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दिव्यांगता की असंगत उच्चतम सीमा पर सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप

  • 28 Mar 2026
  • 70 min read

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

प्रभु कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने यह अभिमत व्यक्त किया कि राज्य लोक सेवाओं में नियुक्ति हेतु दिव्यांगता के प्रतिशत पर मनमानी उच्चतम सीमा निर्धारित नहीं कर सकते, क्योंकि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) केवल 40% बेंचमार्क दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा का ही प्रावधान करता है।

  • अपीलकर्त्ता, जिन्होंने 90% गतिविषयक दिव्यांगता के बावजूद हिमाचल प्रदेश की सहायक ज़िला अधिवक्ता (ADA) परीक्षा उत्तीर्ण की थी, को 60% की दिव्यांगता सीमा के कारण नियुक्ति से वंचित कर दिया गया। तत्पश्चात हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इस अपवर्जनात्मक सीमा को यथावत् रखा।

प्रभु कुमार मामले (2026) में बेंचमार्क दिव्यांगता पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन

  • युक्तिसंगत अनुकूलन: निर्णय में यह प्रतिपादित किया गया कि राज्य पर यह सकारात्मक दायित्व है कि वह युक्तिसंगत अनुकूलन सुनिश्चित करे, जिससे किसी पद हेतु उपयुक्तता का निर्धारण केवल दिव्यांगता प्रतिशत के आधार पर न होकर कार्यात्मक आवश्यकताओं के आधार पर किया जाए।
  • संवैधानिक वैधता: 40%–60% की सीमा तक पात्रता को सीमित करना स्पष्टतः मनमाना माना गया, जो अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) तथा अनुच्छेद 16 (लोक सेवाओं में अवसर की समानता) का उल्लंघन है।
  • कार्यात्मक दक्षता: ऐसे पद, जिनमें मानसिक चपलता तथा विधिक प्रवीणता अपेक्षित होती है (जैसे- सहायक ज़िला अधिवक्ता), उनमें 90% चलन (लोकोमोटर) दिव्यांगता स्वाभाविक रूप से कार्य-निष्पादन को बाधित नहीं करती, जिसका प्रमाण अपीलकर्त्ता का दशक-दीर्घ विधिक अनुभव है।

दिव्यांगता अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्ववर्ती अवलोकन

  • ओम राठौड़ बनाम स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक प्रकरण, 2024: सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि उम्मीदवार की वास्तविक क्षमताओं का कार्यात्मक मूल्यांकन कठोर पात्रता प्रतिशत से अधिक महत्त्व रखता है।
  • वी. सुरेंद्र मोहन बनाम तमिलनाडु राज्य प्रकरण, 2019: सर्वोच्च न्यायालय ने ज़िला न्यायाधीश की  नियुक्ति हेतु श्रवण तथा दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों के लिये 50% दिव्यांगता सीमा को स्वीकार किया। हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने इसी निर्णय के आधार पर अपीलकर्त्ता को राहत देने से इनकार किया था।
  • विकास कुमार बनाम UPSC प्रकरण, 2021: सर्वोच्च न्यायालय ने वी. सुरेंद्र मोहन निर्णय को निरस्त करते हुए अधिक समावेशी दृष्टिकोण को अपनाया।
  • भारत सरकार बनाम रवि प्रकाश गुप्ता प्रकरण, 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पदों की पहचान न होना, सरकार के लिये दिव्यांगजनों हेतु 3% आरक्षण प्रदान करने के दायित्व से बचने का आधार नहीं हो सकता।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?

परिचय

  • दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 एक महत्त्वपूर्ण विधान है, जिसने पूर्ववर्ती दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण एवं पूर्ण सहभागिता) अधिनियम, 1995 का स्थान लिया। इस अधिनियम ने भारतीय विधिक व्यवस्था को संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (UNCRPD) के अनुरूप बनाया, जिसे भारत ने वर्ष 2007 में अनुमोदित किया था।
    • इस अधिनियम ने विधिक दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करते हुए चिकित्सकीय मॉडल (जिसमें दिव्यांगता को एक समस्या के रूप में देखा जाता था) से सामाजिक/मानवाधिकार आधारित मॉडल (जिसमें दिव्यांगता को सामाजिक अवरोधों का परिणाम माना जाता है) की ओर संक्रमण स्थापित किया।

मुख्य विशेषताएँ

  • दिव्यांगता की परिभाषा: ऐसे व्यक्ति को दिव्यांग माना गया है, जिसमें दीर्घकालिक शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा संवेदी अक्षमता हो, जो सामाजिक अवरोधों के साथ अंतःक्रिया के कारण उसे अन्य व्यक्तियों के समान आधार पर समाज में पूर्ण एवं प्रभावी सहभागिता से वंचित करती है।
    • बेंचमार्क दिव्यांगता: ऐसे व्यक्ति, जिनमें निर्दिष्ट दिव्यांगता कम से कम 40% हो (जिसे सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किया गया हो), उन्हें बेंचमार्क दिव्यांगता की श्रेणी में रखा जाता है। यही सीमा विभिन्न लाभों, आरक्षण तथा योजनाओं की पात्रता निर्धारित करती है।
  • दिव्यांगता को मान्यता: अधिनियम ने दिव्यांगता के दायरे का विस्तार करते हुए 21 प्रकार की निर्दिष्ट दिव्यांगताओं को मान्यता दी है (1995 के अधिनियम में यह संख्या 7 थी)। आवश्यकता के अनुसार केंद्र सरकार अतिरिक्त श्रेणियाँ अधिसूचित कर सकती है। मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं को व्यापक रूप से निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है—
    • शारीरिक दिव्यांगता: गतिविषयक दिव्यांगता, हड्डियों, जोड़ों या माँसपेशियों की अक्षमता, जैसे- सेरेब्रल पाल्सी, कुष्ठ रोग से मुक्त व्यक्ति, बौनापन, पेशीय दुष्पोषण और एसिड अटैक पीड़ित।।
    • संवेदी: दृष्टि बाधिता, श्रवण बाधिता, वाक् एवं भाषा संबंधी दिव्यांगता।
    • बौद्धिक एवं तंत्रिका संबंधी: विशिष्ट अधिगम अक्षमता (जैसे- डिस्लेक्सिया), ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम विकार, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, पार्किंसन रोग
    • मानसिक व्यवहार: मानसिक रोग।
    • रक्त संबंधी विकार: थैलेसीमिया, हीमोफीलिया, सिकल सेल रोग
    • अन्य:  बहु-दिव्यांगता तथा बधिर-अंधता
  • प्रमुख अधिदेश एवं प्रावधान: यह अधिनियम गरिमा तथा समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु एक सुदृढ़ विधिक संरक्षण प्रदान करता है;
    • समता एवं भेदभाव-निषेध: दिव्यांगजनों को समता, गरिमापूर्ण जीवन तथा दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव से संरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया है। भेदभाव में युक्तिसंगत अनुकूलन से वंचित करना भी सम्मिलित है।
    • आरक्षण: अधिनियम के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में आरक्षण को 3% से बढ़ाकर 4% तथा उच्च शिक्षण संस्थानों में 3% से बढ़ाकर 5% किया गया है, जो बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिये लागू होता है।
    • शिक्षा: 6 से 18 वर्ष के प्रत्येक बेंचमार्क दिव्यांग बालक/बालिका को निशुल्क शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
    • सुगम्यता: सार्वजनिक भवनों, परिवहन, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) तथा सेवाओं में बाधारहित पहुँच सुनिश्चित करने हेतु अनिवार्य मानक निर्धारित किये गये हैं।
    • संरक्षकता: अधिनियम ने सीमित संरक्षकता की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें संरक्षक तथा दिव्यांग व्यक्ति के मध्य संयुक्त निर्णय-निर्माण की व्यवस्था होती है, जो पूर्ववर्ती पूर्ण संरक्षकता (पूर्ण नियंत्रण) से भिन्न है।
  • संस्थागत ढाँचा: इस अधिनियम के अंतर्गत निम्नलिखित संस्थागत व्यवस्थाएँ स्थापित की गई हैं;
    • केंद्रीय एवं राज्य सलाहकार बोर्ड: नीति-निर्माण के सर्वोच्च निकायों के रूप में कार्य करते हैं।
    • मुख्य आयुक्त एवं राज्य आयुक्त: अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी तथा शिकायतों के निवारण हेतु उत्तरदायी हैं।
    • राष्ट्रीय एवं राज्य कोष: दिव्यांग व्यक्तियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिये स्थापित किये गए हैं।
    • विशेष न्यायालय: प्रत्येक ज़िले में नामित किये जाते हैं, ताकि दिव्यांग व्यक्तियों के विरुद्ध अपराधों के मामलों का त्वरित निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।
  • उल्लंघन हेतु दंड: यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से किसी दिव्यांग व्यक्ति का जानबूझकर अपमान या अवमानना करता है, अथवा उसे अपमानित करने के उद्देश्य से आक्रमण या बल का प्रयोग करता है, तो उसे 6 माह से 5 वर्ष तक का कारावास तथा जुर्माना दिये जाने का प्रावधान है।

महत्त्व

  • यह अधिनियम समावेशी विकास की प्राप्ति हेतु] अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी सरकारी योजनाएँ, चाहे वे ग्रामीण आवास से संबंधित हों या शहरी नियोजन अथवा डिजिटल साक्षरता से संबंधित हों, उनमें दिव्यांगता-समावेशी दृष्टिकोण अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाए।

निष्कर्ष

मनमानी दिव्यांगता सीमाओं को निरस्त करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने दिव्यांगता संबंधी न्यायिक सिद्धांत को कठोर चिकित्सीय प्रतिशत-आधारित दृष्टिकोण से हटाकर कार्यात्मक क्षमता आधारित दृष्टिकोण की ओर परिवर्तित किया है। इससे समान अवसर की संवैधानिक गारंटी सुदृढ़ होती है तथा यह सुनिश्चित होता है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 केवल एक औपचारिक प्रावधान न रहकर वाविद्युत्स्तविक सशक्तीकरण का साधन बने, न कि संस्थागत बहिष्करण का माध्यम।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 की भूमिका का आकलन कीजिये। यह अधिनियम किस प्रकार एक समावेशी समाज के निर्माण में सहायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. RPwD अधिनियम, 2016 के अंतर्गत "बेंचमार्क दिव्यांगता" क्या है?
यह ऐसे व्यक्ति को संदर्भित करती है, जिसमें निर्दिष्ट दिव्यांगता कम-से-कम 40% हो, जिसे सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा प्रमाणित किया गया हो।

2. दिव्यांगताओं के दायरे के संदर्भ में 2016 का अधिनियम, 1995 के अधिनियम से किस प्रकार भिन्न है?
2016 के अधिनियम ने मान्यता प्राप्त दिव्यांगताओं की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी, जिसमें थैलेसीमिया जैसे रक्त विकार तथा पार्किंसन जैसे तंत्रिका संबंधी विकार भी सम्मिलित किये गए हैं।

3. दिव्यांगजनों हेतु सरकारी नौकरियों में आरक्षण का विधिक प्रावधान क्या है?
अधिनियम के अंतर्गत सरकारी प्रतिष्ठानों में बेंचमार्क दिव्यांगता वाले व्यक्तियों के लिये 4% आरक्षण अनिवार्य किया गया है, जो पूर्ववर्ती 3% से अधिक है। 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)

प्रश्न 1. भारत में लाखों दिव्यांगजन निवास करते हैं। कानून के तहत उन्हें क्या लाभ उपलब्ध हैं? (2011) 

  1. सरकारी स्कूलों में 18 वर्ष की आयु तक निशुल्क शिक्षा।  
  2.  व्यवसाय स्थापित करने के लिये भूमि का अधिमान्य आवंटन।  
  3.  सार्वजनिक भवनों में रैंप ।  

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1  

(b) केवल 2 और 3  

(c) केवल 1 और 3  

(d) 1, 2 और 3  

उत्तर: (d)

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