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भारत के स्वास्थ्य परिदृश्य का रूपांतरण

  • 03 Feb 2026
  • 203 min read

यह लेख 01/02/2026 को द हिंदू बिजनेस लाइन में प्रकाशित ‘Health sector continues to remain neglected’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख बजट 2026 की प्राथमिकताओं के परिप्रेक्ष्य में भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की संरचनात्मक रूपरेखा, हालिया नीतिगत परिवर्तनों और लगातार मौजूद चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह लेख स्पष्ट करता है कि समान और सुदृढ़ स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त करने हेतु नवाचार-आधारित सुधारों को सतत सार्वजनिक वित्तपोषण तथा मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के साथ समन्वित करना अनिवार्य है।

प्रिलिम्स के लिये: PM-ABHIM, U-WIN पोर्टल, ABDM, PM-JAY, आयुष्मान आरोग्य मंदिर, वन हेल्थ अप्रोच।

मेन्स के लिये: भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की संरचना, स्वास्थ्य क्षेत्र में मौजूदा घटनाक्रम, प्रमुख मुद्दे और स्वास्थ्य क्षेत्र को मज़बूत करने के उपाय।

भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र एक निर्णायक मोड़ पर स्थित है, जो वृद्ध होती जनसंख्या, गैर-संक्रामक रोगों में वृद्धि और महामारी के बाद सार्वजनिक प्रणालियों पर बढ़ते दबाव से प्रभावित है। यद्यपि हालिया नीतिगत संकेत नवाचार, बायोफार्मा तथा कुशल स्वास्थ्य कार्यबल पर जोर देते हैं तथापि सार्वजनिक स्वास्थ्य वित्तपोषण और प्राथमिक देखभाल को संरचनात्मक रूप से कम महत्त्व दिया जा रहा है। जेब से होने वाला लगातार उच्च व्यय और क्षेत्रीय असमानताएँ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, वहनीयता तथा निवारक देखभाल में विद्यमान कमियों को उजागर करती हैं। घोषणा-आधारित सुधारों से व्यय-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य सुदृढ़ीकरण की दिशा में निर्णायक परिवर्तन अब अपरिहार्य हो गया है।

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के लिये वर्तमान नियामक ढाँचा क्या है? 

  • संवैधानिक आधार: भारत का संविधान स्वास्थ्य विनियमन की नींव रखता है और सातवीं अनुसूची के माध्यम से शक्तियों का वितरण करता है।
    • राज्य सूची (सूची II): ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता, अस्पताल तथा औषधालय’ (प्रविष्टि 6) मुख्य रूप से राज्य का विषय है। सेवाओं के वितरण के लिये राज्य ज़िम्मेदार है।
    • समवर्ती सूची (सूची III): केंद्र और राज्य दोनों निम्नलिखित विषयों पर कानून बना सकते हैं:
      • चिकित्सा शिक्षा और पेशा (प्रविष्टि 26)।
      • संक्रामक रोगों के प्रसार की रोकथाम (प्रविष्टि 29)।
      • औषधियाँ और विष (प्रविष्टि 19)।
  • मौलिक अधिकार और DPSP:
    • अनुच्छेद 21: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है कि इसमें स्वास्थ्य का अधिकार, जीवन के अधिकार का एक भाग शामिल है।
    • अनुच्छेद 47: राज्य को निर्देश देता है कि वह अपने लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को अपने प्राथमिक कर्त्तव्यों में से एक माने।
    • प्रमुख नियामक निकाय: संस्थागत ढाँचा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) द्वारा संचालित है, जिसे विभिन्न स्वायत्त तथा वैधानिक निकायों का समर्थन प्राप्त है।

निकाय

मुख्य दायित्व

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग

इसने भारतीय चिकित्सा परिषद का स्थान लिया है और चिकित्सा शिक्षा, चिकित्सा अभ्यास तथा नैतिकता को विनियमित करता है (NMC अधिनियम, 2019 के तहत)।

केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन

औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के अंतर्गत औषधियों तथा चिकित्सा उपकरणों के लिये राष्ट्रीय नियामक निकाय, जो नई औषधियों एवं नैदानिक परीक्षणों को अनुमोदित करता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण

खाद्य पदार्थों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये उनके निर्माण, भंडारण, वितरण, बिक्री और आयात को विनियमित करना।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (NHA)

आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY) और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के कार्यान्वयन के लिये शीर्ष निकाय।

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण

नियंत्रित थोक औषधियों और निर्माणों का मूल्य तय/संशोधित करना, औषधियों का मूल्य तथा उपलब्धता लागू कराना।

भारतीय नर्सिंग परिषद

नर्सिंग शिक्षा और मानकों का नियमन।

  • विधायी ढाँचा: स्वास्थ्य क्षेत्र कई महत्वपूर्ण अधिनियमों द्वारा नियंत्रित है, जो अनुपालन और मानकों की रूपरेखा निर्धारित करते हैं।
    • औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (और नियम 1945): फार्मा विनियमन की आधारशिला। यह औषधियों तथा प्रसाधन सामग्री के आयात, निर्माण, वितरण एवं बिक्री के लिये व्यापक नियामक ढाँचा स्थापित करता है।
    • राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग अधिनियम, 2019: इसने चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र में सुधार किया, राष्ट्रीय निकास परीक्षा (NExT) की शुरुआत की और निजी कॉलेजों के लिये शुल्क संरचना को विनियमित किया।
    • नैदानिक स्थापन (रजिस्ट्रीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010: इसका उद्देश्य सभी नैदानिक स्थापन प्रक्रियाओं को पंजीकृत करना और सुविधाओं तथा सेवाओं के लिये न्यूनतम मानक निर्धारित करना है। 
      • इसका कार्यान्वयन राज्यों द्वारा अपनाने पर निर्भर होने के कारण असमान है।
    • मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम (MHA), 2017: यह आत्महत्या के प्रयासों को अपराध की श्रेणी से बाहर करता है और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का अधिकार सुनिश्चित करता है।
    • महामारी रोग अधिनियम, 1897 (संशोधित 2020): सरकार को खतरनाक महामारी रोगों के प्रसार को नियंत्रित करने के लिये विशेष उपाय करने का अधिकार प्रदान करता है; COVID-19 के दौरान इसका व्यापक रूप से उपयोग किया गया।
    • नई औषधि एवं नैदानिक ​​परीक्षण (NDCT) नियम, 2019: इसने नई औषधियों और नैदानिक अनुसंधान के लिये नियमों को सुव्यवस्थित तथा आधुनिक बनाया।
      • केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गैर-वाणिज्यिक अनुसंधान मात्राओं के लिये पूर्व सूचना प्रणाली के साथ CDSCO परीक्षण लाइसेंस की आवश्यकता को प्रतिस्थापित करके औषधि अनुसंधान को आसान बनाने के लिये नए औषधि और नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 में संशोधन किया है, जबकि उच्च जोखिम वाली औषधियाँ (साइटोटॉक्सिक, मादक, मनोरोगी) लाइसेंस के अधीन रहेंगी।
  • राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य देखभाल व्यवसाय आयोग अधिनियम, 2021: संबद्ध स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की शिक्षा तथा अभ्यास को मानकीकृत करता है।

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रमुख प्रगति क्या है?

  • बायो फार्मा शक्ति एवं अनुसंधान-केंद्रित दृष्टिकोण: सरकार ने ‘बायो फार्मा शक्ति’ पहल के माध्यम से जेनेरिक औषधियों के उत्पादन से ध्यान हटाकर उच्च मूल्य वाले नवाचारों पर ध्यान केंद्रित करने हेतु संरचनात्मक परिवर्तन किया है।
    • इस कदम का उद्देश्य वैश्विक बायोलॉजिक्स बाज़ार में प्रभुत्व स्थापित करना और आयातित जटिल उपचारों पर निर्भरता को कम करना है, जो फार्मास्युटिकल मूल्य शृंखला में मात्रा से मूल्य नेतृत्व की ओर संक्रमण का संकेत देता है।
    • इससे लगभग 10,000 करोड़ रुपये के निवेश के साथ जैविक औषधियों और जैव-सदृश औषधियों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलने की संभावना है (बजट 2026-27)।
      • इसमें तीन नए राष्ट्रीय औषध विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (NIPER) की स्थापना, सात मौजूदा NIPER का उन्नयन, बायोफार्मा-केंद्रित नेटवर्क का विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण और मान्यता प्राप्त क्लिनिकल परीक्षण स्थलों को सुदृढ़ करना शामिल है, ताकि भारत को मूल्य शृंखला में ‘मात्रा’ से ‘मूल्य’ की ओर अग्रसर किया जा सके।
  • आयुष्मान भारत का ‘सिल्वर इकोनॉमी’ के लिये विस्तार: समावेशिता के एक बड़े अभियान के तहत, सरकार ने वृद्धों के लिये स्वास्थ्य पहुँच को कार्यान्वित किया है और बढ़ती उम्र की आबादी में बीमारियों के उच्च बोझ को कम करने के लिये पात्रता को आय की स्थिति से अलग कर दिया है। 
    • वरिष्ठ नागरिकों के लिये इस सार्वभौमिक व्यवस्था से स्वास्थ्य संबंधी अत्यधिक व्यय में कमी आएगी, जिसने ऐतिहासिक रूप से लाखों पेंशनभोगी परिवारों को गरीबी की स्थिति में धकेला था।
    • बजट 2026-27 में आयुष्मान भारत PM-JAY योजना के तहत लगभग 6 करोड़ वरिष्ठ नागरिकों (4.5 करोड़ परिवारों से संबंधित) के लिये सार्वभौमिक स्वास्थ्य पहुँच की पुनः पुष्टि की गई।
      • इसके अतिरिक्त, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय का 2026-27 के लिये आवंटन, वित्त वर्ष 2025-26 की तुलना में लगभग 10% बढ़ा दिया गया है।
  • मेडटेक आत्मनिर्भरता एवं PLI परिपक्वता: मेडिकल डिवाइस क्षेत्र में उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने व्यावसायिक मान्यता प्रदान करना शुरू कर दिया है, जिससे आवश्यक उपकरणों के आयात पर निर्भरता कम हुई है।
    • इस रणनीतिक स्थानीयकरण से स्वास्थ्य सेवा वितरण की लागत कम होती है और वैश्विक व्यवधानों से आपूर्ति शृंखलाओं को सुरक्षित किया जाता है, जिससे भारत मेडटेक निर्यात केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर है।
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक 22 ग्रीनफील्ड परियोजनाओं ने 55 से अधिक उच्च-स्तरीय उपकरणों (CT/MRI स्कैनर) का उत्पादन शुरू किया।
      • इसके अलावा, बजट 2026 में घटकों पर सीमा शुल्क में कटौती से घरेलू मूल्यवर्द्धन को प्रोत्साहन मिलता है।
  • कैंसर और दुर्लभ रोगों हेतु लागत न्यूनीकरण: कैंसर उपचार की वित्तीय जटिलता को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने सीमा शुल्क को युक्तिसंगत कर वित्तीय हस्तक्षेप किया है, जिससे जीवन रक्षक इम्यूनोथेरेपी की लागत सीधे कम हुई है।
    • बजट 2026-27 में 17 कैंसर औषधियों (जैसे, Ribociclib और Brigatinib) तथा दुर्लभ बीमारियों की औषधियों को सीमा शुल्क से मुक्त किया गया। इसके साथ ही प्रत्येक ज़िला अस्पताल में नए ट्रॉमा सेंटर स्थापित किये गए हैं।
    • बजट 2026-27 में 17 कैंसर की औषधियों (जैसे, रिबोसिक्लिब और ब्रिगाटिनिब ) तथा दुर्लभ रोगों की औषधियों को सीमा शुल्क से छूट दी गई है। इसके साथ ही प्रत्येक ज़िला अस्पताल में नए ट्रॉमा सेंटर स्थापित किये गए हैं।
  • बाह्य रोगी एवं निवारक देखभाल की ओर संरचनात्मक परिवर्तन: आर्थिक समीक्षा 2025-26 एक निर्णायक मोड़ को उजागर करती है, जहाँ आयुष्मान आरोग्य मंदिर (AAM) के संचालन के कारण बाह्य रोगी देखभाल (OPD) और स्क्रीनिंग की दर, अस्पताल में भर्ती रोगियों की तुलना में अधिक तीव्रता से बढ़ रही है।
    • ‘बीमारी की देखभाल’ से ‘स्वास्थ्य’ की ओर यह परिवर्तन गैर-संक्रामक रोगों (NCD) का शीघ्र पता लगाकर तृतीयक अस्पतालों पर दीर्घकालिक भार को कम करता है।
    • आर्थिक समीक्षा 2025-26 में 42.66 करोड़ टेलीकंसल्टेशन और AAM (दिसंबर 2025) के माध्यम से 506 करोड़ से अधिक रोगियों के आगमन का उल्लेख किया गया है।
  • यू-विन पोर्टल के माध्यम से टीकाकरण का डिजिटलीकरण: Co-WIN की सफलता को दोहराते हुए, यू-विन पोर्टल के पूर्ण कार्यान्वयन ने सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (UIP) को डिजिटाइज़ किया है, जिससे माताओं और बच्चों की वास्तविक समय में ट्रैकिंग सुनिश्चित होती है।
    • यू-विन क्यूआर-आधारित, कभी भी सुलभ टीकाकरण प्रमाणपत्र, स्वचालित SMS रिमाइंडर और ABHA-लिंक्ड एकीकरण के माध्यम से वास्तविक समय में निगरानी सुनिश्चित करता है, जिससे बच्चे के टीकाकरण डेटा को आजीवन स्वास्थ्य रिकॉर्ड में समाहित किया जा सके।
    • यह डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचनाशून्य-खुराक’ वाले बच्चों की समस्या समाप्त करती है और पोर्टेबल टीकाकरण रिकॉर्ड प्रदान करती है, जो भारत के प्रवासी कामगारों के लिये महत्त्वपूर्ण है।
    • वर्ष 2026 की शुरुआत तक, यू-विन ने 27.7 करोड़ वैक्सीन खुराक और 7.43 करोड़ लाभार्थियों का रिकॉर्ड दर्ज किया है।
  • सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन: वर्ष 2047 तक सिकल सेल रोग (SCD) को समाप्त करने का मिशन, जनजातीय क्षेत्रों में आक्रामक कार्यान्वयन के साथ आनुवंशिक परामर्श को बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग के साथ एकीकृत करता है।
    • यह जैव-सामाजिक हस्तक्षेप जनजातीय क्षेत्रों में ऐतिहासिक स्वास्थ्य उपेक्षा को संबोधित करता है, जिसमें वैज्ञानिक जाँच को सामुदायिक स्तर पर कार्ड वितरण के साथ जोड़ा गया है।
    • जुलाई 2025 तक चिह्नित जनजातीय बहुल राज्यों में 6.07 करोड़ से अधिक स्क्रीनिंग की जा चुकी है।
  • गहन चिकित्सा अवसंरचना सुधार (PM-ABHIM): बजट 2026 में PM आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (PM-ABHIM) के लिये धनराशि बढ़ाई गई है, ताकि देश को महामारी से सुरक्षित बनाया जा सके।
    • इसका मुख्य उद्देश्य गहन देखभाल केंद्रों और एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं का विकेंद्रीकृत नेटवर्क स्थापित करना है, जिससे भविष्य में होने वाले प्रकोपों का प्रबंधन महानगरों या राजधानियों के बजाय ज़िला स्तर पर किया जा सके।
      • उदाहरण के लिये, बजट 2026 में पीएम-अभिम के लिये ₹4,770 करोड़ आवंटित किये गए हैं (जो 67.6% की वृद्धि है)। 

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र संबंधित प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • दीर्घकालिक अपर्याप्त निधि और सार्वजनिक व्यय में स्थिरता: हाल ही में बजट में वृद्धि के बावजूद, भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय वैश्विक समकक्षों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम बना हुआ है, जिससे निजी क्षेत्र पर निर्भरता बढ़ जाती है जो असमानता को और बढ़ा देती है। 
    • इस संरचनात्मक अपर्याप्त वित्त पोषण से महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढाँचे के विस्तार में बाधा उत्पन्न होती है, जिससे लाखों लोगों के लिये ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ एक व्यावहारिक वास्तविकता के बजाय एक आकांक्षा बनकर रह जाता है।
      • उदाहरण के लिये GDP के प्रतिशत के रूप में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य आवंटन 0.37% (2020-21 वास्तविक व्यय) से घटकर 0.29% (2025-26 अनुमानित व्यय) हो गया है।
  • मध्यम वर्ग और आउट ऑफ पॉकेट एक्सपेंडीचर (OOPE): जहाँ आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाएँ सबसे गरीब लोगों को कवर करती हैं और निजी बीमा अमीरों को सुरक्षा प्रदान करता है, वहीं मध्यम वर्ग को अस्पताल में भर्ती होने पर वित्तीय संकट का सामना करता है।
    • बाह्य रोगी देखभाल और निदान की उच्च लागत, जो अक्सर बीमा द्वारा कवर नहीं की जाती, प्रतिवर्ष लाखों लोगों को गरीबी की ओर धकेलती रहती है। 
    • NHA 2021-22 के अनुसार, कुल स्वास्थ्य व्यय का 39.4% अभी भी OOPE है (पहले 62.6% था)।
  • ग्रामीण-शहरी विभाजन: ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का भौतिक विस्तार तो हुआ है, लेकिन यह ‘खोखले’ कार्यबल से ग्रस्त है, जहाँ सुविधाएँ तो मौजूद हैं लेकिन उनका कोई उपयोग नहीं हो रहा है। 
    • रेफरल चेन का विफल होना ग्रामीण मरीजों को स्थानीय केंद्रों को छोड़कर शहरी अस्पतालों में जाने के लिये बाध्य करता है, जिससे तृतीयक देखभाल केंद्रों में भीड़भाड़ बढ़ जाती है, जबकि ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) वीरान पड़े रहते हैं।
      • ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी 2022-23 के अनुसार, ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों (सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ) की लगभग 80% कमी है, जहाँ आवश्यकता की तुलना में 17,551 पद रिक्त हैं।
  •  गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) की मौन महामारी: भारत एक तीव्र महामारी विज्ञान संबंधी संक्रमण से गुजर रहा है जहाँ मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों का बोझ उनके उपचार की प्रणाली की क्षमता से कहीं अधिक बढ़ रहा है। 
    • यह दोहरा रोग भार दीर्घकालिक, महँगी और पारंपरिक देखभाल की आवश्यकता उत्पन्न करता है, जिसे वर्तमान सार्वजनिक प्रणाली सॅंभालने में सक्षम नहीं।
    • ICMR-INDIAB-17 राष्ट्रीय क्रॉस-सेक्शनल अध्ययन के अनुमानों के अनुसार, भारत में मधुमेह और प्री-डायबिटीज़ की व्यापकता क्रमशः 101 मिलियन और 136 मिलियन है।
  • नियामक असफलताएँ और ‘विश्व की फार्मेसी’ संकट: अच्छी विनिर्माण प्रथाओं (GMP) के कमज़ोर प्रवर्तन और खंडित राज्य-स्तरीय विनियमन के कारण एक विश्वसनीय औषधि निर्यातक के रूप में भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा अस्तित्वगत खतरे का सामना कर रही है।
    • निर्यात किये जाने वाले सिरप में जहरीले संदूषकों की बार-बार हुई घटनाओं ने कठोर गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्थागत कमी और लापरवाह निर्माताओं के लिये दंडात्मक जवाबदेही के अभाव को उजागर किया है।
    • गाम्बिया, उज़्बेकिस्तान और मध्य प्रदेश (2025) जैसे भारतीय राज्यों में डायथिलीन ग्लाइकॉल (DEG) युक्त भारतीय कफ सिरप से जुड़ी हाल की मौतों ने WHO को अलर्ट जारी करने और CDSCO को कार्रवाई करने के लिये प्रेरित करने का काम किया है।
  • एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR)– सुपरबग टाइम बम: एंटीबायोटिक औषधियों की अंधाधुंध, अनियंत्रित ओवर-द-काउंटर बिक्री और अस्पतालों में कमज़ोर संक्रमण नियंत्रण ने भारत को सुपरबग का केंद्र बना दिया है।
    • यह प्रतिरोध जीवन रक्षक औषधियों को अप्रभावी बना देता है, जिससे साधारण सर्जरी या संक्रमण भी घातक हो सकते हैं और दशकों की चिकित्सा प्रगति व्यर्थ हो सकती है।
  • ICMR (2024) के निष्कर्ष बताते हैं कि एस्चेरिचिया कोली और क्लेबसिएला न्यूमोनिया प्रमुख रोगजनक हैं जिनमें खतरनाक रूप से उच्च प्रतिरोध क्षमता है, जबकि गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में एसीनेटोबैक्टर बाउमानी कई एंटीबायोटिक वर्गों के प्रति उच्च स्तर का प्रतिरोध दिखाता है।
  • कार्यबल वितरण में असंतुलन और मानव संसाधन की कमी: डॉक्टरों और जनसंख्या का अनुपात अक्सर क्षेत्रीय असमानताओं को छिपा देता है, क्योंकि चिकित्सा पेशेवर धनी शहरी क्षेत्रों में केंद्रित हो जाते हैं, जिससे भीतरी इलाकों के विशाल क्षेत्र स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाते हैं।
    • यह कमी केवल डॉक्टरों की ही नहीं है, बल्कि नर्सों और तकनीशियनों जैसे महत्त्वपूर्ण सहायक स्वास्थ्य पेशेवरों की भी है जो रोगी देखभाल का आधार हैं।
    • भारत में डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात 1:834 (आयुष प्रणाली सहित) बताया जाता है, लेकिन राज्यों में यह अंतर बहुत अधिक है; उदाहरणतः बिहार और उत्तर प्रदेश केरल से पीछे हैं।
  • डिजिटल स्वास्थ्य संबंधी कमियाँ और डेटा गोपनीयता चिंताएँ: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के आक्रामक प्रयासों को एक डिजिटल विभाजन” का सामना है, जहाँ डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट तक सीमित पहुँच सबसे कमज़ोर वर्गों को लाभों से वंचित करती है।
    • लगभग 79 करोड़ ABHA ID बनाए जाने के बावजूद (अगस्त 2025), इंटरनेट की कमी के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य रिकॉर्ड का वास्तविक उपयोग कम है।
    • इसके अतिरिक्त, गोपनीयता संबंधी चिंताएँ भी सामने आई हैं। AIIMS रैंसमवेयर हमला (2022) ने अखिल भारतीय आयुर्वेद विज्ञान संस्थान (AIIMS) के सर्वर अवसंरचना को कमज़ोर बना दिया, जिससे महत्त्वपूर्ण सेवाओं को मैन्युअल संचालन के लिये मजबूर होना पड़ा।

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को मज़बूत करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • भौतिक-आधारित व्यापक प्राथमिक देखभाल को क्रियान्वित करना: हमें आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को महज भौतिक चौकियों से उन्नत करके ऐसे भौतिक-आधारित केंद्रों में बदलने की आवश्यकता है जो टेली-स्पेशलिस्ट परामर्श के लिये एकीकृत स्वास्थ्य इंटरफेस (UHI) का उपयोग करते हुए समुदाय के साथ उच्च स्तरीय समन्वय बनाए रखें। 
    • जहाँ प्राथमिक देखभाल रेफरल के आधार पर तृतीयक देखभाल तक अभिगम्यता सुनिश्चित की जाती है, वहाँ एक सख्त ‘गेटकीपिंग’ तंत्र लागू किया जाना चाहिये, जिससे बड़े अस्पतालों पर भीड़ कम हो तथा उपचारात्मक स्वास्थ्य के बजाय निवारक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित किया जा सके। यह हाइब्रिड मॉडल ज़मीनी स्तर पर AI-सहायता प्राप्त निदान का लाभ उठाकर पुरानी गैर-संक्रामक बीमारियों (NCD) के लिये निरंतर देखभाल सुनिश्चित करता है।
  • गुणवत्तापूर्ण और लागत-प्रभावी स्वास्थ्य सेवा के लिये सार्वजनिक बीमा का लाभ उठाना: सरकार को एक निष्क्रिय भुगतानकर्त्ता की भूमिका से परे एक ‘रणनीतिक क्रेता’ की भूमिका निभानी चाहिये और PM-JAY योजना के व्यापक दायरे का उपयोग करके निजी प्रदाताओं से उच्च-गुणवत्ता वाली, लागत-प्रभावी सेवाएँ प्राप्त करने को बाध्य करना चाहिये।
    • इसमें ‘शुल्क-आधारित सेवा’ मॉडल से हटकर ‘मूल्य-आधारित देखभाल’ भुगतान की ओर बढ़ना शामिल है, जहाँ प्रदाताओं को किये गए प्रक्रियाओं की संख्या के बजाय रोगी के स्वास्थ्य परिणामों के आधार पर प्रोत्साहन दिया जाता है। 
    • इस तरह के वित्तीय उत्तोलन से कठोर विधायी प्रतिबंध लगाए बिना निजी क्षेत्र में मूल्य निर्धारण पारदर्शिता और मानकीकरण को विनियमित किया जा सकता है।
  • समर्पित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर का विधान: नैदानिक विशेषज्ञों पर बोझ कम करने के लिये, भारत को एक विशेष, गैर-नैदानिक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर (PHMC) के निर्माण की आवश्यकता है जो केवल प्रशासन, महामारी विज्ञान एवं लॉजिस्टिक्स के लिये ज़िम्मेदार हो। 
    • इस प्रशासनिक विभाजन से डॉक्टरों को पूरी तरह से नैदानिक उपचार पर ध्यान केंद्रित करने की सुविधा मिलती है, जबकि पेशेवर प्रबंधक आपूर्ति शृंखला, अस्पताल संचालन और डेटा विश्लेषण का प्रबंधन करते हैं। 
    • यह संरचनात्मक सुधार ज़िला स्तर पर स्वास्थ्य प्रशासन को पेशेवर बनाने और स्वास्थ्य आपात स्थितियों के दौरान संसाधनों के कुशल उपयोग को सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है।
  • एक ‘स्वास्थ्य’ शासन संरचना को संस्थागत रूप देना: भारत को मानव स्वास्थ्य देखभाल की अलग-थलग व्यवस्था से आगे बढ़कर एक एकीकृत ‘एक स्वास्थ्य’ निगरानी प्रणाली स्थापित करनी चाहिये जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य डेटा को एकीकृत करके पशुओं से फैलने वाली बीमारियों की घटनाओं का पूर्वानुमान लगा सके। 
    • इसके लिये वैधानिक अंतर-मंत्रालयी निकायों की स्थापना की आवश्यकता है जो कृषि और शहरी नियोजन क्षेत्रों में रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) की रोकथाम एवं वेक्टर नियंत्रण के लिये समन्वित प्रोटोकॉल को लागू कर सकें। 
    • जलवायु परिवर्तन के प्रति समुत्थानशील स्वास्थ्य अवसंरचना बनाने के लिये इस समन्वय को सुदृढ़ करना महत्त्वपूर्ण है, जो उभरते रोगजनकों और पारिस्थितिक गिरावट के दोहरे खतरों का सामना कर सके।
  • संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों (AHP) को कार्यभार सौंपना: डॉक्टर-मरीज़ अनुपात में सुधार लाने के लिये के लिये सक्रिय ‘कार्य-स्थानांतरण’ की आवश्यकता है, जहाँ नर्स प्रैक्टिशनर और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (CHO) जैसे मध्य-स्तरीय प्रदाताओं को नियमित नैदानिक कार्यों के प्रबंधन के लिये कानूनी रूप से सशक्त बनाया जाता है। 
    • संबद्ध एवं स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों के कार्यक्षेत्र को स्पष्ट रूप से परिभाषित एवं विस्तारित करके, यह प्रणाली प्राथमिक जाँच के लिये फार्मासिस्टों, नेत्र विशेषज्ञों और फिजियोथेरेपिस्टों की अप्रयुक्त क्षमता का उपयोग कर सकती है। इससे देखभाल वितरण का विकेंद्रीकरण होता है तथा यह सुनिश्चित होता है कि उच्च विशिष्ट चिकित्सा प्रतिभा जटिल एवं गंभीर मामलों के लिये ही आरक्षित रहे।
  • जैव-सुरक्षा आपूर्ति शृंखला का स्वदेशीकरण: राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा को मज़बूत करने के लिये उच्च स्तरीय चिकित्सा उपकरणों और फार्मास्यूटिकल्स के लिये प्रमुख प्रारंभिक सामग्रियों (KSM) के घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करके आयात-आधारित आपूर्ति शृंखलाओं पर निर्भरता को कम करना आवश्यक है।
    • नीतिगत ध्यान ‘स्वास्थ्य संप्रभुता’ की ओर केंद्रित होना चाहिये, जिसके लिये समर्पित मेडटेक पार्क स्थापित किये जाएँ तथा जीनोमिक्स और बायोलॉजिक्स में स्वदेशी नवाचार को बढ़ावा देने वाले खरीद संबंधी अनिवार्यताओं को लागू किया जाए। इससे एक आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा जो वैश्विक भू-राजनीतिक उथल-पुथल या व्यापार नाकाबंदी के दौरान आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति को बनाए रखने में सक्षम होगा।
  • उपेक्षित समूहों के लिये शहरी स्वास्थ्य मिशन: ग्रामीण स्वास्थ्य के विपरीत, भारत की शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना खंडित है, इसलिये, शहरी झुग्गी-झोपड़ियों और प्रवासी समूहों को लक्षित करने वाला एक समर्पित शहरी स्वास्थ्य मिशन संरचनात्मक रूप से महत्त्वपूर्ण है। 
    • इसमें शहरों के भीतर ‘स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशील क्षेत्रों’ का मानचित्रण करना शामिल है ताकि मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों एवं इवनिंग क्लीनिकों को तैनात किया जा सके जो कामकाज़ी वर्ग के उन लोगों की जरूरतों को पूरा कर सकें, जो दिन के समय OPD तक नहीं पहुँच सकते। इन इकाइयों को नगरपालिका निगरानी प्रणाली के साथ एकीकृत करने से उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में महामारी विज्ञान संबंधी बदलावों पर नज़र रखने में सहायता मिलती है, जहाँ संक्रामक रोग सबसे तेज़ी से फैलते हैं।
  • डिजिटल सॉवरेनिटी और अंतर-संचालनीय स्वास्थ्य डेटा: आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM) के कार्यान्वयन में निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों और सार्वजनिक सुविधाओं के बीच डेटा विखंडन को समाप्त करने के लिये ‘अंतर-संचालनीयता’ को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाना आवश्यक है।
    • मानकीकृत इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड (EHR) को अनिवार्य बनाकर और एक एकीकृत स्वास्थ्य डेटा आर्किटेक्चर बनाकर, राज्य संवेदनशील डेटा को केंद्रीकृत किये बिना रोगियों के दीर्घकालिक इतिहास की ट्रैकिंग को सक्षम कर सकता है। 
      • यह डेटा-आधारित दृष्टिकोण नीति निर्माताओं को रियल टाइम एनालिसिस के साथ सशक्त बनाता है ताकि वे स्थिर ऐतिहासिक अनुमानों के बजाय क्षेत्रीय रोग भार के आधार पर संसाधनों को गतिशील रूप से आवंटित कर सकें।

निष्कर्ष: 

भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को आकस्मिक रोग-उपचार उन्मुख दृष्टिकोण से आगे बढ़ाकर सहकारी संघवाद पर आधारित सुदृढ़ एवं निवारक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की ओर एक मौलिक रूपांतरण की आवश्यकता है। पर्याप्त सार्वजनिक वित्तपोषण, कार्यबल का युक्तिसंगत नियोजन तथा प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की प्रभावी निगरानी असमानताओं और अत्यधिक व्यय को न्यूनतम करने के लिये अनिवार्य हैं। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्वदेशी नवाचार तथा एक स्वास्थ्य शासन का उपयोग कर स्वास्थ्य सेवा वितरण को भविष्य के प्रति सुरक्षित बनाया जा सकता है। अंततः स्वास्थ्य को केवल सामाजिक व्यय के रूप में नहीं, बल्कि भारत के जनांकिकीय लाभांश हेतु आधारभूत आर्थिक अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिये।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र विस्तारित पहुँच के साथ-साथ स्थायी असमानताओं के विरोधाभास को प्रतिबिंबित करता है। भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की संरचनात्मक रूपरेखा का परीक्षण कीजिये और विश्लेषण कीजिये कि दीर्घकालिक अपर्याप्त वित्तपोषण तथा संघीय असमानताएँ किस प्रकार सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण की प्रभावशीलता को सीमित करती हैं।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. भारत में स्वास्थ्य मुख्यतः राज्य का विषय क्यों है?
क्योंकि लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता राज्य सूची (सातवीं अनुसूची) के अंतर्गत आते हैं, जिससे सेवा वितरण की प्राथमिक ज़िम्मेदारी राज्यों पर होती है।

प्रश्न 2. भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमज़ोरी क्या है?
दीर्घकालिक अपर्याप्त वित्तपोषण, जिसमें सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 2% के आसपास स्थिर बना हुआ है।

प्रश्न 3. आयुष्मान भारत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रावधान से किस प्रकार भिन्न है?
यह अस्पताल में भर्ती के लिये वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है, किंतु सुदृढ़ प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल और निवारक उपायों का स्थानापन्न नहीं हो सकता।

प्रश्न 4. भारत के लिये एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध एक गंभीर खतरा क्यों है?
क्योंकि अंतिम उपाय के रूप में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक औषधियाँ तीव्र गति से अपनी प्रभावशीलता खो रही हैं, जिससे सामान्य संक्रमणों के घातक होने का खतरा बढ़ रहा है।

प्रश्न 5. स्वास्थ्य सुधारों में आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की क्या भूमिका है?
ये उपचारात्मक देखभाल से हटकर निवारक देखभाल की ओर परिवर्तन को प्रोत्साहित करते हैं, जिससे गैर-संचारी रोगों (NCD) की शीघ्र जाँच और निरंतर देखभाल संभव हो पाती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-से 'राष्ट्रीय पोषण मिशन' (नेशनल न्यूट्रिशन मिशन) के उद्देश्य हैं? (2017) 

  1. गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में कुपोषण संबंधी जागरूकता उत्पन्न करना। 
  2. छोटे बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में रक्ताल्पता को कम करना। 
  3. बाजरा, मोटे अनाज और अपरिष्कृत चावल के उपभोग को बढ़ाना। 
  4. मुर्गी के अंडों के उपभोग को बढ़ाना।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1, 2 और 3
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4

उत्तर: a


मेन्स

प्रश्न. "एक कल्याणकारी राज्य की नैतिक अनिवार्यता के अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य संरचना धारणीय विकास की एक आवश्यक पूर्व शर्त है।" विश्लेषण कीजिये। (2021)

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