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डेली न्यूज़

अंतर्राष्ट्रीय संबंध

WTO के IFD समझौते का भारत द्वारा विरोध

प्रिलिम्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन, विकास हेतु निवेश सुगमता (IFD) समझौता, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, बेल्ट एंड रोड पहल, द्विपक्षीय निवेश संधियाँ

मेन्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन (WTO) सुधार और बहुपक्षवाद का संकट, खाद्य सुरक्षा बनाम वैश्विक व्यापार नियम (सार्वजनिक शेयरधारिता का मुद्दा), भारत की व्यापार नीति और रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक शासन में बहुपक्षीय समझौतों की भूमिका

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों? 

भारत ने दक्षिण अफ्रीका, तुर्किये और लगभग 37 अन्य देशों के साथ विश्व व्यापार संगठन (WTO) में चीन-समर्थित विकास हेतु निवेश सुगमता (IFD) संबंधी समझौते के खिलाफ आपत्ति व्यक्त की।

सारांश

  • भारत बहुपक्षवाद, WTO कन्सेंसस के क्षरण और नीतिगत संप्रभुता एवं खाद्य सुरक्षा (PSH मुद्दा) के लिये खतरों के कारण IFD समझौते का विरोध करता है।
  • इसका रुख रणनीतिक भी है, जिसका उद्देश्य दोहा विकास एजेंडे की प्राथमिकताओं को सुरक्षित करने और चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव का सामना करने के लिये वार्त्ता का लाभ उठाना है।

विकास के लिये निवेश सुविधा (IFD) समझौता क्या है?

  • परिचय: वर्ष 2017 में चीन के नेतृत्व में विकासशील और अल्प विकसित देशों (LDC) के एक समूह द्वारा शुरू की गई IFD पहल का उद्देश्य निवेश और व्यापार में सुधार के लिये एक वैश्विक समझौता विकसित करना है।
  • उद्देश्य: इसका प्राथमिक लक्ष्य नौकरशाही प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करके, लालफीताशाही को कम करके तथा विकासशील और अल्प विकसित देशों (LDC) का समर्थन करके निवेशकों के लिये निवेश करना, दिन-प्रतिदिन का व्यवसाय करना और परिचालन के विस्तार को आसान बनाना है।
  • प्रमुख विशेषता:
    • बहुपक्षीय प्रकृति: इसे एक बहुपक्षीय समझौते (मराकेश समझौते के तहत) के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
      • इसका अर्थ यह है कि यह केवल उन WTO सदस्यों के लिये कानूनी रूप से बाध्यकारी होगा जो स्वेच्छा से इसे स्वीकार और अनुसमर्थन करते हैं, न कि संपूर्ण WTO के सदस्यों के लिये।
    • बहिष्करण: प्रस्तावकों का दावा है कि यह समझौता स्पष्ट रूप से बाज़ार पहुँच, निवेश संरक्षण, निवेशक-राज्य विवाद समाधान (ISDS) और सरकारी खरीद जैसे विवादास्पद मुद्दों को बाहर करता है।

IFD समझौते के संबंध में भारत की चिंताएँ क्या हैं?

  • गैर-जनादेशित मुद्दा: भारत का तर्क है कि निवेश सुविधा एक "गैर-व्यापार मुद्दा" है।
    • WTO की स्थापना वस्तुओं, सेवाओं और बौद्धिक संपदा में वैश्विक व्यापार को विनियमित करने के लिये की गई थी।
    • एक सर्वसम्मति वाले बहुपक्षीय जनादेश के बगैर WTO के जनादेश को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को विनियमित करने के लिये विस्तारित करना मूल मराकेश समझौते का उल्लंघन करता है।
  • बहुपक्षवाद और सहमति के लिये खतरा: WTO पारंपरिक रूप से बहुपक्षवाद और सहमति पर कार्य करता है, जहाँ प्रत्येक सदस्य की समान आवाज़ होती है।
    • भारत को आशंका है कि "बहुपक्षीय मार्ग" (इच्छुक गठबंधन द्वारा समर्थित) के माध्यम से IFD को आगे बढ़ाने से यह सर्वसम्मति-आधारित व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।
    • यह "दो-स्तरीय" WTO को तैयार कर सकता है, जो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा भारी रूप से प्रभुत्वशील हो, जिससे वैश्विक दक्षिण की सामूहिक आवाज़ को दरकिनार कर दिया जाएगा।
  • सोवरेन पॉलिसी स्पेस की कमी: IFD ढाँचा एक पूर्व-निवेश अपील प्रणाली और स्वतंत्र जाँच निकायों का प्रस्ताव करता है।
    • भारत चिंतित है कि FDI पर कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक नियम विकासशील राष्ट्रों की घरेलू नीति स्वायत्तता को सीमित कर देंगे।
    • सरकारों को अपनी अद्वितीय व्यापक आर्थिक स्थितियों, राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं (जैसे– परमाणु ऊर्जा और रक्षा के लिये अपवादों की कमी) और स्थानीय विकास लक्ष्यों के अनुसार विदेशी निवेशों को विनियमित करने के लिये लचीलेपन की आवश्यकता होती है।
  • मुख्य मांगों के लिये सामरिक रुख: व्यापार विशेषज्ञ इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि भारत का विरोध सामरिक है।

चीन का दृष्टिकोण

  • IFD का समर्थन करने वाले 128 देशों में से 98 देश बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) के भी सदस्य हैं।
  • भाग लेने वाली अर्थव्यवस्थाओं में नियामकीय प्रक्रियाओं के मानकीकरण के माध्यम से IFD अप्रत्यक्ष रूप से चीन के बड़े पैमाने के सीमा-पार अवसंरचना नेटवर्क के संचालन वातावरण को मज़बूत कर सकता है।
  • IFD को विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने से नियामकीय समन्वय मज़बूत हो सकता है, जो चीन के बढ़ते विदेशी निवेश विस्तार को अधिक अनुकूल बना सकता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो भारत (जैसे– दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र) के लिये रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

आगे की राह

  • दोहा एजेंडा को प्राथमिकता देना: विश्व व्यापार संगठन को नए गैर-अनिवार्य बहुपक्षीय समझौतों को अपनाने से पहले कृषि सब्सिडी, विकासशील देशों के लिये विशेष एवं विभेदक व्यवहार (S&DT) और निष्क्रिय हो चुके विवाद निपटान अपीलीय निकाय की बहाली जैसे महत्त्वपूर्ण बहुपक्षीय मुद्दों के समाधान को प्राथमिकता देनी चाहिये।
  • द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs): एक कठोर वैश्विक ढाँचे के बजाय भारत को लचीली द्विपक्षीय निवेश संधियों (BITs) पर बातचीत जारी रखनी चाहिये, जो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आकर्षित करते हुए उसकी संप्रभु नियामक शक्तियों और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा भी सुनिश्चित करें।
  • गठबंधन निर्माण: राजनयिक अलगाव से बचने के लिये भारत को अफ्रीकी संघ और अन्य विकासशील देशों के साथ सक्रिय रूप से जुड़कर IFD के दीर्घकालिक जोखिमों को समझाना चाहिये तथा विश्व व्यापार संगठन के बहुपक्षीय स्वरूप की रक्षा के लिये सहमति बनानी चाहिये।
  • सार्वजनिक भंडारण (PSH) के लिये IFD का उपयोग: भारत IFD पर अपने वीटो अधिकार का उपयोग एक महत्त्वपूर्ण सौदेबाज़ी के साधन के रूप में कर सकता है। विश्व व्यापार संगठन में भारत की मुख्य मांग खाद्यान्न के सार्वजनिक भंडारण हेतु स्थायी समाधान सुनिश्चित करना है।
    • भारत संकेत दे सकता है कि वह बहुपक्षीय समझौतों पर अपनी कड़ी स्थिति पर पुनर्विचार तभी करेगा, जब विकसित देश सार्वजनिक भंडारण (PSH) के लिये स्थायी समाधान पर सहमत हों।

निष्कर्ष

भारत का दृष्टिकोण आर्थिक, विकासात्मक और रणनीतिक हितों के बीच एक संतुलित समन्वय को दर्शाता है। हालाँकि IFD निवेश को सुगम बनाने में लाभ प्रदान करता है, फिर भी भारत विश्व व्यापार संगठन की बहुपक्षीय संरचना को बनाए रखने और खाद्य सुरक्षा जैसी अपनी घरेलू प्राथमिकताओं की रक्षा को लेकर सतर्क बना हुआ है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न.  खाद्य सुरक्षा और नीतिगत संप्रभुता के संदर्भ में IFD समझौते के प्रति भारत के विरोध पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. WTO में IFD समझौता क्या है?
एक बहुपक्षीय समझौता, जिसका उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाकर और पारदर्शिता में सुधार लाकर FDI को सुगम बनाना है।

2. भारत IFD समझौते का विरोध क्यों कर रहा है?
बहुपक्षवाद और नीतिगत संप्रभुता के क्षरण तथा खाद्य सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की उपेक्षा को लेकर चिंताओं के कारण।

3. सार्वजनिक भंडारण (PSH) मुद्दा क्या है?
यह सरकारी खरीद और खाद्यान्नों के रियायती वितरण से संबंधित है, जो WTO की सब्सिडी सीमाओं से अधिक है।

4. ‘पीस क्लॉज़’ (2013 बाली) क्या है?
यह भारत जैसे विकासशील देशों को बिना किसी कानूनी कार्रवाई के अस्थायी तौर पर सब्सिडी की सीमाओं का उल्लंघन करने की अनुमति देता है।

5. चीन IFD समझौते से किस प्रकार जुड़ा है?
IFD के कई सदस्य चीन के BRI का हिस्सा हैं, जिससे चीन के बढ़ते आर्थिक प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रश्न 1. 'एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ऑन द एप्लीकेशन ऑफ सेनेटरी एंड फाइटोसेनेटरी मेज़र्स और 'पीस क्लाज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं। (2015)

(a) खाद्य और कृषि संगठन

(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन

(c) विश्व व्यापार संगठन

(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

उत्तर: (c)


प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसके संदर्भ में आपको कभी-कभी समाचारों में 'ऐंबर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016)

(a) WTO मामला

(b) SAARC मामला

(c) UNFCCC मामला

(d) FTA पर भारत-यूरोपीय संघ वार्त्ता 

उत्तर: (a)


मेन्स:

प्रश्न . यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को ज़िंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं, विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)

प्रश्न 2. “WTO के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन तथा प्रोन्नति करना है। परंतु (संधि) वार्त्ताओं की दोहा परिधि मृतोन्मुखी प्रतीत होती है जिसका कारण विकसित और विकासशील देशों के बीच मतभेद है।'' भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)


शासन व्यवस्था

परिसीमन में उत्तर-दक्षिण विभाजन का संतुलन

प्रिलिम्स के लिये: परिसीमन, संवैधानिक संशोधन, महिला आरक्षण अधिनियम, 2023, जनगणना, अनुच्छेद 82, मुख्य चुनाव आयुक्त, 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976, वित्त आयोग, कुल प्रजनन दर (TFR), मानव विकास सूचकांक (HDI)

मेन्स के लिये: परिसीमन से संबंधित प्रमुख तथ्य तथा परिसीमन प्रक्रिया में हाल के विकास, परिसीमन अभ्यास से संबंधित चिंताएँ एवं आगे की राह।

स्रोत: इकोनॉमिक्स टाइम्स 

चर्चा  में क्यों?

केंद्र सरकार परिसीमन अभ्यास को गति प्रदान करने और महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 में संवैधानिक संशोधन करने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या बढ़ाना है।

  • हालाँकि, अनुच्छेद 82 के अनुसार 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाना अनिवार्य है, लेकिन प्रस्तावित संशोधन 2011 की जनगणना के आँकड़ों के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं, जिससे वर्तमान जनगणना पूर्ण होने से पहले ही निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण संभव हो सकेगा।

सारांश

  • केंद्र सरकार 2011 के जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 816 करने की योजना बना रही है, ताकि वर्ष 2029 के चुनावों तक 33% महिला आरक्षण को शीघ्र लागू किया जा सके।
  • यह रणनीति राज्यों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखती है, जिससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों को दंडित न किया जाए, साथ ही SC/ST आरक्षण को भी बढ़ाया जा सके।
  • हालाँकि, इस कदम के सामने संघवाद, वित्तीय संसाधनों के बँटवारे (फिस्कल डिवोल्यूशन) और भारित प्रतिनिधित्व के सूत्र की आवश्यकता जैसी महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ विद्यमान हैं।

परिसीमन अभ्यास से संबंधित प्रमुख विकास क्या हैं?

  • सीटों में वृद्धि: सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में लगभग 50% की वृद्धि (प्रो-राटा आधार पर) का प्रस्ताव कर रही है। लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 816 की जा सकती हैं।
    • राज्यों का आनुपातिक संतुलन बनाए रखना: दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण ‘दंडित’ होने से बचाने के लिये राज्यों का सापेक्ष प्रतिनिधित्व स्थिर रखा जाएगा। उदाहरण: उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120, जबकि तमिलनाडु की 39 से बढ़कर 59 हो सकती हैं।
  • नई जनगणना से पृथक्करण: प्रस्तावित संशोधन के तहत महिला आरक्षण को नई जनगणना की अनिवार्यता से अलग किया जाएगा और वर्ष 2011 को आधार वर्ष बनाया जाएगा, ताकि इसका शीघ्र क्रियान्वयन हो सके।
    • महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 ने इसके कार्यान्वयन को दशकीय जनगणना और परिसीमन से जोड़ा था। कोविड-19 के कारण विलंबित 2021 की जनगणना अब अप्रैल 2026 से शुरू हो रही है, जिसके कारण इसका कार्यान्वयन 2030 के बाद तक स्थगित हो सकता था, इसीलिये इसे गति प्रदान करने हेतु नए संशोधनों की आवश्यकता महसूस की गई है।
  • महिला प्रतिनिधित्व: संशोधित लोकसभा में लगभग 33% सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी; अर्थात संभावित 816 सीटों में से लगभग 273 सीटें।
    • महिलाओं के लिये आरक्षित सीटों का निर्धारण लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा और यह व्यवस्था 15 वर्षों की अवधि तक लागू रहेगी।
  • संशोधित SC/ST कोटा: अनुसूचित जाति (SC) के लिये आरक्षित सीटें 84 से बढ़कर 136 होने की संभावना है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) के लिये सीटें 47 से बढ़कर 70 हो सकती हैं।
    • महिला आरक्षण को ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) रूप से लागू किया जाएगा, जिससे SC और ST श्रेणियों के भीतर भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी। विपक्ष ने मांग की है कि यह आरक्षण लाभ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं तक भी विस्तारित किया जाए।
  • क्रियान्वयन समय-रेखा: संभावना है कि ये नए प्रावधान और संशोधित सीट संरचना 2029 के आम चुनावों से प्रभावी हो जाएंगे। निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण हेतु वर्ष 2029 के आम चुनावों से पहले, जून 2026 तक एक परिसीमन आयोग के गठन की संभावना है।

परिसीमन

  • परिचय: परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिये भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि प्रत्येक सीट लगभग समान संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करे।
  • उद्देश्य: समय के साथ जनसंख्या घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार सीमाओं को समायोजित कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत को लागू करना।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद संसद को एक परिसीमन अधिनियम बनाने का निर्देश दिया गया है, जिसके तहत राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन किया जाता है तथा राज्यों को भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
    • अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं में सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों के इसी प्रकार के पुनर्निर्धारण का प्रावधान करता है।
  • परिसीमन आयोग: यह एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र निकाय है, जिसका गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसमें कुल 3 सदस्य होते हैं, एक अध्यक्ष (जो सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं), मुख्य चुनाव आयुक्त (या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त) तथा संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त।
    • आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेश लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं, लेकिन उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
    • मार्च 2026 तक परिसीमन आयोग का गठन चार बार किया जा चुका है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
  • परिसीमन पर स्थगन: 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से लोकसभा में कुल सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थगित (फ्रीज़) कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी रूप से लागू करने वाले राज्यों (मुख्यतः दक्षिण भारत) को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में दंडित न किया जाए।
    • 84वाँ संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा में कुल सीटों की संख्या पर लगाए गए स्थगन को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया।
    • हालाँकि 2002 के परिसीमन आयोग ने राज्यों के भीतर आंतरिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण (2001 की जनगणना के आधार पर) किया, लेकिन राज्यों के बीच सीटों का आवंटन अब भी 1971 के आँकड़ों पर आधारित है।
  • न्यायिक पुनरवलोकन: किशोरचंद्र छगनलाल राठौड़ मामला, 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि परिसीमन आयोग का कोई आदेश स्पष्ट रूप से विवेकाधीन हो और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता हो, तो उसका न्यायिक पुनरवलोकन किया जा सकता है।

परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं?

  • जनसांख्यिकीय दंड: दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक) ने राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है। यदि परिसीमन (delimitation) पूरी तरह से वर्तमान जनसंख्या के आँकड़ों के आधार पर किया जाता है, तो इससे उनकी सीटों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी। यह प्रभावी रूप से उन राज्यों को उनकी विकासात्मक सफलता के लिये ‘दंडित’ करने और उच्च प्रजनन दर वाले उत्तरी राज्यों को ‘पुरस्कृत’ करने जैसा होगा।
    • उदाहरण के लिये, परिसीमन को केवल जनसंख्या पर आधारित करने से केरल में सीटों की वृद्धि 0% , तमिलनाडु में 26% और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 79% होगी।
  • संघवाद के लिये खतरा: संसदीय सीटों का उत्तरी राज्यों की ओर महत्त्वपूर्ण हस्तांतरण भारत के संघीय स्वरूप को कमज़ोर कर सकता है, जिससे उत्तरी राज्य दक्षिणी राज्यों की सहमति के बिना सरकार बनाने या संवैधानिक संशोधन पारित करने में सक्षम हो सकते हैं। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित छोटे उत्तरी और पूर्वोत्तर राज्य भी इससे प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे।
  • राजकोषीय नुकसान: वित्त आयोग के फॉर्मूले में जनसंख्या एक प्रमुख मानदंड होने के कारण, कर हस्तांतरण के संबंध में दक्षिणी राज्यों को यह डर है कि वे लगातार उच्च राजस्व का योगदान देते रहेंगे, लेकिन इससे उन्हें राजनीतिक और वित्तीय रूप से कम अधिकार मिलेंगे, जिससे उन्हें राजकोषीय नुकसान होगा।
  • सीमा परिसीमन से संबंधित जोखिम: ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की गई हैं कि सीमाओं का पुनर्गठन विशिष्ट राजनीतिक दलों या सांप्रदायिक समूहों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से किया जा सकता है, जिसके तहत (या तो ‘विपक्षी मतदाताओं को एक साथ लाया जाए’ या उन्हें ‘तोड़ा जाए’) जम्मू-कश्मीर में हालिया क्षेत्रीय परिसीमन के दौरान विपक्षी दलों ने भी इस प्रकार की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया था।
  • क्षेत्रीय और राजनीतिक तनाव में वृद्धि: जनसंख्या-आधारित मानदंडों के विरोध में दक्षिणी राज्यों के नेताओं के एकजुट होने से उत्तर-दक्षिण विभाजन गहराने का खतरा है, जिसे वे "डेमोकल्स की तलवार" बता रहे हैं। इस बढ़ते क्षेत्रीय और राजनीतिक तनाव से राजनीतिक असंतोष, जनगणना पर रोक को 2056 तक बढ़ाने की मांग और संभावित संघीय गतिरोध जैसी आशंकाएँ बढ़ गई हैं।
  • परिचालन संबंधी चुनौतियाँ: लोकसभा में सदस्यों की संख्या को 800 से अधिक तक बढ़ाने (यह सुनिश्चित करने के लिये कि किसी भी राज्य की सीटें कम न हों) के प्रस्ताव से संसदीय कार्यकरण पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। इतने बड़े सदन में प्रभावी ढंग से विचार-विमर्श करने और बहसों की गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता पर संदेह उत्पन्न होता है।

आम सहमति पर आधारित परिसीमन के लिये कौन-से कदम आवश्यक हैं?

  • भारित प्रतिनिधित्व सूत्र: संतुलित परिसीमन सुनिश्चित करने के लिये सीट आवंटन सूत्र को केवल जनसंख्या-आधारित मॉडल के बजाय एक भारित दृष्टिकोण में बदला जा सकता है। यह नया सूत्र जनसांख्यिकीय कारकों के साथ-साथ विकासात्मक प्रदर्शन को भी पुरस्कृत करेगा।
    • यह सुनिश्चित करने के लिये कि सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित न किया जाए, कुल प्रजनन दर (TFR), मानव विकास सूचकांक (HDI) और आर्थिक योगदान (GST/राजकोषीय अनुशासन) जैसे मानदंडों को एकीकृत किया जाना चाहिये।
  • राज्यसभा को सशक्त बनाना: राज्यसभा को और अधिक सशक्त बनाने के लिये इसे एक मज़बूत संघीय सुरक्षा कवच में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिये अमेरिकी सीनेट मॉडल के अनुरूप राज्यों का निश्चित प्रतिनिधित्व शामिल किया जा सकता है, जहाँ प्रत्येक राज्य को जनसंख्या पर ध्यान दिये बिना समान या अधिक संतुलित संख्या में सीटें आवंटित की जाती हैं।
    • इसके अलावा, निवास की आवश्यकताओं को फिर से लागू करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सदस्य वास्तव में उन राज्यों के निवासी हैं जिनका वे सदन में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
  • वित्त आयोग के माध्यम से सुरक्षा उपाय: वित्त आयोग दक्षिणी और पहाड़ी राज्यों के लिये केंद्रीय करों के हिस्से की रक्षा के लिये ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ और ‘वन आवरण’ के भार को बढ़ा सकता है।
  • कुछ विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि बड़े राज्यों, जैसे कि उत्तर प्रदेश, का छोटे प्रशासनिक खंडों में विभाजन करना आवश्यक है। उनका मानना है कि ऐसा करने से किसी एक भौगोलिक क्षेत्र को राष्ट्रीय राजनीति पर अपनी प्रभुता स्थापित करने से रोका जा सकता है।
  • संस्थागत पारदर्शिता में सुधार: चुनावी क्षेत्रों के हेरफेर या राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोपों से बचने के लिये  परिसीमन आयोग की मसौदा प्रक्रिया में नागरिक समाज और क्षेत्रीय दलों जैसे प्रमुख हितधारकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है।

निष्कर्ष:

त्वरित परिसीमन की प्रक्रिया एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसका लक्ष्य महिला सशक्तीकरण के लोकतांत्रिक उद्देश्य को पूरा करना है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि सहकारी संघवाद अस्थिर न हो। इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे केवल जनसंख्या-आधारित मॉडल तक सीमित न रखकर एक ऐसे भारित सूत्र का उपयोग किया जाए जो विकासात्मक प्रदर्शन को भी महत्त्व दे। ऐसा करने से ही भारत का लोकतांत्रिक विस्तार समावेशी बना रह सकेगा और सभी क्षेत्रों को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य होगा।

दृष्टि मेन्स का प्रश्न:

प्रश्न: भारत में परिसीमन की संवैधानिक रूपरेखा का विश्लेषण कीजिये। इसके अतिरिक्त, इस बात की विवेचना कीजिये कि आगामी 2026 का परिसीमन अभ्यास किस प्रकार दक्षिणी राज्यों में इस आशंका को जन्म दे रहा है कि उनकी जनसंख्या नियंत्रण और विकासात्मक सफलताओं के परिणामस्वरूप वे राजनीतिक रूप से हाशिये  पर चले जाएंगे?

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. परिसीमन क्या है?
समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 द्वारा अनिवार्य।

2. परिसीमन पर संवैधानिक रोक क्या है?
42वें संशोधन (1976) और 84वें संशोधन (2001) ने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक स्थिर कर दिया।

3. अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 के बीच संवैधानिक अंतर क्या है?
अनुच्छेद 82 संसद को जनगणना के बाद लोकसभा सीटों के लिये परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं के लिये सीटों के पुनर्व्यवस्थापन का प्रावधान करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रिलिम्स

प्रश्न. दिसंबर 2023 तक भारत सरकार द्वारा कितने परिसीमन आयोग गठित किये गए हैं?  (2024)

(a) एक

(b) दो

(c) तीन

(d) चार  

उत्तर: (d)


प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)

परिसीमन आयोग के आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।  

जब परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


मेन्स

प्रश्न. "भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।" सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार-योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016) 

प्रश्न. "जिस समय हम भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफ़िक डिविडेंड) को शान से प्रदर्शित करते हैं, उस समय हम रोज़गार-योग्यता की पतनशील दरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।" क्या हम ऐसा करने में कोई चूक कर रहे हैं? भारत को जिन जॉबों की बेसबरी से दरकार है, वे जॉब कहाँ से आएंगे? स्पष्ट कीजिये। (2014)


रैपिड फायर

मानसिक विकारों के संबंध में भारत की पहली डिजिटल रिपॉजिटरी: CALM-ब्रेन

स्रोत: द हिंदू

भारत ने CALM-ब्रेन लॉन्च किया है, जो मानसिक विकारों से संबंधित भारत की पहली डिजिटल रिपॉजिटरी है, जिसका उद्देश्य मानसिक विकारों के अनुसंधान, निदान और उपचार हेतु सहयोगी तंत्र के रूप में कार्य करना है।

  • CALM-ब्रेन: यह अपनी तरह का पहला ओपन-सोर्स डेटाबेस है जो मानसिक विकारों से प्रभावित मस्तिष्क संरचना पर विस्तृत सूचनाएँ संकलित करता है, जिससे उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान और नैदानिक अनुप्रयोग सक्षम होते हैं।
    • यह रिपॉजिटरी/संग्रह राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS) और राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र (NCBS) - TIFR द्वारा रोहिणी नीलेकणी सेंटर फॉर ब्रेन एंड माइंड (CBM) के अंतर्गत विकसित किया गया है।
    • यह संग्रह वर्ष 2016 में डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी एवं प्रतिक्षा ट्रस्ट द्वारा संयुक्त रूप से वित्तपोषित एक्सेलेरेटर प्रोग्राम फॉर डिस्कवरी इन ब्रेन डिसऑर्डर यूजिंग स्टेम सेल्स (ADBS परियोजना) के भाग के रूप में अपनी पहचान बनाए हुए है।
  • डेटा कवरेज़: यह प्लेटफॉर्म क्लिनिकल, न्यूरो-इमेजिंग, व्यवहारिक और आनुवंशिक डेटासेट को एकीकृत करता है, जो लत, बायपोलर डिसऑर्डर, डिमेंशिया और सिज़ोफ्रेनिया जैसे प्रमुख विकारों को कवर करता है, जो इसके दायरे को व्यापक बनाता है।
    • इस संग्रह में 900 से अधिक परिवारों के 2,000 से अधिक व्यक्तियों का डेटा शामिल है, जो प्रभावित और अप्रभावित व्यक्तियों के बीच तुलनात्मक विश्लेषण को सक्षम बनाता है।
  • बायोरिपॉजिटरी लिंकेज: यह एक स्टेम सेल बायोबैंक से संबंधित है, जो शोधकर्त्ताओं को मानसिक विकारों के जैविक आधार का पता लगाने और मानसिक स्वास्थ्य में प्रायोगिक अनुसंधान करने की अनुमति देता है।
  • अनुसंधान का उद्देश्य: प्राथमिक लक्ष्य मानसिक विकारों के बायोमार्कर और तंत्रिका-संज्ञानात्मक संकेतकों की पहचान करना, रोगों की प्रगति को समझना और बेहतर नैदानिक परिणामों के लिये उपचार प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना है।
  • महत्त्व: CALM-ब्रेन में प्रारंभिक निदान, व्यक्तिगत उपचार और सटीक मनोरोग को सक्षम बनाने की क्षमता है, जिससे भारत में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित सेवाओं की प्रदायगी में सुधार होगा।

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