अंतर्राष्ट्रीय संबंध
पारस्परिक व्यापार समझौते
प्रिलिम्स के लिये: विश्व व्यापार संगठन, जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एंड ट्रेड, मुक्त व्यापार समझौते (FTA), क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP), पारस्परिक व्यापार समझौता
मेन्स के लिये: बहुपक्षवाद से 'शक्ति-आधारित' द्विपक्षीय वार्त्ताओं की ओर बदलाव, पारस्परिक व्यापार समझौते
चर्चा में क्यों?
अमेरिकी प्रशासन ने बांग्लादेश, मलेशिया, कंबोडिया और अल साल्वाडोर जैसे विकासशील देशों के साथ 'पारस्परिक व्यापार समझौतों' (Agreements on Reciprocal Trade- ARTs) को तीव्रता से आगे बढ़ाने की नीति अपनाई है। इसी क्रम में, भारत के साथ भी एक अंतरिम व्यापार ढाँचे की रूपरेखा तैयार की गई है।
- व्यापक दंडात्मक टैरिफ के दबाव में निर्मित ये 'पारस्परिक व्यापार समझौते' (ARTs) विश्व व्यापार संगठन (WTO) के 'नियम-आधारित बहुपक्षीय ढाँचे' से एक बड़े विचलन को दर्शाते हैं।
- विकासशील देशों के लिये 'फेयर-प्ले' वाले वैश्विक नियमों से 'शक्ति-आधारित' द्विपक्षीय वार्त्ताओं की ओर यह बदलाव गहरे आर्थिक, रणनीतिक और विधिक निहितार्थ रखता है।
सारांश
- अमेरिका के नेतृत्व वाला पारस्परिक व्यापार समझौता (ART) विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों को दरकिनार करता है। इससे MFN सिद्धांतों, विवाद निपटान तंत्र और सामूहिक सौदेबाज़ी की प्रक्रिया कमज़ोर होती है। इन समझौतों के कारण विकासशील देशों को जबरन बाज़ार पहुँच, डिजिटल संप्रभुता के लिये जोखिम और वैश्विक व्यापार में विखंडन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
- भारत अपनी डिजिटल संप्रभुता की रक्षा करते हुए नियम-आधारित और समावेशी बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को बनाए रखने के लिये विश्व व्यापार संगठन (WTO) में सुधारों का समर्थन कर रहा है। इसके साथ ही, भारत मुक्त व्यापार समझौतों (FTA), मज़बूत आपूर्ति शृंखलाओं और वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग को भी बढ़ावा दे रहा है।
परंपरागत बहुपक्षीय व्यापार ढाँचा क्या है?
- अंतरयुद्ध काल का संदर्भ: 1930 के दशक की विनाशकारी संरक्षणवादी नीतियों (जैसे– उच्च शुल्क) के बाद, जिसने महामंदी को और बढ़ा दिया, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने एक सहकारी आर्थिक प्रणाली की आवश्यकता को पहचाना।
- GATT (1947): द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एंड ट्रेड (GATT) स्थापित किया गया था।
- यह कोटा, टैरिफ और सब्सिडी को समाप्त या कम करके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में बाधाओं को कम करने के लिये एक अस्थायी कानूनी समझौते के रूप में कार्य करता था।
- विश्व व्यापार संगठन (1995): उरुग्वे दौर की वार्त्ता (1986-94) के बाद अंततः GATT को विश्व व्यापार संगठन (WTO) द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया।
- जहाँ GATT (गैट) केवल नियमों का एक संग्रह था, वहीं विश्व व्यापार संगठन ने एक स्थायी और मज़बूत संस्थागत संरचना स्थापित की। इस व्यापक संस्थागत ढाँचे ने वैश्विक व्यापार नियमों का दायरा बढ़ाया है, जिसमें अब केवल वस्तुओं ही नहीं, बल्कि सेवाओं (GATS) और बौद्धिक संपदा अधिकारों (TRIPS) को भी शामिल किया गया है।
- बहुपक्षीय ढाँचे के मूल सिद्धांत:
- सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (MFN) नियम: यह नियम विश्व व्यापार संगठन (WTO) का एक मूलभूत सिद्धांत है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी देश को सामान्यतः अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ भेदभाव करने की अनुमति नहीं है।
- यदि कोई राष्ट्र किसी को विशेष सुविधा प्रदान करता है (जैसे कि उनके किसी उत्पाद पर कम सीमा शुल्क दर), तो उसे इसे अन्य सभी WTO सदस्यों को भी प्रदान किया जाना चाहिये।
- राष्ट्रीय व्यवहार: विदेशी वस्तुओं के बाज़ार में प्रवेश करने के बाद आयातित और स्थानीय रूप से उत्पादित वस्तुओं के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये।
- यही सिद्धांत विदेशी और घरेलू सेवाओं के साथ-साथ विदेशी और स्थानीय ट्रेडमार्क, कॉपीराइट और पेटेंट पर भी लागू होता है।
- एक देश, एक वोट: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) या विश्व बैंक के विपरीत, जहाँ मतदान शक्ति वित्तीय योगदान के आधार पर निर्धारित होती है, विश्व व्यापार संगठन (WTO) सर्वसम्मति से संचालित होता है। प्रत्येक सदस्य देश, चाहे उसका आर्थिक आकार कुछ भी हो, अपनी बात रखने का समान अधिकार रखता है।
- सर्वाधिक वरीयतापूर्ण राष्ट्र (MFN) नियम: यह नियम विश्व व्यापार संगठन (WTO) का एक मूलभूत सिद्धांत है। इसका अर्थ यह है कि किसी भी देश को सामान्यतः अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ भेदभाव करने की अनुमति नहीं है।
- अनुमत अपवाद: विश्व व्यापार संगठन का सिद्धांत गैर-भेदभाव पर आधारित है, फिर भी GATT का अनुच्छेद XXIV कुछ समझौतों को गैर-MFN आधार पर अनुमति प्रदान करता है, जैसे कि मुक्त व्यापार क्षेत्र और सीमा शुल्क संघ (CU)।
- मुक्त व्यापार क्षेत्र (FTA) में सदस्य देशों के बीच लगभग सभी प्रकार के व्यापार शामिल होना आवश्यक है। जबकि, सीमा शुल्क संघ (CU) को न केवल यह शर्त पूरी करनी होती है, बल्कि गैर-सदस्य देशों के प्रति एक समान बाह्य व्यापार नीति भी अपनानी होती है। ये शर्तें सुनिश्चित करती हैं कि क्षेत्रीय व्यापार समूह बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को कमज़ोर करने के बजाय उसे मज़बूत करें।
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) के अतिरिक्त दायित्व: कई आधुनिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) [जैसे– क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) समझौता] श्रम, पर्यावरण और विदेशी निवेश पर नियमों को शामिल करने के लिये मानक WTO जनादेश से आगे बढ़कर कार्य करते हैं।
- अनिवार्य जाँच: मानक मुक्त व्यापार समझौतों के लिये यह कानूनी रूप से आवश्यक है कि उनकी सूचना विश्व व्यापार संगठन (WTO) को दी जाए। यह प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह उन सदस्य देशों को, जिन पर समझौते का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, उसकी शर्तों पर सवाल उठाने और उनकी जाँच करने का अवसर प्रदान करती है।
विकासशील देशों के लिये महत्त्व
- सामूहिक सौदेबाज़ी: आम सहमति पर आधारित यह दृष्टिकोण विकासशील देशों को विकसित आर्थिक शक्तियों के खिलाफ प्रभावी ढंग से सौदेबाज़ी करने के लिये गठबंधन (जैसे– अफ्रीकी संघ) बनाने की क्षमता प्रदान करता है।
- दबाव से सुरक्षा: एक नियम-आधारित व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि विवादों का समाधान आर्थिक ताकत के बजाय कानूनी सिद्धांतों के आधार पर हो। यह प्रणाली विशेष रूप से छोटी अर्थव्यवस्थाओं को बड़ी अर्थव्यवस्थाओं द्वारा अपनाई जाने वाली एकतरफा और ज़बरदस्ती की रणनीतियों से बचाकर उन्हें सुरक्षा प्रदान करती है।
- दोहा घोषणा पर ट्रिप्स एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य (2001): इसने भारत जैसे देशों को स्वास्थ्य आपातकाल के दौरान किफायती दवाएँ सुनिश्चित करने के लिये पेटेंट को दरकिनार करने (अनिवार्य लाइसेंसिंग) की अनुमति दी।
- विशेष एवं विभेदक उपचार (S&DT): यह ढाँचा आधिकारिक तौर पर मान्यता देता है कि विकसित और विकासशील देश समान स्तर पर नहीं हैं।
- S&DT प्रावधान विकासशील देशों को समझौतों और प्रतिबद्धताओं को लागू करने के लिये लंबी समयावधि प्रदान करते हैं, साथ ही उनके व्यापारिक अवसरों को बढ़ाने के उपाय भी करते हैं।
- हालाँकि, दिसंबर 2019 से, विश्व व्यापार संगठन (WTO) का अपीलीय निकाय निष्क्रिय बना हुआ है क्योंकि अमेरिका ने नए न्यायाधीशों की नियुक्ति पर रोक लगा दी है। इसके परिणामस्वरूप वैश्विक व्यापार प्रणाली "नियम-आधारित व्यवस्था" से वापस "शक्ति-आधारित व्यवस्था" की ओर स्थानांतरित हो गई है।
पारस्परिक व्यापार समझौते (ART) क्या हैं?
- स्वतंत्र श्रेणी: पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौतों के विपरीत अमेरिका द्वारा हस्ताक्षरित ART, GATT के अनुच्छेद XXIV के तहत स्थापित नहीं हैं।
- WTO से जुड़ाव का अभाव: ये समझौते विश्व व्यापार संगठन के संस्थागत ढाँचे के बाहर कार्य करते हैं, मानक कानूनी निगरानी को दरकिनार करते हैं और विश्व व्यापार संगठन या अन्य सदस्य देशों द्वारा जाँच को रोकते हैं।
- "अमेरिका प्रथम" से प्रेरित: ART गहनता के साथ एकतरफा अमेरिकी हितों में निहित हैं, जो अमेरिका को असंगत टैरिफ दरें बनाए रखने की अनुमति देते हैं, साथ ही व्यापार भागीदारों को अमेरिकी वस्तुओं पर अपने स्वयं के टैरिफ को समाप्त करने या भारी कमी करने के लिये मजबूर करते हैं।
- अमेरिका की वैकल्पिक समाधान तकनीकें साम्राज्यवादी हैं और ये व्यापार बहुपक्षवाद को कमजोर करने का एक प्रयास हैं।
वैकल्पिक समाधान तकनीकें बहुपक्षवाद और सामूहिक सौदेबाज़ी को कैसे प्रभावित करती हैं?
- विश्व व्यापार संगठन शील्ड का क्षरण: विश्व व्यापार संगठन को "एक-देश, एक-वोट" सिद्धांत के साथ डिज़ाइन किया गया है, ताकि बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को छोटी अर्थव्यवस्थाओं को दबाने से रोका जा सके।
- चूँकि ART विश्व व्यापार संगठन के ढाँचे को पूरी तरह से दरकिनार करते हैं, विकासशील देश सामूहिक सौदेबाज़ी की सुरक्षा खो देते हैं।
- विवाद निपटान से हानि: मानक मुक्त व्यापार समझौतों का विश्व व्यापार संगठन के साथ संस्थागत संबंध है, जिससे छोटे देश अनुचित प्रथाओं को चुनौती दे सकते हैं।
- ART में एक निष्पक्ष, तृतीय-पक्ष विवाद समाधान तंत्र का अभाव है, जिससे विकासशील देश समझौते की एकतरफा अमेरिकी व्याख्याओं के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं।
- वैश्विक व्यापार का विखंडन: मोस्ट-फेवर्ड-नेशन (MFN) सिद्धांत को त्यागकर ART वैश्विक व्यापार प्रणाली को अमेरिकी हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित पृथक्, लेन-देन संबंधी केंद्रों में विखंडित कर देते हैं, जिससे छोटी अर्थव्यवस्थाओं के लिये वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ कम अनुमानित हो जाती हैं।
- बाज़ार पर एकतरफा शासन: विकासशील देशों को प्रायः गंभीर टैरिफ (कभी-कभी अमेरिकी आपातकालीन आर्थिक शक्तियों के अधीन 50% तक) की धमकी से दबाया जाता है।
- यह उन्हें अमेरिकी कृषि और विनिर्मित वस्तुओं के लिये व्यापक बाज़ार पहुँच प्रदान करने के लिये मजबूर करता है, जो स्थानीय कृषकों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को प्रभावित कर सकता है।
- "पॉइज़न पिल" क्लॉज़: हाल के ART में अभूतपूर्व भू-राजनीतिक शर्तें शामिल हैं:
- उदाहरण के लिये, मलेशिया और कंबोडिया के साथ समझौतों में चीन के साथ उनके आर्थिक एकीकरण को रोकने के लिये डिज़ाइन किये गए क्लॉज़ शामिल हैं, जो स्वच्छ ऊर्जा निवेश आकर्षित करने या "गैर-बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं" के साथ व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने की उनकी क्षमता को सीमित करते हैं।
- डिजिटल करों पर प्रतिबंध: अधिकांश ART में सख्त "WTO-प्लस" प्रावधान शामिल हैं, जो देशों को इलेक्ट्रॉनिक प्रसारण या डिजिटल सेवाओं पर सीमा शुल्क लगाने से रोकते हैं।
- डिजिटल अवसंरचना के निर्माण का प्रयास कर रही विकासशील अर्थव्यवस्थाओं (जैसे– भारत) के लिये डिजिटल कर (जैसे– विशाल विदेशी प्रौद्योगिकी पर समान शुल्क) लगाने में असमर्थता के परिणामस्वरूप संभावित संप्रभु राजस्व का भारी नुकसान होता है।
- अप्रतिबंधित डेटा प्रवाह: ये समझौते अक्सर स्वतंत्र सीमा पार डेटा प्रवाह को अनिवार्य करते हैं, जिससे विकासशील देश डेटा स्थानीयकरण कानूनों को लागू करने के अपने अधिकार से वंचित हो जाते हैं, जो नागरिकों की गोपनीयता की रक्षा और घरेलू प्रौद्योगिकी नवाचार को बढ़ावा देने के लिये महत्त्वपूर्ण हैं।
बहुध्रुवीय विश्व में भारत की व्यापार रणनीति
- सतर्कता से सक्रिय भागीदारी की ओर: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में (जैसा कि वर्ष 2019 में RCEP से इसके बाहर निकलने से देखा गया था) भारत अब उन्नत और उच्च-मूल्य वाली अर्थव्यवस्थाओं (यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, UAE) के साथ व्यापक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को अंतिम रूप दे रहा है।
- भारत का FTA नेटवर्क वर्ष 2019 में मात्र 22% से बढ़कर वर्ष 2026 तक इसके एक्सपोर्ट बास्केट के 71% को कवर करने का अनुमान है।
- विकसित देश अपने FTA का 70-80% उपयोग करते हैं, भारत की उपयोग दर लगभग 25% पर कम बनी हुई है, मुख्यतः उत्पत्ति के जटिल नियमों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के बीच सीमित जागरूकता के कारण।
- इसे संबोधित करने के लिये भारत प्रक्रियाओं को सरल बनाने, अनुपालन में सुधार करने और निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने हेतु अपने FTA और दोहरे कराधान से बचाव समझौतों (DTAA) की समीक्षा कर रहा है।
- निर्यात लक्ष्य: विदेश व्यापार नीति, 2023 ने वर्ष 2030 तक भारत के कुल निर्यात को दो ट्रिलियन डॉलर तक बढ़ाने का निश्चित लक्ष्य निर्धारित किया है।
- कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवाएँ) वित्त वर्ष 2024-25 में 825.25 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया, जो 6.05% की मज़बूत वार्षिक वृद्धि को दर्शाता है।
- "चीन प्लस वन" रणनीति का लाभ उठाना: भारत वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVC) में स्वयं को शामिल करने के लिये भू-राजनीतिक कमियों का लाभ उठा रहा है।
- पैक्स सिलिका फ्रेमवर्क जैसे समझौते दुर्लभ मृदा तत्वों, अर्द्धचालक और उच्च-तकनीकी इलेक्ट्रॉनिक जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में सहयोग को प्राथमिकता देते हैं, जो भारत को एक विश्वसनीय वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में मज़बूत करते हैं।
- रणनीतिक स्वायत्तता और बाज़ार विविधीकरण: यूरोप, मध्य पूर्व तथा अमेरिका में निर्यात गंतव्यों का विस्तार करते हुए भारत नीतिगत अनिश्चितता, एकल-बाज़ार पर अत्यधिक निर्भरता एवं वैश्विक आपूर्ति-शृंखला व्यवधानों से बचाव की रणनीति अपना रहा है।
- सेवाओं और डिजिटल शक्ति का उपयोग: नई पीढ़ी के मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) में सीमा-पार डिजिटल व्यापार, पेशेवर गतिशीलता और योग्यताओं की पारस्परिक मान्यता से जुड़े विशेष प्रावधान शामिल किये जा रहे हैं, जिससे भारत अपनी विशाल IT क्षमता और कुशल मानव संसाधन लाभ का प्रभावी उपयोग कर सके।
- कूटनीतिक और रणनीतिक स्वायत्तता: विभिन्न महाद्वीपों में अनेक वैश्विक शक्तियों के साथ सहभागिता भारत को अपने निर्यात गंतव्यों में विविधता लाने, किसी एक भू-क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता से बचने और वैश्विक व्यापार मानदंडों को आकार देने में अपनी प्रभावशीलता बढ़ाने का अवसर प्रदान करती है।
- घरेलू नीतियों के साथ समन्वय: भारत का बाह्य एकीकरण घरेलू संरचनात्मक क्षमता निर्माण के साथ गहराई से समन्वित है, जहाँ उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन तथा अवसंरचना विस्तार जैसी पहलों का उपयोग कर एक विकसित राष्ट्र के दृष्टिकोण को साकार करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्षेत्रीय व्यापार समझौतों के बढ़ते प्रभाव के बीच बहुपक्षवाद को बचाने के लिये क्या उपाय किये जा सकते हैं?
- WTO-केंद्रित बहुपक्षवाद के प्रति प्रतिबद्धता का पुनर्पुष्टि: भारत को वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ सहयोग करते हुए विश्व व्यापार संगठन की विवाद निपटान प्रणाली को मज़बूत करना चाहिये, अपीलीय निकाय की बहाली के लिये सक्रिय समर्थन देना चाहिये और यह सुनिश्चित कर पारदर्शिता को बढ़ावा देना चाहिये कि सभी व्यापार समझौते WTO की अधिसूचना आवश्यकताओं के अनुरूप हों।
- संतुलित सहभागिता रणनीति अपनाना: द्विपक्षीय समझौतों में चयनात्मक रूप से भागीदारी करते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि शुल्क नीति, डिजिटल कराधान और डेटा शासन जैसे क्षेत्रों में आवश्यक नीतिगत अवकाश बना रहे।
- ऐसी प्रतिबद्धताओं से बचें जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को प्रभावित कर सकें, विशेष रूप से उभरते क्षेत्रों, जैसे– कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा में।
- डिजिटल संप्रभुता और वित्तीय स्वतंत्रता की रक्षा: डेटा को अक्सर "नया तेल" (New Oil) कहा जाता है, और भारत के विशाल डिजिटल उपयोगकर्त्ता आधार द्वारा उत्पन्न उच्च-मूल्य डेटा नवाचार, आर्थिक विकास और रणनीतिक लाभ में योगदान देता है।
- इसलिये भारत को अपनी निजता की रक्षा करने, वैश्विक तकनीकी कंपनियों से उचित राजस्व सुनिश्चित करने और घरेलू नवाचार को बढ़ावा देने के लिये डिजिटल टैक्स लगाने और डेटा स्थानीयकरण लागू करने के अधिकार को सुरक्षित रखना चाहिये। साथ ही सीमा-पार डेटा प्रवाह पर एक ऐसे संतुलित वैश्विक ढाँचे का समर्थन करना चाहिये जो संप्रभु नियंत्रण से समझौता किये बिना व्यापार का समर्थन करे।
- घरेलू आर्थिक लचीलापन सुदृढ़ करना: MSME की प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता बढ़ाना, कृषि सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करना और औद्योगिक नीतियाँ (PLI योजनाएँ) लागू करना ताकि विदेशी बाज़ारों के अनुचित दबाव का सामना किया जा सके।
- भारत को अपनी आपूर्ति शृंखला की सुदृढ़ता में निवेश करना चाहिये ताकि चाइना प्लस वन अवसरों का लाभ उठाया जा सके और किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।
- समावेशी और विकासोन्मुख व्यापार मानदंडों को बढ़ावा देना: वैश्विक व्यापार नियमों में ऐसे सुधार लागू करने का प्रयास करें जो विकास संबंधी असमानताओं तथा जलवायु ज़िम्मेदारियों को समुचित रूप से प्रतिबिंबित करें।
- व्यापार नीतियों में श्रम, पर्यावरण और स्थिरता मानकों का समावेश आवश्यक है, किंतु यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि ये मानक 'गैर-शुल्क बाधाओं' या छिपे हुए संरक्षणवाद का रूप न लें।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना: एकतरफा दबावों के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिये ब्रिक्स, अफ्रीकी संघ और आसियान जैसी साझेदारियों के भीतर व्यापारिक संबंधों को गहरा करना अनिवार्य है।
- क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं को प्रोत्साहित करें, जैसे– भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जो न्यायसंगत और विकासोन्मुख हो।
- क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं को प्रोत्साहित करें, जैसे– भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), जो न्यायसंगत और विकासोन्मुख हो।
निष्कर्ष
ARTs को एक नए ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ के रूप में स्वीकार करने के बजाय, भारत और अन्य विकासशील देशों को समावेशी तथा नियम-आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का समर्थन करना चाहिये। एक संतुलित दृष्टिकोण—जिसमें रणनीतिक सहभागिता, घरेलू क्षमता निर्माण एवं गठबंधन-आधारित कूटनीति शामिल हो—सुनिश्चित करेगा कि वैश्विक व्यापार न्यायसंगत, पूर्वानुमेय व विकासोन्मुख बना रहे।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “बहुध्रुवीय विश्व में, व्यापार समझौते केवल आर्थिक समझौतों से बढ़कर रणनीतिक राज्यकला के महत्त्व पूर्ण उपकरण बन गए हैं।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. पारस्परिक व्यापार समझौते (ARTs) क्या हैं?
ARTs वे अमेरिका-नेतृत्व वाले द्विपक्षीय व्यापार समझौते हैं जो WTO ढाँचे के बाहर होते हैं और रणनीतिक दबाव के तहत आपसी शुल्क छूट की मांग करते हैं।
2. ARTs और WTO-अनुपालक मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) में अंतर क्या है?
GATT अनुच्छेद XXIV के तहत आने वाले FTAs के विपरीत, पारस्परिक व्यापार समझौते WTO अधिसूचना, MFN सिद्धांत और विवाद निपटान तंत्र का पालन किये बिना लागू किये जाते हैं।
3. ARTs को विकासशील देशों के लिये खतरा क्यों माना जाता है?
ये प्रावधान न केवल विकासशील देशों की सामूहिक सौदेबाज़ी की क्षमता को कमज़ोर करते हैं, बल्कि विदेशी बाज़ारों के लिये एकतरफा पहुँच सुनिश्चित करते हुए डिजिटल कर और डेटा स्थानीयकरण जैसे संप्रभु अधिकारों को भी प्रतिबंधित करते हैं।
4. WTO में विशेष और भिन्न उपचार (S&DT) क्या है?
विशेष और भिन्न उपचार (S&DT) विकासशील देशों को अधिकार लागू करने के लिए अधिक समय और बाज़ार तक बेहतर पहुँच प्रदान करता है, ताकि विकासात्मक असमानताओं को संतुलित किया जा सके।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. 'एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ऑन द एप्लीकेशन ऑफ सेनेटरी एंड फाइटोसेनेटरी मेज़र्स और 'पीस क्लाज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं? (2015)
(a) खाद्य और कृषि संगठन
(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रूपरेखा सम्मेलन
(c) विश्व व्यापार संगठन
(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम
उत्तर: (c)
प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में कभी-कभी समाचारों में 'एंबर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016)
(a) WTO मामला
(b) SAARC मामला
(c) UNFCCC मामला
(d) FTA पर भारत-EU वार्त्ता
उत्तर: (a)
मेन्स:
प्रश्न 1. यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन को ज़िंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)
प्रश्न 2. “विश्व व्यापार संगठन के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन एवं प्रोन्नति करना है। लेकिन वार्त्ताओं की दोहा परिधि मृत्योन्मुखी प्रतीत होती है, जिसका कारण विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद है।” भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)

शासन व्यवस्था
किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट
प्रारंभिक परीक्षा के लिये: आर्थिक समीक्षा 2025-26, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), गरीबी, विश्व स्वास्थ्य संगठन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK), टेली MANAS, किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक (AFHC), ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP), किरण हेल्पलाइन, मनोदर्पण।
मुख्य परीक्षा के लिये: भारत में मानसिक स्वास्थ्य का सिनेरियो, भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य संकट के पीछे के कारक, भारत में किशोर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये आवश्यक उपाय।
चर्चा में क्यों?
किशोरों से संबंधित हालिया दुखद घटनाओं ने भारत में बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर संकट को रेखांकित किया है। यह समस्या न केवल शुरुआती उम्र की संवेदनशीलता से जुड़ी है, बल्कि अनियंत्रित डिजिटल परिवेश ने इसे और भी भयावह बना दिया है।
- आर्थिक समीक्षा 2025-26 ने इन चुनौतियों को स्वीकार किया है एवं निवारक रणनीतियाँ प्रस्तावित की हैं और सोशल मीडिया के उपयोग हेतु विनियामक उपायों को महत्त्वपूर्ण माना है।
सारांश
- भारत में किशोरों के बीच मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का व्यापक प्रसार चिंताजनक है, जिसे एक गंभीर 'उपचार अंतराल' और भी चुनौतीपूर्ण बना देता है।
- डिजिटल ओवरयूज़, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक पूर्वाग्रह और प्रणालीगत कमियाँ भेद्यता को और बढ़ा देती हैं।
- भविष्य के संकटों को रोकने के लिये स्कूलों में हस्तक्षेप को मज़बूत करना, टेली-मेंटल हेल्थ सेवाओं का विस्तार, विनियामक सुधार और फंडिंग में वृद्धि करना अनिवार्य है।
भारत में किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट को क्या बढ़ावा दे रहा है?
- शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा का दबाव: शिक्षा व्यवस्था की उच्च-प्रभाव वाली परीक्षाएँ और प्रबल प्रतिस्पर्द्धा विद्यार्थियों में निरंतर मानसिक तनाव और चिंता का प्रमुख कारण रही हैं। सामाजिक गतिशीलता के रूप में शैक्षणिक सफलता से संबंधित अभिभावकों की अपेक्षाओं के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाएँ विफलता के भय को जन्म देती हैं, जिसमें बोर्ड परीक्षा से संबंधित तनाव अवसाद का एक प्रमुख कारण है, विशेष रूप से उच्च स्तरीय कक्षाओं में।
- व्यापक डिजिटल प्रभाव: 80 करोड़ से अधिक भारतीयों के बीच स्मार्टफोन के व्यापक उपयोग ने अत्यधिक स्क्रीन टाइम और इंटरनेट की लत को जन्म दिया है। यह साइबर बुलिंग, बॉडी शेमिंग और नींद में व्यवधान उत्पन्न करता है, जिससे ऑनलाइन और वास्तविक जीवन के बीच की रेखाएँ धुँधली हो जाती हैं और चिंता व सामाजिक अलगाव बढ़ जाता है।
- शिथिल पारिवारिक गतिशीलता: पारिवारिक संघर्ष की स्थितियाँ, अत्यधिक नियंत्रण, उपेक्षा या अत्यधिक अपेक्षाओं वाले पारिवारिक वातावरण का खराब मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से गहरा संबंध है। भावनात्मक कल्याण के बजाय केवल उपलब्धियों पर ज़ोर देने से किशोरों की मानसिकता प्रभावित होने के साथ अत्यधिक दबाव विकसित होता है।
- सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय स्थिति: शहरीकरण, गरीबी, प्रवासन और हिंसा जैसे कारक संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। लैंगिक असमानताएँ भी उल्लेखनीय हैं, जहाँ सामाजिक मानदंडों तथा भेदभाव के कारण महिलाओं में प्रायः चिंता व अवसाद की उच्च दर देखी जाती है।
- प्रणालीगत कमियाँ और पूर्वाग्रह: मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित निरंतर सामाजिक पूर्वाग्रह मदद मांगने को हतोत्साहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप परिवार केवल संकट के समय ही हस्तक्षेप करते हैं। यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी (जो प्रति 1,00,000 आबादी पर WHO के 3 पेशेवरों के मानक से बहुत कम है) और स्कूलों में सहायता की कमी के कारण और भी जटिल हो जाती है, जिससे प्रारंभिक हस्तक्षेप में विलंब होता है।
- महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव: कोविड-19 महामारी ने सामाजिक अलगाव, शोक-वियोग तथा दिनचर्या में व्यवधान कारकों ने किशोरों की मानसिक संवेदनशीलता को तीव्र कर दिया, जिससे पहले से मौजूद संवेदनशीलताएँ और अधिक बढ़ गईं एवं किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लक्षणों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति क्या है?
- व्यापक प्रसार: भारत में वर्तमान में हर दस में से एक वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित है। भारत की वयस्क आबादी के 15% से अधिक हिस्से को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है, जो इस समस्या को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में रेखांकित करता है।
- जीवनकाल का जोखिम और भी अधिक है, जहाँ लगभग 14% भारतीयों के जीवन में किसी न किसी अवस्था पर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना करने की संभावना रहती है।
- संवेदनशील किशोर आबादी: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015–16 के जनसंख्या-स्तरीय आँकड़ों से संकेत मिलता है कि भारत में 7% से 10% किशोरों में निदान योग्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, साथ ही विद्यालयी आयु के लगभग 5% से 7% बच्चों में ध्यानाभाव अतिसक्रियता विकार या अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) पाया जाता है।
- किशोरों में आत्महत्या एक गंभीर महामारी: भारत में 15–29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। भारत की आत्महत्या दर 12.6 प्रति 100,000 है, जो वैश्विक औसत 9.2 से कहीं अधिक है।
- शहरी-ग्रामीण अंतर: मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का प्रसार शहरी क्षेत्रों में (13.5%) ग्रामीण क्षेत्रों (6.9%) की तुलना में कहीं अधिक है। इसका संभावित कारण शहरों में बढ़ा हुआ तनाव, सामाजिक अलगाव और तीव्र प्रतिस्पर्द्धात्मक दबाव माना जाता है।
- मानवीय और आर्थिक लागत: भारत पर रोगों का अत्यधिक बोझ है, जिसे प्रति 100,000 जनसंख्या पर 2443 डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ इयर्स (DALY) के रूप में आँका गया है।
- मानसिक स्वास्थ्य संकट का आर्थिक प्रभाव अत्यंत व्यापक होने का अनुमान है—उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य-देखभाल लागतों के कारण वर्ष 2012 से 2030 के बीच लगभग 1.03 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक क्षति होने की संभावना जताई गई है।
- गंभीर उपचार अंतराल: मानसिक विकारों से ग्रस्त 70% से 92% लोग किसी भी प्रकार का उपचार प्राप्त नहीं कर पाते, जो उपचार में एक गंभीर कमी को दर्शाता है। भारत में प्रति 100,000 जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित 3 प्रति 100,000 के मानक का मात्र एक-चौथाई है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित प्रमुख पहलें
भारत में किशोर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये क्या उपाय आवश्यक हैं?
- स्कूल-आधारित हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) की प्राथमिकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम में अनिवार्य सामाजिक-भावनात्मक अधिगम (SEL) और जीवन कौशल शिक्षा को एकीकृत किया जाना चाहिये।
- सभी विद्यालयों में कोटा मॉडल का अनुसरण करते हुए योग्य काउंसलरों की नियुक्ति की जानी चाहिये तथा शिक्षकों को विद्यार्थियों में मानसिक तनाव और संकट के प्रारंभिक संकेतों की पहचान करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये, जिसे एक राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जाने योग्य ढाँचे के रूप में विकसित किया जा सकता है।
- 24×7 गोपनीय पहुँच सुनिश्चित करने के लिये टेली मानस का विस्तार किया जाना चाहिये, जिसमें किशोरों के लिये विशेष मॉड्यूल और बहुभाषी सहायता शामिल हो। साथ ही, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिकों (AFHCs) को और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
- सहकर्मी-नेतृत्व एवं समुदाय-आधारित सहयोग: किशोरों को सहकर्मी समर्थक के रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, जैसे– यूनिसेफ-निमहंस (UNICEF– NIMHANS) के 'आई सपोर्ट माई फ्रेंड्स' ढाँचे के माध्यम से, ताकि वे प्रारंभिक स्तर पर सहायता प्रदान कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर साथियों को पेशेवर मदद से जोड़ सकें। साथ ही विशेष रूप से हाशिये पर मौजूद समूहों के लिये समुदाय-आधारित नेटवर्क और हेल्पलाइनों को सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
- प्रणालीगत और संरचनात्मक बाधाओं का समाधान: मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी प्रणालीगत और संरचनात्मक चुनौतियों को दूर करने के लिये बजट आवंटन में वृद्धि की जानी चाहिये, जिसमें 25 उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना तथा ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के माध्यम से ज़िला स्तर पर एकीकरण शामिल हो।
- केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में उत्तरी भारत में एक नया NIMHANS परिसर स्थापित करने का प्रस्ताव किया है, क्योंकि वर्तमान में इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर का कोई भी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान मौजूद नहीं है। इस पहल के तहत, राँची और तेजपुर स्थित मौजूदा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को भी क्षेत्रीय शीर्ष संस्थान के रूप में उन्नत किया जाएगा।
- जोखिम कारकों को विनियमित करने और साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता: सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग और साइबरबुलिंग जैसे जोखिमों के खिलाफ सुरक्षात्मक उपाय लागू करना (उदाहरण के लिये, 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला विश्व का पहला देश ऑस्ट्रेलिया बन गया है)। इसके अतिरिक्त, स्कूल-स्तरीय सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के स्कूलों के लिये दिशा-निर्देश: बुलिंग और साइबरबुलिंग की रोकथाम (2024) को लागू करना। रुझानों की निगरानी करने और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील अनुकूलन की जानकारी देने के लिये निगरानी, दीर्घकालिक अनुसंधान और राज्य-स्तरीय विखंडित डेटा संग्रह को मज़बूत करना महत्त्वपूर्ण है।
- परिवार और अभिभावकों की सहभागिता बढ़ाना: परिवारों को सहायक संचार के लिये उपकरण उपलब्ध कराने और अभिभावकों पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव को कम करने के लिये जागरूकता अभियान और पालन-पोषण कार्यक्रम शुरू करना। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ताओं (जैसे– ASHAs) की सहायता से खुले विचार-विमर्श को बढ़ावा देना तथा घरेलू स्तर पर भेदभाव को कम करना।
निष्कर्ष:
भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता संकट एक समग्र, निवारक और अधिकार-आधारित रणनीति की आवश्यकता दर्शाता है। उपचार की कमी को दूर करना, स्कूल और परिवार की सहायक प्रणालियों को मज़बूत करना, डिजिटल खतरों को नियंत्रित करना तथा समुदाय आधारित सेवाओं का विस्तार करना अनिवार्य है। साथ ही, सतत वित्तीय सहायता, सामाजिक भेदभाव को कम करना और संस्थागत उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना, बिखरे प्रयासों को एक प्रभावी, सशक्त और युवा-केंद्रित मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली में बदलने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारकों का विश्लेषण कीजिये तथा इसके गहरे सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए आगे की राह सुझाइये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. भारतीय किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की व्यापकता क्या है?
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 7% से 10% भारतीय किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तथा 5% से 7% स्कूली बच्चे ध्यानाभाव अतिसक्रियता विकार से ग्रस्त है।
2. भारत में मनोचिकित्सक-जनसंख्या अनुपात क्या है और यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित मानकों से किस प्रकार सुमेलित है?
भारत में प्रति एक लाख लोगों पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित 3 प्रति एक लाख लोगों के अनुपात का मात्र एक-चौथाई है।
3. भारत में मानसिक स्वास्थ्य के लिये सरकार की प्रमुख पहलें क्या हैं?
प्रमुख पहलों में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP), टेली मानस, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और मनोदर्पण जैसे विद्यालय-आधारित कार्यक्रम शामिल हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
मेन्स
प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में, सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)
प्रश्न. भारत में 'सभी के लिये स्वास्थ्य' को प्राप्त करने के लिये समुचित स्थानीय सामुदायिक-स्तरीय स्वास्थ्य देखभाल का मध्यक्षेप एक पूर्वपेक्षा है। व्याख्या कीजिये। (2018)
