 23 राष्ट्रीय जैव विविधता लक्ष्यों में से सही दिशा में होने के रूप में पहचाना गया है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रश्न. भूमंडलीय पर्यावरण सुविधा' के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं? (2014)
(a) यह 'जैव विविधता पर अभिसमय' एवं 'जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र ढाँचा अभिसमय' के लिये वित्तीय क्रियाविधि के रूप में काम करता है
(b) यह भूमंडलीय स्तर पर पर्यावरण के मुद्दों पर वैज्ञानिक अनुसंधान करता है
(c) यह OECD के अधीन एक अभिकरण है, जो अल्पविकसित देशों को उनके पर्यावरण की सुरक्षा के विशिष्ट उद्देश्य से प्रौद्योगिकी और निधियों का अंतरण सुकर बनाता है
(d) दोनों (a) और (b)
उत्तर: (a)
प्रश्न. ‘‘मोमेंटम फॉर चेंज: क्लाइमेट न्यूट्रल नाउ’’ यह पहल किसके द्वारा प्रवर्तित की गई है? (2018)
(a) जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल
(b) UNEP सचिवालय
(c) UNFCCC सचिवालय
(d) विश्व मौसमविज्ञान संगठन
उत्तर: (c)
प्रारंभिक परीक्षा
भारत में वायु प्रदूषण
चर्चा में क्यों?
फिनलैंड स्थित एक स्वतंत्र अनुसंधान समूह, सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) द्वारा किये गए एक विश्लेषण में पाया गया कि सत्र 2025-26 की सर्दियों के दौरान भारत के 238 शहरों में से 204 शहर राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा करने में विफल रहे।
- इस विश्लेषण में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा सतत परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों (CAAQMS) के माध्यम से एकत्र किये गए आँकड़ों का उपयोग किया गया, जिसके निष्कर्ष भारत भर में शीतकालीन वायु प्रदूषण की गंभीरता को उजागर करते हैं।
CREA विश्लेषण के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- व्यापक राष्ट्रीय अनुपालन की कमी: सर्दियों के दौरान 238 शहरों में से 204 शहरों में औसत PM2.5 का स्तर भारतीय राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (NAAQS) के 40 µg/m³ से अधिक दर्ज किया गया।
- विश्लेषण किये गए 238 शहरों में से एक भी शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 5 µg/m³ के सुरक्षित PM2.5 मानक को पूरा करने में सफल नहीं रहा।
- सबसे प्रदूषित शहर: गाज़ियाबाद देश का सबसे प्रदूषित शहर बनकर उभरा है, जहाँ PM2.5 की औसत सांद्रता 172 µg/m³ है। इसके बाद नोएडा (166 µg/m³) और दिल्ली (163 µg/m³) का स्थान रहा।
- भारत के अधिकांश आर्थिक केंद्रों को ज़हरीली हवा की समस्या से जूझना पड़ा। दिल्ली (163 µg/m³), कोलकाता (78 µg/m³), मुंबई (48 µg/m³) और चेन्नई (44 µg/m³) सभी में सर्दियों के दौरान PM2.5 की सांद्रता राष्ट्रीय मानक से अधिक दर्ज की गई।
- भारत के सबसे स्वच्छ शहर: कर्नाटक का चामराजनगर शीतकालीन मौसम के दौरान भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया, जहाँ PM2.5 की औसत सांद्रता मात्र 19 µg/m³ थी।
- बंगलुरु एकमात्र ऐसा महानगर था जिसने अपनी वायु गुणवत्ता को NAAQS सीमा से थोड़ा नीचे बनाए रखा, जहाँ PM2.5 की औसत सांद्रता 39 µg/m³ दर्ज की गई।
- दक्षिण और मध्य/पूर्वोत्तर भारत का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा। दस सबसे स्वच्छ शहरों में कर्नाटक के 8, मध्य प्रदेश का 1 तथा मेघालय का एक 1 शामिल हैं।
वायु प्रदूषण से संबंधित प्रमुख शब्द
मुख्य प्रदूषक
- पर्टिकुलेट मैटर (PM10 और PM2.5): वायुमंडल में निलंबित सूक्ष्म ठोस या तरल पदार्थ।
- PM10 कणों का व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। PM2.5 अत्यंत सूक्ष्म कण (2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम) होते हैं जो फेफड़ों के अवरोधकों (lung barrier) को भेदकर रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकते हैं।
- भू-स्तरीय (ट्रोपोस्फेरिक) ओज़ोन (O3): समतापमंडलीय ओज़ोन (जो हमें पराबैंगनी किरणों से बचाती है) के विपरीत, भू-स्तरीय ओज़ोन हानिकारक द्वितीयक प्रदूषक है।
- यह सीधे उत्सर्जित नहीं होता है, बल्कि सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में नाइट्रोजन के ऑक्साइड (NOx) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOC) के बीच रासायनिक प्रतिक्रियाओं द्वारा निर्मित होता है।
- वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC): कार्बनिक रसायन जो कक्षीय तापमान पर आसानी से वाष्प या गैस बन जाते हैं।
- ये पेंट, सॉल्वैंट्स, वाहनों से निष्कर्षण और औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्सर्जित होते हैं और स्मॉग निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
- द्वितीयक प्रदूषक: ऐसे प्रदूषक जो सीधे किसी स्रोत से उत्सर्जित नहीं होते हैं, बल्कि प्राथमिक प्रदूषकों के बीच रासायनिक प्रतिक्रियाओं द्वारा निम्न वायुमंडल में बनते हैं (जैसे– भू-स्तरीय ओज़ोन, फोटोकेमिकल स्मॉग)।
वायुमंडलीय परिघटना
- फोटोकेमिकल स्मॉग: एक भूरी-भूरी (Brownish-Gray) धुंध, जो हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन के ऑक्साइड से प्रदूषित वायुमंडल पर सौर पराबैंगनी विकिरण की क्रिया के कारण होती है।
- यह गर्म और धूपयुक्त जलवायु वाले अत्यधिक मोटरयुक्त (जहाँ वाहनों की संख्या अधिक हो) शहरों में एक आम समस्या है।
- तापमान व्युत्क्रमण: तापमान व्युत्क्रमण तब होता है जब वायु का तापमान घटने के बजाय ऊँचाई के साथ बढ़ता है, जिससे शीतल पवन के ऊपर एक उष्ण परत बन जाती है जो प्रदूषकों को ऊपर उठने से रोक देती है।
- शीतकाल में दिल्ली में पड़ने वाली सर्दी के कारण प्रदूषक निम्न वायुमंडल में जमा हो जाते हैं, जिससे घने स्मॉग का निर्माण होता है और सतह-स्तरीय वायु प्रदूषण में वृद्धि हो जाती है।
- अम्लीय वर्षा: नाइट्रिक और सल्फ्यूरिक अम्ल की हानिकारक मात्रा वाली वर्षा, जो मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के दहन से वायुमंडल में उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड से बनती है।
निगरानी और मापन
- वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI): लोगों तक वायु गुणवत्ता की स्थिति को प्रभावी ढंग से संप्रेषित करने के लिये एक कलर-कोडेड टूल।
- भारत में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक 8 प्रदूषकों (PM10, PM2.5, NO2, SO2, CO, O3, NH3 और Pb) की सांद्रता के आधार पर एक समग्र सूचकांक की गणना करता है।
- NAAQS (राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक): केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा परिवेशी वायु गुणवत्ता के लिये निर्धारित मानक।
- भारत में NAAQS में 12 प्रदूषक शामिल हैं (AQI में शामिल 8 के अतिरिक्त बेंजीन, बेंजो(a) पाइरीन, आर्सेनिक और निकल)।
- सफर (वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान एवं अनुसंधान प्रणाली): पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) की एक पहल जो वायु गुणवत्ता पर लगभग वास्तविक समय (नियर रियल-टाइम) में स्थान-विशिष्ट जानकारी और 1-3 दिन पहले इसका पूर्वानुमान प्रदान करती है।
- CAAQMS (निरंतर परिवेशी वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशन): अत्यधिक उन्नत, स्वचालित स्टेशन जो वायु प्रदूषकों को लगातार मापते हैं और केंद्रीय सर्वरों पर वास्तविक समय में डेटा प्रेषित करते हैं (दैनिक AQI की गणना के लिये उपयोग किया जाता है)।
शासन और कार्रवाई ढाँचे
- ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP): दिल्ली-NCR क्षेत्र में लागू आपातकालीन प्रकृति के प्रदूषण-रोधी उपायों का एक समूह।
- GRAP के तहत उपाय "श्रेणीबद्ध" हैं और AQI के बिगड़ने ("खराब" से "गंभीर+") के साथ चरणबद्ध रूप से लागू होते हैं।
- भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानक: भारत सरकार द्वारा आंतरिक दहन इंजन और मोटर वाहनों से वायु प्रदूषकों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के लिये स्थापित BS उत्सर्जन मानदंड।
- भारत वर्तमान में BS-VI मानदंडों का पालन कर रहा है।
- राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा संपूर्ण देश में वायु प्रदूषण से व्यापक रूप से निपटने के लिये शुरू की गई एक राष्ट्रीय स्तर की रणनीति, जिसका लक्ष्य वर्ष 2024 तक पार्टिकुलेट मैटर सांद्रता में 20-30% की कमी लाना था (बाद में इसे संशोधित कर वर्ष 2026 तक 40% तक कम कर दिया गया)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. PM2.5 क्या है और यह खतरनाक क्यों है?
PM2.5 वह कण है जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये कण फेफड़ों और रक्त प्रवाह में गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं, जिससे साँस संबंधी और हृदय रोग हो सकते हैं।
2. एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) क्या है?
एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) भारत में वायु गुणवत्ता के स्तर को बताने के लिये उपयोग किया जाने वाला एक रंग-कोडित उपकरण है, जिसकी गणना आठ प्रमुख प्रदूषकों की सांद्रता के आधार पर की जाती है।\
3. तापमान व्युत्क्रमण क्या है और यह वायु प्रदूषण को कैसे प्रभावित करता है
तापमान व्युत्क्रमण तब होता है जब ऊपर की हवा गर्म और ज़मीन के पास की हवा ठंडी हो, जिससे प्रदूषक फँस जाते हैं और गंभीर स्मॉग उत्पन्न होता है। यह स्थिति विशेष रूप से उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान देखने को मिलती है।
4. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) का उद्देश्य क्या है?
NCAP का लक्ष्य 2026 तक पार्टिकुलेट मैटर (PM) प्रदूषण को 40% तक कम करना है। इसके लिये शहर-विशेष कार्ययोजनाएँ, निगरानी विस्तार और समन्वित प्रदूषण नियंत्रण उपाय अपनाए जाएंगे।
5. ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) क्या है?
ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) दिल्ली-NCR के लिये एक आपातकालीन प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली है, जिसमें AQI स्तरों के अनुसार प्रतिबंधों और उपायों को धीरे-धीरे लागू किया जाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. वायु प्रदूषण कम करने हेतु कृत्रिम वर्षा कराने के तरीके में किनका प्रयोग होता है? (2025)
(a) सिल्वर आयोडाइड और पोटैशियम आयोडाइड
(b) सिल्वर नाइट्रेट और पोटैशियम आयोडाइड
(c) सिल्वर आयोडाइड और पोटैशियम नाइट्रेट
(d) सिल्वर नाइट्रेट और पोटैशियम क्लोराइड
उत्तर: (a)
प्रश्न. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) किस प्रकार केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) से भिन्न है? (2018)
- एनजीटी का गठन एक अधिनियम द्वारा किया गया है, जबकि सीपीसीबी का गठन सरकार के कार्यपालक आदेश से किया गया है।
- एनजीटी पर्यावरणीय न्याय उपलब्ध करता है तथा उच्चतर न्यायालयों में मुकदमों के भार को कम करने में सहायता करता है, जबकि सीपीसीबी झरनों एवं कुओं की सफाई को प्रोत्साहित करता है तथा देश में वायु की गुणवत्ता में सुधार लाने का लक्ष्य रखता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा हाल ही में जारी किये गए संशोधित वैश्विक वायु गुणवत्ता दिशा-निर्देशों (AQG) के मुख्य बिंदुओं का वर्णन कीजिये। विगत 2005 के अद्यतन से ये किस प्रकार भिन्न हैं? इन संशोधित मानकों को प्राप्त करने के लिये भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम में किन परिवर्तनों की आवश्यकता है? (2021)
रैपिड फायर
डेनमार्क ने HIV तथा सिफलिस के माता से शिशु संचरण का उन्मूलन किया
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा डेनमार्क को यूरोपीय संघ में HIV और सिफलिस के माँ-से-शिशु में संचरण (EMTCT) को समाप्त करने वाला पहला देश प्रमाणित किया गया है।
- माता से शिशु संचरण (EMTCT) का उन्मूलन: माता से शिशु संचरण (EMTCT) HIV और सिफलिस जैसे संक्रमणों का गर्भावस्था, प्रसव या स्तनपान के दौरान माँ से उसके शिशु में संचरण है, जो बिना हस्तक्षेप के शिशु संक्रमण, मृत जन्म, नवजात मृत्यु या जन्मजात बीमारियों का कारण बन सकता है।
- मातृ-शिशु संक्रमण उन्मूलन के मानदंड : EMTCT के लिये WHO के मानदंडों में माँ से बच्चे में संक्रमण की दर को प्रति 100,000 जीवित जन्मों पर 50 से कम करना तथा यह सुनिश्चित करना शामिल है कि 95% से अधिक गर्भवती महिलाओं को परीक्षण और उपचार प्राप्त हो।
- वैश्विक संदर्भ: डेनमार्क विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा आपातकालीन चिकित्सा नियंत्रण (EMTCT) के लिये मान्यता प्राप्त 20 से अधिक देशों और क्षेत्रों में शामिल हो गया है, जो प्रमाणन की दिशा में प्रगति कर रहे हैं। इनमें कैरिबियन (जैसे– एंगुइला, एंटीगुआ), दक्षिण अमेरिका (जैसे– ब्राज़ील), अफ्रीका (जैसे– बोत्सवाना) और एशिया (मलेशिया, मालदीव) के देश शामिल हैं।
- WHO की त्रिपक्षीय उन्मूलन रणनीति: WHO चार स्तंभों के माध्यम से HIV, सिफलिस और हेपेटाइटिस बी के त्रिपक्षीय उन्मूलन को बढ़ावा देता है:
- सार्वभौमिक प्रसवपूर्व देखभाल
- एकीकृत मातृ संक्रमण परीक्षण
- प्रभावी उपचार प्रोटोकॉल
- सामुदायिक भागीदारी और मानवाधिकार संरक्षण से युक्त सुदृढ़ स्वास्थ्य प्रणाली।
- HIV: ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV) शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली, विशेष रूप से CD4 कोशिकाओं पर हमला करता है। यदि इसका ससमय उपचार न किया जाए, तो यह एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम (AIDS) का कारण बनता है, जिससे शरीर जानलेवा संक्रमणों तथा कैंसर के प्रति सुभेद्य हो जाता है।
- सिफिलिस: सिफिलिस ट्रेपोनेमा पैलिडम नामक जीवाणु से होने वाला संक्रमण है। यह यौन संपर्क के माध्यम से फैलता है और चरणबद्ध रूप से विकसित होता है जिसमें पहले बिना दर्द वाले घाव, फिर चकत्ते दिखाई देते हैं तथा उपचार न होने पर यह हृदय और मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुँचा सकता है।
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रैपिड फायर
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में नाबालिगों के लिये सोशल मीडिया पर प्रतिबंध
स्रोत: द हिंदू
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश द्वारा नाबालिगों के लिये सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा ने संवैधानिक बहस को जन्म दिया है, क्योंकि इंटरनेट को विनियमित करना मूल रूप से केंद्र सरकार के अनन्य अधिकार क्षेत्र में आता है।
- राज्य स्तर पर पहल: कर्नाटक (16 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्त्ताओं पर प्रतिबंध) और आंध्र प्रदेश (13 वर्ष से कम आयु के उपयोगकर्त्ताओं पर प्रतिबंध) ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के कारण बच्चों पर पड़ने वाले नकारात्मक मनोवैज्ञानिक प्रभावों को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।
- संघ का अनन्य क्षेत्राधिकार: भारतीय संविधान की 7 वीं अनुसूची के तहत दूरसंचार और इंटरनेट विनियमन पूरी तरह से संघ सूची (प्रविष्टि 31: डाक एवं तार, टेलीफोन, वायरलेस, प्रसारण और संचार के अन्य समान रूप) के अंतर्गत आते हैं।
- परिणामस्वरूप, भारत का डिजिटल क्षेत्र केंद्रीय विधि द्वारा शासित है, मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 द्वारा।
- ऐसे उपाय जो सीधे तौर पर डिजिटल मध्यस्थों को शर्तें निर्धारित करते हैं, परंपरागत रूप से केंद्र सरकार की कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
- इंटरनेट की संरचना के कारण, केंद्र सरकार के सहयोग के बिना किसी राज्य-विशिष्ट प्रतिबंध को लागू करना व्यावहारिक रूप से कठिन है, क्योंकि केंद्र सरकार ही गेटवे और इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को नियंत्रित करती है।
- राज्य द्वारा संभावित औचित्य: राज्य, राज्य या समवर्ती सूचियों के अंतर्गत आने वाले विषयों, जैसे: ‘सार्वजनिक व्यवस्था,’ ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य,’ या ‘बाल कल्याण’ का हवाला देकर इन प्रतिबंधों को उचित ठहराने का प्रयास कर सकते हैं।
- मूल अधिकार बनाम उचित प्रतिबंध: डिजिटल अधिकारों के समर्थकों का तर्क है कि व्यापक प्रतिबंध किसी बच्चे (नाबालिग) की वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(A)) और सूचना के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
- किसी भी प्रकार का प्रतिबंध केवल तभी स्वीकार्य है जब वह अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत ‘युक्तिसंगत प्रतिबंध’ की कसौटी पर खरा उतरे और अनुपातिकता के सिद्धांत के अनुरूप हो।
- वैश्विक उदाहरण: यह स्थानीय बहस एक वैश्विक प्रवृत्ति को दर्शाती है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया बच्चों के लिये राष्ट्रव्यापी सोशल मीडिया प्रतिबंध लागू करने वाला पहला देश बन गया है तथा इंडोनेशिया ने 16 वर्ष से कम उम्र के उपयोगकर्त्ताओं के लिये इसी तरह के नियमों की घोषणा की है।
| और पढ़ें: बच्चों के लिये सोशल मीडिया नियमन |
रैपिड फायर
केरल में मिला महापाषाणकालीन लैटेराइट शैलकृत कक्ष
केरल के कासरगोड ज़िले में एक महत्त्वपूर्ण महापाषाणकालीन लैटेराइट शैलकृत कक्ष की खोज हुई है, जो क्षेत्र की प्रागैतिहासिक अंत्येष्टि प्रथाओं एवं भौतिक संस्कृति के संबंध में नवीन दृष्टिकोण प्रदान करती है।
- यह कक्ष महापाषाणकालीन शवाधान का वह भाग हैं, जहाँ अनुष्ठानिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न आकार तथा प्रकार के मृद्भांडों को साथ में दफनाकर ऐसे कक्षों का निर्माण किया था।।
महापाषाणकालीन संस्कृति
- परिचय: महापाषाणकालीन संस्कृति में ऐसी प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक प्रथाएँ शामिल हैं, जिनमें विशाल शैल-संरचनाओं का निर्माण किया जाता था। ये मुख्यतः बस्तियों से दूर स्थित अंत्येष्टि स्थलों/कब्रगाहों के रूप में प्रयुक्त होती थीं।
- समयावधि: पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर दक्षिण भारत की महापाषाणकालीन संस्कृतियाँ 1000 ई.पू. से 100 ई. तक विस्तृत थीं, जिनका शीर्ष काल 600 ई.पू. से 100 ई. के मध्य तक रहा।
- दक्षिण भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति पूर्ण विकसित लौह युग संस्कृति थी, जहाँ लौह प्रौद्योगिकी का पूर्ण विकास हो चुका था। इस क्षेत्र से हथियारों एवं कृषि उपकरणों सहित विभिन्न लौह वस्तुओं की प्राप्ति हुई है।
- भौगोलिक विस्तार: महापाषाणकालीन संस्कृति का मुख्य केंद्र दक्कन में है, विशेषतः गोदावरी नदी के दक्षिण में।
- प्रमुख स्थल हैं- ब्रह्मगिरि एवं चंद्रावली (कर्नाटक), जुनापाणी, खाप एवं मुहुर्जहरी (महाराष्ट्र), तथा आदिचनल्लूर (तमिलनाडु)।
- इस प्रकार के कक्ष पंजाब मैदान, इंडो-गंगा घाटी, राजस्थान, गुजरात तथा बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) में भी पाए गए है।
- जीविका एवं संस्कृति: महापाषाणकालीन लोग कृषि, शिकार, मत्स्यपालन एवं पशुपालन पर जीवन-निर्वाह करते थे। इन स्थलों पर पाए जाने वाले शैलचित्रों में शिकार दृश्यों, पशु-हमलों एवं सामूहिक नृत्य शामिल हैं, जो उनकी सामाजिक-संस्कृति का दर्पण प्रस्तुत करते हैं।
| और पढ़ें: महापाषाणकालीन पदचिह्न और मानव आकृति |
रैपिड फायर
भारत-जापान CEPA बैठक
भारत–जापान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA) के तहत सातवीं संयुक्त समिति की बैठक टोक्यो में आयोजित की गई, जिसमें समझौते के क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दों की समीक्षा और द्विपक्षीय आर्थिक सहभागिता बढ़ाने पर चर्चा की गई।
- चर्चाओं में द्विपक्षीय व्यापार और निवेश, व्यापारिक माहौल में सुधार और कैमरून के याउंडे में होने वाले विश्व व्यापार संगठन (WTO) के आगामी 14वें मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (मार्च 2026) की तैयारियों सहित व्यापक मुद्दों को शामिल किया गया।
भारत-जापान CEPA
- परिचय: भारत-जापान व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA), जो अगस्त 2011 में लागू हुआ था, एक ऐतिहासिक द्विपक्षीय व्यापार समझौता है। इसके अंतर्गत वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार, प्राकृतिक व्यक्तियों की आवाजाही (पेशेवरों का आना-जाना), निवेश, बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), सीमा शुल्क प्रक्रियाएँ और व्यापार से जुड़े अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं।
- शुल्क उन्मूलन: इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच व्यापार होने वाले 94% से अधिक वस्तुओं पर 10 वर्षों की अवधि में कस्टम ड्यूटी समाप्त करने का प्रावधान है।
भारत-जापान आर्थिक संबंध
- द्विपक्षीय व्यापार का आयतन: वर्ष 2023–24 में कुल व्यापार लगभग USD 22.85 बिलियन था। जापान से भारत के लिये निर्यात USD 17.69 बिलियन और भारत से जापान हेतु निर्यात USD 5.15 बिलियन था, जिससे भारत के लिये व्यापक व्यापार घाटा दर्शाया गया।
- व्यापार हिस्सेदारी रैंकिंग: भारत जापान के कुल व्यापार में 18वें स्थान पर है (1.4% हिस्सेदारी), जबकि जापान भारत के कुल व्यापार (2.1% हिस्सेदारी) में 17वें स्थान पर है।
- FDI प्रवाह: वर्ष 2000 से दिसंबर 2024 तक भारत में जापानी FDI का संचयी आँकड़ा लगभग USD 43.2 बिलियन है, जिससे जापान भारत में FDI के लिये 5वाँ सबसे बड़ा स्रोत देश बन गया है।
- जापानी FDI का क्षेत्रीय वितरण: जापानी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मुख्यतः ऑटोमोबाइल, विद्युत उपकरण, दूरसंचार, रसायन, वित्तीय सेवाएँ (बीमा) और फार्मास्यूटिकल्स में केंद्रित है।
| और पढ़ें: भारत-जापान संबंधों का पुनर्मूल्यांकन |
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