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जैव विविधता और पर्यावरण

भारत का राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (2031-35)

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान, पेरिस समझौता, हरित हाइड्रोजन मिशन, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI), जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना

मेन्स के लिये: पेरिस समझौते के तहत भारत की जलवायु प्रतिबद्धता, कार्बन बाज़ार और जलवायु वित्त

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2031-35 की अवधि के लिये भारत के अद्यतित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC 3.0) को स्वीकृति प्रदान की, जिसे पेरिस समझौते के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) को औपचारिक रूप से संप्रेषित किया जाएगा।

भारत के NDC 3.0 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • अंतर्राष्ट्रीय जनादेश: पेरिस समझौते के हस्ताक्षरकर्त्ता के रूप में भारत को वर्ष 2025 तक एक अद्यतित NDC जारी करना आवश्यक था।
    • दिसंबर 2025 तक, 128 देशों (वैश्विक उत्सर्जन का 78% प्रतिनिधित्व करते हुए) ने अपने अद्यतित NDC प्रस्तुत कर दिये थे, जिससे भारत और अर्जेंटीना ऐसा करने वाले अंतिम G-20 देश बन गए।
    • NDC 3.0 के लक्ष्य को वर्ष 2021 के वैश्विक स्टॉकटेक (GST) के प्राप्त परिणामों से आकार दिया गया था, जिससे यह निष्कर्ष निकला कि दुनिया वर्तमान में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की राह पर नहीं है।
    • पर्यावरण मंत्रालय ने बल देते हुए कहा कि नए लक्ष्य "सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों और संबंधित क्षमताओं" (CBDR-RC) के सिद्धांत के साथ विकासात्मक प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा को संतुलित करते हैं।
  • भारत के NDC 3.0 के तहत लक्ष्य:
    • गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का विस्तार: भारत वर्ष 2035 तक अपनी ऊर्जा क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों (सौर, पवन, जल, बायोमास और परमाणु सहित) से प्राप्त करने का संकल्प करता है।
      • भारत ने फरवरी 2026 तक 52.57% हासिल कर लिया है, जो अपने पूर्व में निर्धारित वर्ष 2030 के लक्ष्य (50%) को सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है।
    • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: सरकार का लक्ष्य वर्ष 2005 के आधार वर्ष की तुलना में वर्ष 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता को 47% तक कम करना है।
      • भारत ने वर्ष 2020 तक 36% तक कम कर लिया था, जिससे वह वर्ष 2030 के अपने पिछले 45% कटौती के लक्ष्य को समय से पहले पूरा करने की सही राह पर है।
    • कार्बन सिंक में वृद्धि: भारत वर्ष 2035 तक बढ़े हुए वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4.0 बिलियन टन CO₂ समतुल्य के अतिरिक्त कार्बन सिंक के निर्माण का लक्ष्य रखता है।
      • वर्ष 2025 तक, भारत ने वन एवं वृक्ष आवरण से 2.29 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक निर्मित किया है।

महत्त्व

  • वैश्विक जलवायु नेतृत्व: ऐसे समय में जब कई विकसित देश अपनी "जलवायु नीतियों में कटौती" कर रहे हैं और एकतरफा व्यापार की नीति अपना रहे हैं, भारत का अद्यतित NDC (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान) ग्लोबल साउथ के ठोस नेतृत्व और जलवायु बहुपक्षवाद के प्रति एक सुदृढ़ प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।
  • रणनीतिक संरेखण: नए लक्ष्य भारत के दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन (2070 तक) के उद्देश्य की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं और ये “विकसित भारत @2047” के आर्थिक दृष्टिकोण के साथ भी संरेखित हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC)

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश की आधिकारिक जलवायु कार्ययोजना को दर्शाता है। यह योजना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन के लिये देश द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
  • यह स्वैच्छिक है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार अपने लक्ष्यों का निर्धारण स्वयं करता है, साथ ही यह समयबद्ध और प्रगतिशील भी है, जिसमें बढ़ती महत्त्वाकांक्षा को दर्शाते हुए हर 5-10 वर्षों में इन लक्ष्यों को अद्यतित किया जाता है।
  • राष्ट्रीय विकास योजनाओं (NDC) के प्रमुख घटकों में सामान्यतः उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य, नवीकरणीय ऊर्जा से संबंधित उद्देश्य, अनुकूलन रणनीतियाँ तथा वित्तीय व तकनीकी आवश्यकताएँ शामिल होती हैं।
  • ये पेरिस समझौते के मुख्य परिचालन तंत्र का निर्माण करते हैं, क्योंकि वैश्विक जलवायु कार्रवाई इन राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की सामूहिक महत्त्वाकांक्षा और प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है।
  • भारत की NDC यात्रा: पहला NDC (2015), जिसमें वर्ष 2005 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग किया गया, जिसका लक्ष्य उत्सर्जन तीव्रता में 33-35% की कमी, लगभग 40% गैर-जीवाश्म क्षमता और वर्ष 2030 तक 2.5-3 बिलियन टन कार्बन सिंक का निर्माण करना था।
    • इसे अपडेटेड NDC (2022) के माध्यम से और मज़बूत किया गया है। इसके तहत, COP26 (ग्लासगो) में की गई घोषणाओं के अनुरूप, महत्त्वाकांक्षा को बढ़ाते हुए निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं: उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी (2005 के स्तर से), 50% गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता प्राप्त करना।

NDC (2031-35) के प्रति भारत का क्या दृष्टिकोण है?

  • समता और CBDR-RC: यह दृष्टिकोण CBDR-RC के सिद्धांत पर आधारित है। यह सुनिश्चित करता है कि लक्ष्य समानता को दर्शाते हैं और भारत की राष्ट्रीय वास्तविकताओं, विकासात्मक प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप हैं।
  • समग्र समाज दृष्टिकोण: सरकार ने जलवायु लक्ष्यों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के साथ सहजता से एकीकृत करने के लिये 'समग्र सरकारी' और 'समग्र समाज' दृष्टिकोण को प्रमुखता दी। यह एक समग्र समाज दृष्टिकोण को सुनिश्चित करता है।
  • रणनीतिक सरकारी योजनाएँ: ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ और पीएम-कुसुम जैसी पहलों के माध्यम से जलवायु लक्ष्यों को अर्थव्यवस्था में एकीकृत किया जा रहा है।
  • उन्नत प्रौद्योगिकियाँ: भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमताओं का विस्तार करने के साथ-साथ कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) सहित नए शमन तरीकों को बढ़ावा दे रहा है।
  • अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व: देश अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) और वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (GBA) जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा देना जारी रखे हुए है।
  • तटीय संरक्षण उपाय: मैंग्रोव बहाली (MISHTI पहल के तहत), तटीय विनियमन और चक्रवातों के लिये उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के उपयोग से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों को सुरक्षित किया जा रहा है।
  • समन्वित ढाँचे: अनुकूलन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) द्वारा संचालित है और जल जीवन मिशन, सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसे ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में एकीकृत है।
  • जन आंदोलनों को बढ़ावा देना: भारत के जलवायु प्रयास "पर्यावरण के लिये जीवनशैली" (LiFE) के सिद्धांत में गहराई से निहित हैं, जिसका उद्देश्य सतत जीवन को बढ़ावा देना है। ये प्रयास नागरिक-नेतृत्व वाले जन आंदोलनों को प्रोत्साहित करते हैं, जैसे कि वृक्षारोपण अभियान ('एक पेड़ माँ के नाम'), जो LiFE सिद्धांत के तहत नागरिक कार्रवाई में परिवर्तित होते हैं।

भारत के लिये अपने NDC (2031-35) को प्राप्त करने के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • क्षमता बनाम वास्तविक उत्पादन: गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से विद्युत उत्पादन की स्थापित क्षमता 52% से अधिक है, जबकि इन स्रोतों से वास्तविक रूप से उत्पादित विद्युत वर्तमान में कुल उत्पादन का लगभग 25% ही है।
    • यह विसंगति मुख्य रूप से नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे– सौर और पवन ऊर्जा) के स्वरूप और बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण समाधानों की वर्तमान अनुपलब्धता के कारण उत्पन्न होती है।
  • भंडारण और ग्रिड संबंधी बाधाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव में प्रमुख बाधाएँ हैं। इनमें किफायती, बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण की कमी और लिथियम जैसी आयातित सामग्रियों पर भारी निर्भरता शामिल है। इसके अतिरिक्त, दूरस्थ नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन स्थलों को मांग केंद्रों से जोड़ने के लिये आवश्यक पारेषण बुनियादी ढाँचे के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
  • कोयले पर निर्भरता: विद्युत उत्पादन में कोयले का योगदान लगभग 75% है, जो इसे ऊर्जा सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण बनाता है, जबकि तेज़ी से बदलाव से आर्थिक व्यवधान, रोज़गार की हानि और इस्पात एवं सीमेंट जैसे क्षेत्रों के डीकार्बनाइज़ेशन में चुनौतियाँ उत्पन्न होने का खतरा है।
  • वित्तीय बाधाएँ: स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार के लिये भारत को वार्षिक लगभग 40-50 अरब अमेरिकी डॉलर के भारी निवेश की आवश्यकता है, लेकिन सीमित और अनिश्चित वैश्विक जलवायु वित्त और कार्बन सीमा कर जैसी व्यापार बाधाओं के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • भूमि और वनरोपण संबंधी चुनौतियाँ: बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जबकि भूमि की कमी और वनरोपण प्रयासों को बनाए रखने में चुनौतियों के कारण 3.5-4 अरब टन के कार्बन सिंक लक्ष्यों को प्राप्त करना मुश्किल है।

भारत के राष्ट्रीय विकास लक्ष्य (2031-35) को प्राप्त करने के प्रयासों को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • 24 घंटे (RTC) नवीकरणीय ऊर्जा: क्षमता वृद्धि से आगे बढ़कर विश्वसनीय आपूर्ति की ओर बढ़ना महत्त्वपूर्ण है, जिसके लिये RTC बिजली खरीद समझौतों (PPA) को अनिवार्य बनाना आवश्यक है जो सौर और पवन ऊर्जा को बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BSE) या पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) के साथ जोड़ते हैं।
  • पारंपरिक अवसंरचना का पुन: उपयोग: परित्यक्त या बंद कोयला खदानों का वैज्ञानिक पुन: उपयोग करके पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज साइट्स या बड़े सौर पार्कों में बदला जा सकता है। यह पारंपरिक अवसंरचना का पुन: उपयोग भूमि अधिग्रहण और ऊर्जा भंडारण दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान करता है।
  • कोयले पर निर्भर पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण: कोयले पर निर्भर पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में कोयले के उपयोग में तेज़ी से कमी लाखों लोगों की आजीविका को खतरे में डाल सकती है।
    • भारत को श्रमिकों को पुन: कौशल प्रदान करने, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में विविधता लाने और पुराने तथा अक्षम थर्मल पावर प्लांटों को बंद करने से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के प्रबंधन के लिये एक वैधानिक 'न्यायसंगत संक्रमण कोष' (Just Transition Fund) की आवश्यकता है।
  • अनलॉकिंग ब्लेंडेड फाइनेंस: चूँकि पारंपरिक ऋण हरित अवसंरचना के लिये अत्यधिक महंगा है, अतः भारत को बहुपक्षीय बैंकों से रियायती पूंजी का उपयोग करते हुए “ब्लेंडेड फाइनेंस” का लाभ उठाना चाहिये, जिससे परियोजनाओं का जोखिम कम किया जा सके तथा निजी निवेश को आकर्षित किया जा सके।
  • कार्बन बाज़ार का परिपक्वकरण: घरेलू कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) का शीघ्र क्रियान्वयन तथा कठोर विनियमन कठिन-नियंत्रणीय क्षेत्रों (इस्पात, सीमेंट, उर्वरक) को कार्बन पकड़, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) प्रौद्योगिकी अपनाने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करेगा।
  • कृषि-फोटोवोल्टाइक (एग्री-वोल्टैक्स): कृषि तथा बड़े सौर ऊर्जा पार्कों के मध्य भूमि के लिये तीव्र प्रतिस्पर्द्धा को दूर करने हेतु भारत को “कृषि-फोटोवोल्टाइक” का विस्तार करना चाहिये—अर्थात् कृषि भूमि के ऊपर ऊँचाई पर सौर पैनलों की स्थापना।
    • यह स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन करता है, जल वाष्पीकरण को कम करता है तथा किसानों को द्वैध आय स्रोत प्रदान करता है।
  • कार्बन सिंक्स हेतु एग्रोफॉरेस्ट्री: केवल पारंपरिक वनीकरण के माध्यम से 3.5–4 अरब टन कार्बन सिंक लक्ष्य प्राप्त करना भूमि की कमी के कारण व्यवहार्य नहीं है।
    • निजी भूमि पर कृषि परिदृश्यों में वृक्षों का एकीकरण (कृषिवनिकी), जिसे कार्बन क्रेडिट के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाए, सबसे व्यावहारिक समाधान है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. “भारत का राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) 3.0 जलवायु महत्त्वाकांक्षा तथा विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य संतुलन को परिलक्षित करता है।” विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. NDC 3.0 क्या है?
पेरिस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2031–35 हेतु भारत की अद्यतन जलवायु कार्ययोजना, जिसमें शमन तथा अनुकूलन लक्ष्यों को और सुदृढ़ किया गया है।

2. भारत के NDC 3.0 के प्रमुख लक्ष्य क्या हैं?
वर्ष 2035 तक 60% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2005 के स्तर की तुलना में 47% उत्सर्जन तीव्रता में कमी तथा 3.5–4 अरब टन कार्बन सिंक का सृजन।

3. CBDR-RC क्या है?
यह एक सिद्धांत है जो सुनिश्चित करता है कि जलवायु उत्तरदायित्व साझा हो, किंतु देशों की क्षमता तथा ऐतिहासिक उत्सर्जनों के आधार पर विभेदित भी हो।

4. नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण में प्रमुख चुनौती क्या है?
अंतराल (Intermittency) तथा भंडारण अवसंरचना के अभाव के कारण स्थापित क्षमता तथा वास्तविक उत्पादन के मध्य अंतर।

5. न्यायसंगत संक्रमण (Just Transition) क्या है?
यह एक रूपरेखा है, जिसके अंतर्गत जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर श्रमिकों तथा क्षेत्रों को पुनःकौशल, विविधीकरण तथा सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से सहयोग प्रदान किया जाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. ‘अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित अंशदान’  (Intended Nationally Determined Contributions) पद को कभी-कभी समाचारों में किस संदर्भ में देखा जाता है? (2016)

(a) युद्ध-प्रभावित मध्य पूर्व के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय देशों द्वारा दिये गए वचन 

(b) जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्ययोजना

(c) एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक) की स्थापना करने में सदस्य राष्ट्रों द्वारा किया गया पूंजी योगदान 

(d) धारणीय विकास लक्ष्यों के बारे में विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्ययोजना

उत्तर : (b)


प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
  2.  यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2 °C या कोशिश करें कि 1.5 °C से भी अधिक न होने पाए।
  3.  विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3

(b)  केवल 2

(c)  केवल 2 और 3

(d)  1, 2 और 3

उत्तर: (b)


मेन्स  

प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई प्रतिबद्धताएँ क्या हैं? (2021)

प्रश्न 2. 'जलवायु परिवर्तन' एक वैश्विक समस्या है। जलवायु परिवर्तन से भारत किस प्रकार प्रभावित होगा? जलवायु परिवर्तन के द्वारा भारत के हिमालयी और समुद्रतटीय राज्य किस प्रकार प्रभावित होंगे? (2017)


मुख्य परीक्षा

दिव्यांगता की असंगत उच्चतम सीमा पर सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

प्रभु कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने यह अभिमत व्यक्त किया कि राज्य लोक सेवाओं में नियुक्ति हेतु दिव्यांगता के प्रतिशत पर मनमानी उच्चतम सीमा निर्धारित नहीं कर सकते, क्योंकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) केवल 40% बेंचमार्क दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा का ही प्रावधान करता है।

  • अपीलकर्त्ता, जिन्होंने 90% गतिविषयक दिव्यांगता के बावजूद हिमाचल प्रदेश की सहायक ज़िला अधिवक्ता (ADA) परीक्षा उत्तीर्ण की थी, को 60% की दिव्यांगता सीमा के कारण नियुक्ति से वंचित कर दिया गया। तत्पश्चात हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इस अपवर्जनात्मक सीमा को यथावत् रखा।

प्रभु कुमार मामले (2026) में बेंचमार्क दिव्यांगता पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन

  • युक्तिसंगत अनुकूलन: निर्णय में यह प्रतिपादित किया गया कि राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व है कि वह युक्तिसंगत अनुकूलन सुनिश्चित करे, जिससे किसी पद हेतु उपयुक्तता का निर्धारण केवल दिव्यांगता प्रतिशत के आधार पर न होकर कार्यात्मक आवश्यकताओं के आधार पर किया जाए।
  • संवैधानिक वैधता: 40%–60% की सीमा तक पात्रता को सीमित करना स्पष्टतः मनमाना माना गया, जो अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) तथा अनुच्छेद 16 (लोक सेवाओं में अवसर की समानता) का उल्लंघन है।
  • कार्यात्मक दक्षता: ऐसे पद, जिनमें मानसिक चपलता तथा विधिक प्रवीणता अपेक्षित होती है (जैसे- सहायक ज़िला अधिवक्ता), उनमें 90% चलन (लोकोमोटर) दिव्यांगता स्वाभाविक रूप से कार्य-निष्पादन को बाधित नहीं करती, जिसका प्रमाण अपीलकर्त्ता का दशक-दीर्घ विधिक अनुभव है।

दिव्यांगता अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती अवलोकन

  • ओम राठौड़ बनाम स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक प्रकरण, 2024: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि उम्मीदवार की वास्तविक क्षमताओं का कार्यात्मक मूल्यांकन कठोर पात्रता प्रतिशत से अधिक महत्त्व रखता है।
  • वी. सुरेंद्र मोहन बनाम तमिलनाडु राज्य प्रकरण, 2019: सर्वोच्च न्यायालय ने ज़िला न्यायाधीश की  नियुक्ति हेतु श्रवण तथा दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिये 50% दिव्यांगता सीमा को स्वीकार किया। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसी निर्णय के आधार पर अपीलकर्त्ता को राहत देने से इनकार किया था।
  • विकास कुमार बनाम UPSC प्रकरण, 2021: सर्वोच्च न्यायालय ने वी. सुरेंद्र मोहन निर्णय को निरस्त करते हुए अधिक समावेशी दृष्टिकोण को अपनाया।
  • भारत सरकार बनाम रवि प्रकाश गुप्ता प्रकरण, 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पदों की पहचान न होना, सरकार के लिये दिव्यांगजनों हेतु 3% आरक्षण प्रदान करने के दायित्व से बचने का आधार नहीं हो सकता।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

परिचय

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 एक महत्त्वपूर्ण विधान है, जिसने पूर्ववर्ती दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995 का स्थान लिया। इस अधिनियम ने भारतीय विधिक व्यवस्था को संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD) के अनुरूप बनाया, जिसे भारत ने वर्ष 2007 में अनुमोदित किया था।
    • इस अधिनियम ने विधिक दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करते हुए चिकित्सकीय मॉडल (जिसमें दिव्यांगता को एक समस्या के रूप में देखा जाता था) से सामाजिक/मानवाधिकार आधारित मॉडल (जिसमें दिव्यांगता को सामाजिक अवरोधों का परिणाम माना जाता है) की ओर संक्रमण स्थापित किया।

मुख्य विशेषताएँ

  • दिव्यांगता की परिभाषा: ऐसे व्यक्ति को दिव्यांग माना गया है, जिसमें दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा संवेदी अक्षमता हो, जो सामाजिक अवरोधों के साथ अंतःक्रिया के कारण उसे अन्य व्यक्तियों के समान आधार पर समाज में पूर्ण एवं प्रभावी सहभागिता से वंचित करती है।
    • बेंचमार्क दिव्यांगता: ऐसे व्यक्ति, जिनमें निर्दिष्ट दिव्यांगता कम से कम 40% हो (जिसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किया गया हो), उन्हें बेंचमार्क दिव्यांगता की श्रेणी में रखा जाता है। यही सीमा विभिन्न लाभों, आरक्षण तथा योजनाओं की पात्रता निर्धारित करती है।
  • दिव्यांगता को मान्यता: अधिनियम ने दिव्यांगता के दायरे का विस्तार करते हुए 21 प्रकार की निर्दिष्ट दिव्यांगताओं को मान्यता दी है (1995 के अधिनियम में यह संख्या 7 थी)। आवश्यकता के अनुसार केंद्र सरकार अतिरिक्त श्रेणियाँ अधिसूचित कर सकती है। मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं को व्यापक रूप से निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है—
    • शारीरिक दिव्यांगता: गतिविषयक दिव्यांगता, हड्डियों, जोड़ों या माँसपेशियों की अक्षमता, जैसे- सेरेब्रल पाल्सी, कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति, बौनापन, पेशीय दुष्पोषण और एसिड अटैक पीड़ित।।
    • संवेदी: दृष्टि बाधिता, श्रवण बाधिता, वाक् एवं भाषा संबंधी दिव्यांगता।
    • बौद्धिक एवं तंत्रिका संबंधी: विशिष्ट अधिगम अक्षमता (जैसे- डिस्लेक्सिया), ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, पार्किंसन रोग
    • मानसिक व्यवहार: मानसिक रोग।
    • रक्त संबंधी विकार: थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, सिकल सेल रोग
    • अन्य:  बहु-दिव्यांगता तथा बधिर-अंधता
  • प्रमुख अधिदेश एवं प्रावधान: यह अधिनियम गरिमा तथा समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु एक सुदृढ़ विधिक संरक्षण प्रदान करता है;
    • समता एवं भेदभाव-निषेध: दिव्यांगजनों को समता, गरिमापूर्ण जीवन तथा दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव से संरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया है। भेदभाव में युक्तिसंगत अनुकूलन से वंचित करना भी सम्मिलित है।
    • आरक्षण: अधिनियम के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में आरक्षण को 3% से बढ़ाकर 4% तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में 3% से बढ़ाकर 5% किया गया है, जो बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिये लागू होता है।
    • शिक्षा: 6 से 18 वर्ष के प्रत्येक बेंचमार्क दिव्यांग बालक/बालिका को निशुल्क शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
    • सुगम्यता: सार्वजनिक भवनों, परिवहन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) तथा सेवाओं में बाधारहित पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अनिवार्य मानक निर्धारित किये गये हैं।
    • संरक्षकता: अधिनियम ने सीमित संरक्षकता की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें संरक्षक तथा दिव्यांग व्यक्ति के मध्य संयुक्त निर्णय-निर्माण की व्यवस्था होती है, जो पूर्ववर्ती पूर्ण संरक्षकता (पूर्ण नियंत्रण) से भिन्न है।
  • संस्थागत ढाँचा: इस अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित संस्थागत व्यवस्थाएँ स्थापित की गई हैं;
    • केंद्रीय एवं राज्य सलाहकार बोर्ड: नीति-निर्माण के सर्वोच्च निकायों के रूप में कार्य करते हैं।
    • मुख्य आयुक्त एवं राज्य आयुक्त: अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी तथा शिकायतों के निवारण हेतु उत्तरदायी हैं।
    • राष्ट्रीय एवं राज्य कोष: दिव्यांग व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिये स्थापित किये गए हैं।
    • विशेष न्यायालय: प्रत्येक ज़िले में नामित किये जाते हैं, ताकि दिव्यांग व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों के मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।
  • उल्लंघन हेतु दंड: यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से किसी दिव्यांग व्यक्ति का जानबूझकर अपमान या अवमानना करता है, अथवा उसे अपमानित करने के उद्देश्य से आक्रमण या बल का प्रयोग करता है, तो उसे 6 माह से 5 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना दिये जाने का प्रावधान है।

महत्त्व

  • यह अधिनियम समावेशी विकास की प्राप्ति हेतु] अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी सरकारी योजनाएँ, चाहे वे ग्रामीण आवास से संबंधित हों या शहरी नियोजन अथवा डिजिटल साक्षरता से संबंधित हों, उनमें दिव्यांगता-समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए।

निष्कर्ष

मनमानी दिव्यांगता सीमाओं को निरस्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांगता संबंधी न्यायिक सिद्धांत को कठोर चिकित्सीय प्रतिशत-आधारित दृष्टिकोण से हटाकर कार्यात्मक क्षमता आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तित किया है। इससे समान अवसर की संवैधानिक गारंटी सुदृढ़ होती है तथा यह सुनिश्चित होता है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 केवल एक औपचारिक प्रावधान न रहकर वाविद्युत्स्तविक सशक्तीकरण का साधन बने, न कि संस्थागत बहिष्करण का माध्यम।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भूमिका का आकलन कीजिये। यह अधिनियम किस प्रकार एक समावेशी समाज के निर्माण में सहायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. RPwD अधिनियम, 2016 के अंतर्गत "बेंचमार्क दिव्यांगता" क्या है?
यह ऐसे व्यक्ति को संदर्भित करती है, जिसमें निर्दिष्ट दिव्यांगता कम-से-कम 40% हो, जिसे सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किया गया हो।

2. दिव्यांगताओं के दायरे के संदर्भ में 2016 का अधिनियम, 1995 के अधिनियम से किस प्रकार भिन्न है?
2016 के अधिनियम ने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी, जिसमें थैलेसीमिया जैसे रक्त विकार तथा पार्किंसन जैसे तंत्रिका संबंधी विकार भी सम्मिलित किये गए हैं।

3. दिव्यांगजनों हेतु सरकारी नौकरियों में आरक्षण का विधिक प्रावधान क्या है?
अधिनियम के अंतर्गत सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिये 4% आरक्षण अनिवार्य किया गया है, जो पूर्ववर्ती 3% से अधिक है। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. भारत में लाखों दिव्यांगजन निवास करते हैं। कानून के तहत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011) 

  1. सरकारी स्कूलों में 18 वर्ष की आयु तक निशुल्क शिक्षा।  
  2.  व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन।  
  3.  सार्वजनिक भवनों में रैंप ।  

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  

(b) केवल 2 और 3  

(c) केवल 1 और 3  

(d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (d)


प्रारंभिक परीक्षा

स्वर्ण की कीमतों में गिरावट

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

पश्चिम एशियाई संघर्ष बढ़ने के बावजूद वैश्विक तथा देश में स्वर्ण की कीमतों में तीव्र एवं असामान्य गिरावट देखी गई है। परंपरागत रूप से स्वर्ण भू-राजनीतिक या वित्तीय संकटों के दौरान एक सुरक्षित निवेश परिसंपत्ति के रूप में कार्य करता है, किंतु वर्तमान व्यापक आर्थिक गतिशीलताओं ने इस पूर्व की प्रचलित प्रवृत्ति से विचलन दर्शाया है।

स्वर्ण की कीमतों में गिरावट के प्रमुख कारण कौन-से हैं?

  • तेल की कीमतों में आकस्मिक वृद्धि और मुद्रास्फीति भार: पश्चिम एशियाई संघर्ष से वैश्विक तेल आपूर्ति शृंखलाएँ गंभीर रूप से बाधित हो गई हैं, जिससे कच्चे तेल की कीमतें काफी बढ़ गई हैं (हालिया प्रवृत्ति 120 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल से अधिक)।
    • ऊर्जा की बढ़ती लागत व्यापक स्तर पर व्यापक आर्थिक मुद्रास्फीति उत्पन्न करती है। तेल- जनित मुद्रास्फीति से निपटने के लिये प्रमुख केंद्रीय बैंक (जैसे– अमेरिकी फेडरल रिज़र्व) ब्याज दरों में कटौती करने के पक्ष में नहीं हैं।
    • बाज़ार में वर्तमान परिदृश्य में संकुचनवादी मौद्रिक नीति की आशंका है, जिसके तहत मांग को कम करने के लिये ब्याज दरें लंबे समय तक ऊँची बनी रहेंगी।
  • बॉण्ड प्रतिफल में वृद्धि: उच्च ब्याज दरों के जारी रहने की आशंका के साथ अमेरिकी ट्रेज़री बॉण्ड (जो गारंटीकृत, निश्चित रिटर्न प्रदान करते हैं) अत्यधिक आकर्षक हो गए हैं।
    • निवेशक शून्य-प्रतिफल वाले स्वर्ण से पूंजी का आहरण कर उच्च-प्रतिफल वाले सरकारी बॉण्ड में निवेश कर रहे हैं।
  • अमेरिकी डॉलर का सुदृढ़ीकरण: वैश्विक पूंजी का प्रवाह उच्च प्रतिफल प्राप्त करने के लिये अमेरिकी ऋण बाज़ारों में होने से अमेरिकी डॉलर सूचकांक का सुदृढ़ीकरण होता है।
    • डॉलर की कीमत बढ़ने से विदेशी खरीदारों के लिये स्वर्ण मौलिक रूप से अधिक महंगा हो जाता है, जिससे वैश्विक भौतिक और निवेश मांग में कमी आती है।
  • नकदी संकट और मुनाफा वसूली: मौजूदा गिरावट से पहले स्वर्ण की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर थीं। भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण वैश्विक शेयर बाज़ारों में व्यापक विक्रय हुआ, जिससे निवेशकों को नकदी संकट का सामना करना पड़ा।
    • मार्जिन कॉल और इक्विटी पोर्टफोलियो के नुकसान की भरपाई के लिये निवेशकों ने अपने अत्यधिक लाभदायक स्वर्ण धारिताओं को बेचकर मुनाफा वसूली का विकल्प अपनाया, जिससे बाज़ार में अतिरिक्त आपूर्ति हो गई और कीमतों में और भी गिरावट हुई।

सुरक्षित निवेश के रूप में स्वर्ण की पारंपरिक भूमिका

  • सुरक्षित निवेश विकल्प: ऐतिहासिक रूप से (उदाहरणार्थ, वर्ष 2008 के वित्तीय संकट, कोविड-19 महामारी और वर्ष 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान), जब शेयर बाज़ार और फिएट मुद्राएँ अस्थिर हो जाती हैं, तो निवेशक अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिये स्वर्ण में निवेश का विकल्प चुनते हैं।
  • ब्याज दरों के साथ प्रतिलोम संबंध: स्वर्ण से प्रतिफल प्राप्त नहीं होता है (इससे ब्याज या लाभांश प्राप्त नहीं होता)। 
    • ब्याज दरें कम होने पर यह सामान्यतया सबसे उपयुक्त विकल्प होता है, क्योंकि सरकारी बॉण्ड जैसे ब्याज अर्जक परिसंपत्तियों की तुलना में स्वर्ण धारिता की अवसर लागत कम हो जाती है।
  • अमेरिकी डॉलर के साथ प्रतिलोम संबंध: स्वर्ण का वैश्विक मूल्य निर्धारण अमेरिकी डॉलर (USD) में होता है। डॉलर की कीमत कम होने से अन्य मुद्राओं वाले खरीदारों के लिये स्वर्ण सस्ता हो जाता है, जिससे मांग और कीमतें बढ़ जाती हैं।

अमेरिकी डॉलर: नया सुरक्षित निवेश विकल्प

  • अल्पकालिक डॉलर का प्रभुत्व: निकट भविष्य में अमेरिकी डॉलर प्राथमिक सुरक्षित निवेश के रूप में कार्य कर रहा है। चूँकि वैश्विक तेल व्यापार मुख्य रूप से डॉलर में होता है (पेट्रोडॉलर), तेल की बढ़ती कीमतें देशों को अपने ऊर्जा आयात के लिये अधिक डॉलर प्राप्त करने के लिये मजबूर करती हैं, जिससे संरचनात्मक रूप से स्वर्ण की तुलना में डॉलर की मांग बढ़ जाती है।
  • दीर्घकालिक डॉलर-विरोधी रणनीति: मौजूदा मूल्य सुधार के बावजूद समग्र दुनिया के केंद्रीय बैंक (विशेषकर उभरते बाज़ारों में) स्वर्ण का महत्त्वपूर्ण रूप से संचय करना जारी रखे हुए हैं। 
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपने विदेशी मुद्रा आरक्षित निधि के एक रणनीतिक घटक के रूप में अपनी स्वर्ण धारिता में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिसके तहत वर्ष 2025 के अंत तक कुल स्वर्ण धारिता 880 मीट्रिक टन से अधिक रही, जो आरक्षित निधि का 15.17% है।
    • यह डी-डॉलराइज़ेशन और पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों से बचाव के लिये विदेशी आरक्षित निधि में विविधता लाने की दिशा में दीर्घकालिक रणनीतिक बदलाव से प्रेरित है।

स्वर्ण

  • तत्त्व से संबंधित मूल बातें: स्वर्ण का रासायनिक प्रतीक Au है (यह लैटिन शब्द aurum से लिया गया है, जिसका अर्थ “चमक भोर” होता है)। इसका परमाणु क्रमांक 79 है, जिससे यह प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले उच्च परमाणु क्रमांक वाले तत्त्वों में से एक है।
    • स्वर्ण अत्यंत दुर्लभ है और इसका अधिकांश निर्माण उल्कापिंडों के प्रभाव से हुआ माना जाता है।
  • लचीलापन और तन्यता: स्वर्ण सभी ज्ञात धातुओं में सबसे अधिक लचीला और तन्य होता है।
  • अक्रिय धातु: यह रासायनिक रूप से अभिक्रियाहीन होता है। इसमें न ज़ंग लगता है और न ही इसका क्षरण होता है। यह वायु, नमी और अधिकांश अम्लों से प्रभावित नहीं होता, केवल नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विशेष संक्षारक मिश्रण (जिसे एक्वारेजिया कहा जाता है) में घुलता है।
  • चालकता: यह ऊष्मा और विद्युत दोनों का उत्कृष्ट चालक है।
  • आर्थिक एवं वित्तीय महत्त्व: स्वर्ण की शुद्धता कैरेट में मापी जाती है (24K = 99.9% शुद्ध)। इसे मज़बूती के लिये अक्सर मिश्रधातु के रूप में उपयोग किया जाता है।
    • यह एक सुरक्षित निवेश माना जाता है, ऐतिहासिक रूप से स्वर्ण मानक से जुड़े होने के साथ इसे केंद्रीय बैंकों द्वारा रणनीतिक भंडार के रूप में रखा जाता है।
  • तकनीकी एवं औद्योगिक उपयोग: अपनी उच्च चालकता और क्षरण-प्रतिरोध के कारण स्वर्ण का व्यापक रूप से उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊष्मा परावर्तन के लिये एयरोस्पेस अनुप्रयोगों में तथा चिकित्सा और दंत चिकित्सा में किया जाता है। इसमें स्वर्ण के नैनोकणों जैसे उन्नत उपयोग भी शामिल हैं।

भारत में स्वर्ण भंडार

  • भारत में स्वर्ण एक प्रमुख खनिज संसाधन है जिसका आर्थिक और रणनीतिक महत्त्व है। यह मुख्य रूप से स्वर्णयुक्त चट्टानों और जलोढ़ निक्षेपों में पाया जाता है तथा इसका अधिकतर संकेंद्रण प्रायद्वीपीय पठार में है।
  • कर्नाटक इसका प्रमुख उत्पादक राज्य है, जहाँ कोलार और हुट्टी जैसे प्रमुख क्षेत्र स्थित हैं, जबकि आंध्र प्रदेश रामगिरि क्षेत्र के साथ इसके बाद आता है।
    • कोलार ज़िले में स्थित कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) विश्व की सबसे पुरानी और गहरी स्वर्ण खानों में से एक है।
  • भंडार के संदर्भ में बिहार का सबसे अधिक हिस्सा (~45%) है। इसके बाद राजस्थान (~23%) का स्थान है। झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और केरल का योगदान अपेक्षाकृत कम है, जहाँ स्वर्ण प्रायः जलोढ़ निक्षेपों में पाया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. किस कारण स्वर्ण को सुरक्षित निवेश माना जाता है?
स्वर्ण ब्याज न देने वाली तथा मुद्रास्फीति से सुरक्षा प्रदान करने वाली परिसंपत्ति है, जिसकी मांग आर्थिक और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के समय बढ़ जाती है।

2. हाल ही में स्वर्ण की कीमतों में गिरावट का मुख्य कारण क्या है?
अमेरिका में उच्च ब्याज दरें और बढ़ते बॉन्ड यील्ड्स के कारण निवेश स्वर्ण से हटकर ब्याज देने वाली परिसंपत्तियों की ओर हुआ है।

3. कच्चे तेल की कीमतें स्वर्ण की कीमतों को कैसे प्रभावित करती हैं?
तेल की बढ़ती कीमतें मुद्रास्फीति को बढ़ाती हैं, जिससे सख्त मौद्रिक नीति अपनाई जाती है और स्वर्ण की मांग नकारात्मक रूप से प्रभावित होती है।

4. केंद्रीय बैंक के भंडार में स्वर्ण का क्या महत्त्व है?
स्वर्ण एक रणनीतिक संपत्ति भंडार के रूप में भूमिका निभाता है, जो विविधीकरण में सहायता करता है और डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों को समर्थन देता है।

5. भारत में स्वर्ण मुख्य रूप से कहाँ पाया जाता है?
भारत में स्वर्ण के भंडार मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय पठार (विशेषकर कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, बिहार और राजस्थान) में केंद्रित हैं।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न  

प्रिलिम्स:

प्रश्न. सरकार की 'संप्रभु स्वर्ण बॉण्ड योजना'  (Sovereign Gold Bond Scheme) एवं 'स्वर्ण मुद्रीकरण योजना' (Gold Monetization Scheme) का/के उद्देश्य क्या है/ हैं?  (2016)

  1. भारतीय गृहस्थों के पास निष्क्रिय पड़े स्वर्ण को अर्थव्यवस्था में लाना
  2.  स्वर्ण एवं आभूषण के क्षेत्र में एफडीआई (FDI) को प्रोत्साहित करना
  3.  स्वर्ण-आयात पर भारत की निर्भरता में कमी लाना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सा समूह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में शामिल है? (2013)   

(a) विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ, विशेष आहरण अधिकार (एसडीआर) और विदेशों से ऋण।
(b) विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ, आरबीआई और एसडीआर की स्वर्ण होल्डिंग्स।
(c) विदेशी मुद्रा संपत्ति, विश्व बैंक से ऋण और एसडीआर।
(d) विदेशी मुद्रा संपत्ति, आरबीआई की स्वर्ण होल्डिंग और विश्व बैंक से ऋण।

उत्तर: (b) 


Q. भारतीय सरकारी बॉण्ड प्रतिफल निम्नलिखित में से किससे/किनसे प्रभावित होता है/होते हैं?

  1. यूनाइटेड स्टेट्स फेडरल रिज़र्व की कार्रवाई
  2.  भारतीय रिज़र्व बैंक की कार्रवाई
  3.  मुद्रास्फीति एवं अल्पावधि ब्याज दर

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (d)


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