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स्पाइना बिफिडा

  • 09 Jan 2026
  • 15 min read

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रेखांकित किया है कि भारत में स्पाइना बिफिडा की व्यापकता दर विश्व में सबसे अधिक में से एक है (लगभग 1,000 जन्मों पर 4 मामले), जिससे प्रतिवर्ष 25,000 से अधिक बच्चे प्रभावित होते हैं।

  • परिचय: स्पाइना बिफिडा एक जन्मजात न्यूरल ट्यूब दोष है, जिसमें भ्रूण के प्रारंभिक विकास के दौरान रीढ़ की हड्डी (स्पाइनल कॉर्ड) पूरी तरह से बंद नहीं हो पाती है।
  • लक्षण (Symptoms): इससे प्रभावित बच्चों में हाइड्रोसेफेलस (मस्तिष्क में द्रव का अत्यधिक संचय), मूत्र एवं मल असंयम (नियंत्रण का अभाव), शिशु की पीठ पर दृश्यमान सूजन या गाँठ, क्लब फुट तथा अन्य अस्थि संबंधी विकृतियाँ विकसित हो सकती हैं। इसकी गंभीरता हल्की माँसपेशीय कमज़ोरी से लेकर पूर्ण पैराप्लेजिया (निचले अंगों का पूर्ण पक्षाघात) तक हो सकती है।
  • प्रभाव (Impact): यह स्थिति निचले अंगों के आंशिक या पूर्ण पक्षाघात का कारण बनती है, जिसके परिणामस्वरूप कई बच्चों को कम उम्र से ही व्हीलचेयर पर निर्भर होना पड़ता है। यद्यपि प्रभावित बच्चों की बौद्धिक क्षमता सामान्य रहती है, फिर भी भारत में 75% से अधिक बच्चों को विशेषीकृत चिकित्सकीय एवं शल्य-चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पातीं, जिससे परिवारों को दीर्घकालिक आर्थिक एवं मानसिक संकट का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर, विकलांगता भार तथा दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत में उल्लेखनीय वृद्धि करती है।
  • रोकथाम (Prevention): वर्ष 1991 से उपलब्ध वैश्विक चिकित्सकीय साक्ष्य यह पुष्टि करते हैं कि गर्भधारण के आसपास (Periconceptional Period) फोलिक एसिड अनुपूरण से स्पाइना बिफिडा के 70% से अधिक मामलों की रोकथाम संभव है।
  • उभरता हुआ अनुसंधान (Emerging Research): हालिया अध्ययनों से संकेत मिलता है कि चाय जैसे व्यापक रूप से उपभोग किये जाने वाले पेयों में फोलेट एवं विटामिन B12 का सुदृढ़ीकरण (Fortification) भारत में एनीमिया तथा न्यूरल ट्यूब दोषों की रोकथाम में सहायक हो सकता है।

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