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केरल में मिला महापाषाणकालीन लैटेराइट शैलकृत कक्ष

  • 07 Mar 2026
  • 14 min read

स्रोत: द हिंदू 

केरल के कासरगोड ज़िले में एक महत्त्वपूर्ण महापाषाणकालीन लैटेराइट शैलकृत कक्ष की खोज हुई है, जो क्षेत्र की प्रागैतिहासिक अंत्येष्टि प्रथाओं एवं भौतिक संस्कृति के संबंध में नवीन दृष्टिकोण प्रदान करती है।

  • यह कक्ष महापाषाणकालीन शवाधान का वह भाग हैं, जहाँ अनुष्ठानिक मान्यताओं के अनुसार विभिन्न आकार तथा प्रकार के मृद्भांडों को साथ में दफनाकर ऐसे कक्षों का निर्माण किया था।।

महापाषाणकालीन संस्कृति

  • परिचय: महापाषाणकालीन संस्कृति में ऐसी प्रागैतिहासिक सांस्कृतिक प्रथाएँ शामिल हैं, जिनमें विशाल शैल-संरचनाओं का निर्माण किया जाता था। ये मुख्यतः बस्तियों से दूर स्थित अंत्येष्टि स्थलों/कब्रगाहों के रूप में प्रयुक्त होती थीं।
  • समयावधि: पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर दक्षिण भारत की महापाषाणकालीन संस्कृतियाँ 1000 ई.पू. से 100 ई. तक विस्तृत थीं, जिनका शीर्ष काल 600 ई.पू. से 100 ई. के मध्य तक रहा।
    • दक्षिण भारत में महापाषाणकालीन संस्कृति पूर्ण विकसित लौह युग संस्कृति थी, जहाँ लौह प्रौद्योगिकी का पूर्ण विकास हो चुका था। इस क्षेत्र से हथियारों एवं कृषि उपकरणों सहित विभिन्न लौह वस्तुओं की प्राप्ति हुई है।
  • भौगोलिक विस्तार: महापाषाणकालीन संस्कृति का मुख्य केंद्र दक्कन में है, विशेषतः गोदावरी नदी के दक्षिण में। 
    • प्रमुख स्थल हैं- ब्रह्मगिरि एवं चंद्रावली (कर्नाटक), जुनापाणी, खाप एवं मुहुर्जहरी (महाराष्ट्र), तथा आदिचनल्लूर (तमिलनाडु)। 
    • इस प्रकार के कक्ष पंजाब मैदान, इंडो-गंगा घाटी, राजस्थान, गुजरात तथा बुर्जहोम (जम्मू-कश्मीर) में भी पाए गए है।
  • जीविका एवं संस्कृति: महापाषाणकालीन लोग कृषि, शिकार, मत्स्यपालन एवं पशुपालन पर जीवन-निर्वाह करते थे। इन स्थलों पर पाए जाने वाले शैलचित्रों में शिकार दृश्यों, पशु-हमलों एवं सामूहिक नृत्य शामिल हैं, जो उनकी सामाजिक-संस्कृति का दर्पण प्रस्तुत करते हैं।

और पढ़ें: महापाषाणकालीन पदचिह्न और मानव आकृति
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