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पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर शुल्क में छूट

  • 04 Apr 2026
  • 48 min read

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने चल रहे पश्चिम एशिया संघर्ष के कारण उत्पन्न लागत दबाव और आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता से निपटने के लिये 40 महत्त्वपूर्ण पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर 30 जून, 2026 तक पूर्ण कस्टम ड्यूटी छूट की घोषणा की है।

पेट्रोकेमिकल उत्पाद क्या हैं?

  • परिचय: पेट्रोकेमिकल उत्पाद पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस से प्राप्त मूलभूत रासायनिक ‘बिल्डिंग ब्लॉक्स’ होते हैं। ये चिकित्सा उपकरणों से लेकर नवीकरणीय ऊर्जा के घटकों तक सभी निर्मित वस्तुओं के 95% हिस्से के लिये प्रारंभिक बिंदु (आधार) के रूप में कार्य करते हैं।
  • वर्गीकरण: इन्हें उनकी रासायनिक संरचना के आधार पर तीन मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया जाता है।
    • ओलेफिंस (एल्केंस): ओलेफिंस सबसे अधिक उत्पादित पेट्रोकेमिकल्स में से हैं और मुख्य रूप से प्लास्टिक तथा सिंथेटिक रबर बनाने में उपयोग किये जाते हैं। उदाहरण:
      • एथिलीन: पॉलीएथिलीन (PE) के निर्माण का मुख्य आधार—यह प्लास्टिक पैकेजिंग, बोतलों और पतली फिल्मों में सबसे अधिक इस्तेमाल होता है।
      • प्रोपिलीन: पॉलीप्रोपिलीन (PP) बनाने के लिए आवश्यक—जिसका उपयोग वाहन के हिस्सों, कपड़ों और गर्मी सहने वाले खाद्य कंटेनरों में किया जाता है।
      • ब्यूटाडाइन: सिंथेटिक रबर का प्रमुख घटक—जिसका उपयोग बड़े पैमाने पर टायर और अन्य रबर उत्पादों के निर्माण में होता है।
    • BTX एरोमैटिक्स: ये रिंग-आकार के हाइड्रोकार्बन होते हैं, जो उच्च-शक्ति वाले प्लास्टिक, डिटर्जेंट और सिंथेटिक फाइबर बनाने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। उदाहरण:
      • बेंज़ीन: वस्त्र उद्योग और औद्योगिक पैकेजिंग में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
      • टोल्यून: मुख्य रूप से उच्च-ऑक्टेन ईंधन के एडिटिव और पेंट्स में सॉल्वेंट के रूप में उपयोग होता है।
      • ज़ाइलीन: PET (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) बनाने के लिये प्रमुख कच्चा माल—जिसका उपयोग पानी की बोतलों और पॉलिएस्टर वस्त्रों में किया जाता है।
    • सिंथेसिस गैस (सिनगैस): यह कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन का मिश्रण होता है, जिसका उपयोग उर्वरकों तथा विभिन्न रसायनों के निर्माण के लिये आधारभूत कच्चे माल के रूप में किया जाता है।
      • अमोनिया: वैश्विक खाद्य उत्पादन की रीढ़– यह यूरिया जैसे नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों का प्रमुख स्रोत है।
      • मेथनॉल: एक बहु-उद्देशीय सॉल्वेंट और ईंधन में मिलाने वाला पदार्थ, जिसका उपयोग फॉर्मेल्डिहाइड बनाने में भी होता है, जो आगे प्लाईवुड रेज़िन और कई प्रकार के प्लास्टिक के निर्माण में काम आता है।
  • आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व: पेट्रोकेमिकल्स वैश्विक तेल और प्राकृतिक गैस की मांग (वर्तमान में लगभग 12–14% तेल खपत) का एक बढ़ता हुआ हिस्सा हैं। इनका उत्पादन मुख्यतः उन क्षेत्रों में केंद्रित होता है जहाँ सस्ता कच्चा माल (फीडस्टॉक) उपलब्ध होता है, जैसे– प्राकृतिक गैस से प्राप्त एथेन या तेल रिफाइनिंग से मिलने वाला नैफ्था।

छूट का उद्देश्य एवं कवरेज

  • रणनीतिक उद्देश्य: यह उपाय ‘अस्थायी और लक्षित राहत’ प्रदान करता है, जिससे डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को एनहाइड्रस अमोनिया, टोल्यून, स्टाइरीन और मेथनॉल जैसे इनपुट्स की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके, जिनकी कीमतों में इज़रायल-अमेरिका द्वारा ईरान पर हमलों के कारण वृद्धि हुई है।
  • प्रभावित क्षेत्र: यह छूट विशेष रूप से प्लास्टिक, वस्त्र, औषधि, ऑटोमोबाइल घटक और रसायन क्षेत्रों को समर्थन देती है, जिससे विनिर्माण क्षेत्र को स्थिर करने और उपभोक्ताओं के लिये अंतिम कीमतों को कम करने में सहायता मिलती है।

सीमा शुल्क

  • परिचय: सीमा शुल्क वह अनिवार्य कर है जो सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार वस्तुओं के आवागमन पर लगाया जाता है। भारत में यह सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 तथा सीमा शुल्क टैरिफ अधिनियम, 1975 द्वारा विनियमित होता है।
  • उद्देश्य: राजस्व संग्रह के अतिरिक्त सीमा शुल्क का उपयोग घरेलू उद्योगों के संरक्षण (आयात को महंगा बनाकर), व्यापार के विनियमन तथा यह सुनिश्चित करने के लिये किया जाता है कि आयातित वस्तुएँ राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप हों।
  • सीमा शुल्क के प्रकार: सामान्यतः सीमा शुल्क को निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है:
    • एड वैलोरेम शुल्क: वस्तुओं के मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत के रूप में लगाया जाता है (वैश्विक स्तर पर सबसे सामान्य)।
    • विशिष्ट शुल्क: माप की प्रति इकाई (जैसे- प्रति किलोग्राम, प्रति लीटर या प्रति वस्तु) पर एक निश्चित राशि के रूप में लगाया जाता है। 
    • संयुक्त शुल्क: एड वैलोरेम और विशिष्ट शुल्क का संयोजन होता है।
    • अतिरिक्त शुल्क: जैसे एंटी-डंपिंग शुल्क (अनुचित रूप से कम कीमत वाले आयात के विरुद्ध), काउंटरवेलिंग शुल्क (सब्सिडी प्राप्त आयात के विरुद्ध), संरक्षक शुल्क तथा सामाजिक कल्याण उपकर आदि।
  • मूल्यांकन पद्धति: शुल्क केवल वस्तु के अंकित मूल्य (स्टिकर प्राइस) पर नहीं लगाया जाता। इसे आकलनीय मूल्य के आधार पर निर्धारित किया जाता है, जो सामान्यतः CIF (लागत, बीमा और माल भाड़ा) मूल्य पर आधारित होता है।
    (आकलनीय मूल्य = वस्तु की लागत + बीमा + मालभाड़ा)
    • सीमा शुल्क = आकलनीय मूल्य × लागू शुल्क दर
  • हालिया सुधार: केंद्रीय बजट 2026-27 में व्यक्तिगत उपयोग के लिये आयातित वस्तुओं पर सीमा शुल्क को 20% से घटाकर 10% कर दिया गया है। साथ ही, 17 कैंसर दवाओं तथा 7 दुर्लभ रोगों के लिये दवाओं/खाद्य पदार्थों पर सीमा शुल्क पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सीमा शुल्क क्या है?
सीमा शुल्क वह अनिवार्य कर है जो सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के पार वस्तुओं के आवागमन पर लगाया जाता है।

2. सीमा शुल्क की गणना के लिये ‘आकलनीय मूल्य’ क्या होता है?
यह मुख्यतः वस्तुओं का CIF (लागत, बीमा और माल भाड़ा) मूल्य होता है, जो भारतीय बंदरगाह तक पहुँचने तक उत्पाद की कुल लागत को दर्शाता है।

3. ओलेफिंस और एरोमैटिक्स के औद्योगिक उपयोग में क्या अंतर है?
ओलेफिंस (जैसे– एथिलीन) बहु-उपयोगी प्लास्टिक और पैकेजिंग के प्रमुख कच्चे पदार्थ होते हैं, जबकि एरोमैटिक्स (जैसे– बेंज़ीन) उच्च-शक्ति वाले सिंथेटिक फाइबर और डिटर्जेंट के लिये आवश्यक होते हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)  

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2018)

  1. पिछले पाँच वर्षों में आयातित खाद्य तेलों की मात्रा, खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन से अधिक रही है।  
  2.  सरकार विशेष स्थिति के तौर पर भी सभी आयातित खाद्य तेलों पर किसी प्रकार का सीमा शुल्क नहीं लगाती।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (a)

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