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भारतीय अर्थव्यवस्था

द्विपक्षीय निवेश संधियाँ

  • 19 Feb 2024
  • 11 min read

प्रिलिम्स के लिये:

द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs), केंद्रीय बजट 2024-25, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI)

मेन्स के लिये:

द्विपक्षीय निवेश संधियाँ, भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये FDI का महत्त्व।

स्रोत:इंडियन एक्सप्रेस

चर्चा में क्यों?

अंतरिम केंद्रीय बजट 2024-25 प्रस्तुत करते हुए, भारतीय वित्त मंत्री ने कहा कि भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign direct investment- FDI) के प्रवाह को बढ़ावा देने के लिये अपने व्यापरिक भागीदारों के साथ द्विपक्षीय निवेश संधियों (Bilateral Investment Treaty- BITs) पर बातचीत करेगा।

  • विशेष रूप से वर्ष 2016 में BIT मॉडल को अपनाने के बाद से भारत की द्विपक्षीय संधियाँ समाप्त हो गई हैं।

द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs) क्या हैं?

  • परिचय:
    • BITs दो देशों के बीच एक-दूसरे के क्षेत्रों में विदेशी निजी निवेश को बढ़ावा देने एवं उसकी सुरक्षा करने के लिये पारस्परिक समझौते हैं।
    • 90 के दशक के मध्य से भारत सरकार ने विदेशी निवेशकों एवं निवेशों को अनुकूल परिस्थितियों के साथ संधि-आधारित सुरक्षा प्रदान करने के लिये BIT की शुरुआत की।
  • न्यूनतम गारंटी:
    • BIT विदेशी निवेश व्यवहार के संबंध में दोनों देशों के बीच न्यूनतम गारंटी स्थापित करते हैं, जैसे,
      • राष्ट्रीय व्यवहार (विदेशी निवेशकों के साथ घरेलू कंपनियों के समान व्यवहार करना)
      • निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार (अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार)
      • ज़ब्ती से सुरक्षा (प्रत्येक देश की अपने क्षेत्र में विदेशी निवेश प्राप्त करने की क्षमता को सीमित करना)।
  • BITs के अंतर्गत मध्यस्थता:
    • BITs सामान्य रूप से निवेशकों एवं निवेश करने वाले देश के बीच विवादों को निपटाने के लिये एक तंत्र प्रदान करते हैं।
    • ऐसे विवादों को निपटाने के लिये सर्वाधिक चुना जाने वाला तरीका मध्यस्थता है, जहाँ पक्ष न्यायालय में जाने के स्थान पर अपने विवाद का निर्णय किसी तटस्थ व्यक्ति (मध्यस्थ) द्वार कराये जाने पर सहमती व्यक्त करते हैं।
  • इतिहास:
    • भारत द्वारा पहला BITs, वर्ष 1994 में UK के साथ हस्ताक्षरित किया गया था।
    • वर्ष 2010 में भारत के खिलाफ दायर पहली निवेशक संधि दावे के निपटान के साथ BITs संधि ने ध्यान आकर्षित किया।
    • वर्ष 2011 में भारत को ऑस्ट्रेलिया-भारत BITs (व्हाइट इंडस्ट्रीज़ बनाम रिपब्लिक ऑफ इंडिया) से उत्पन्न विवाद में अपना पहला प्रतिकूल भुगतान करना पड़ा, जहाँ भारत सरकार को इंटरनेशनल चैंबर ऑफ कॉमर्स द्वारा 4.1 मिलियन अमरीकी डाॅलर का भुगतान करने का आदेश दिया गया था।
    • वर्ष 2015 तक भारत को 17 ज्ञात BITs दावों का सामना करना पड़ा, जिसमें ब्रिटिश तेल और गैस कंपनी केयर्न एनर्जी Plc का दावा भी शामिल था, जिसके परिणामस्वरूप भारत सरकार को 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का पुरस्कार मिला।
    • सरकारी खजाने पर बढ़ रहे बोझ को देखते हुए, सरकार वर्ष 1993, BIT मॉडल पर फिर से विचार करने के लिये विवश हुई। इसके परिणामस्वरूप वर्ष 2016 मॉडल BIT को अपनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने संशोधित पाठ के आधार पर शर्तों पर पुनर्विचार करने के अनुरोध के साथ वर्ष 2015 तक निष्पादित 74 संधियों में से 68 को समाप्त कर दिया।
      • वर्ष 2016, BIT मॉडल को अपनाने को विदेशी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिये एक सूक्ष्म तथा कैलिब्रेटेड (अंशांकित) दृष्टिकोण के स्थान पर एक तत्काल संरक्षणवादी उपाय के रूप में देखा गया था।

वर्ष 2016 मॉडल BIT के साथ क्या चुनौतियाँ रही हैं?

  • निवेश की संक्षिप्त परिभाषा:
    • BIT मॉडल द्वारा BIT सुरक्षा के लिये अर्हता प्राप्त करने के लिये आवश्यक निवेश की परिभाषा को सीमित कर दिया। BIT मॉडल इंगित करता है कि भारत निवेश के लिये एक संकीर्ण 'उद्यम-आधारित' परिभाषा को प्रस्तावित करता है, जिसके तहत संधि के तहत केवल प्रत्यक्ष निवेश को संरक्षित किया जाता है।
    • इसमें एक नकारात्मक सूची भी शामिल है, जो निवेश की परिभाषा से पोर्टफोलियो निवेश, ऋण-प्रतिभूतियों में ब्याज, अमूर्त अधिकार इत्यादि को अलग करती है।
    • इस प्रकार नई परिभाषा वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के आधुनिक युग में विदेशी निवेश के बढ़ते दायरे को ध्यान में नहीं रखती है।
  • घरेलू उपचार खण्ड की समाप्ति:
    • BIT मॉडल में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता कार्यवाही शुरू करने से पूर्व घरेलू उपचार की समाप्ति को अनिवार्य करने वाला एक खंड शामिल है।
    • वर्ष 2016, BIT मॉडल में प्रावधान किया गया है कि एक निवेशक को अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता का सहारा लेने से पूर्व स्थानीय व्यवहार का उपयोग करना होगा।
    • यह निश्चित रूप से विदेशी निवेशकों में विश्वास बढ़ाने के लिये बहुत कम है।
  • FDI पर प्रभाव:
    • अन्य देशों के साथ शर्तों पर पुनः बातचीत करने में आने वाली कठिनाइयों ने भी FDI को आकर्षित करने में चुनौतियों में योगदान दिया है।
    • अप्रैल-सितंबर 2023 में भारत में FDI इक्विटी प्रवाह 24% घटकर 20.48 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।
      • कुल FDI- जिसमें इक्विटी प्रवाह, पुनर्निवेश आय तथा अन्य पूंजी शामिल है, अप्रैल-जून 2022 में 38.94 बिलियन अमरीकी डॉलर के मुकाबले समीक्षाधीन अवधि के दौरान 15.5% घटकर 32.9 बिलियन अमरीकी डॉलर हो गई।
  • मेज़बान राज्य को व्यापक विवेकाधीन शक्तियाँ:
    • संधि में निवेश के उचित व्यवहार को सुनिश्चित करने वाला एक खंड शामिल था, जो दोनों पक्षों को ऐसे उपायों को लागू करने से रोकता है जो स्पष्ट रूप से अपमानजनक हैं या उचित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हैं।
    • हालाँकि, "उचित प्रक्रिया" के उल्लंघन के मूल्यांकन का पैमाना क्या है, यह परिभाषित नहीं किया गया है।
    • इसके अतिरिक्त BIT मॉडल में कहा गया है कि यदि मेज़बान राज्य यह निर्णय लेता है कि BIT के तहत कथित उल्लंघन किसी भी समय कराधान का विषय है, तो मेज़बान राज्य का निर्णय गैर-न्यायसंगत होगा और साथ ही मध्यस्थ न्यायाधिकरण द्वारा समीक्षा से छूट दी जाएगी।
      • मॉडल BIT मानता है कि एक विदेशी निवेशक को घरेलू न्यायिक व्याख्याओं एवं तंत्रों पर पूर्ण विश्वास होगा।
      • यह संभावित रूप से मेज़बान राज्य को किसी भी विवाद को न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र से एकतरफा बाहर करने का व्यापक अधिकार दे सकता है, केवल इस आधार पर कि प्रश्न में आचरण कराधान से संबंधित है।

आगे की राह

  • विदेशी निवेशकों और घरेलू अर्थव्यवस्था दोनों के हितों को संतुलित करते हुए यह सुनिश्चित करने के लिये कि यह वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ संरेखित हो, भारत अपनी BIT व्यवस्था पर फिर से विचार कर सकता है। इसमें निष्पक्ष एवं न्यायसंगत व्यवहार, सर्वाधिक पसंदीदा राष्ट्र का दर्जा एवं मज़बूत विवाद समाधान तंत्र के प्रावधान शामिल हो सकते हैं।
  • विवादों के समय पर निपटान की सुविधा के साथ निवेशक राज्य विवादों में प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये वर्ष 2021 में विदेशी मामलों पर संसदीय स्थायी समिति द्वारा की गई सिफारिशें, जैसे मध्यस्थता पूर्व परामर्श एवं बातचीत को बढ़ावा देने के साथ लागू करना।
  • भारत को निवेशक राज्य विवादों को प्रभावी ढंग से संभालने की अपनी क्षमता बढ़ाने के लिये निवेश मध्यस्थता के क्षेत्र में स्थानीय विशेषज्ञता विकसित करने में निवेश करना चाहिये। इसमें प्रशिक्षण पेशेवरों एवं कानूनी विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है, साथ ही निवेश मध्यस्थता के लिये विशेष संस्थान भी बनाए जा सकते हैं।
  • भारत को BIT के लिये एक प्रगतिशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिये जो नियामक संप्रभुता की अनिवार्यता के साथ निवेशक सुरक्षा की आवश्यकता को संतुलित करता है। इसमें निवेशकों के अधिकारों के साथ-साथ सतत् विकास, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देने वाले प्रावधानों को भी शामिल किया जा सकता है।

  UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्षों के प्रश्न  

प्रश्न: निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2021)

  1. विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय
  2. कुछ शर्तों के साथ विदेशी संस्थागत निवेश
  3. वैश्विक डिपॉज़िटरी रसीदें
  4. अनिवासी बाहरी जमा

उपर्युक्त में से किसको प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में शामिल किया जा सकता है?

(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 3
(c) केवल 2 और 4
(d) केवल 1 और 4

उत्तर: (a)

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