प्रारंभिक परीक्षा
ज्योतिबा फुले
- 08 Apr 2026
- 29 min read
चर्चा में क्यों?
हाल ही में ज्योतिबा फुले (1827–1890) की द्विशताब्दी ने एक समाज सुधारक और संवैधानिक विचारधारा के अग्रदूत के रूप में उनके योगदान को रेखांकित किया।
- ज्योतिबा फुले के विचारों ने समानता, गरिमा और शक्ति के पुनर्वितरण पर आधारित समाज की पुनर्कल्पना की, जिसमें सामाजिक पदानुक्रम, आर्थिक शोषण तथा राज्य की उदासीनता के आपसी संबंध को उजागर किया गया।
ज्योतिबा फुले के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं?
- परिचय: ज्योतिबा फुले, जिनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को हुआ था, एक अग्रणी समाज सुधारक थे। उन्होंने ब्राह्मणवादी रूढ़िवाद को चुनौती दी और दलितों एवं महिलाओं के अधिकारों के लिये संघर्ष किया। फुले को भारत में सामाजिक न्याय आंदोलनों की नींव रखने का श्रेय दिया जाता है।
- मुख्य योगदान:
- शैक्षिक सुधार: ज्योतिबा फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले ने वर्ष 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोला और बाद में वर्ष 1855 में पुणे में श्रमिकों, किसानों और महिलाओं के लिये रात्रि विद्यालयों की शुरुआत की।
- समाज सुधार:
- रूढ़िवाद का विरोध: ज्योतिबा फुले ने जातिगत उत्पीड़न का विरोध किया, चिपलूणकर और तिलक जैसे ब्राह्मणवादी विचारकों की आलोचना की, उत्पीड़ित वर्गों तथा महिलाओं के उत्थान के लिये ब्रिटिश शासन का समर्थन किया।
- जाति-विरोधी आंदोलन: ज्योतिबा फुले ने वर्ष 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका उद्देश्य जाति-आधारित पदानुक्रम के खिलाफ संघर्ष करना था। अपनी पुस्तक गुलामगिरी में उन्होंने जातिगत उत्पीड़न की तुलना अमेरिकी दासता से की।
- दीनबंधु, कृष्णराव पांडुरंग भालेकर द्वारा वर्ष 1877 में स्थापित एक मराठी साप्ताहिक समाचार-पत्र सत्यशोधक समाज के लिये एक माध्यम के रूप में कार्य करता था।
- वर्ष 1857 के विद्रोह की आलोचना: इसे ब्राह्मणवादी शासन को बहाल करने के लिये एक उच्च जाति के प्रयास के रूप में देखा गया।
- आर्थिक सुधार: जाति पदानुक्रम को समाप्त करने के लिये निचली जातियों के लिये अनिवार्य शिक्षा और आर्थिक उत्थान का समर्थन किया।
- धार्मिक स्वतंत्रता: अपने सत्सार (सत्य का सार) में फुले ने पंडिता रमाबाई के ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के अधिकार का बचाव किया।
- कृषि में सुधार: शेतकऱ्यांचा आसूड में, ज्योतिबा फुले ने एक ब्रिटिश और ब्राह्मण नौकरशाही गठबंधन द्वारा शूद्र किसानों के शोषण की आलोचना की।
- तर्कवाद: सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक में उन्होंने एक न्यायपूर्ण और न्यायसंगत समाज की वकालत की जहाँ ईश्वर को एक प्रेमपूर्ण और तर्कसंगत निर्माता के रूप में देखा जाता है। इसने पारंपरिक पदानुक्रमों को ध्वस्त कर दिया।
- प्रमुख प्रकाशन: तृतीय रत्न (1855), पोवाडा: छत्रपति शिवाजीराजे भोसले यांचा (1869), गुलामगिरी (1873), शेतकऱ्यांचा आसूड (1881)।
- प्रेरणा: वह थॉमस पेन की 'द राइट्स ऑफ मैन' से प्रभावित थे और सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने के लिये महिलाओं और निचली जातियों की शिक्षा को कुंजी के रूप में देखते थे।
- मान्यता: उन्हें 11 मई, 1888 को एक महाराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्त्ता विठ्ठलराव कृष्णाजी वंदेकर द्वारा महात्मा की उपाधि से सम्मानित किया गया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. महात्मा ज्योतिबा फुले का जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म 11 अप्रैल, 1827 को हुआ था।
2. महात्मा ज्योतिबा फुले के प्रमुख योगदान क्या थे?
वे एक समाज सुधारक, शिक्षाविद् और जाति प्रथा के कटु आलोचक थे।
3. महात्मा ज्योतिबा फुले महिला शिक्षा में क्यों महत्त्वपूर्ण हैं?
उन्होंने भारत में महिला शिक्षा का बीड़ा उठाया और उसे बढ़ावा दिया।
4. महात्मा ज्योतिबा फुले की सामाजिक सुधार में क्या भूमिका थी?
उन्होंने जातिगत भेदभाव के उन्मूलन और उपेक्षित वर्गों के उत्थान के लिये काम किया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रश्न. सत्यशोधक समाज ने आयोजित किया: (2016)
(a) बिहार में जनजातीय उत्थान के लिये एक आंदोलन
(b) गुजरात में मंदिर प्रवेश आंदोलन
(c) महाराष्ट्र में जाति-विरोधी आंदोलन
(d) पंजाब में किसान आंदोलन
उत्तर: (c)
