जैव विविधता और पर्यावरण
कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण
- 13 Feb 2026
- 113 min read
प्रिलिम्स के लिये: कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS), अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी, कार्बन डाइऑक्साइड, ग्रीन स्टील
मेन्स के लिये: भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और नेट ज़ीरो मार्ग में CCUS की भूमिका, कठिन क्षेत्रों का/हार्ड-टू-एबेट डीकार्बोनाइज़ेशन, कार्बन बाज़ार
चर्चा में क्यों?
भारत के प्रधानमंत्री ने केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी द्वारा लिखित एक लेख साझा किया, जिसमें बताया गया है कि कार्बन कैप्चर तकनीक भारत की अगली इस्पात क्रांति को कैसे शक्ति प्रदान कर सकती है।
- इसी क्रम में केंद्रीय बजट 2026–27 में एक नई CCUS योजना के लिये 20,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो अनुसंधान से आगे बढ़कर व्यावसायिक क्रियान्वयन की ओर एक निर्णायक नीतिगत बदलाव का संकेत देता है।
सारांश
- CCUS एक महत्त्वपूर्ण तकनीक के रूप में उभर रहा है, जो स्टील, सीमेंट और ऊर्जा जैसे हार्ड-टू-एबेट होने वाले क्षेत्रों को डीकार्बनाइज़ करने में मदद करता है साथ ही ऊर्जा सुरक्षा, ग्रीन स्टील निर्यात तथा भारत के नेट ज़ीरो 2070 लक्ष्यों का समर्थन करता है।
- उच्च लागत, ऊर्जा हानि, अवसंरचना की खामियाँ, नियामक अंतर और सीमित CO₂ उपयोग के सीमित बाज़ार CCUS को बड़े पैमाने पर लागू होने में बाधा डालते हैं।
- CCUS को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिये CCUS क्लस्टर्स, कार्बन मार्केट, PLI प्रोत्साहन, कर छूट, CO₂ उपयोग में अनुसंधान एवं विकास और मज़बूत भंडारण मानक जैसी उपायों को अपनाया जा सकता है।
कार्बन कैप्चर, यूटिलाइज़ेशन और स्टोरेज (CCUS) क्या है?
- परिचय: अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, CCUS उन प्रौद्योगिकियों का समूह है, जिनके माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को बड़े बिंदु स्रोतों (जैसे– विद्युत उत्पादन या औद्योगिक संयंत्रों) से अथवा सीधे वातावरण से संगृहीत किया जाता है।
- इसके बाद संगृहीत CO₂ को दबाव में संपीडित कर विभिन्न उपयोगों के लिये परिवहन किया जाता है या फिर स्थायी भंडारण हेतु गहरी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में प्रविष्ट कराया जाता है।
- तीन-चरणीय प्रक्रिया:
- कैप्चर: औद्योगिक प्रक्रियाओं के दौरान उत्पन्न अन्य गैसों से CO₂ को अलग करना, जिसमें रासायनिक सॉल्वेंट्स, मेंब्रेन या ठोस शोषकों (सॉरबेंट्स) का उपयोग किया जाता है।
- परिवहन: संगृहीत CO₂ को संपीडित कर पाइपलाइनों, जहाज़ों या सड़क टैंकरों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।
- उपयोग और भंडारण:
- यूटिलाइज़ेशन: संगृहीत CO₂ का उपयोग यूरिया (उर्वरक), कृत्रिम ईंधन, निर्माण सामग्री (कंक्रीट क्योरिंग) अथवा रसायन (मेथनॉल) जैसे उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
- स्टोरेज: CO₂ को स्थायी रूप से पृथक् (सीक्वेस्ट्रेशन) करने के लिये इसे गहरी भूमिगत भू-वैज्ञानिक संरचनाओं (जैसे– समाप्त हो चुके तेल/गैस क्षेत्र या लवणीय एक्विफर) में इंजेक्ट किया जाता है।
CCUS भारत के लिये क्यों आवश्यक है?
- ‘हार्ड-टू-एबेट’ क्षेत्रों के लिये समाधान: इस्पात, सीमेंट और रसायन जैसे क्षेत्र केवल नवीकरणीय ऊर्जा अपनाकर उत्सर्जन कम नहीं कर सकते, क्योंकि इनमें होने वाला उत्सर्जन अक्सर प्रक्रियाजन्य होता है। उदाहरणतः सीमेंट निर्माण में चूना पत्थर को गर्म करने पर ईंधन चाहे कोई भी हो, रासायनिक प्रक्रिया के कारण CO₂ का उत्सर्जन अनिवार्य रूप से होता है।
- वर्तमान में CCUS ही ऐसी एकमात्र व्यवहार्य तकनीक है, जिसके माध्यम से इन प्रक्रियाओं का डीकार्बोनाइज़ेशन किया जा सकता है, बिना उद्योगों को बंद किये।
- ‘स्टील क्रांति’ को ऊर्जा प्रदान करना: भारत चीन के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक है, जिसका उत्पादन वित्त वर्ष 2024–25 में लगभग 152 मिलियन टन है।
- राष्ट्रीय इस्पात नीति, 2017 के तहत देश का लक्ष्य वित्त वर्ष 2030–31 तक 300 मिलियन टन कच्चा इस्पात क्षमता हासिल करना है और विकसित भारत दृष्टि के हिस्से के रूप में वर्ष 2047 तक इसे बढ़ाकर 500 मिलियन टन करना है।
- हालाँकि हाइड्रोजन आधारित इस्पात निर्माण भविष्य है, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर लागू करने में समय लगेगा। CCUS एक महत्त्वपूर्ण ब्रिज टेक्नोलॉजी के रूप में कार्य करता है, जो मौजूदा अवसंरचना का उपयोग करके तुरंत “लो-कार्बन स्टील” को संभव बनाता है।
- ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत प्राथमिक ऊर्जा (लगभग 55–60 प्रतिशत) के लिये कोयले पर अत्यधिक निर्भर है।
- कोयले का तत्काल परित्याग आर्थिक रूप से हानिकारक है। CCUS जीवाश्म ईंधनों के निरंतर उपयोग की अनुमति देता है, जिसमें पर्यावरणीय प्रभाव में उल्लेखनीय कमी आती है तथा संक्रमण काल के दौरान ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
- चक्रीय अर्थव्यवस्था: कैप्चर की गई CO₂ को मेथनॉल (एक स्वच्छ ईंधन) में परिवर्तित किया जा सकता है या संवर्द्धित ऑयल की पुनःप्राप्ति (EOR) में उपयोग किया जा सकता है, जहाँ पुराने तेल क्षेत्रों में CO₂ इंजेक्ट करके अवशिष्ट तेल निकाला जाता है, जिससे अपशिष्ट उत्पाद आय का स्रोत बन जाता है।
- कार्बन करों का सामना: वैश्विक बाज़ारों को स्थिरता मानदंडों, जैसे– यूरोपीय संघ के कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है।
- एकीकृत कार्बन कैप्चर प्रणालियों से निर्मित इस्पात का कार्बन फुटप्रिंट कम होगा, जो सीमा पार कार्बन करों से निर्यात की रक्षा करेगा।
- निम्न-कार्बन इस्पात विनिर्माण जलवायु-संरेखित अंतर्राष्ट्रीय निवेशों को आकर्षित करेगा।
- परिसंपत्तियों की दीर्घायु: भारत के पास इस्पात संयंत्रों का अपेक्षाकृत नया (युवा) बेड़ा है। CCUS इन मौज़ूदा परिसंपत्तियों को जलवायु लक्ष्यों को पूरा करते हुए संचालन जारी रखने में सक्षम बनाता है, जिससे वे "स्ट्रेंडेड असेट" बनने से बच जाती हैं।
- लक्ष्यों के साथ संरेखण: CCUS पहल भारत को पेरिस समझौते के लक्ष्यों (तापमान वृद्धि 2°C तक सीमित करना, अधिमानतः 1.5°C) को पूरा करने तथा जलवायु कार्रवाई एवं स्वच्छ ऊर्जा सहित पाँच सतत विकास लक्ष्यों (SDG) के साथ समन्वय स्थापित करने में सहायता कर सकती हैं।
CCUS से संबंधित भारत की पहलें
- केंद्रीय बजट आवंटन (2026-27): CCUS परियोजनाओं के समर्थन हेतु पाँच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये आवंटित किये गए।
- यह वित्तपोषण पाँच प्रमुख क्षेत्रों: विद्युत, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और रसायन पर केंद्रित है।
- नीति आयोग का CCUS पॉलिसी फ्रेमवर्क: इसने कैप्चर की लागत को कम करने के लिये व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) तंत्र का प्रस्ताव रखा।
- गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में CCUS केंद्र एवं क्लस्टर का विकास किया जाएगा, जहाँ अनेक उद्योग परिवहन एवं भंडारण अवसंरचना साझा करेंगे।
- हरित इस्पात वर्गीकरण: सरकार ने "हरित इस्पात" हेतु बेंचमार्क परिभाषित किये हैं, जिससे निर्यात पर कार्बन करों (जैसे– CBAM) से बचने हेतु उत्पादकों को CCUS जैसी निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियाँ अपनाने के लिये प्रोत्साहन मिलेगा।
- प्रति टन कच्चे इस्पात में 2.2 टन CO₂ या उसके समतुल्य (tCO2e/t-fs) से कम उत्सर्जन वाले इस्पात को अब आधिकारिक रूप से 3 से 5-स्टार रेटिंग के साथ 'हरित इस्पात' वर्गीकृत किया जा सकेगा।
- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का अनुसंधान एवं विकास का रोडमैप: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने CCUS के पायलट प्रदर्शन (2025-30) से वाणिज्यिक स्तर (2035-45) तक एक चरणबद्ध दृष्टिकोण रेखांकित करते हुए एक विस्तृत रोडमैप जारी किया है।
- IIT बॉम्बे और बंगलूरू स्थित JNCASR में कार्बन कैप्चर एवं उसके उपयोग हेतु दो राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र (NCoE-CCU) स्थापित किये गए हैं।
- CCUS पर मिशन इनोवेशन चैलेंज: यह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) की एक संयुक्त पहल है।
- इसे वर्ष 2018 में शुरू किया गया था, यह मिशन इनोवेशन के 24 सदस्य देशों के साथ सहयोगात्मक अनुसंधान एवं विकास करने हेतु लक्षित है। यह CO₂ कैप्चर, पृथक्करण, भंडारण एवं मूल्यवर्द्धन में अभूतपूर्व प्रौद्योगिकियों पर केंद्रित है।
भारत में CCUS को बढ़ाने में क्या चुनौतियाँ हैं?
- पूंजी गहनता: CCUS प्रौद्योगिकियाँ अत्यधिक महंगी हैं। ये विद्युत लागत में 60-80% तक की वृद्धि कर सकती हैं तथा इस्पात एवं सीमेंट को अधिक महंगा बना सकती हैं, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता प्रभावित होती है।
- ऊर्जा दंड: कार्बन कैप्चर प्रणालियों में किसी संयंत्र के 15-25% विद्युत का उपभोग होता है, जिससे दक्षता कम होती है तथा कोयले की खपत में वृद्धि होती है।
- अवसंरचनात्मक कमियाँ: भारत में वर्तमान में औद्योगिक क्लस्टरों (स्रोतों) से भंडारण स्थलों (सिंक) तक हाई-प्रेशर CO₂ के परिवहन हेतु समर्पित पाइपलाइन नेटवर्क का अभाव है।
- इन पाइपलाइनों के बिछाने हेतु भूमि अधिग्रहण करना, उच्च जनसंख्या घनत्व एवं भूमि अधिग्रहण कानूनों के कारण एक जटिल चुनौती बना हुआ है।
- भूवैज्ञानिक बाधाएँ एवं डेटा की कमी: यद्यपि भारत के पास अनुमानित भंडारण क्षमता (500-1000 GT) है, तथापि स्थायी भंडारण हेतु सटीक, सुरक्षित स्थानों को इंगित करने वाले हाई-रिज़ॉल्यूशन जियोलॉजिकल डेटा ("कार्बन भंडारण एटलस") का अभाव है।
- भारत की अधिकांश संभावित भंडारण क्षमता बेसाल्ट संरचनाओं (दक्कन ट्रैप) में निहित है। बेसाल्ट में CO₂ का भंडारण करना तकनीकी रूप से अधिक चुनौतीपूर्ण है, ये पश्चिम में पाई जाने वाली अवसादी चट्टान की संरचनाओं की तुलना में विश्व स्तर पर कम प्रमाणित हैं।
- भूमिगत उच्च-दबाव वाली गैस को इंजेक्ट करना सैद्धांतिक रूप से छोटे भूकंप या भूमि कंपन उत्पन्न कर सकता है।
- उपयोग संबंधी बाधाएँ: CO₂ के उपयोग का बाज़ार (जैसे– कार्बोनेटेड पेय, शुष्क बर्फ या अग्निशामक यंत्र बनाना) उत्सर्जन की कुल मात्रा की तुलना में अत्यंत छोटा है।
- CO₂ को मेथनॉल जैसे मूल्यवर्द्धित उत्पादों में परिवर्तित करना वर्तमान में महंगा है तथा ग्रीन हाइड्रोजन की आवश्यकता होती है, जो स्वयं भी विकास की प्रारंभिक अवस्था में है।
- विनियामक एवं विधिक शून्यता: इस बात को परिभाषित करने वाला कोई विधिक ढाँचा नहीं है कि यदि संगृहीत CO₂ 50 वर्ष बाद रिसाव करे तो कौन उत्तरदायी होगा (क्या यह कंपनी, भंडारण संचालक, अथवा सरकार है?)।
- यदि भूवैज्ञानिक भंडारण स्थल पूर्णतः सील नहीं किये गए तो CO₂ वायुमंडल में पुनः लीक हो सकती है (जलवायु लाभों को निष्प्रभावी करते हुए) अथवा भूजल जलभृतों को दूषित कर सकती है।
- भारत में एक परिपक्व कार्बन बाज़ार अथवा हाई कार्बन टैक्स का अभाव है। कार्बन उत्सर्जन पर कोई कीमत निर्धारित न होने के कारण उद्योगों के पास महँगी CCUS प्रौद्योगिकी में निवेश हेतु कोई वित्तीय प्रोत्साहन नहीं है।
भारत में CCUS के विस्तार को सुदृढ़ करने हेतु कौन-से कदम उठाए जा सकते हैं?
- क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण: भारत को ऐसे औद्योगिक हब (जैसे– गुजरात या ओडिशा में) विकसित करने चाहिये, जहाँ इस्पात, सीमेंट और विद्युत संयंत्र एक-दूसरे के निकट स्थित हों। ये इकाइयाँ CO₂ के परिवहन और भंडारण हेतु साझा अवसंरचना का उपयोग कर लागत में कमी ला सकती हैं।
- कार्बन बाज़ार: कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के अंतर्गत CCUS को सुदृढ़ किया जाना चाहिये। यदि कंपनियाँ CO₂ को कैप्चर करके अर्जित कार्बन क्रेडिट का व्यापार कर सकें, तो यह प्रौद्योगिकी वित्तीय रूप से व्यवहार्य बन सकती है।
- परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना: ग्रीन हाइड्रोजन के लिये लागू PLI के समान सरकार को CCUS हेतु भी एक PLI योजना प्रारंभ करनी चाहिये, ताकि कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों की उच्च प्रारंभिक लागत को आंशिक रूप से सब्सिडी प्रदान की जा सके।
- कर प्रोत्साहन (‘45Q’ मॉडल): भारत को अमेरिका के ‘45Q’ कर-छूट मॉडल के समान व्यवस्था अपनानी चाहिये, जिसके अंतर्गत स्थायी रूप से संगृहीत या उपयोग में लाई गई प्रत्येक टन CO₂ पर निश्चित कर कटौती प्रदान की जाती है।
- उपयोग में अनुसंधान एवं विकास: भंडारण (Storage) की अपेक्षा CCU (उपयोग) पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये। CO₂ को मूल्य संवर्द्धित उत्पादों (जैसे– ग्रीन यूरिया या ग्रीन मेथनॉल) में परिवर्तित करना, इसे भूमिगत संगृहीत करने की तुलना में, भारत जैसे मूल्य-संवेदनशील बाज़ार के लिये अधिक उपयुक्त रणनीति हो सकती है।
- भंडारण मानक: भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) को भू-वैज्ञानिक CO₂ भंडारण के सुरक्षित इंजेक्शन, निगरानी (Monitoring) तथा सत्यापन (Verification) के लिये स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिये, ताकि संभावित पर्यावरणीय जोखिमों की रोकथाम सुनिश्चित की जा सके।
निष्कर्ष
CCUS अब विकल्प नहीं रहा, बल्कि 2070 तक भारत के नेट-ज़ीरो लक्ष्य की प्राप्ति की ‘कुंजी’ बन चुका है। CCUS का विस्तार केवल प्रौद्योगिकी उन्नयन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सुदृढ़ ‘कार्बन अर्थव्यवस्था’ के निर्माण से भी संबंधित है। यदि CO₂ को अपशिष्ट के बजाय एक मूल्यवान कच्चे माल (फीडस्टॉक) के रूप में देखा जाए तथा क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से अवसंरचना लागत साझा की जाए, तो भारत अपने डीकार्बोनाइज़ेशन की चुनौती को एक महत्त्वपूर्ण औद्योगिक अवसर में परिवर्तित कर सकता है।
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दृष्टि मुख्य परीक्षा प्रश्न: प्रश्न: ‘कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) केवल जलवायु शमन का उपकरण नहीं, बल्कि कार्बन-सीमित विश्व में भारत की औद्योगिक वृद्धि को बनाए रखने की पूर्व-शर्त है।’ विवेचना कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. CCUS क्या है?
CCUS (कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण) प्रौद्योगिकियों का एक समूह है, जिसके माध्यम से औद्योगिक स्रोतों से CO₂ को कैप्चर किया जाता है, उसका परिवहन किया जाता है तथा उसे मेथनॉल और यूरिया जैसे उत्पादों में उपयोग किया जाता है या स्थायी भंडारण (Permanent Sequestration) हेतु भूमिगत संगृहीत किया जाता है।
2. भारत के लिये CCUS क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह इस्पात और सीमेंट जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रों के डीकार्बोनाइज़ेशन में सहायक है, ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करता है तथा यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मेकैनिज़्म (CBAM) जैसे कार्बन करों से निर्यात को संरक्षण प्रदान करता है।
3. भारत का ग्रीन स्टील मानदंड क्या है?
जिस इस्पात का उत्सर्जन 2.2 टन CO₂e प्रति टन कच्चे इस्पात से कम हो, उसे ग्रीन स्टील की श्रेणी में रखा जाता है, जिसमें 3-5 स्टार रेटिंग प्रणाली लागू है।
4. CCUS पर प्रमुख सरकारी पहलें कौन-सी हैं?
₹20,000 करोड़ का बजटीय आवंटन (2026-27), नीति आयोग का CCUS ढाँचा, CCUS हब का विकास, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) का रोडमैप तथा मिशन इनोवेशन IC3 सहयोग।
5. भारत में CCUS के विस्तार की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
उच्च लागत, ऊर्जा दंड (Energy Penalty), CO₂ पाइपलाइन अवसंरचना का अभाव, सीमित भू-वैज्ञानिक आँकड़े, नियामकीय शून्यताएँ तथा अप्रभावी कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. निम्नलिखित कृषि पद्धतियों पर विचार कीजिये: (2012)
- कंटूर बंडलिंग
- रिले फसल
- शून्य जुताई
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में उपर्युक्त में से कौन मिट्टी में कार्बन को अलग करने/भंडारण में मदद करता है?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) 1, 2 और 3
(d) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. कार्बन डाइऑक्साइड के मानवजनित उत्सर्जन के कारण होने वाले ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन कार्बन पृथक्करण के लिये संभावित स्थल हो सकता है? (2017)
- परित्यक्त और गैर-आर्थिक कोयले की तह
- तेल और गैस भंडारण में कमी
- भूमिगत गहरी लवणीय संरचनाएँ
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. कार्बन अवशोषण (कैप्चर), उपयोग तथा भंडारण (सीसीयूएस) से क्या आशय है? जलवायु परिवर्तन से निपटने में सीसीयूएस की संभावित भूमिका क्या है? (2025)
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