शासन व्यवस्था
परिसीमन में उत्तर-दक्षिण विभाजन का संतुलन
- 27 Mar 2026
- 104 min read
प्रिलिम्स के लिये: परिसीमन, संवैधानिक संशोधन, महिला आरक्षण अधिनियम, 2023, जनगणना, अनुच्छेद 82, मुख्य चुनाव आयुक्त, 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976, वित्त आयोग, कुल प्रजनन दर (TFR), मानव विकास सूचकांक (HDI)
मेन्स के लिये: परिसीमन से संबंधित प्रमुख तथ्य तथा परिसीमन प्रक्रिया में हाल के विकास, परिसीमन अभ्यास से संबंधित चिंताएँ एवं आगे की राह।
चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार परिसीमन अभ्यास को गति प्रदान करने और महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 में संवैधानिक संशोधन करने की तैयारी में है। इसका उद्देश्य 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या बढ़ाना है।
- हालाँकि, अनुच्छेद 82 के अनुसार 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाना अनिवार्य है, लेकिन प्रस्तावित संशोधन 2011 की जनगणना के आँकड़ों के उपयोग की अनुमति दे सकते हैं, जिससे वर्तमान जनगणना पूर्ण होने से पहले ही निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण संभव हो सकेगा।
सारांश
- केंद्र सरकार 2011 के जनगणना के आँकड़ों का उपयोग करते हुए लोकसभा की सीटों को बढ़ाकर 816 करने की योजना बना रही है, ताकि वर्ष 2029 के चुनावों तक 33% महिला आरक्षण को शीघ्र लागू किया जा सके।
- यह रणनीति राज्यों के आनुपातिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखती है, जिससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल दक्षिणी राज्यों को दंडित न किया जाए, साथ ही SC/ST आरक्षण को भी बढ़ाया जा सके।
- हालाँकि, इस कदम के सामने संघवाद, वित्तीय संसाधनों के बँटवारे (फिस्कल डिवोल्यूशन) और भारित प्रतिनिधित्व के सूत्र की आवश्यकता जैसी महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ विद्यमान हैं।
परिसीमन अभ्यास से संबंधित प्रमुख विकास क्या हैं?
- सीटों में वृद्धि: सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों में लगभग 50% की वृद्धि (प्रो-राटा आधार पर) का प्रस्ताव कर रही है। लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर लगभग 816 की जा सकती हैं।
- राज्यों का आनुपातिक संतुलन बनाए रखना: दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण ‘दंडित’ होने से बचाने के लिये राज्यों का सापेक्ष प्रतिनिधित्व स्थिर रखा जाएगा। उदाहरण: उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 120, जबकि तमिलनाडु की 39 से बढ़कर 59 हो सकती हैं।
- नई जनगणना से पृथक्करण: प्रस्तावित संशोधन के तहत महिला आरक्षण को नई जनगणना की अनिवार्यता से अलग किया जाएगा और वर्ष 2011 को आधार वर्ष बनाया जाएगा, ताकि इसका शीघ्र क्रियान्वयन हो सके।
- महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 ने इसके कार्यान्वयन को दशकीय जनगणना और परिसीमन से जोड़ा था। कोविड-19 के कारण विलंबित 2021 की जनगणना अब अप्रैल 2026 से शुरू हो रही है, जिसके कारण इसका कार्यान्वयन 2030 के बाद तक स्थगित हो सकता था, इसीलिये इसे गति प्रदान करने हेतु नए संशोधनों की आवश्यकता महसूस की गई है।
- महिला प्रतिनिधित्व: संशोधित लोकसभा में लगभग 33% सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी; अर्थात संभावित 816 सीटों में से लगभग 273 सीटें।
- महिलाओं के लिये आरक्षित सीटों का निर्धारण लॉटरी प्रणाली के माध्यम से किया जाएगा और यह व्यवस्था 15 वर्षों की अवधि तक लागू रहेगी।
- संशोधित SC/ST कोटा: अनुसूचित जाति (SC) के लिये आरक्षित सीटें 84 से बढ़कर 136 होने की संभावना है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) के लिये सीटें 47 से बढ़कर 70 हो सकती हैं।
- महिला आरक्षण को ऊर्ध्वाधर (वर्टिकल) रूप से लागू किया जाएगा, जिससे SC और ST श्रेणियों के भीतर भी एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिये आरक्षित होंगी। विपक्ष ने मांग की है कि यह आरक्षण लाभ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं तक भी विस्तारित किया जाए।
- क्रियान्वयन समय-रेखा: संभावना है कि ये नए प्रावधान और संशोधित सीट संरचना 2029 के आम चुनावों से प्रभावी हो जाएंगे। निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण हेतु वर्ष 2029 के आम चुनावों से पहले, जून 2026 तक एक परिसीमन आयोग के गठन की संभावना है।
परिसीमन
- परिचय: परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिये भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनर्निर्धारण किया जाता है, ताकि प्रत्येक सीट लगभग समान संख्या में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करे।
- उद्देश्य: समय के साथ जनसंख्या घनत्व में होने वाले परिवर्तनों के अनुसार सीमाओं को समायोजित कर ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत को लागू करना।
- संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 82 के अनुसार प्रत्येक जनगणना के बाद संसद को एक परिसीमन अधिनियम बनाने का निर्देश दिया गया है, जिसके तहत राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का पुनः आवंटन किया जाता है तथा राज्यों को भौगोलिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।
- अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं में सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों के इसी प्रकार के पुनर्निर्धारण का प्रावधान करता है।
- परिसीमन आयोग: यह एक उच्च-स्तरीय स्वतंत्र निकाय है, जिसका गठन केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। इसमें कुल 3 सदस्य होते हैं, एक अध्यक्ष (जो सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं), मुख्य चुनाव आयुक्त (या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त) तथा संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त।
- आयोग के आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके आदेश लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के समक्ष प्रस्तुत किये जाते हैं, लेकिन उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
- मार्च 2026 तक परिसीमन आयोग का गठन चार बार किया जा चुका है: 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
- परिसीमन पर स्थगन: 42वाँ संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से लोकसभा में कुल सीटों की संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थगित (फ्रीज़) कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी रूप से लागू करने वाले राज्यों (मुख्यतः दक्षिण भारत) को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी के रूप में दंडित न किया जाए।
- 84वाँ संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा में कुल सीटों की संख्या पर लगाए गए स्थगन को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया।
- हालाँकि 2002 के परिसीमन आयोग ने राज्यों के भीतर आंतरिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण (2001 की जनगणना के आधार पर) किया, लेकिन राज्यों के बीच सीटों का आवंटन अब भी 1971 के आँकड़ों पर आधारित है।
- न्यायिक पुनरवलोकन: किशोरचंद्र छगनलाल राठौड़ मामला, 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि परिसीमन आयोग का कोई आदेश स्पष्ट रूप से विवेकाधीन हो और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन करता हो, तो उसका न्यायिक पुनरवलोकन किया जा सकता है।
परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ी चिंताएँ क्या हैं?
- जनसांख्यिकीय दंड: दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक) ने राष्ट्रीय जनसंख्या नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया है। यदि परिसीमन (delimitation) पूरी तरह से वर्तमान जनसंख्या के आँकड़ों के आधार पर किया जाता है, तो इससे उनकी सीटों की हिस्सेदारी कम हो जाएगी। यह प्रभावी रूप से उन राज्यों को उनकी विकासात्मक सफलता के लिये ‘दंडित’ करने और उच्च प्रजनन दर वाले उत्तरी राज्यों को ‘पुरस्कृत’ करने जैसा होगा।
- उदाहरण के लिये, परिसीमन को केवल जनसंख्या पर आधारित करने से केरल में सीटों की वृद्धि 0% , तमिलनाडु में 26% और मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में 79% होगी।
- संघवाद के लिये खतरा: संसदीय सीटों का उत्तरी राज्यों की ओर महत्त्वपूर्ण हस्तांतरण भारत के संघीय स्वरूप को कमज़ोर कर सकता है, जिससे उत्तरी राज्य दक्षिणी राज्यों की सहमति के बिना सरकार बनाने या संवैधानिक संशोधन पारित करने में सक्षम हो सकते हैं। पंजाब, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड सहित छोटे उत्तरी और पूर्वोत्तर राज्य भी इससे प्रतिकूल रूप से प्रभावित होंगे।
- राजकोषीय नुकसान: वित्त आयोग के फॉर्मूले में जनसंख्या एक प्रमुख मानदंड होने के कारण, कर हस्तांतरण के संबंध में दक्षिणी राज्यों को यह डर है कि वे लगातार उच्च राजस्व का योगदान देते रहेंगे, लेकिन इससे उन्हें राजनीतिक और वित्तीय रूप से कम अधिकार मिलेंगे, जिससे उन्हें राजकोषीय नुकसान होगा।
- सीमा परिसीमन से संबंधित जोखिम: ऐसी आशंकाएँ व्यक्त की गई हैं कि सीमाओं का पुनर्गठन विशिष्ट राजनीतिक दलों या सांप्रदायिक समूहों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से किया जा सकता है, जिसके तहत (या तो ‘विपक्षी मतदाताओं को एक साथ लाया जाए’ या उन्हें ‘तोड़ा जाए’) जम्मू-कश्मीर में हालिया क्षेत्रीय परिसीमन के दौरान विपक्षी दलों ने भी इस प्रकार की चिंताओं को प्रमुखता से उठाया था।
- क्षेत्रीय और राजनीतिक तनाव में वृद्धि: जनसंख्या-आधारित मानदंडों के विरोध में दक्षिणी राज्यों के नेताओं के एकजुट होने से उत्तर-दक्षिण विभाजन गहराने का खतरा है, जिसे वे "डेमोकल्स की तलवार" बता रहे हैं। इस बढ़ते क्षेत्रीय और राजनीतिक तनाव से राजनीतिक असंतोष, जनगणना पर रोक को 2056 तक बढ़ाने की मांग और संभावित संघीय गतिरोध जैसी आशंकाएँ बढ़ गई हैं।
- परिचालन संबंधी चुनौतियाँ: लोकसभा में सदस्यों की संख्या को 800 से अधिक तक बढ़ाने (यह सुनिश्चित करने के लिये कि किसी भी राज्य की सीटें कम न हों) के प्रस्ताव से संसदीय कार्यकरण पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। इतने बड़े सदन में प्रभावी ढंग से विचार-विमर्श करने और बहसों की गुणवत्ता बनाए रखने की क्षमता पर संदेह उत्पन्न होता है।
आम सहमति पर आधारित परिसीमन के लिये कौन-से कदम आवश्यक हैं?
- भारित प्रतिनिधित्व सूत्र: संतुलित परिसीमन सुनिश्चित करने के लिये सीट आवंटन सूत्र को केवल जनसंख्या-आधारित मॉडल के बजाय एक भारित दृष्टिकोण में बदला जा सकता है। यह नया सूत्र जनसांख्यिकीय कारकों के साथ-साथ विकासात्मक प्रदर्शन को भी पुरस्कृत करेगा।
- यह सुनिश्चित करने के लिये कि सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित न किया जाए, कुल प्रजनन दर (TFR), मानव विकास सूचकांक (HDI) और आर्थिक योगदान (GST/राजकोषीय अनुशासन) जैसे मानदंडों को एकीकृत किया जाना चाहिये।
- राज्यसभा को सशक्त बनाना: राज्यसभा को और अधिक सशक्त बनाने के लिये इसे एक मज़बूत संघीय सुरक्षा कवच में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिये अमेरिकी सीनेट मॉडल के अनुरूप राज्यों का निश्चित प्रतिनिधित्व शामिल किया जा सकता है, जहाँ प्रत्येक राज्य को जनसंख्या पर ध्यान दिये बिना समान या अधिक संतुलित संख्या में सीटें आवंटित की जाती हैं।
- इसके अलावा, निवास की आवश्यकताओं को फिर से लागू करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सदस्य वास्तव में उन राज्यों के निवासी हैं जिनका वे सदन में प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
- वित्त आयोग के माध्यम से सुरक्षा उपाय: वित्त आयोग दक्षिणी और पहाड़ी राज्यों के लिये केंद्रीय करों के हिस्से की रक्षा के लिये ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ और ‘वन आवरण’ के भार को बढ़ा सकता है।
- कुछ विशेषज्ञ यह सुझाव देते हैं कि बड़े राज्यों, जैसे कि उत्तर प्रदेश, का छोटे प्रशासनिक खंडों में विभाजन करना आवश्यक है। उनका मानना है कि ऐसा करने से किसी एक भौगोलिक क्षेत्र को राष्ट्रीय राजनीति पर अपनी प्रभुता स्थापित करने से रोका जा सकता है।
- संस्थागत पारदर्शिता में सुधार: चुनावी क्षेत्रों के हेरफेर या राजनीतिक पूर्वाग्रह के आरोपों से बचने के लिये परिसीमन आयोग की मसौदा प्रक्रिया में नागरिक समाज और क्षेत्रीय दलों जैसे प्रमुख हितधारकों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करना महत्त्वपूर्ण है।
निष्कर्ष:
त्वरित परिसीमन की प्रक्रिया एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसका लक्ष्य महिला सशक्तीकरण के लोकतांत्रिक उद्देश्य को पूरा करना है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि सहकारी संघवाद अस्थिर न हो। इस प्रक्रिया की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे केवल जनसंख्या-आधारित मॉडल तक सीमित न रखकर एक ऐसे भारित सूत्र का उपयोग किया जाए जो विकासात्मक प्रदर्शन को भी महत्त्व दे। ऐसा करने से ही भारत का लोकतांत्रिक विस्तार समावेशी बना रह सकेगा और सभी क्षेत्रों को राजनीतिक रूप से स्वीकार्य होगा।
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दृष्टि मेन्स का प्रश्न: प्रश्न: भारत में परिसीमन की संवैधानिक रूपरेखा का विश्लेषण कीजिये। इसके अतिरिक्त, इस बात की विवेचना कीजिये कि आगामी 2026 का परिसीमन अभ्यास किस प्रकार दक्षिणी राज्यों में इस आशंका को जन्म दे रहा है कि उनकी जनसंख्या नियंत्रण और विकासात्मक सफलताओं के परिणामस्वरूप वे राजनीतिक रूप से हाशिये पर चले जाएंगे? |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. परिसीमन क्या है?
समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिये निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 द्वारा अनिवार्य।
2. परिसीमन पर संवैधानिक रोक क्या है?
42वें संशोधन (1976) और 84वें संशोधन (2001) ने 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक स्थिर कर दिया।
3. अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 के बीच संवैधानिक अंतर क्या है?
अनुच्छेद 82 संसद को जनगणना के बाद लोकसभा सीटों के लिये परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 170 राज्य विधानसभाओं के लिये सीटों के पुनर्व्यवस्थापन का प्रावधान करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. दिसंबर 2023 तक भारत सरकार द्वारा कितने परिसीमन आयोग गठित किये गए हैं? (2024)
(a) एक
(b) दो
(c) तीन
(d) चार
उत्तर: (d)
प्रश्न. परिसीमन आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2012)
परिसीमन आयोग के आदेश को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
जब परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभा के समक्ष रखे जाते हैं, तो वे आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. "भारत में जनांकिकीय लाभांश तब तक सैद्धांतिक ही बना रहेगा जब तक कि हमारी जनशक्ति अधिक शिक्षित, जागरूक, कुशल और सृजनशील नहीं हो जाती।" सरकार ने हमारी जनसंख्या को अधिक उत्पादनशील और रोज़गार-योग्य बनने की क्षमता में वृद्धि के लिये कौन-से उपाय किये हैं? (2016)
प्रश्न. "जिस समय हम भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश (डेमोग्राफ़िक डिविडेंड) को शान से प्रदर्शित करते हैं, उस समय हम रोज़गार-योग्यता की पतनशील दरों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।" क्या हम ऐसा करने में कोई चूक कर रहे हैं? भारत को जिन जॉबों की बेसबरी से दरकार है, वे जॉब कहाँ से आएंगे? स्पष्ट कीजिये। (2014)