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डेली न्यूज़

जैव विविधता और पर्यावरण

विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति

प्रिलिम्स के लिये: विश्व की प्रवासी प्रजातियों की रिपोर्ट 2024, वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर सम्मेलन (CMS), IUCN रेड लिस्ट श्रेणी, अत्यधिक रोगज़नक एवियन इन्फ्लूएंजा (HPAI) H5N1, ऑलिव रिडले कछुआ, बॉन सम्मेलन, मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF), अमूर फाल्कन, हिम तेंदुआ, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP), पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), BBNJ संधि, नवीकरणीय ऊर्जा   

मेन्स के लिये: संयुक्त राष्ट्र की विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024 के अंतरिम अद्यतन के प्रमुख निष्कर्ष, प्रवासी प्रजातियों से संबंधित प्रमुख तथ्य, प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिये आवश्यक कदम

स्रोत: डाउन टू अर्थ

चर्चा में क्यों?

संयुक्त राष्ट्र की विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024 के एक चिंताजनक अंतरिम अद्यतन में चेतावनी दी गई है कि वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर सम्मेलन (CMS) के तहत संरक्षित वैश्विक प्रवासी प्रजातियों की 49% आबादी घट रही है

सारांश

  • संयुक्त राष्ट्र की एक चिंताजनक अंतरिम रिपोर्ट से पता चलता है कि कन्वेंशन ऑन माइग्रेटरी स्पीशीज़ (CMS) के तहत आने वाली 49% प्रवासी प्रजातियों की आबादी घट रही है, जो दो वर्ष पहले 44% थी।
  • मुख्य खतरों में आवास का नुकसान, एवियन फ्लू और अत्यधिक दोहन शामिल हैं।
  • इन प्रवृत्तियों के बावजूद, साइगा मृग और स्किमिटर-हॉर्न्ड ओरिक्स जैसी प्रजातियों के संरक्षण में लक्षित प्रयासों से सफलता भी मिली है।

संयुक्त राष्ट्र की ‘विश्व की प्रवासी प्रजातियों की स्थिति रिपोर्ट 2024’ के अंतरिम अद्यतन के प्रमुख निष्कर्ष क्या हैं?

  • आबादी में गिरावट और विलुप्ति का खतरा: केवल 2 वर्षों में CMS में सूचीबद्ध प्रजातियों की घटती आबादी का अनुपात 44% से बढ़कर 49% हो गया है।
    • परिणामस्वरूप, बढ़ती या स्थिर प्रवृत्ति वाली प्रजातियों का प्रतिशत घटकर 38% रह गया है, जबकि विलुप्ति के खतरे का सामना करने वाली प्रजातियाँ अब कुल सूचीबद्ध प्रजातियों का 24% हो गई हैं, जो पहले 22% था।
  • संरक्षण स्थिति में गिरावट: वर्ष 2022 के बाद पुनर्मूल्यांकन की गई CMS में सूचीबद्ध 386 प्रजातियों में से 34 (9%) को IUCN रेड लिस्ट की अलग श्रेणी में स्थानांतरित किया गया, जिनमें अधिकांश (26 प्रजातियाँ) अधिक गंभीर खतरे वाली श्रेणी (जैसे- लुप्तप्राय से गंभीर रूप से लुप्तप्राय) में चली गईं।
    • इनमें से 69% प्रजातियाँ प्रवासी तटीय पक्षी हैं, जिनकी संख्या में गिरावट का मुख्य कारण महत्त्वपूर्ण ठहराव स्थलों और गैर-प्रजनन क्षेत्रों में पर्यावास की हानि और विखंडन है।
  • नए और पहले से मौजूद खतरों का उभरना:
    • प्रमुख खतरे के रूप में एवियन फ्लू: अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लूएंजा (HPAI) H5N1 एक नया गंभीर खतरा बन गया है, जो पेंगुइन, पेलेकेन, क्रेन और जलीय स्तनधारियों जैसे- फर सील और सी लॉयन सहित कई प्रजातियों में बड़े पैमाने पर मृत्यु का कारण बन रहा है।
    • पर्यावास की हानि और विखंडन: रेखीय अवसंरचना (सड़कें, रेलवे, बाड़) का विस्तार आवासों को विखंडित करता रहता है, जैसा कि मंगोलियाई गज़ेल की गतिशीलता में गंभीर गिरावट से देखा गया है।
      • भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण वन्यजीवों की आबादी में भारी गिरावट आई है जैसे कि मारा–लोइटा ब्लू वाइल्डबीस्ट (Mara-Loita Blue Wildebeest) की संख्या 1970 के दशक के अंत से 75% तक घट गई
    • अत्यधिक दोहन और बायकैच: शार्क और रे के लिये अति-मत्स्यन तथा बायकैच प्रमुख खतरे बने हुए हैं। अफ्रीका और यूरेशिया में रैप्टर (शिकारी पक्षी) का अवैध शिकार, विषप्रयोग तथा ऊर्जा अवसंरचना (जैसे- बिजली लाइनों और पवन टर्बाइनों) से टकराव का गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
  • क्षेत्रीय सफलता की कहानियाँ और पुनर्प्राप्ति: नकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद, लक्षित संरक्षण प्रयासों के कारण कुछ प्रजातियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है:
    • स्किमिटर-हॉर्नड ओरिक्स को चाड में पुनर्प्रवेश कार्यक्रमों की सफलता के बाद ‘वनों से विलुप्त (Extinct in the Wild)’ से पुनर्वर्गीकृत कर ‘लुप्तप्राय’ श्रेणी में रखा गया।
    • साइगा मृग (Saiga Antelope) की संख्या कज़ाखस्तान में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी, जिसके परिणामस्वरूप इसकी स्थिति ‘लुप्तप्राय’ से सुधरकर ‘संकटापन्न’ हो गई।
    • भूमध्यसागरीय मोंक सील की संख्या में वृद्धि के कारण इसकी स्थिति ‘लुप्तप्राय’ से सुधारकर ‘सुभेद्य’ कर दी गई।

प्रवासी प्रजातियाँ क्या हैं ?

  • परिचय: प्रवासी प्रजातियाँ वे वन्यजीव हैं, जिनमें जलीय, पक्षी तथा स्थलीय प्रजातियाँ शामिल होती हैं, जिनकी आबादी चक्रीय और पूर्वानुमेय रूप से एक भौगोलिक क्षेत्र से दूसरे भौगोलिक क्षेत्र की ओर प्रवास करती है।
    • ये प्रजातियाँ प्रजनन (Breeding), भोजन प्राप्त करने (Feeding) तथा विश्राम करने के लिये रुकने वाले स्थानों (Stopovers) हेतु अलग-अलग स्थलों पर निर्भर करती हैं। उनके प्रवास मार्ग के दौरान यदि इन महत्त्वपूर्ण स्थलों में से किसी एक का भी लोप हो जाए, तो इससे पूरी आबादी  के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • टैक्सोनॉमिक स्कोप: प्रवासी प्रजातियों में विभिन्न प्रकार के जीव शामिल होते हैं-
    • पक्षी: बार-टेल्ड गॉडविट, आर्कटिक टर्न
    • मैमल्स: टेरेस्ट्रियल मैमल्स में वाइल्डबीस्ट, साइगा एंटीलोप, आदि शामिल हैं, जबकि मरीन मैमल्स में हंपबैक व्हेल, ग्रे व्हेल, आदि शामिल हैं।
    • मछली: सैल्मन, यूरोपियन ईल, आदि 
    • रेंगने वाले: लेदरबैक टर्टल, ऑलिव रिडले टर्टल, आदि
    • कीट: मोनार्क बटरफ्लाई, ग्लोब स्किमर ड्रैगनफ्लाई।
  • प्रवासी प्रजातियों का संरक्षण: प्रवासी प्रजातियों का संरक्षण CMS (1979) के तहत किया जाता है, जिसे बॉन कन्वेंशन भी कहा जाता है। भारत वर्ष 1983 से CMS का एक हिस्सा रहा है।
  • भारत का भौगोलिक महत्त्व: भारत प्रमुख वैश्विक प्रवासी मार्गों (Flyways) पर अवस्थित होने के कारण के कारण प्रवासी प्रजातियों के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF) के संदर्भ में, जो सैकड़ों प्रवासी पक्षी आबादी को आश्रय प्रदान करता है। भारत समुद्री कछुओं, स्तनधारियों तथा अन्य जीव समूहों के लिये भी महत्त्वपूर्ण प्रवासन मार्गों की मेज़बानी करता है।

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वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS)

  • परिचय: CMS, जिसे बॉन अभिसमय भी कहा जाता है, एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय संधि है, जिसका संचालन संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा किया जाता है। यह प्रवासी प्रजातियों की रक्षा करने तथा विभिन्न देशों में उनके आवासों के संरक्षण के लिये वैश्विक ढाँचा प्रदान करती है।
    • इसे 1979 में जर्मनी के बॉन में अपनाया गया था और यह 1 नवंबर, 1983 को प्रभाव में (लागू) आया।
  • उद्देश्य: वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) का उद्देश्य उन विशिष्ट चुनौतियों का समाधान करना है, जिनका सामना प्रवासी प्रजातियाँ करती हैं। ये प्रजातियाँ अपने जीवन चक्र के दौरान (जैसे- प्रजनन, भोजन या अन्य उद्देश्यों हेतु) नियमित और पूर्वानुमेय रूप से राष्ट्रीय सीमाओं को पार करती हैं। इसलिये इनके प्रभावी संरक्षण के लिये केवल राष्ट्रीय उपाय पर्याप्त नहीं होते, बल्कि समन्वित अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई आवश्यक होती है।
  • दो परिशिष्ट: CMS में दो परिशिष्ट शामिल हैं:
    • परिशिष्ट-I: इसमें विलुप्ति की कगार पर पहुँचीं प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं और सदस्य देशों (Parties) पर इनका संरक्षण सुनिश्चित करने हेतु सख्त उपाय लागू करने का दायित्व होता है, जैसे- शिकार (Hunting), प्रपाशन (Trapping) और विषप्रयोग (Poisoning) पर रोक लगाना, पर्यावासों का संरक्षण या पुनर्स्थापन करना, प्रवास बाधाओं (जैसे- अवरोध) को कम करना आदि।
      • परिशिष्ट-I में कुल 188 प्रजातियाँ शामिल हैं। CMS परिशिष्ट-I में भारत की प्रमुख प्रजातियाँ: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, साइबेरियन क्रेन, ऑलिव रिडले टर्टल, लेदरबैक सी टर्टल आदि।
    • परिशिष्ट-II: इसमें ऐसी प्रवासी प्रजातियाँ शामिल हैं, जिनकी संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं है और जो अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकती हैं। यह परिशिष्ट प्रवासन मार्ग वाले देशों (Range states) के बीच लक्षित समझौते (Agreements) या समझौता ज्ञापन (MoUs) के समन्वय और वार्ता का समर्थन करता है।
  • संचालन निकाय: कॉन्फ्रेंस ऑफ द पार्टीज़ (COP) मुख्य निर्णय लेने वाला निकाय है, जो समय-समय पर बैठक करके क्रियान्वयन की समीक्षा, प्रस्तावों को अपनाने और परिशिष्टों में संशोधन करता है। CMS COP 15 मार्च, 2026 में कैंपो ग्रांडे, ब्राज़ील में आयोजित होगी। (पिछली बैठक, CMS COP 14, समरकंद, उज्बेकिस्तान में हुई थी)।

प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण के लिये कौन-से कदम उठाने आवश्यक हैं ?

CMS ने अपनी परिशिष्टों को मज़बूत करने पर ज़ोर देने के साथ ही बढ़ते खतरों से निपटने के लिये प्राथमिकता वाली कार्रवाइयों की रूपरेखा तैयार की है, जिसके तहत पर्यावास संरक्षण, अत्यधिक दोहन की रोकथाम, प्रदूषण को कम करने और जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों का समाधान करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

  • पर्यावास का संरक्षण, जोड़ना और पुनर्स्थापित करना: प्राथमिकता वाले कार्यों में संरक्षित क्षेत्रों के दायरे को प्रमुख जैव विविधता स्थलों तक बढ़ाना शामिल है। साथ ही, राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) में प्रजातियों की प्राथमिकताओं को एकीकृत करके और पर्याप्त संसाधन सुरक्षित करके प्रबंधन प्रभावशीलता को बढ़ाना भी इसमें शामिल है।
    • जैव विविधता के ह्रास को रोकने के लिये KMGBF के लक्ष्य 2 के अंतर्गत वर्ष 2030 तक कम-से-कम 30% निम्नीकृत पारिस्थितिक तंत्रों की प्रभावी बहाली सुनिश्चित करना अनिवार्य है। इसके लिये मानकीकृत वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के माध्यम से नियमित निगरानी और पारिस्थितिक कनेक्टिविटी (जो वर्तमान में 10% के चिंताजनक स्तर से नीचे है) को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिये।
    • बुनियादी ढाँचे के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के लिये पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और रणनीतिक पर्यावरण आकलन (SEA) का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिये। इसके साथ ही, अक्षय ऊर्जा, रैखिक बुनियादी ढाँचे और प्रदूषण के संबंध में प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS) के दिशा-निर्देशों का पालन करना भी आवश्यक है।
  • अत्यधिक दोहन से निपटना: अत्यधिक मत्स्यन और अवैध शिकार को कम करने के लिये अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाना चाहिए। इसमें मत्स्य पालन की निगरानी, मत्स्य निकायों के साथ CMS की भागीदारी और BBNJ संधि का अनुमोदन शामिल है।
    • यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि राष्ट्रीय विधियाँ CMS परिशिष्ट I में सूचीबद्ध प्रजातियों को 'पकड़ने' (Take) — जिसमें शिकार, मत्स्यन और संग्रहण शामिल है, से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करें तथा इस संबंध में मिलने वाली किसी भी छूट या अपवाद को सख्ती से विनियमित किया जाए।
  • पर्यावरण प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों को कम करना:प्रवासी प्रजातियों पर प्रदूषण के प्रभाव को कम करने के लिए प्राथमिक कार्यों में CMS द्वारा अनुमोदित दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रकाश प्रदूषण को कम करना, संवेदनशील क्षेत्रों में क्वाइटिंग टेक्नोलॉजीज़ के माध्यम से पानी के भीतर होने वाले शोर को सीमित करना तथा विषैले सीसा युक्त गोला-बारूद के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से शीघ्र समाप्त करना शामिल है। 
    • महत्त्वपूर्ण पर्यावासों के निकट कीटनाशकों का उपयोग कम करना एक अतिरिक्त उपाय है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिये समस्याग्रस्त प्लास्टिक को खत्म करना और अनावश्यक उत्पादन को कम करना भी इसमें शामिल हैं।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के शमन हेतु लक्षित पारिस्थितिक तंत्र पुनर्स्थापन के माध्यम से पर्यावास की गुणवत्ता और कनेक्टिविटी को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। इसके साथ ही, चरम मौसम की घटनाओं के जोखिम को कम करने और प्रवासन मार्गों में जलवायु-प्रेरित परिवर्तनों के अनुरूप 'डायनेमिक मैनेजमेंट' (गतिशील प्रबंधन) रणनीतियों को लागू किया जाना चाहिये।
    • यह सुनिश्चित करने के लिये कि नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना के विस्तार से प्रवासी प्रजातियों को कोई हानि न पहुँचे, CMS ऊर्जा कार्य बल के दिशा-निर्देशों का अनुपालन आवश्यक है।

निष्कर्ष:

प्रवासी प्रजातियों की संख्या में हो रही गिरावट को रोकने के लिये तत्काल और समन्वित कार्रवाई अनिवार्य है। उनके आवासों का संरक्षण, अत्यधिक दोहन और प्रदूषण से निपटना तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्राथमिकताएँ हैं। अब तक हुए सुधार यह दर्शाते हैं कि CMS (प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय) के तहत निरंतर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से, इन सीमा-पार प्रजातियों को भविष्य की पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रखना संभव है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण (CMS) में 'प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय' की भूमिका का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. प्रवासी प्रजातियों पर सम्मेलन (CMS) क्या है?
CMS या बॉन कन्वेंशन, UNEP द्वारा प्रशासित एक संधि है, जिसे वर्ष 1979 में अपनाया गया था और यह राष्ट्रीय सीमाओं के पार प्रवासी प्रजातियों एवं उनके आवासों के संरक्षण के लिये एक वैश्विक कानूनी ढाँचा प्रदान करती है।

2. CMS के अंतर्गत दो परिशिष्ट कौन-से हैं ?
परिशिष्ट I में उन लुप्तप्राय प्रवासी प्रजातियों की सूची दी गई है, जिन्हें सख्त संरक्षण की आवश्यकता है। परिशिष्ट II में उन प्रजातियों की सूची दी गई है, जिनकी संरक्षण स्थिति अनुकूल नहीं है, लेकिन जिन्हें समझौतों या समझौता ज्ञापनों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से लाभ मिलता है।

3. CMS परिशिष्ट I में कौन-कौन सी भारतीय प्रजातियाँ सूचीबद्ध हैं ?
भारत में पाई जाने वाली प्रमुख प्रजातियों में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, एशियाई हाथी, बंगाल फ्लोरिकन, साइबेरियन क्रेन, ऑलिव रिडले टर्टल, लेदरबैक टर्टल और हॉक्सबिल टर्टल शामिल हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न

प्रिलिम्स

प्रश्न. जैव विविधता के साथ-साथ मनुष्य के परंपरागत जीवन के संरक्षण के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण रणनीति निम्नलिखित में से किस एक की स्थापना करने में निहित है? (2014)

(a) जीवमंडल निचय (रिज़र्व)
(b) वानस्पतिक उद्यान
(c) राष्ट्रीय उपवन
(d) वन्यजीव अभयारण्य

उत्तर: (a)


प्रश्न. प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिये अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) तथा वन्य प्राणिजात एवं वनस्पतिजात की संकटापन्न स्पीशीज़ के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (CITES) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2015)

  1. IUCN संयुक्त राष्ट्र का एक अंग है तथा CITES सरकारों के बीच अंतर्राष्ट्रीय करार है। 
  2. IUCN प्राकृतिक वातावरण के बेहतर प्रबंधन के लिये विश्व भर में हज़ारों क्षेत्र-परियोजनाएँ चलाता है। 
  3. CITES उन राज्यों पर वैध रूप से आबद्धकर है, जो इसमें शामिल हुए हैं, लेकिन यह कन्वेंशन राष्ट्रीय विधियों का स्थान नहीं लेता है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(A) केवल 1

(B) केवल 2 और 3

(C) केवल 1 और 3

(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (B)


मेन्स:

प्रश्न. भारत में जैव विविधता किस प्रकार अलग-अलग पाई जाती है? वनस्पतिजात और प्राणिजात के संरक्षण में जैव विविधता अधिनियम, 2002 किस प्रकार सहायक है ? (2018)


सामाजिक न्याय

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026

प्रिलिम्स के लिये: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस, लखपति दीदी पहल, NaMo ड्रोन दीदी योजना, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, राष्ट्रीय महिला आयोग, मातृ मृत्यु अनुपात

मेन्स के लिये: महिला नेतृत्व वाला विकास, विकसित भारत 2047 के स्तंभ के रूप में, भारत में महिलाओं के लिये संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपाय

स्रोत: पीआईबी

चर्चा में क्यों? 

भारत ने 8 मार्च, 2026 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (IWD) मनाया, जो संयुक्त राष्ट्र की थीम ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तीकरण के लिये वास्तविक कार्रवाई’ के अनुरूप था।

  • इस अवसर पर नारी शक्ति को भारत के विकास में बदलाव का आधार बताया गया, जहाँ ‘महिलाओं के लिये विकास’ से ‘महिला नेतृत्व वाला विकास’ की ओर बढ़त हुई और महिलाओं को विकसित भारत 2047 की ओर सामाजिक-आर्थिक प्रगति के प्रमुख चालक के रूप में प्रस्तुत किया गया।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस क्या है?

  • परिचय: अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस (IWD) एक वैश्विक कार्यक्रम है, जिसे प्रतिवर्ष 8 मार्च को महिलाओं की सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक उपलब्धियों का सम्मान करने के लिये मनाया जाता है।
  • ऐतिहासिक उत्पत्ति: यह 20वीं सदी की शुरुआत में उत्तरी अमेरिका और यूरोप में श्रमिक एवं  मताधिकार आंदोलनों से शुरू हुआ।
    • अमेरिका में 1909 में सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका द्वारा पहला राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया।
    • यह विशेष तिथि 8 मार्च, 1917  (ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार) को पेत्रोग्राद, रूस में महिलाओं द्वारा किये गए बड़े हड़ताल की स्मृति में मनाई जाती है।
      • महिलाओं की ‘रोटी और शांति’ के लिये हड़ताल ने वर्ष 1917 के रूसी क्रांति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और अंततः वहाँ महिलाओं को मत देने का अधिकार प्राप्त हुआ।
    • संयुक्त राष्ट्र ने इसे पहली बार 8 मार्च, 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के दौरान आधिकारिक रूप से मनाया और संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1977 में इस दिवस को औपचारिक रूप से मान्यता दी, जिससे लिंग समानता को एक मौलिक मानव अधिकार के रूप में सुदृढ़ किया गया।
  • 2026 के लिये थीम:
    • संयुक्त राष्ट्र की थीम: ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला एवं बालिका के सशक्तीकरण के लिये वास्तविक कार्रवाई,’ जिसका फोकस सिस्टमगत बाधाओं को दूर करना तथा वैश्विक स्तर पर न्याय तक पहुँच को मज़बूत करना है।
    • अभियान की थीम:गिव टू गेन,’ इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जब समाज महिलाओं को संसाधनों की सुलभता, समय की स्वतंत्रता और उचित मार्गदर्शन प्रदान करने में निवेश करता है, तो यह केवल एक सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का आधार बन जाता है।

भारत अलग-अलग क्षेत्र में नारी शक्ति को कैसे आगे बढ़ा रहा है?

  • ज़मीनी स्तर पर आर्थिक सशक्तीकरण: यह आर्थिक रणनीति ग्रामीण महिलाओं को अवैतनिक श्रमिकों से लेकर औपचारिक माइक्रो-उद्यमियों और प्रौद्योगिकी ऑपरेटरों में बदलने पर केंद्रित है।
    • दीनदयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत, 10.05 करोड़ से अधिक ग्रामीण महिलाओं को 90 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों (SHGs) में संगठित किया गया है, जिससे यह विश्व के सबसे बड़े सामुदायिक संस्थागत नेटवर्क में से एक बन गया है।
    • लखपति दीदी पहल का लक्ष्य 6 करोड़ लखपति दीदियों का सृजन करना है, जहाँ स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ प्रशिक्षित होकर वार्षिक एक लाख रुपये से अधिक स्थायी घरेलू आय अर्जित कर सकें।
    • NaMo ड्रोन दीदी योजना के तहत स्वयं सहायता समूहों (SHGs) को कृषि ड्रोन खरीदने के लिये 80% सब्सिडी प्रदान की जाती है।
      • यह योजना ग्रामीण महिलाओं को इन अत्यंत तकनीकी उपकरणों (जैसे- तरल उर्वरक छिड़काव) को संचालित करने के लिये प्रशिक्षित करती है, जिससे वे तुरंत उच्च आय वाली ग्रामीण तकनीकी उद्यमी बन जाती हैं।
    • भारत के डेयरी क्षेत्र में महिलाएँ इसकी मज़बूत आधारशिला हैं। सभी महिला डेयरी सहकारी समितियों के बढ़ते नेटवर्क से उनकी आय सीधे बैंक खातों में जाती है और पुरुष मध्यस्थों की आवश्यकता खत्म हो जाती है।
    • प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत लगभग 70% बिना गारंटी वाले ऋण महिला नेतृत्व वाले माइक्रो-उद्यमों को दिये गए हैं।
    • स्टैंड-अप इंडिया योजना और स्टार्टअप इंडिया इकोसिस्टम के तहत, भारत में मान्यता प्राप्त 45% से अधिक स्टार्टअप्स में कम-से-कम एक महिला निदेशक या साझेदार शामिल है।
  • रक्षा क्षेत्र में सीमाओं का विस्तार: भारतीय सशस्त्र बलों ने ऐतिहासिक ग्लास सीलिंग्स को तोड़ा है और महिलाओं को प्रमुख मुकाबला तथा कमांड भूमिकाओं में शामिल किया है।
    • सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों की कुल संख्या वर्ष 2014 में लगभग 3,000 से बढ़कर वर्ष 2026 में 11,000 से अधिक हो गई है।
    • राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में महिलाओं का व्यवस्थित प्रशिक्षण यह सुनिश्चित करता है कि महिला कैडेटों को आरंभ से ही शीर्ष सैन्य नेतृत्व के लिये तैयार किया जाए।
    • सेक्रेटरी, रक्षा मंत्रालय बनाम बबीता पुनिया (2020) में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन प्रदान किया, जिससे उनके प्रमोशन और पेंशन में समानता सुनिश्चित हुई।
    • अब महिला अधिकारी सभी सेवा क्षेत्रों में स्थायी कमीशन प्राप्त कर रही हैं, नौसेना युद्धपोतों का नेतृत्व कर रही हैं, फ्रंटलाइन फाइटर पायलट के रूप में उड़ान भर रही हैं और वरिष्ठ पदों पर कार्यरत हैं, जिसमें सैन्य चिकित्सा सेवा के निदेशक जनरल भी शामिल हैं।
  • STEM में शिक्षा और नेतृत्व: उच्च शिक्षा में महिला सकल नामांकन अनुपात (GER) 2022-23 में 30.2 तक बढ़ गया, जिसका समर्थन सुकन्या समृद्धि योजना और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय जैसी योजनाओं ने किया।
    • वित्तीय वर्ष 2024–25 में STEM में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) NET-JRF स्कॉलर्स में महिलाएँ 53% से अधिक थीं, जो अनुसंधान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को दर्शाता है।
      • वर्तमान में भारत में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) के कुल स्नातकों में महिलाएँ 43% हैं, जो वैश्विक स्तर पर प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक सबसे उच्च अनुपात में से है।
    • इस गति को बनाए रखने के लिये केंद्रीय बजट 2026-27 में हर ज़िले में विशेष महिला छात्रावासों की स्थापना के लिये स्पष्ट प्रावधान किया गया है, जो छात्राओं को उन्नत तकनीकी शिक्षा आसानी से प्राप्त करने में सहायता करेंगे।
  • बुनियादी ढाँचे के माध्यम से गरिमा का संवर्द्धन: वास्तविक सशक्तीकरण के लिये उन दैनिक शारीरिक मेहनत या बोझ को कम करना आवश्यक है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से महिलाओं के समय, स्वास्थ्य और गतिशीलता को बाधित किया है।
    • प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत 10.56 करोड़ से अधिक स्वच्छ रसोई गैस कनेक्शन प्रदान किये गए हैं, जिससे महिलाओं का घातक इनडोर वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने का जोखिम काफी कम हुआ है।
    • जल जीवन मिशन ने ग्रामीण महिलाओं को जल संचयन के कठिन शारीरिक श्रम और समय लेने वाले दैनिक कार्यों को समाप्त करने में मदद की है, जिससे उन्हें शिक्षा और आर्थिक गतिविधियों के लिये समय मिला है।
    • स्वच्छ भारत मिशन के तहत 12 करोड़ से अधिक घरेलू शौचालयों के निर्माण ने स्वच्छता, मातृ स्वास्थ्य परिणामों और ग्रामीण महिलाओं की बुनियादी शारीरिक सुरक्षा एवं गरिमा में महत्त्वपूर्ण सुधार किया  है।
  • राजनीतिक एजेंसी एवं विधिक संरक्षण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम ऐतिहासिक संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिये 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, जिससे देश की सर्वोच्च विधि-निर्माण संस्थाओं में महिलाओं की प्रत्यक्ष तथा आनुपातिक भागीदारी सुनिश्चित होती है।
    • 73वाँ तथा 74वाँ संविधान संशोधन (1992) ने ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया तथा महिलाओं के लिये अनिवार्य 33% आरक्षण का प्रावधान किया, जिसके परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगभग 50% तक पहुँच गया है।
    • अनेक पश्चिमी देशों के विपरीत, भारत ने गणराज्य की स्थापना के प्रारंभ से ही महिलाओं को समान मताधिकार प्रदान किया।
    • मिशन शक्ति के अंतर्गत वन स्टॉप सेंटर तथा महिला हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से महिलाओं को चिकित्सीय, विधिक तथा परामर्श संबंधी सहायता प्रदान कर समर्थन तंत्र को सुदृढ़ किया गया है।
    • महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013 कार्यस्थलों को अधिक सुरक्षित बनाने हेतु आंतरिक समितियों के गठन को अनिवार्य बनाता है तथा शी-बॉक्स पोर्टल के माध्यम से ऑनलाइन शिकायत निवारण की व्यवस्था प्रदान करता है।
    • शायरा बानो बनाम भारत संघ (2017) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक की प्रथा को असंवैधानिक घोषित किया, जो लैंगिक न्याय की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम था।
  • स्वास्थ्य: सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) रिपोर्ट के अनुसार भारत में मातृ मृत्यु अनुपात (MMR) वर्ष 2014–16 में प्रति लाख जीवित जन्म पर 130 से घटकर वर्ष 2020–22 में प्रति लाख जीवित जन्म पर 88 हो गया है।
    • संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत का MMR प्रति लाख जीवित जन्म पर 80 है, जो 1990 के बाद से 86% की गिरावट को दर्शाता है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह कमी लगभग 48% रही है।
    • प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान तथा पोषण अभियान मातृ स्वास्थ्य देखभाल एवं पोषण सेवाओं को सुदृढ़ कर रहे हैं।
  • खेल: भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने अपने केंद्रीय अनुबंधित पुरुष एवं महिला क्रिकेटरों के लिये समान मैच शुल्क की घोषणा की है, जबकि महिला प्रीमियर लीग ने महिला खिलाड़ियों की आर्थिक सुरक्षा तथा दृश्यता को सुदृढ़ किया है।
    • ASMITA पहल के अंतर्गत देशभर में महिलाओं की खेल भागीदारी का विस्तार हो रहा है, जिसमें 33 खेल विधाओं में 2,600 लीगों के माध्यम से लगभग 3 लाख महिलाएँ भाग ले रही हैं।
      • यह कार्यक्रम भारतीय खेल प्राधिकरण तथा खेलो इंडिया के सहयोग से संचालित है, जिसका उद्देश्य ज़मीनी स्तर की प्रतिभाओं की पहचान करना तथा ओलंपिक जैसे वैश्विक आयोजनों में भारत की पदक संभावनाओं को सुदृढ़ करना है।

नोट: भारत की लैंगिक समानता के प्रति प्रतिबद्धता उसके संविधान में निहित है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध तथा महिलाओं के लिये विशेष प्रावधान की अनुमति), अनुच्छेद 16 (लोक सेवाओं में समान अवसर), अनुच्छेद 39 (जीविका के समान अवसर), अनुच्छेद 42 (मातृत्व सहायता तथा मानवीय कार्य परिस्थितियाँ) एवं अनुच्छेद 243 (स्थानीय शासन में महिलाओं के लिये आरक्षण) जैसे प्रावधान सम्मिलित हैं।

  • साथ ही, राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं से संबंधित विधिक संरक्षणों की निगरानी करता है, जबकि स्वतंत्रता के पश्चात प्रारंभ से लागू सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार भारत के लोकतंत्र में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित करता है।

नारी शक्ति को आगे बढ़ाने में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • कृषि क्षेत्र में सहभागिता, परंतु भूमि अधिकारों का अभाव: महिलाएँ कृषि कार्यबल का 70% से अधिक हिस्सा हैं, किंतु उनके स्वामित्व में केवल 13–14% कृषि भूमि ही है।
    • भूमि का स्वामित्व उनके नाम पर न होने के कारण उन्हें विधिक रूप से ‘किसान’ के रूप में मान्यता नहीं मिलती। परिणामस्वरूप वे संस्थागत ऋण, MSP खरीद तथा PM-किसान जैसे प्रत्यक्ष लाभ अंतरण से वंचित रह जाती हैं।
  • देखभाल कार्यों में असमान समय आवंटन का संकट: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के टाइम यूज़ सर्वे के अनुसार भारतीय महिलाएँ प्रतिदिन लगभग 7.2 घंटे अवैतनिक घरेलू एवं देखभाल कार्यों में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुषों के लिये यह समय लगभग 2.8 घंटे है।
    • यह देखभाल का भार महिलाओं को कौशल विकास, पुनः कौशल अर्जन तथा औपचारिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश से रोकता है, जिससे वे कम वेतन वाले, अनौपचारिक या गिग कार्यों में सीमित रह जाती हैं।
  • राजनीतिक एवं शासन संबंधी बाधाएँ: 73वें तथा 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिये आरक्षण का प्रावधान किया गया, किंतु ज़मीनी स्तर पर कई बार सरपंच पति/प्रधान पति सिंड्रोम’ देखने को मिलता है, जहाँ वास्तविक वित्तीय एवं प्रशासनिक शक्ति पुरुष रिश्तेदारों के हाथ में रहती है और निर्वाचित महिला केवल औपचारिक भूमिका निभाती है।
    • नारी शक्ति वंदन अधिनियम का क्रियान्वयन अगली जनगणना तथा परिसीमन प्रक्रिया पर निर्भर है, जिससे वास्तविक प्रतिनिधित्व कम-से-कम वर्ष 2029 तक विलंबित हो सकता है।
    • एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के आँकड़े दर्शाते हैं कि राजनीतिक दल प्रायः महिलाओं को ‘जीतने योग्य’ सामान्य सीटों पर टिकट देने से हिचकते हैं और उन्हें मुख्यतः आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों या महिला प्रकोष्ठों तक सीमित रखते हैं।
  • स्वास्थ्य एवं सामाजिक संवेदनशीलताएँ: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार भारत में 15–49 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 57% महिलाएँ एनीमिया से प्रभावित हैं।
    • इसके परिणामस्वरूप कुपोषण का अंतर्जनन चक्र, उच्च मातृ मृत्यु अनुपात (MMR), कम जन्म-भार वाले शिशु जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तथा महिलाओं की शारीरिक और संज्ञानात्मक उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
    • पुत्र वरीयता के कारण ‘पुत्री न चाहने वालों’ की एक काल्पनिक श्रेणी उत्पन्न होती है, जिसकी संख्या का अनुमान 21 मिलियन से अधिक लगाया गया है।
  • तकनीकी एवं उभरती चुनौतियाँ: GSMA मोबाइल जेंडर गैप रिपोर्ट 2024 के अनुसार भारतीय महिलाओं के पास स्मार्टफोन स्वामित्व तथा मोबाइल इंटरनेट उपयोग की संभावना पुरुषों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम है।
    • इससे उनकी डिजिटल शिक्षा, वित्तीय समावेशन तथा आधुनिक रोज़गार बाज़ारों तक पहुँच सीमित हो जाती है।
    • यद्यपि STEM डिग्रियों में लगभग 43% नामांकन महिलाओं का है, फिर भी कार्यबल में प्रवेश से पूर्व अनेक महिलाएँ बाहर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप भारत के STEM कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी लगभग 27% तथा वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यबल में लगभग 14% ही है, जो इस क्षेत्र में गंभीर लैंगिक अंतराल को दर्शाता है।
  • साइबर हिंसा एवं डीपफेक: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के अनियंत्रित विस्तार ने तकनीक के दुरुपयोग की समस्या को बढ़ाया है।
    • गैर-सहमति अंतरंग चित्र (NCII) तथा डीपफेक सामग्री का प्रसार विशेष रूप से महिलाओं को लक्षित करता है, जिससे उनके डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में सहभागिता पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • संस्थागत विफलताएँ: राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में दोषसिद्धि दर लगभग 25–26% है, जबकि न्यायिक लंबित मामलों की दर 90% से अधिक है, जो न्याय प्रदायगी में गंभीर विलंब को दर्शाती है।
    • सबसे सामान्य अपराध ‘पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा अत्याचार’ है, जो कुल मामलों के 30% से अधिक का प्रतिनिधित्व करता है और घरेलू क्षेत्र को हिंसा का प्रमुख स्थल दर्शाता है।
    • इसके अतिरिक्त सुरक्षित परिवहन, कार्यरत महिलाओं के छात्रावास तथा क्रेच सुविधाओं की कमी महिलाओं की गतिशीलता एवं कार्यबल भागीदारी को सीमित करती है।
    • कुछ परिस्थितियों में मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 के अंतर्गत अनुपालन लागत भी कुछ नियोक्ताओं को महिलाओं की भर्ती से हतोत्साहित कर सकती है।

नारी शक्ति को सशक्त बनाने हेतु कौन-से उपाय 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को प्राप्त करने में सहायता कर सकते हैं?

  • आर्थिक सशक्तीकरण: केरल के कुडुम्बश्री भूमि पट्टे मॉडल को अपनाकर महिलाओं को किसान का दर्जा, ऋण की सुविधा और प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के लाभ प्रदान करना।
    • महिलाओं द्वारा संचालित MSME के लिये स्व-सहायता समूहों से परे विस्तार करने हेतु  क्रेडिट गारंटी समर्थन बनाकर ‘मिसिंग मिडिल’ वित्तीय अंतर को पाटें।
    • केयर इकॉनमी को मान्यता और समर्थन देना, अभिभावकीय अवकाश नीतियाँ लागू करना और बाल देखभाल तथा वृद्ध देखभाल अवसंरचना में CSR निवेश का विस्तार करना।
  • उभरती हरित अर्थव्यवस्था में महिलाएँ: महिलाओं को नवीकरणीय ऊर्जा, जलवायु अनुकूलन और सतत कृषि में नौकरियों के लिये प्रशिक्षित करना, ताकि वे भारत के हरित संक्रमण में भागीदारी कर सकें।
  • शासन और राजनीतिक भागीदारी: राजनीतिक दलों को चुनावों में अधिक महिलाओं को प्रत्याशी बनाने के लिये प्रोत्साहित करना। इसके लिये भारत निर्वाचन आयोग के ढाँचे के माध्यम से चुनावों में महिला प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रोत्साहन प्रदान करना।
    • पंचायती निर्वाचित महिलाओं के लिये नेतृत्व अकादमियाँ स्थापित करना, ताकि प्रशासनिक और वित्तीय निर्णय क्षमता को सशक्त बनाया जा सके।
  • प्रौद्योगिकी और डिजिटल समावेशन: महिलाओं को डीप-टेक उद्यमिता में समर्थन देना, इसके लिये अटल इनोवेशन मिशन जैसे इन्क्यूबेशन और इनोवेशन प्लेटफॉर्म का उपयोग करना।
  • स्वास्थ्य प्रणाली सुधार: आयुष्मान आरोग्य मंदिर की सेवाओं का विस्तार करके महिलाओं में गैर-संक्रामक रोगों (NCD) की स्क्रीनिंग शामिल करना।
    • भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा दिशा-निर्देशों के माध्यम से लैंगिक-संतुलित नैदानिक अनुसंधान सुनिश्चित करना।
  • सुरक्षित शहरी क्षेत्र और न्याय: सिटी प्लानिंग में पर्यावरणीय डिज़ाइन के माध्यम से अपराध रोकथाम (CPTED) को शामिल करना, ताकि सार्वजनिक स्थलों में महिलाओं की सुरक्षा बेहतर हो।
    • महिला अपराधों के लिये विशेष पुलिस जाँच इकाइयाँ स्थापित करना, ताकि साक्ष्य संग्रह और दोषसिद्धि दरों में सुधार किया जा सके।
  • लैंगिक नीति के लिये डेटा को सशक्त बनाना: रोज़गार, डिजिटल पहुँच, भूमि स्वामित्व और स्वास्थ्य में लैंगिक-विभाजित डेटा संग्रह का विस्तार करना, ताकि साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण सुनिश्चित किया जा सके।

निष्कर्ष

वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के लक्ष्य की प्राप्ति अनिवार्य रूप से 'महिला नेतृत्व वाले विकास' की ओर एक निर्णायक और रणनीतिक बदलाव पर टिकी है। यह केवल महिलाओं के कल्याण का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की प्रगति का मुख्य चालक है। नारी शक्ति का पूर्ण उपयोग करने के लिये भारत को तुरंत अवैतनिक देखभाल का बोझ, डिजिटल विभाजन और असमान भूमि अधिकार जैसी प्रणालीगत बाधाओं को दूर करना होगा। कानूनी सुरक्षा उपायों को सख्ती से लागू करके और आधार-स्तरीय अर्थव्यवस्थाओं का विस्तार करके, लैंगिक समानता केवल नीति नहीं, बल्कि जीवन में अनुभव की जाने वाली वास्तविकता बन जाएगी।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न: महिला नेतृत्व वाला विकास भारत के 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण में केंद्रीय भूमिका रखता है। की गई प्रगति और शेष चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस कब मनाया जाता है?
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को विश्वभर में मनाया जाता है।

2. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के लिये संयुक्त राष्ट्र का विषय क्या था?
IWD 2026 के लिये संयुक्त राष्ट्र का विषय था: ‘अधिकार और न्याय के साथ-साथ हर महिला और बालिका के सशक्तीकरण हेतु वास्तविक कार्रवाई।

3. संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार आधिकारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस कब मनाया?
संयुक्त राष्ट्र ने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च, 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के दौरान आधिकारिक रूप से मनाया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1977 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस को औपचारिक रूप से मान्यता दी।

4. अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से जुड़े पारंपरिक रंग कौन-से हैं?
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से जुड़े रंग हैं: बैंगनी (न्याय और गरिमा), हरा (आशा) एवं सफेद (शुद्धता)।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न 

मेन्स 

प्रश्न 1: “महिलाओं का सशक्तीकरण जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने की कुंजी है।” विवेचना कीजिये। (2019) 

प्रश्न 2: भारत में महिलाओं पर वैश्वीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों की चर्चा कीजिये। (2015) 

प्रश्न 3: महिला संगठन को लैंगिक पूर्वाग्रह से मुक्त बनाने के लिये पुरुष सदस्यता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। टिप्पणी कीजिये। (2013)


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