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सर्वोच्च न्यायालय ने OBC क्रीमी लेयर के मानदंडों को स्पष्ट किया

  • 13 Mar 2026
  • 23 min read

स्रोत: द हिंदू

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने निर्णय दिया है कि केवल अभिभावकों की आय के आधार पर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के अभ्यर्थियों की क्रीमी लेयर’ स्थिति निर्धारित नहीं की जा सकती। यह निर्णय सिविल सेवा परीक्षाओं में आरक्षण नियमों के अनुप्रयोग को लेकर लंबे समय से चली आ रही भ्रम की स्थिति को स्पष्ट करता है।

  • वर्ष 2004 के स्पष्टीकरण पत्र को निरस्त करना: यह निर्णय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के वर्ष 1993 के कार्यालय ज्ञापन तथा वर्ष 2004 के स्पष्टीकरण पत्र द्वारा उत्पन्न भ्रम का समाधान करता है।
    • वर्ष 1993 के DoPT कार्यालय ज्ञापन में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि वेतन से प्राप्त आय तथा कृषि भूमि से आय को क्रीमी लेयर निर्धारण हेतु आय/संपत्ति जाँच में शामिल नहीं किया जाएगा।
    • हालाँकि, वर्ष 2004 के DoPT स्पष्टीकरण में सार्वजनिक उपक्रमों (PSU) तथा निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की वेतन आय को शामिल करने का निर्देश दिया गया था। इसके परिणामस्वरूप सरकारी कर्मचारियों के बच्चों तथा PSU/निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच असमान व्यवहार की स्थिति उत्पन्न हुई।
  • आय-आधारित नहीं, बल्कि स्थिति-आधारित निर्धारण: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि क्रीमी लेयर का निर्धारण स्थिति-आधारित है, न कि पूर्णतः आय-आधारित और इसमें माता-पिता की रोज़गार स्थिति तथा पद श्रेणी (समूह A/B/C/D) पर विचार किया जाना चाहिये, न कि केवल आय पर।
  • संवैधानिक वैधता: सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि सरकार ने निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को माता-पिता के पद की स्थिति के आधार पर OBC आरक्षण के लाभ बरकरार रखने की अनुमति देकर "प्रतिकूल भेदभाव" किया, भले ही वेतन में वृद्धि हुई हो।
    • सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों/निजी क्षेत्र के समकक्ष कर्मचारियों के बच्चों को केवल इसलिये OBC आरक्षण से वंचित कर दिया गया क्योंकि माता-पिता का वेतन 8 लाख रुपये से अधिक था, जो समान लोगों के साथ असमान व्यवहार करना एवं संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का उल्लंघन करना है।
  • PSU/PSB कर्मचारियों के बच्चों को राहत: यह निर्णय OBC आरक्षण की पात्रता का विस्तार कर सकता है, विशेषकर उन PSU कर्मचारियों तथा निजी क्षेत्र के श्रमिकों के बच्चों के लिये जिन्हें पहले वेतन-आधारित गणना के कारण बाहर कर दिया गया था।
    • न्यायालय ने सरकार को यह भी निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो तो उन उम्मीदवारों को शामिल करने के लिये अतिरिक्त पद सृजित किये जाएँ जिन्हें पहले वेतन-आधारित गणना के कारण बाहर कर दिया गया था
  • क्रीमी लेयर: "क्रीमी लेयर" की अवधारणा का प्रथम प्रयोग 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के निर्णय में किया गया था, जिसका उद्देश्य सामाजिक रूप से उन्नत OBC वर्गों को आरक्षण लाभ से बाहर रखना था।
    • वर्तमान नियमों के अंतर्गत: ग्रुप A के अधिकारियों के बच्चों या 40 वर्ष की आयु से पहले पदोन्नत हुए अधिकारियों के बच्चों को OBC कोटा से बाहर रखा जाता है।
      • ग्रुप B के दो अधिकारियों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में आते हैं।
      • गैर-सरकारी व्यवसायों के लिये क्रीमी लेयर की आय सीमा ₹8 लाख प्रतिवर्ष (2017 से) निर्धारित है।

और पढ़ें:  क्रीमी लेयर: OBC

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