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भारत का राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (2031-35)

  • 28 Mar 2026
  • 110 min read

प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान, पेरिस समझौता, हरित हाइड्रोजन मिशन, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा-रोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI), जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना

मेन्स के लिये: पेरिस समझौते के तहत भारत की जलवायु प्रतिबद्धता, कार्बन बाज़ार और जलवायु वित्त

स्रोत: पीआईबी 

चर्चा में क्यों? 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2031-35 की अवधि के लिये भारत के अद्यतित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान (NDC 3.0) को स्वीकृति प्रदान की, जिसे पेरिस समझौते के अंतर्गत संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (UNFCCC) को औपचारिक रूप से संप्रेषित किया जाएगा।

भारत के NDC 3.0 की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं?

  • अंतर्राष्ट्रीय जनादेश: पेरिस समझौते के हस्ताक्षरकर्त्ता के रूप में भारत को वर्ष 2025 तक एक अद्यतित NDC जारी करना आवश्यक था।
    • दिसंबर 2025 तक, 128 देशों (वैश्विक उत्सर्जन का 78% प्रतिनिधित्व करते हुए) ने अपने अद्यतित NDC प्रस्तुत कर दिये थे, जिससे भारत और अर्जेंटीना ऐसा करने वाले अंतिम G-20 देश बन गए।
    • NDC 3.0 के लक्ष्य को वर्ष 2021 के वैश्विक स्टॉकटेक (GST) के प्राप्त परिणामों से आकार दिया गया था, जिससे यह निष्कर्ष निकला कि दुनिया वर्तमान में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की राह पर नहीं है।
    • पर्यावरण मंत्रालय ने बल देते हुए कहा कि नए लक्ष्य "सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों और संबंधित क्षमताओं" (CBDR-RC) के सिद्धांत के साथ विकासात्मक प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा को संतुलित करते हैं।
  • भारत के NDC 3.0 के तहत लक्ष्य:
    • गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता का विस्तार: भारत वर्ष 2035 तक अपनी ऊर्जा क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों (सौर, पवन, जल, बायोमास और परमाणु सहित) से प्राप्त करने का संकल्प करता है।
      • भारत ने फरवरी 2026 तक 52.57% हासिल कर लिया है, जो अपने पूर्व में निर्धारित वर्ष 2030 के लक्ष्य (50%) को सफलतापूर्वक पूरा कर रहा है।
    • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: सरकार का लक्ष्य वर्ष 2005 के आधार वर्ष की तुलना में वर्ष 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की उत्सर्जन तीव्रता को 47% तक कम करना है।
      • भारत ने वर्ष 2020 तक 36% तक कम कर लिया था, जिससे वह वर्ष 2030 के अपने पिछले 45% कटौती के लक्ष्य को समय से पहले पूरा करने की सही राह पर है।
    • कार्बन सिंक में वृद्धि: भारत वर्ष 2035 तक बढ़े हुए वन और वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4.0 बिलियन टन CO₂ समतुल्य के अतिरिक्त कार्बन सिंक के निर्माण का लक्ष्य रखता है।
      • वर्ष 2025 तक, भारत ने वन एवं वृक्ष आवरण से 2.29 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक निर्मित किया है।

महत्त्व

  • वैश्विक जलवायु नेतृत्व: ऐसे समय में जब कई विकसित देश अपनी "जलवायु नीतियों में कटौती" कर रहे हैं और एकतरफा व्यापार की नीति अपना रहे हैं, भारत का अद्यतित NDC (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित अंशदान) ग्लोबल साउथ के ठोस नेतृत्व और जलवायु बहुपक्षवाद के प्रति एक सुदृढ़ प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करता है।
  • रणनीतिक संरेखण: नए लक्ष्य भारत के दीर्घकालिक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन (2070 तक) के उद्देश्य की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं और ये “विकसित भारत @2047” के आर्थिक दृष्टिकोण के साथ भी संरेखित हैं।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC)

  • राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) पेरिस समझौते के तहत प्रत्येक देश की आधिकारिक जलवायु कार्ययोजना को दर्शाता है। यह योजना ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन के लिये देश द्वारा किये जाने वाले प्रयासों की रूपरेखा प्रस्तुत करती है।
  • यह स्वैच्छिक है, जिसका अर्थ है कि प्रत्येक देश अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार अपने लक्ष्यों का निर्धारण स्वयं करता है, साथ ही यह समयबद्ध और प्रगतिशील भी है, जिसमें बढ़ती महत्त्वाकांक्षा को दर्शाते हुए हर 5-10 वर्षों में इन लक्ष्यों को अद्यतित किया जाता है।
  • राष्ट्रीय विकास योजनाओं (NDC) के प्रमुख घटकों में सामान्यतः उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य, नवीकरणीय ऊर्जा से संबंधित उद्देश्य, अनुकूलन रणनीतियाँ तथा वित्तीय व तकनीकी आवश्यकताएँ शामिल होती हैं।
  • ये पेरिस समझौते के मुख्य परिचालन तंत्र का निर्माण करते हैं, क्योंकि वैश्विक जलवायु कार्रवाई इन राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की सामूहिक महत्त्वाकांक्षा और प्रभावी कार्यान्वयन पर निर्भर करती है।
  • भारत की NDC यात्रा: पहला NDC (2015), जिसमें वर्ष 2005 को आधार वर्ष के रूप में उपयोग किया गया, जिसका लक्ष्य उत्सर्जन तीव्रता में 33-35% की कमी, लगभग 40% गैर-जीवाश्म क्षमता और वर्ष 2030 तक 2.5-3 बिलियन टन कार्बन सिंक का निर्माण करना था।
    • इसे अपडेटेड NDC (2022) के माध्यम से और मज़बूत किया गया है। इसके तहत, COP26 (ग्लासगो) में की गई घोषणाओं के अनुरूप, महत्त्वाकांक्षा को बढ़ाते हुए निम्नलिखित लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं: उत्सर्जन तीव्रता में 45% की कमी (2005 के स्तर से), 50% गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता प्राप्त करना।

NDC (2031-35) के प्रति भारत का क्या दृष्टिकोण है?

  • समता और CBDR-RC: यह दृष्टिकोण CBDR-RC के सिद्धांत पर आधारित है। यह सुनिश्चित करता है कि लक्ष्य समानता को दर्शाते हैं और भारत की राष्ट्रीय वास्तविकताओं, विकासात्मक प्राथमिकताओं और ऊर्जा सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप हैं।
  • समग्र समाज दृष्टिकोण: सरकार ने जलवायु लक्ष्यों को राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के साथ सहजता से एकीकृत करने के लिये 'समग्र सरकारी' और 'समग्र समाज' दृष्टिकोण को प्रमुखता दी। यह एक समग्र समाज दृष्टिकोण को सुनिश्चित करता है।
  • रणनीतिक सरकारी योजनाएँ: ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ और पीएम-कुसुम जैसी पहलों के माध्यम से जलवायु लक्ष्यों को अर्थव्यवस्था में एकीकृत किया जा रहा है।
  • उन्नत प्रौद्योगिकियाँ: भारत अपनी परमाणु ऊर्जा क्षमताओं का विस्तार करने के साथ-साथ कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) सहित नए शमन तरीकों को बढ़ावा दे रहा है।
  • अंतर्राष्ट्रीय नेतृत्व: देश अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन (CDRI) और वैश्विक जैव-ईंधन गठबंधन (GBA) जैसी पहलों के माध्यम से वैश्विक साझेदारी को बढ़ावा देना जारी रखे हुए है।
  • तटीय संरक्षण उपाय: मैंग्रोव बहाली (MISHTI पहल के तहत), तटीय विनियमन और चक्रवातों के लिये उन्नत प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों के उपयोग से संवेदनशील तटीय क्षेत्रों को सुरक्षित किया जा रहा है।
  • समन्वित ढाँचे: अनुकूलन राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना (NAPCC) द्वारा संचालित है और जल जीवन मिशन, सतत कृषि पर राष्ट्रीय मिशन और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसे ज़मीनी स्तर के कार्यक्रमों में एकीकृत है।
  • जन आंदोलनों को बढ़ावा देना: भारत के जलवायु प्रयास "पर्यावरण के लिये जीवनशैली" (LiFE) के सिद्धांत में गहराई से निहित हैं, जिसका उद्देश्य सतत जीवन को बढ़ावा देना है। ये प्रयास नागरिक-नेतृत्व वाले जन आंदोलनों को प्रोत्साहित करते हैं, जैसे कि वृक्षारोपण अभियान ('एक पेड़ माँ के नाम'), जो LiFE सिद्धांत के तहत नागरिक कार्रवाई में परिवर्तित होते हैं।

भारत के लिये अपने NDC (2031-35) को प्राप्त करने के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?

  • क्षमता बनाम वास्तविक उत्पादन: गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से विद्युत उत्पादन की स्थापित क्षमता 52% से अधिक है, जबकि इन स्रोतों से वास्तविक रूप से उत्पादित विद्युत वर्तमान में कुल उत्पादन का लगभग 25% ही है।
    • यह विसंगति मुख्य रूप से नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे– सौर और पवन ऊर्जा) के स्वरूप और बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण समाधानों की वर्तमान अनुपलब्धता के कारण उत्पन्न होती है।
  • भंडारण और ग्रिड संबंधी बाधाएँ: नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव में प्रमुख बाधाएँ हैं। इनमें किफायती, बड़े पैमाने पर बैटरी भंडारण की कमी और लिथियम जैसी आयातित सामग्रियों पर भारी निर्भरता शामिल है। इसके अतिरिक्त, दूरस्थ नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन स्थलों को मांग केंद्रों से जोड़ने के लिये आवश्यक पारेषण बुनियादी ढाँचे के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
  • कोयले पर निर्भरता: विद्युत उत्पादन में कोयले का योगदान लगभग 75% है, जो इसे ऊर्जा सुरक्षा के लिये महत्त्वपूर्ण बनाता है, जबकि तेज़ी से बदलाव से आर्थिक व्यवधान, रोज़गार की हानि और इस्पात एवं सीमेंट जैसे क्षेत्रों के डीकार्बनाइज़ेशन में चुनौतियाँ उत्पन्न होने का खतरा है।
  • वित्तीय बाधाएँ: स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार के लिये भारत को वार्षिक लगभग 40-50 अरब अमेरिकी डॉलर के भारी निवेश की आवश्यकता है, लेकिन सीमित और अनिश्चित वैश्विक जलवायु वित्त और कार्बन सीमा कर जैसी व्यापार बाधाओं के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • भूमि और वनरोपण संबंधी चुनौतियाँ: बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं को भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जबकि भूमि की कमी और वनरोपण प्रयासों को बनाए रखने में चुनौतियों के कारण 3.5-4 अरब टन के कार्बन सिंक लक्ष्यों को प्राप्त करना मुश्किल है।

भारत के राष्ट्रीय विकास लक्ष्य (2031-35) को प्राप्त करने के प्रयासों को मज़बूत करने के लिये कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?

  • 24 घंटे (RTC) नवीकरणीय ऊर्जा: क्षमता वृद्धि से आगे बढ़कर विश्वसनीय आपूर्ति की ओर बढ़ना महत्त्वपूर्ण है, जिसके लिये RTC बिजली खरीद समझौतों (PPA) को अनिवार्य बनाना आवश्यक है जो सौर और पवन ऊर्जा को बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BSE) या पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) के साथ जोड़ते हैं।
  • पारंपरिक अवसंरचना का पुन: उपयोग: परित्यक्त या बंद कोयला खदानों का वैज्ञानिक पुन: उपयोग करके पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज साइट्स या बड़े सौर पार्कों में बदला जा सकता है। यह पारंपरिक अवसंरचना का पुन: उपयोग भूमि अधिग्रहण और ऊर्जा भंडारण दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान करता है।
  • कोयले पर निर्भर पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण: कोयले पर निर्भर पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा जैसे राज्यों में कोयले के उपयोग में तेज़ी से कमी लाखों लोगों की आजीविका को खतरे में डाल सकती है।
    • भारत को श्रमिकों को पुन: कौशल प्रदान करने, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं में विविधता लाने और पुराने तथा अक्षम थर्मल पावर प्लांटों को बंद करने से उत्पन्न सामाजिक-आर्थिक प्रभावों के प्रबंधन के लिये एक वैधानिक 'न्यायसंगत संक्रमण कोष' (Just Transition Fund) की आवश्यकता है।
  • अनलॉकिंग ब्लेंडेड फाइनेंस: चूँकि पारंपरिक ऋण हरित अवसंरचना के लिये अत्यधिक महंगा है, अतः भारत को बहुपक्षीय बैंकों से रियायती पूंजी का उपयोग करते हुए “ब्लेंडेड फाइनेंस” का लाभ उठाना चाहिये, जिससे परियोजनाओं का जोखिम कम किया जा सके तथा निजी निवेश को आकर्षित किया जा सके।
  • कार्बन बाज़ार का परिपक्वकरण: घरेलू कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) का शीघ्र क्रियान्वयन तथा कठोर विनियमन कठिन-नियंत्रणीय क्षेत्रों (इस्पात, सीमेंट, उर्वरक) को कार्बन पकड़, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) प्रौद्योगिकी अपनाने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करेगा।
  • कृषि-फोटोवोल्टाइक (एग्री-वोल्टैक्स): कृषि तथा बड़े सौर ऊर्जा पार्कों के मध्य भूमि के लिये तीव्र प्रतिस्पर्द्धा को दूर करने हेतु भारत को “कृषि-फोटोवोल्टाइक” का विस्तार करना चाहिये—अर्थात् कृषि भूमि के ऊपर ऊँचाई पर सौर पैनलों की स्थापना।
    • यह स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन करता है, जल वाष्पीकरण को कम करता है तथा किसानों को द्वैध आय स्रोत प्रदान करता है।
  • कार्बन सिंक्स हेतु एग्रोफॉरेस्ट्री: केवल पारंपरिक वनीकरण के माध्यम से 3.5–4 अरब टन कार्बन सिंक लक्ष्य प्राप्त करना भूमि की कमी के कारण व्यवहार्य नहीं है।
    • निजी भूमि पर कृषि परिदृश्यों में वृक्षों का एकीकरण (कृषिवनिकी), जिसे कार्बन क्रेडिट के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाए, सबसे व्यावहारिक समाधान है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. “भारत का राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) 3.0 जलवायु महत्त्वाकांक्षा तथा विकासात्मक आवश्यकताओं के मध्य संतुलन को परिलक्षित करता है।” विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. NDC 3.0 क्या है?
पेरिस समझौते के अंतर्गत वर्ष 2031–35 हेतु भारत की अद्यतन जलवायु कार्ययोजना, जिसमें शमन तथा अनुकूलन लक्ष्यों को और सुदृढ़ किया गया है।

2. भारत के NDC 3.0 के प्रमुख लक्ष्य क्या हैं?
वर्ष 2035 तक 60% गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, 2005 के स्तर की तुलना में 47% उत्सर्जन तीव्रता में कमी तथा 3.5–4 अरब टन कार्बन सिंक का सृजन।

3. CBDR-RC क्या है?
यह एक सिद्धांत है जो सुनिश्चित करता है कि जलवायु उत्तरदायित्व साझा हो, किंतु देशों की क्षमता तथा ऐतिहासिक उत्सर्जनों के आधार पर विभेदित भी हो।

4. नवीकरणीय ऊर्जा संक्रमण में प्रमुख चुनौती क्या है?
अंतराल (Intermittency) तथा भंडारण अवसंरचना के अभाव के कारण स्थापित क्षमता तथा वास्तविक उत्पादन के मध्य अंतर।

5. न्यायसंगत संक्रमण (Just Transition) क्या है?
यह एक रूपरेखा है, जिसके अंतर्गत जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर श्रमिकों तथा क्षेत्रों को पुनःकौशल, विविधीकरण तथा सामाजिक सुरक्षा के माध्यम से सहयोग प्रदान किया जाता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

प्रिलिम्स:

प्रश्न. ‘अभीष्ट राष्ट्रीय निर्धारित अंशदान’  (Intended Nationally Determined Contributions) पद को कभी-कभी समाचारों में किस संदर्भ में देखा जाता है? (2016)

(a) युद्ध-प्रभावित मध्य पूर्व के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिये यूरोपीय देशों द्वारा दिये गए वचन 

(b) जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्ययोजना

(c) एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक) की स्थापना करने में सदस्य राष्ट्रों द्वारा किया गया पूंजी योगदान 

(d) धारणीय विकास लक्ष्यों के बारे में विश्व के देशों द्वारा बनाई गई कार्ययोजना

उत्तर : (b)


प्रश्न. वर्ष 2015 में पेरिस में UNFCCC की बैठक में हुए समझौते के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2016)

  1. इस समझौते पर UN के सभी सदस्य देशों ने हस्ताक्षर किये और यह वर्ष 2017 से लागू होगा।
  2.  यह समझौता ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को सीमित करने का लक्ष्य रखता है जिससे इस सदी के अंत तक औसत वैश्विक तापमान की वृद्धि उद्योग-पूर्व स्तर (pre-industrial levels) से 2 °C या कोशिश करें कि 1.5 °C से भी अधिक न होने पाए।
  3.  विकसित देशों ने वैश्विक तापन में अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी को स्वीकारा और जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिये विकासशील देशों की सहायता के लिये 2020 से प्रतिवर्ष 1000 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 3

(b)  केवल 2

(c)  केवल 2 और 3

(d)  1, 2 और 3

उत्तर: (b)


मेन्स  

प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) के पक्षकारों के सम्मेलन (COP) के 26वें सत्र के प्रमुख परिणामों का वर्णन कीजिये। इस सम्मेलन में भारत द्वारा की गई प्रतिबद्धताएँ क्या हैं? (2021)

प्रश्न 2. 'जलवायु परिवर्तन' एक वैश्विक समस्या है। जलवायु परिवर्तन से भारत किस प्रकार प्रभावित होगा? जलवायु परिवर्तन के द्वारा भारत के हिमालयी और समुद्रतटीय राज्य किस प्रकार प्रभावित होंगे? (2017)

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