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किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट

  • 26 Feb 2026
  • 90 min read

प्रारंभिक परीक्षा के लिये: आर्थिक समीक्षा 2025-26, अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD), गरीबी, विश्व स्वास्थ्य संगठन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK), टेली MANAS, किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिक (AFHC), ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP), किरण हेल्पलाइन, मनोदर्पण।              

मुख्य परीक्षा के लिये: भारत में मानसिक स्वास्थ्य का सिनेरियो, भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य संकट के पीछे के कारक, भारत में किशोर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये आवश्यक उपाय।

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों?

किशोरों से संबंधित हालिया दुखद घटनाओं ने भारत में बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य के गंभीर संकट को रेखांकित किया है। यह समस्या न केवल शुरुआती उम्र की संवेदनशीलता से जुड़ी है, बल्कि अनियंत्रित डिजिटल परिवेश ने इसे और भी भयावह बना दिया है।

  • आर्थिक समीक्षा 2025-26 ने इन चुनौतियों को स्वीकार किया है एवं निवारक रणनीतियाँ प्रस्तावित की हैं और सोशल मीडिया के उपयोग हेतु विनियामक उपायों को महत्त्वपूर्ण माना है।

सारांश

  • भारत में किशोरों के बीच मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का व्यापक प्रसार चिंताजनक है, जिसे एक गंभीर 'उपचार अंतराल' और भी चुनौतीपूर्ण बना देता है।
  • डिजिटल ओवरयूज़, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक पूर्वाग्रह और प्रणालीगत कमियाँ भेद्यता को और बढ़ा देती हैं।
  • भविष्य के संकटों को रोकने के लिये स्कूलों में हस्तक्षेप को मज़बूत करना, टेली-मेंटल हेल्थ सेवाओं का विस्तार, विनियामक सुधार और फंडिंग में वृद्धि करना अनिवार्य है।

भारत में किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट को क्या बढ़ावा दे रहा है?

  • शैक्षणिक प्रतिस्पर्द्धा का दबाव: शिक्षा व्यवस्था की उच्च-प्रभाव वाली परीक्षाएँ और प्रबल प्रतिस्पर्द्धा विद्यार्थियों में निरंतर मानसिक तनाव और चिंता का प्रमुख कारण रही हैं। सामाजिक गतिशीलता के रूप में शैक्षणिक सफलता से संबंधित अभिभावकों की अपेक्षाओं के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाएँ विफलता के भय को जन्म देती हैं, जिसमें बोर्ड परीक्षा से संबंधित तनाव अवसाद का एक प्रमुख कारण है, विशेष रूप से उच्च स्तरीय कक्षाओं में।
  • व्यापक डिजिटल प्रभाव: 80 करोड़ से अधिक भारतीयों के बीच स्मार्टफोन के व्यापक उपयोग ने अत्यधिक स्क्रीन टाइम और इंटरनेट की लत को जन्म दिया है। यह साइबर बुलिंग, बॉडी शेमिंग और नींद में व्यवधान उत्पन्न करता है, जिससे ऑनलाइन और वास्तविक जीवन के बीच की रेखाएँ धुँधली हो जाती हैं और चिंता सामाजिक अलगाव बढ़ जाता है।
  • शिथिल पारिवारिक गतिशीलता: पारिवारिक संघर्ष की स्थितियाँ, अत्यधिक नियंत्रण, उपेक्षा या अत्यधिक अपेक्षाओं वाले पारिवारिक वातावरण का खराब मानसिक स्वास्थ्य परिणामों से गहरा संबंध है। भावनात्मक कल्याण के बजाय केवल उपलब्धियों पर ज़ोर देने से किशोरों की मानसिकता प्रभावित होने के साथ अत्यधिक दबाव विकसित होता है।
  • सामाजिक-आर्थिक एवं पर्यावरणीय स्थिति: शहरीकरण, गरीबी, प्रवासन और हिंसा जैसे कारक संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं। लैंगिक असमानताएँ भी उल्लेखनीय हैं, जहाँ सामाजिक मानदंडों तथा भेदभाव के कारण महिलाओं में प्रायः चिंता व अवसाद की उच्च दर देखी जाती है।
  • प्रणालीगत कमियाँ और पूर्वाग्रह: मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित निरंतर सामाजिक पूर्वाग्रह मदद मांगने को हतोत्साहित करता है, जिसके परिणामस्वरूप परिवार केवल संकट के समय ही हस्तक्षेप करते हैं। यह स्थिति मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों की कमी (जो प्रति 1,00,000 आबादी पर WHO के 3 पेशेवरों के मानक से बहुत कम है) और स्कूलों में सहायता की कमी के कारण और भी जटिल हो जाती है, जिससे प्रारंभिक हस्तक्षेप में विलंब होता है।
  • महामारी के दीर्घकालिक प्रभाव: कोविड-19 महामारी ने सामाजिक अलगाव, शोक-वियोग तथा दिनचर्या में व्यवधान कारकों ने किशोरों की मानसिक संवेदनशीलता को तीव्र कर दिया, जिससे पहले से मौजूद संवेदनशीलताएँ और अधिक बढ़ गईं एवं किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी लक्षणों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति क्या है?

  • व्यापक प्रसार: भारत में वर्तमान में हर दस में से एक वयस्क किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित है। भारत की वयस्क आबादी के 15% से अधिक हिस्से को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में सक्रिय हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है, जो इस समस्या को एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट के रूप में रेखांकित करता है।
    • जीवनकाल का जोखिम और भी अधिक है, जहाँ लगभग 14% भारतीयों के जीवन में किसी न किसी अवस्था पर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना करने की संभावना रहती है।
  • संवेदनशील किशोर आबादी: राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015–16 के जनसंख्या-स्तरीय आँकड़ों से संकेत मिलता है कि भारत में 7% से 10% किशोरों में निदान योग्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ हैं, साथ ही विद्यालयी आयु के लगभग 5% से 7% बच्चों में ध्यानाभाव अतिसक्रियता विकार या अटेंशन डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) पाया जाता है।
  • किशोरों में आत्महत्या एक गंभीर महामारी: भारत में 15–29 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में आत्महत्या मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है। भारत की आत्महत्या दर 12.6 प्रति 100,000 है, जो वैश्विक औसत 9.2 से कहीं अधिक है।
  • शहरी-ग्रामीण अंतर: मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का प्रसार शहरी क्षेत्रों में (13.5%) ग्रामीण क्षेत्रों (6.9%) की तुलना में कहीं अधिक है। इसका संभावित कारण शहरों में बढ़ा हुआ तनाव, सामाजिक अलगाव और तीव्र प्रतिस्पर्द्धात्मक दबाव माना जाता है।
  • मानवीय और आर्थिक लागत: भारत पर रोगों का अत्यधिक बोझ है, जिसे प्रति 100,000 जनसंख्या पर 2443 डिसेबिलिटी-एडजस्टेड लाइफ इयर्स (DALY) के रूप में आँका गया है।
    • मानसिक स्वास्थ्य संकट का आर्थिक प्रभाव अत्यंत व्यापक होने का अनुमान है—उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य-देखभाल लागतों के कारण वर्ष 2012 से 2030 के बीच लगभग 1.03 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक क्षति होने की संभावना जताई गई है।
  • गंभीर उपचार अंतराल: मानसिक विकारों से ग्रस्त 70% से 92% लोग किसी भी प्रकार का उपचार प्राप्त नहीं कर पाते, जो उपचार में एक गंभीर कमी को दर्शाता है। भारत में प्रति 100,000 जनसंख्या पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित 3 प्रति 100,000 के मानक का मात्र एक-चौथाई है। 

भारत में किशोर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये क्या उपाय आवश्यक हैं?

  • स्कूल-आधारित हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करना: राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) की प्राथमिकताओं के अनुरूप पाठ्यक्रम में अनिवार्य सामाजिक-भावनात्मक अधिगम (SEL) और जीवन कौशल शिक्षा को एकीकृत किया जाना चाहिये।
    • सभी विद्यालयों में कोटा मॉडल का अनुसरण करते हुए योग्य काउंसलरों की नियुक्ति की जानी चाहिये तथा शिक्षकों को विद्यार्थियों में मानसिक तनाव और संकट के प्रारंभिक संकेतों की पहचान करने का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये, जिसे एक राष्ट्रीय स्तर पर अपनाए जाने योग्य ढाँचे के रूप में विकसित किया जा सकता है।
    • 24×7 गोपनीय पहुँच सुनिश्चित करने के लिये टेली मानस का विस्तार किया जाना चाहिये, जिसमें किशोरों के लिये विशेष मॉड्यूल और बहुभाषी सहायता शामिल हो। साथ ही, राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत किशोर-अनुकूल स्वास्थ्य क्लीनिकों (AFHCs) को और अधिक सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
  • सहकर्मी-नेतृत्व एवं समुदाय-आधारित सहयोग: किशोरों को सहकर्मी समर्थक के रूप में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, जैसे– यूनिसेफ-निमहंस (UNICEF– NIMHANS) के 'आई सपोर्ट माई फ्रेंड्स' ढाँचे के माध्यम से, ताकि वे प्रारंभिक स्तर पर सहायता प्रदान कर सकें और आवश्यकता पड़ने पर साथियों को पेशेवर मदद से जोड़ सकें। साथ ही विशेष रूप से हाशिये पर मौजूद समूहों के लिये समुदाय-आधारित नेटवर्क और हेल्पलाइनों को सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
  • प्रणालीगत और संरचनात्मक बाधाओं का समाधान: मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी प्रणालीगत और संरचनात्मक चुनौतियों को दूर करने के लिये बजट आवंटन में वृद्धि की जानी चाहिये, जिसमें 25 उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना तथा ज़िला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (DMHP) के माध्यम से ज़िला स्तर पर एकीकरण शामिल हो।
    • केंद्र सरकार ने केंद्रीय बजट 2026-27 में उत्तरी भारत में एक नया NIMHANS परिसर स्थापित करने का प्रस्ताव किया है, क्योंकि वर्तमान में इस क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर का कोई भी मानसिक स्वास्थ्य संस्थान मौजूद नहीं है। इस पहल के तहत, राँची और तेजपुर स्थित मौजूदा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को भी क्षेत्रीय शीर्ष संस्थान के रूप में उन्नत किया जाएगा।
  • जोखिम कारकों को विनियमित करने और साक्ष्य जुटाने की आवश्यकता: सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग और साइबरबुलिंग जैसे जोखिमों के खिलाफ सुरक्षात्मक उपाय लागू करना (उदाहरण के लिये, 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिये सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला विश्व का पहला देश ऑस्ट्रेलिया बन गया है)। इसके अतिरिक्त, स्कूल-स्तरीय सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के स्कूलों के लिये दिशा-निर्देश: बुलिंग और साइबरबुलिंग की रोकथाम (2024) को लागू करना। रुझानों की निगरानी करने और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील अनुकूलन की जानकारी देने के लिये निगरानी, दीर्घकालिक अनुसंधान और राज्य-स्तरीय विखंडित डेटा संग्रह को मज़बूत करना महत्त्वपूर्ण है।
  • परिवार और अभिभावकों की सहभागिता बढ़ाना: परिवारों को सहायक संचार के लिये उपकरण उपलब्ध कराने और अभिभावकों पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव को कम करने के लिये जागरूकता अभियान और पालन-पोषण कार्यक्रम शुरू करना। राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम जैसे प्लेटफॉर्मों के माध्यम से अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्त्ताओं (जैसे– ASHAs) की सहायता से खुले विचार-विमर्श को बढ़ावा देना तथा घरेलू स्तर पर भेदभाव को कम करना।

निष्कर्ष:

भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य का बढ़ता संकट एक समग्र, निवारक और अधिकार-आधारित रणनीति की आवश्यकता दर्शाता है। उपचार की कमी को दूर करना, स्कूल और परिवार की सहायक प्रणालियों को मज़बूत करना, डिजिटल खतरों को नियंत्रित करना तथा समुदाय आधारित सेवाओं का विस्तार करना अनिवार्य है। साथ ही, सतत वित्तीय सहायता, सामाजिक भेदभाव को कम करना और संस्थागत उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना, बिखरे प्रयासों को एक प्रभावी, सशक्त और युवा-केंद्रित मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली में बदलने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. भारत में किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य संकट को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारकों का विश्लेषण कीजिये तथा इसके गहरे सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए आगे की राह सुझाइये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारतीय किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की व्यापकता क्या है?
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 7% से 10% भारतीय किशोरों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ तथा 5% से 7% स्कूली बच्चे ध्यानाभाव अतिसक्रियता विकार से ग्रस्त है।

2. भारत में मनोचिकित्सक-जनसंख्या अनुपात क्या है और यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित मानकों से किस प्रकार सुमेलित है?
भारत में प्रति एक लाख लोगों पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक हैं, जो कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुशंसित 3 प्रति एक लाख लोगों के अनुपात का मात्र एक-चौथाई है।

3. भारत में मानसिक स्वास्थ्य के लिये सरकार की प्रमुख पहलें क्या हैं?
प्रमुख पहलों में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (NMHP), टेली मानस, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 और मनोदर्पण जैसे विद्यालय-आधारित कार्यक्रम शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)

मेन्स

प्रश्न. सामाजिक विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के क्रम में, विशेषकर जराचिकित्सा एवं मातृ स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में, सुदृढ़ और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नीतियों की आवश्यकता है। विवेचन कीजिये। (2020)

प्रश्न. भारत में 'सभी के लिये स्वास्थ्य' को प्राप्त करने के लिये समुचित स्थानीय सामुदायिक-स्तरीय स्वास्थ्य देखभाल का मध्यक्षेप एक पूर्वपेक्षा है। व्याख्या कीजिये। (2018)

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