जैव विविधता और पर्यावरण
भारत की आर्द्रभूमियों का संरक्षण
- 02 Feb 2026
- 233 min read
यह लेख 30/01/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “Conserving wetlands to nurture nature, society” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में आर्द्रभूमियों को भारत की महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक आधारभूत संरचना के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो जैव विविधता, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन-क्षमता सुनिश्चित करती हैं। यह नीतिगत पहलों, समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण और सतत आर्द्रभूमि प्रबंधन को बाधित करने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है।
प्रिलिम्स के लिये: मिशन लाइफ, मिष्टी योजना, मिशन सहभागिता, अमृत धरोहर योजना
मेन्स के लिये: आर्द्रभूमि का महत्त्व, आर्द्रभूमि के संरक्षण हेतु किये गए उपाय, उनके संरक्षण में चुनौतियाँ, आवश्यक उपाय।
आर्द्रभूमियाँ पृथ्वी की कुल स्थलीय सतह का केवल एक छोटा-सा भाग आच्छादित करती हैं, फिर भी वे वैश्विक जैव विविधता के बड़े हिस्से का पोषित करती हैं और बाढ़ नियंत्रण तथा जलवायु संतुलन जैसी महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी सेवाएँ प्रदान करती हैं। हिमालयी झीलों से लेकर तटीय मैंग्रोव वनों तक, भारत का सांस्कृतिक विकास इन्हीं पारिस्थितिक तंत्रों के आधार पर आकार ग्रहण करता रहा है। इस पारिस्थितिकी महत्त्व को रेखांकित करते हुए, भारत ने अपने रामसर स्थलों की संख्या वर्ष 2014 में 26 से बढ़ाकर 2026 तक 98 कर दी है, जो कुल मिलाकर 1,384,140 हेक्टेयर क्षेत्र में विस्तृत हैं (एशिया में सर्वाधिक)। यह प्रवृत्ति सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप, समुदाय-आधारित और संस्कृति-एकीकृत आर्द्रभूमि प्रबंधन की दिशा में नीतिगत परिवर्तन को दर्शाती है।
भारत के लिये आर्द्रभूमि का क्या महत्त्व है?
- भूजल सुरक्षा एवं शहरी बाढ़ न्यूनीकरण: आर्द्रभूमियाँ भारत के तीव्र शहरीकरण परिदृश्य में प्राकृतिक 'स्पंज' के रूप में कार्य करती हैं, जो अत्यधिक वर्षा को अवशोषित कर आकस्मिक बाढ़ को कम करती हैं तथा अल्प-वर्षा अवधियों में जलभृतों का पुनर्भरण करती हैं।
- यह 'स्पंज सिटी' क्षमता जल सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये जल प्रवाह को रोककर तथा उसे धीरे-धीरे मुक्त कर जल चक्र का नियमन करती हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले अनियमित वर्षा प्रतिरूपों के विरुद्ध एक बफर के रूप में कार्य करते हैं।
- उदाहरण के लिये भोपाल की भोज आर्द्रभूमियों ने मानसूनी बाढ़ को नियंत्रित करने तथा नगर की पेयजल आपूर्ति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे यह प्रदर्शित होता है कि संरक्षित शहरी आर्द्रभूमियाँ बाढ़ से निपटने की क्षमता और जल सुरक्षा दोनों को सुदृढ़ करती हैं।
- यह 'स्पंज सिटी' क्षमता जल सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ये जल प्रवाह को रोककर तथा उसे धीरे-धीरे मुक्त कर जल चक्र का नियमन करती हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले अनियमित वर्षा प्रतिरूपों के विरुद्ध एक बफर के रूप में कार्य करते हैं।
- कार्बन अवशोषण एवं जलवायु कार्रवाई: भारतीय आर्द्रभूमियाँ, विशेषकर मैंग्रोव और पीटलैंड्स, शक्तिशाली 'ब्लू कार्बन' सिंक हैं, जो स्थलीय वनों की तुलना में 10–50 गुना अधिक तीव्रता से कार्बन का अवशोषण करती हैं।
- आर्द्रभूमियाँ भारत की राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धताओं के केंद्र में हैं, क्योंकि इनकी अवायवीय मृदाएँ सहस्राब्दियों तक कार्बन को स्थिर रूप से संचित रखती हैं, जिससे वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इनका संरक्षण एक उच्च-प्रभावी प्राकृतिक जलवायु समाधान बन जाता है।
- उदाहरण के लिये, मिष्टी योजना का उद्देश्य 9 तटीय राज्यों में 540 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव को बहाल करना है, जिसमें अनुमानित 4.5 मिलियन टन कार्बन अवशोषण क्षमता है।
- आर्द्रभूमियाँ भारत की राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन संबंधी प्रतिबद्धताओं के केंद्र में हैं, क्योंकि इनकी अवायवीय मृदाएँ सहस्राब्दियों तक कार्बन को स्थिर रूप से संचित रखती हैं, जिससे वर्ष 2070 तक नेट-ज़ीरो लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इनका संरक्षण एक उच्च-प्रभावी प्राकृतिक जलवायु समाधान बन जाता है।
- आर्थिक मूल्यांकन एवं आजीविका निर्वाह: आर्द्रभूमि अनुपयोगी भूमि नहीं बल्कि उच्च मूल्य वाली आर्थिक संपत्तियाँ हैं जो 'समझदारीपूर्ण उपयोग' ढाँचे के अंतर्गत मत्स्य पालन, कृषि (जैसे, मखाना की खेती) और पर्यावरण-पर्यटन का समर्थन करती हैं।
- ये समेकित संसाधन प्रबंधन के माध्यम से तटीय एवं नदी-तटीय वंचित समुदायों के लिये आय का प्रमुख स्रोत बनकर लाखों लोगों की आजीविकाओं को संधारित करती हैं, जिसे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु सरकार औपचारिक रूप प्रदान कर रही है।
- उदाहरण के लिये, अमृत धरोहर योजना (2023 में प्रारंभ) हरित रोज़गार सृजित करने के लिये विशिष्ट संरक्षण मूल्यों को बढ़ावा देती है।
- हाल ही में केरल की कोले आर्द्रभूमि के मूल्यांकन में इनका कुल आर्थिक मूल्य (TEV) 54 मिलियन अमेरिकी डॉलर आँका गया है, जिसका अधिकांश भाग धान उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण से प्राप्त होता है।
- ये समेकित संसाधन प्रबंधन के माध्यम से तटीय एवं नदी-तटीय वंचित समुदायों के लिये आय का प्रमुख स्रोत बनकर लाखों लोगों की आजीविकाओं को संधारित करती हैं, जिसे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने हेतु सरकार औपचारिक रूप प्रदान कर रही है।
- प्रदूषण न्यूनीकरण एवं अपशिष्ट प्रबंधन: 'प्रकृति की किडनी' के रूप में कार्य करते हुए, आर्द्रभूमियाँ जैव-निस्यंदन और अवसादन प्रक्रियाओं द्वारा कृषि अपवाह तथा औद्योगिक अपशिष्टों से भारी धातुओं, नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस को छानती हैं।
- यह पारिस्थितिकी तंत्र जल निकायों की जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) को कम करता है, जो भारत में सीवेज उपचार की कमी और नदी प्रदूषण संकट का एक लागत प्रभावी, प्रकृति-आधारित समाधान प्रदान करता है।
- दाहरण के लिये, पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि (एक रामसर स्थल) प्राकृतिक रूप से सीवेज का उपचार करके कोलकाता को प्रतिवर्ष लगभग ₹4,680 मिलियन की बचत कराती है।
- जैव विविधता हॉटस्पॉट और प्रवासी गलियारे: आर्द्रभूमि जैव विविधता के हॉटस्पॉट हैं, जो प्रवासी पक्षी मार्गों और लुप्तप्राय प्रजातियों का समर्थन करती हैं तथा पारिस्थितिकी स्वास्थ्य के वैश्विक बैरोमीटर के रूप में कार्य करती हैं, जिसे भारत ने रामसर अभिसमय के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त स्थलों के नेटवर्क के विस्तार तथा प्रवासी प्रजातियों पर अभिसमय (CMS) के तहत अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं की पूर्ति के माध्यम से प्राथमिकता दी है।
- भारत मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF) पर एक महत्त्वपूर्ण शीतकालीन प्रवास स्थल है, जहाँ आर्द्रभूमि लाखों प्रवासी पक्षियों के लिये महत्त्वपूर्ण विश्राम स्थल के रूप में कार्य करती है।
- उदाहरण के लिये, पल्लिकरनई (चेन्नई), पुलिकट झील (तमिलनाडु), खिजड़िया पक्षी अभयारण्य (गुजरात), केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) और होकरसर आर्द्रभूमि ( जम्मू-कश्मीर में होकरा के नाम से ज्ञात) प्रमुख शीतकालीन प्रवास स्थल के रूप में कार्य करते हैं।
- भारत मध्य एशियाई फ्लाईवे (CAF) पर एक महत्त्वपूर्ण शीतकालीन प्रवास स्थल है, जहाँ आर्द्रभूमि लाखों प्रवासी पक्षियों के लिये महत्त्वपूर्ण विश्राम स्थल के रूप में कार्य करती है।
- तटीय सुरक्षा और आपदा अनुकूलन क्षमता: तटीय आर्द्रभूमियाँ, विशेषकर मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियाँ, चक्रवातों, तूफानी ज्वार तथा सूनामी के विरुद्ध जैव-ढाल के रूप में कार्य करती हैं, जिनकी आवृत्ति महासागरों के तापमान में वृद्धि के कारण बढ़ रही है।
- ये तरंग ऊर्जा का अपसारण करती हैं और तटरेखाओं को अपरदन से स्थिर करती हैं, जिससे भारत के घनी आबादी वाले तटीय आर्थिक क्षेत्रों तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना को जलवायु-प्रेरित आपदाओं से प्रभावी संरक्षण मिलता है।
- उदाहरण के लिये, चक्रवात दाना (2024) के दौरान, ओडिशा में स्थित भितरकनिका मैंग्रोव ने पवन वेग और तूफान के प्रभाव को ल्लेखनीय रूप से कम कर दिया, जिससे आंतरिक ग्रामों को सुरक्षा मिली तथा अवसंरचना क्षति में लाखों रुपये की बचत हुई।
- ये तरंग ऊर्जा का अपसारण करती हैं और तटरेखाओं को अपरदन से स्थिर करती हैं, जिससे भारत के घनी आबादी वाले तटीय आर्थिक क्षेत्रों तथा महत्त्वपूर्ण अवसंरचना को जलवायु-प्रेरित आपदाओं से प्रभावी संरक्षण मिलता है।
- भूजल पुनर्भरण और कृषि स्थिरता: आर्द्रभूमि महत्त्वपूर्ण 'परकोलेशन टैंकों' के रूप में कार्य करती हैं, जो समाप्त हो चुके जलभृतों का पुनर्भरण करती हैं, भारत की भूजल-आश्रित कृषि अर्थव्यवस्था को संधारित करती हैं तथा अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में मृदा लवणीकरण को रोकती हैं।
- यह पारिस्थितिकी तंत्र राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा के लिये अनिवार्य है और गहन कृषि वाले इंडो-गंगा मैदानों में मरुस्थलीकरण तथा जल-अभाव के बढ़ते खतरे के विरुद्ध प्रमुख प्राकृतिक प्रतिकारक उपाय के रूप में कार्य करती है।
- केरल के कोले आर्द्रभूमि को राज्य के प्रमुख 'चावल उत्पादक क्षेत्रों' में से एक माना जाता है, जो अपनी असाधारण रूप से उच्च उत्पादकता के लिये प्रसिद्ध है। समुद्र तल से नीचे स्थित ये आर्द्रभूमियाँ चावल की खेती की एक अनूठी और विशिष्ट प्रणाली के लिये जानी जाती है।
- भू-रणनीतिक सुरक्षा एवं हिमनदीय स्थिरता: हिमालय की उच्च-ऊँचाई वाली आर्द्रभूमियाँ संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों (LAC) के निकट भू-रणनीतिक परिसंपत्तियों के रूप में कार्य करती हैं, जो सैन्य रसद के लिये आवश्यक हिम-पिघलन जल का नियमन करती हैं तथा हिमनदीय झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs) के विरुद्ध बफर का कार्य करती हैं।
- इन संवेदनशील पारितंत्रों का संरक्षण राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय है, ताकि जलवायु-प्रेरित जलवैज्ञानिक आपदाओं से रणनीतिक अवसंरचना (पुल/सड़कें) और सीमा-संपर्क की रक्षा की जा सके।
- उदाहरण के लिये, त्सो कर आर्द्रभूमि (लद्दाख) को जल संसाधनों (मीठे जल के स्रोत स्टार्टसापुक त्सो) की सुरक्षा के उद्देश्य से रणनीतिक रूप से रामसर स्थल घोषित किया गया।
- सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक प्रबंधन: आर्द्रभूमियाँ भारत की 'जल-सामाजिक' संरचना के केंद्र में हैं, जो पवित्र स्थलों के रूप में विकेंद्रीकृत संरक्षण को प्रेरित करती हैं तथा धार्मिक श्रद्धा और पारंपरिक सामुदायिक स्वामित्व (Commons) के माध्यम से संरक्षण को सुदृढ़ करती हैं।
- यह सांस्कृतिक संबद्धता ज़मीनी स्तर पर शासन को सुगम बनाता है, जिससे ' श्रमदान' (स्वैच्छिक श्रम) का लाभ उठाकर विशुद्ध रूप से नौकरशाही हस्तक्षेपों की तुलना में पुनर्भरण परियोजनाओं की दीर्घकालिक सफलता दर अधिक सुनिश्चित होती है।
- रेणुका झील (हिमाचल प्रदेश) इसका उदाहरण है, जहाँ इसके पवित्र स्थल होने के कारण स्थानीय स्तर पर प्रदूषण और अतिक्रमण पर कठोर प्रतिबंध लागू हैं।
- मिशन अमृत सरोवर के अंतर्गत जनवरी 2025 तक सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से 68,000 से अधिक जल निकायों का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार किया जा चुका है।
- यह सांस्कृतिक संबद्धता ज़मीनी स्तर पर शासन को सुगम बनाता है, जिससे ' श्रमदान' (स्वैच्छिक श्रम) का लाभ उठाकर विशुद्ध रूप से नौकरशाही हस्तक्षेपों की तुलना में पुनर्भरण परियोजनाओं की दीर्घकालिक सफलता दर अधिक सुनिश्चित होती है।
भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण हेतु क्या उपाय किये गए हैं?
- आजीविका एकीकरण के लिये 'अमृत धरोहर' का संचालन: उच्च मात्रा वाले प्रकृति पर्यटन से उच्च मूल्य वाले प्रकृति पर्यटन की ओर संक्रमण करके, यह पारिस्थितिकी संपत्तियों को आर्थिक इंजनों में परिवर्तित करता है, जिससे संरक्षण स्वयं ही समुदायीय संरक्षकता के माध्यम से आर्थिक रूप से स्व-संचालित हो जाता है।
- इस कार्यक्रम के पहले चरण में, पाँच प्राथमिकता वाले रामसर स्थलों की पहचान की गई, जिनमें सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान, सिरपुर आर्द्रभूमि, यशवंत सागर, भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान और चिल्का झील शामिल हैं।
- इस पहल के तहत, स्थानीय समुदाय के सदस्यों को प्रशिक्षित और प्रमाणित करने के लिये दो प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, जिनका नाम वैकल्पिक आजीविका कार्यक्रम (ALP) तथा पर्यटन नाविक प्रमाण-पत्र (PNC) है।
- 'वेटलैंड सिटी एक्रेडिटेशन' (WCA) से वैश्विक मान्यता: शहरी जल निकायों पर अतिक्रमण रोकने के लिये भारत ने रामसर अभिसमय के WCA को अपनाया, जो प्रभावी रूप से 'स्पंज सिटी' शहरी नियोजन ढाँचे को अनिवार्य बनाता है।
- इससे संरक्षण का दोहरी सुरक्षा स्तर सुनिश्चित होता है, जहाँ नगर निगम मास्टर प्लान को कानूनी रूप से आर्द्रभूमि संरक्षण के अनुरूप बनाना होता है, ताकि यह अंतर्राष्ट्रीय मान्यता बनी रह सके और शहरों तथा झीलों को बाढ़-बफर के रूप में रखने के लिये बाध्य किया जाता है।
- उदाहरण के लिये, जनवरी 2025 में इंदौर (मध्य प्रदेश) और उदयपुर (राजस्थान) भारत के पहले ऐसे शहर बने जिन्होंने यह मान्यता प्राप्त की।
- इससे संरक्षण का दोहरी सुरक्षा स्तर सुनिश्चित होता है, जहाँ नगर निगम मास्टर प्लान को कानूनी रूप से आर्द्रभूमि संरक्षण के अनुरूप बनाना होता है, ताकि यह अंतर्राष्ट्रीय मान्यता बनी रह सके और शहरों तथा झीलों को बाढ़-बफर के रूप में रखने के लिये बाध्य किया जाता है।
- 'वेटलैंड मित्र' और नागरिक विज्ञान: सरकारी निगरानी से आगे बढ़ते हुए,'वेटलैंड बचाओ अभियान' ने 'वेटलैंड मित्रों' को नामांकित करके एक स्थानीय स्तर का निगरानी नेटवर्क स्थापित किया है।
- यह 'जन आंदोलन' एक विकेंद्रीकृत, गैर-सरकारी सतर्कता दल बनाता है जो अतिक्रमण और प्रदूषण की वास्तविक समय में रिपोर्ट करता है, जिससे दूरस्थ नौकरशाही प्राधिकरण तथा ज़मीनी स्तर की वास्तविकता के बीच की खाई को प्रभावी ढंग से पाटा जा सकता है।
- निजी वित्त पोषण हेतु “ग्रीन क्रेडिट” का कार्यान्वयन: ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP) की अधिसूचना ने एक बाज़ार-आधारित वित्तीय तंत्र बनाया है जो निजी निगमों को आर्द्रभूमि पुनर्भरण के वित्तपोषण के लिये व्यापार योग्य क्रेडिट अर्जित करने की अनुमति देता है।
- इससे राजकोष पर बोझ कम होता है और निजी क्षेत्र को न केवल CSR के लिये, बल्कि नियामक क्षतिपूर्ति के लिये भी, दूषित जल निकायों को बहाल करने के लिये प्रोत्साहन मिलता है, जिससे पारिस्थितिकी पुनरुद्धार का प्रभावी रूप से मुद्रीकरण होता है।
- वर्ष 2023 के नियमों के तहत, कंपनियाँ अब मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिये क्रेडिट अर्जित कर रही हैं।
- इससे राजकोष पर बोझ कम होता है और निजी क्षेत्र को न केवल CSR के लिये, बल्कि नियामक क्षतिपूर्ति के लिये भी, दूषित जल निकायों को बहाल करने के लिये प्रोत्साहन मिलता है, जिससे पारिस्थितिकी पुनरुद्धार का प्रभावी रूप से मुद्रीकरण होता है।
- सक्रिय 'वेटलैंड हेल्थ कार्ड' का उपयोग: मंत्रालय ने स्थैतिक मानचित्रों की जगह सक्रिय “वेटलैंड स्वास्थ्य कार्ड” लागू किये हैं, जो ISRO से प्राप्त भू-स्थानिक डेटा को ज़मीनी स्तर पर मैलापन और घुलित ऑक्सीजन के मापों के साथ एकीकृत करता है।
- यह विश्लेषणात्मक उपकरण आर्द्रभूमि का वास्तविक समय में “ECG” प्रदान करता है, प्रशासन को प्रतिक्रियाशील संकट प्रबंधन से सक्रिय रख-रखाव की ओर ले जाता है और जब पारिस्थितिकी संकेतक सुरक्षा सीमा पार करते हैं तो स्वतः चेतावनी (रेड-फ्लैग) जारी करता है।
- जल निकायों के स्वास्थ्य कार्ड की अवधारणा वर्ष 2022 में लॉन्च किये गए “सहभागिता मिशन” से उत्पन्न हुई, जिसका उद्देश्य आर्द्रभूमि संरक्षण के लिये जागरूकता फैलाना था।
- इस मिशन के तहत, 20 लाख से अधिक लोगों को जागरूक बनाया गया, लगभग 80,000 आर्द्रभूमियों का सर्वेक्षण किया गया, 6,200 से अधिक आर्द्रभूमियों के स्वास्थ्य कार्ड तैयार किये गए और 18,000 से अधिक वेटलैंड मित्रों को पंजीकृत किया गया (DTE—सितंबर 2024)।
- रामसर नेटवर्क का तीव्र विस्तार: भारत ने रामसर का दर्जा प्राप्त करने के लिये आक्रामक रूप से स्थलों को नामित करके संरक्षण में अपनी राजनयिक उपस्थिति को रणनीतिक रूप से बढ़ाया है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय जाँच और उनकी सुरक्षा के लिये बाध्यकारी संधि दायित्वों को लागू किया जा रहा है।
- यह व्यापक विस्तार एक भू-राजनीतिक सॉफ्ट-पावर उपकरण के रूप में कार्य करता है, जबकि कानूनी रूप से इन स्थलों को 'नो-रिग्रेशन' संरक्षण स्थिति में बाध्य कर देता है जो भविष्य की सरकारों को इन्हें निरस्त करने से रोकता है।
- भारत का रामसर नेटवर्क वर्ष 2014 में 26 स्थलों से बढ़कर वर्ष 2026 तक 98 स्थलों तक पहुँच गया, जो एशिया का सबसे बड़ा नेटवर्क बन गया।
- छोटी आर्द्रभूमियों हेतु ज़मीनी स्तर पर सत्यापन: उन कमियों को दूर करने के लिये जहाँ छोटे आर्द्रभूमियों (<2.25 हेक्टेयर) की अनदेखी की गई और उन पर निर्माण किया गया, सर्वोच्च न्यायालय ने बार-बार 'ज़मीनी स्तर पर सत्यापन' का आह्वान किया है, जिसके लिये उपग्रह मानचित्रों के भौतिक सत्यापन की आवश्यकता होती है।
- इससे यह सुनिश्चित होता है कि 'भूत आर्द्रभूमि (ghost wetlands)' ( जो कागज़ों पर मौजूद हैं या सूख चुकी हैं) कानूनी रूप से प्रलेखित और अधिसूचित हों, जिससे सार्वजनिक न्यास सिद्धांत का विस्तार छोटे ग्रामीण तालाबों तक भी हो जाता है।
- भारत के 'मिशन सहभागिता' और 'आर्द्र्भूमि बचाओ अभियान' ने 20 लाख से अधिक नागरिकों को लामबंद किया है, जिसके परिणामस्वरूप देश भर में 170,000 से अधिक आर्द्रभूमियों का ज़मीनी स्तर पर सत्यापन और लगभग 100,000 आर्द्रभूमियों का सीमांकन किया गया है।
- जलग्रहण क्षेत्र स्तररीय प्रबंधन हेतु संशोधित NPCA दिशानिर्देश: राष्ट्रीय जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण योजना (NPCA) के दिशानिर्देशों को व्यापक रूप से संशोधित किया गया ताकि “फ्रेमवर्क प्रबंधन योजनाएँ” को अनिवार्य बनाया जा सके, जो केवल जल निकाय तक सीमित न होकर पूरे जलग्रहण क्षेत्र को देखें।
- इससे सुनिश्चित होता है कि वित्तीय संसाधन केवल सौंदर्यीकरण पर व्यर्थ न जाएँ, बल्कि स्रोत पर तलछट और प्रदूषण की रोकथाम हेतु निर्देशित हों तथा संरक्षण के लिये बेसिन-स्तरीय जलवैज्ञानिक दृष्टिकोण लागू हो।
आर्द्रभूमि पर रामसर अभिसमय
- परिचय: रामसर अभिसमय एक अंतर-सरकारी संधि है, जो संपूर्ण विश्व में आर्द्रभूमि के संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग के लिये समर्पित है तथा यह एकल प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्र पर केंद्रित पहला वैश्विक पर्यावरण समझौता है।
- इसे अपनाने के उपलक्ष्य में 2 फरवरी को विश्व स्तर पर विश्व आर्द्रभूमि दिवस के रूप में मनाया जाता है।
- इसे 2 फरवरी, 1971 को अपनाया गया, ईरान के रामसर में इस पर हस्ताक्षर किये गए और यह 21 दिसंबर, 1975 को लागू हुआ। भारत वर्ष 1982 में इसका एक अनुबंधित पक्षकार बना।
- मुख्य उद्देश्य:
- स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
- पारिस्थितिकी संरक्षण और सतत आजीविका के बीच संतुलन बनाए रखना।
- स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना।
- प्रमुख स्तंभ (अनुबंध करने वाले पक्षों के 3 दायित्व)
- सभी आर्द्रभूमियों का विवेकपूर्ण उपयोग (एकीकृत योजना, सतत प्रबंधन)
- रामसर स्थलों (अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व के आर्द्रभूमि) का पदनाम एवं संरक्षण
- साझा आर्द्रभूमि, प्रजातियों और नदी घाटियों पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
- रामसर स्थल: रामसर स्थल वे आर्द्रभूमि हैं जिन्हें उनके पारिस्थितिकी, जैव विविधता, जलवैज्ञानिक या सांस्कृतिक महत्त्व के लिये नामित किया गया है और इन्हें अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमियों की रामसर सूची में सूचीबद्ध किया गया है। भारत में 98 रामसर स्थल हैं (2026), जो एशिया में सबसे अधिक है।
- यद्यपि इन क्षेत्रों को नामित करने से राष्ट्रीय कानून के तहत स्वतः ही संरक्षित क्षेत्र का दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता है, लेकिन यह देशों को उनके विवेकपूर्ण उपयोग और प्रभावी प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिये बाध्य करता है।
- इसके अतिरिक्त पारिस्थितिकी कमी या प्रतिकूल परिवर्तन का सामना कर रही आर्द्रभूमि को मोंट्रेक्स रेकॉर्ड (Montreux Record) में रखा जाता है, जो रामसर अभिसमय के तहत एक रजिस्टर है जो उन स्थलों की पहचान करता है जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर संरक्षण और उपचारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
भारत में आर्द्रभूमि के संरक्षण से जुड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?
- नगरीय अतिक्रमण एवं कंक्रीटीकरण का विस्तार: सबसे गंभीर खतरा 'सार्वजनिक भूमि' का वाणिज्यिक अचल संपत्ति में रूपांतरण है, जो भूमि राजस्व अभिलेखों में अस्पष्टता के कारण होता है जहाँ आर्द्रभूमि को प्रायः 'बंजर भूमि' के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
- यह नियामक शून्यता निर्माणकर्त्ताओं को जल-विज्ञान संबंधी बफरों पर विधिसम्मत रूप से अतिक्रमण करने की अनुमति देती है, जिससे नगरों की प्राकृतिक बाढ़-नियंत्रण क्षमता नष्ट हो जाती है और अपरिवर्तनीय नगरीय ऊष्मा द्वीप प्रभाव उत्पन्न होता है।
- उदाहरण के लिये, चेन्नई की पल्लिकरणाई दलदल भूमि का विगत 30 वर्षों में लगभग 90 प्रतिशत तक ह्रास हो गया है, जिसके परिणामस्वरूप नगर में भीषण बाढ़ की घटनाएँ बढ़ी हैं।
- विषाक्त प्रवाह और सुपोषण: भारत की आर्द्रभूमियाँ अनजाने में अपशिष्ट-जल शोधन स्थलों के रूप में कार्य कर रही हैं। इनमें औद्योगिक अपशिष्ट एवं घरेलू मल जल का अनियंत्रित प्रवाह होता है, जिससे अति-सुपोषण एवं घुलित ऑक्सीजन का ह्रास होता है।
- इस रासायनिक हमले से 'मृत क्षेत्र' उत्पन्न होते हैं, जहाँ जलीय जीव दम घुटने से नष्ट हो जाते हैं, जिससे जैवविविधता से परिपूर्ण क्षेत्र जैविक कब्रगाह में परिवर्तित हो जाते हैं तथा रोग-वाहक जीवों के प्रजनन स्थल बन जाते हैं।
- वर्ष 2023 में उत्तरी भारत की सबसे बड़ी आर्द्रभूमि हरिके में प्रवासी पक्षियों की संख्या में वर्ष 2021 की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत की गिरावट आई, जिसका प्रमुख कारण सतलुज नदी में बढ़ता प्रदूषण है।
- नियामकीय विखंडन और कानूनी कमियाँ: समर्पित विनियामक कार्यढाँचे के बावजूद कमज़ोर क्रियान्वयन तथा शासन-व्यवस्था का विखंडन आर्द्रभूमि संरक्षण को कमज़ोर कर रहा है।
- वर्ष 2017 में, सर्वोच्च न्यायालय ने व्यापक आर्द्रभूमि सूची तैयार करने और संरक्षण के लिये 1,683 प्रस्तावों में कमियों को दूर करने में सरकार की विफलता के लिये उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
- यह विकेंद्रीकृत 'ऑप्ट-इन' मॉडल राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरणों पर निर्भर करता है, जो संभावित औद्योगिक उपयोग के लिये भूमि उपलब्ध रखने के लिये प्रायः अधिसूचना में विलंब करते हैं।
- जल-विज्ञानीय अवरोध एवं गाद जमाव: ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में अनियोजित बाँधों और नहरों के निर्माण से पर्यावरणीय प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है, जिससे आर्द्रभूमियों में गाद का अत्यधिक संचयन होता है तथा जल निकाय क्रमशः स्थलीय रूप धारण करने लगते हैं।
- इस भौतिक अवरोधन से आर्द्रभूमि की गहराई और जल धारण क्षमता कम हो जाती है, जिससे कुछ ही दशकों में गतिशील जलीय पारितंत्र स्थिर स्थलरूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
- उदाहरण के लिये, वुलर झील में पिछले तीन दशकों के दौरान मुख्य रूप से निम्नीकृत जलग्रहण क्षेत्रों से गाद जमा होने के कारण जल धारण क्षमता में काफी कमी देखी गई है।
- बाह्यजीवी प्रजातियों का आक्रमण: जलकुंभी ( Eichhornia crassipes ) और अफ्रीकी कैटफिश जैसी आक्रामक बाह्यजीवी प्रजातियाँ स्थानीय वनस्पतियों एवं जीवों से प्रतिस्पर्द्धा कर खाद्य जाल को विकृत कर रही हैं तथा जल की सतह को अवरुद्ध कर रही हैं।
- यह जैविक आक्रमण सूर्य के प्रकाश के प्रवेश को अवरुद्ध करता है, जलमग्न वनस्पति को नष्ट कर देता है तथा स्थानीय जलपक्षियों के विश्राम स्थलों को नष्ट कर देता है, जिससे आर्द्रभूमियों में ‘रिक्त वन’ जैसी स्थिति उत्पन्न होती है।
- भारत के अंतर्देशीय ताजे जल के आर्द्रभूमि क्षेत्र, जो लगभग 58.2 मिलियन हेक्टेयर में फैले हुए हैं तथा जैव विविधता में असाधारण रूप से समृद्ध हैं, के पारिस्थितिक स्वास्थ्य के लिये आक्रामक बाह्यजीवी पादप और पशु प्रजातियाँ एक गंभीर खतरा उत्पन्न करती हैं।
- भारत की आर्द्रभूमि में लगभग 1,200 पादप प्रजातियाँ पाई जाती हैं तथा लगभग 17,853 ज्ञात वृहत एवं लघु जीव प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो देश के कुल ज्ञात जीव-जंतुओं का लगभग 5वाँ हिस्सा है।
- जलवायु परिवर्तन और कालानुक्रमिक असंगति: तापमान और वर्षा के प्रतिरूपों में तीव्र परिवर्तन से मौसमी आर्द्रभूमियाँ प्रवासी पक्षियों के आगमन से पूर्व ही सूख जाती हैं, जिससे संसाधनों की उपलब्धता और प्रजातियों की आवश्यकताओं के बीच कालानुक्रमिक असंगति उत्पन्न होती है।
- इसके कारण प्रवास का समय अनियमित हो रहा है और पक्षी पारंपरिक शीतकालीन आवास छोड़कर निम्न-गुणवत्ता वाले स्थलों की ओर बाध्य हो रहे हैं, जिससे उनकी जनसंख्या में गिरावट का जोखिम बढ़ता है।
- रामसर ग्लोबल वेटलैंड आउटलुक- 2025 का अनुमान है कि वर्ष 1970 के बाद से विश्व की लगभग 22 प्रतिशत आर्द्रभूमियाँ नष्ट हो चुकी हैं। भारत में विगत तीन दशकों में लगभग एक-तिहाई आर्द्रभूमियों का क्षरण हुआ है, जिसका प्रमुख कारण कृषि विस्तार, अतिक्रमण और प्रदूषण है।
- माइक्रो प्लास्टिक का प्रवेश और रासायनिक 'मिश्रित' संदूषण: पारंपरिक सीवेज के अलावा, भारतीय आर्द्रभूमि सौंदर्य प्रसाधन एवं वस्त्र उद्योगों से उत्सर्जित माइक्रो प्लास्टिक और अंतःस्रावी व्यवधानकारी रसायनों (EDC) के लिये तेज़ी से भंडार बनती जा रही हैं।
- यह 'अदृश्य' संदूषण तलस्थ जीवों के माध्यम से जलीय खाद्य शृंखला में प्रवेश करता है, जिससे मछलियों और प्रवासी पक्षियों में जैव-संचयन होता है तथा अंततः इन पारितंत्रों पर निर्भर मानव समुदायों के लिये तंत्रिकीय एवं प्रजनन संबंधी गंभीर जोखिम उत्पन्न होते हैं।
- सामाजिक-आर्थिक संघर्ष और कार्यकाल की अस्पष्टता: 'संरक्षण-आजीविका' के बीच एक व्यापक अंतराल बनता जा रहा है, जहाँ शीर्ष-स्तरीय अंतर्राष्ट्रीय मान्यता कई बार स्थानीय मत्स्यन एवं कृषक समुदायों के पारंपरिक उपभोगाधिकारों की उपेक्षा करती है, जिससे संरक्षण उपायों के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न होता है।
- भूमि-स्वामित्व की स्पष्टता तथा पारिस्थितिकी सेवाओं से लाभ-साझेदारी की व्यवस्था के अभाव में स्थानीय हितधारक आर्द्रभूमियों को विकास में बाधा मानते हैं, परिणामस्वरूप गुप्त अतिक्रमण एवं राज्य प्राधिकारों के साथ असहयोग बढ़ता है।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2021 में असम की दीपोर बील आर्द्रभूमि में पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र प्रतिबंधों के विरुद्ध स्थानीय समुदायों द्वारा विरोध प्रदर्शन किये गये।
भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण को बढ़ावा देने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- जलग्रहण क्षेत्र स्तर पर 'Source-to-Sink' उपचार: संरक्षण प्रयास प्रायः विफल हो जाते हैं क्योंकि वे केवल जल निकाय पर ही केंद्रित होते हैं; इसके बजाय हमें जलग्रहण क्षेत्र उपचार (CAT) योजनाओं को अनिवार्य बनाना चाहिये जो संपूर्ण जलसंभर नेटवर्क को सुरक्षित करें।
- इसमें जलस्रोत वाले पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक वृक्षारोपण और मृदा संरक्षण शामिल है ताकि अवक्षेपण को रोका जा सके तथा प्राकृतिक प्रवाह व्यवस्था को बनाए रखा जा सके। जल संग्रहण क्षेत्र का शोधन करके, यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि आर्द्रभूमि को स्वच्छ, गाद रहित जल मिले, जो इसके दीर्घकालिक अस्तित्व और सूखने से बचाव के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- वित्तपोषण के लिये 'ग्रीन क्रेडिट' कार्यक्रम का लाभ उठाना: वित्तपोषण अंतर को समाप्त करने के लिये, सरकार को ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम (GCP) को सक्रीय रूप से लागू करना चाहिये, जिससे निजी निगमों को क्षतिग्रस्त हो चुकी आर्द्रभूमि का पुनर्स्थापन करने के लिये व्यापार योग्य क्रेडिट अर्जित कर सकें।
- इससे एक बाज़ार-आधारित वित्तीय तंत्र का निर्माण होता है, जहाँ कंपनियाँ न केवल CSR (कर्मचारी संबंध) के लिये, बल्कि ठोस नियामक लाभों के लिये भी गाद हटाने और पुनर्जीवन परियोजनाओं में निवेश करती हैं। यह पारिस्थितिक पुनर्भरण का मौद्रिकरण करता है, जिससे आर्द्रभूमि संरक्षण निजी क्षेत्र के लिये आर्थिक रूप से व्यवहार्य उद्यम बन जाता है।
- 'निर्मित आर्द्रभूमि' का रणनीतिक विकास: शहरी नगरपालिकाओं को कच्चे सीवेज को मुख्य जल निकायों में प्रवेश करने से पहले उसके उपचार के लिये प्रकृति-आधारित समाधान के रूप में 'निर्मित आर्द्रभूमि' को अपनाना चाहिये।
- पूर्वी कोलकाता आर्द्रभूमि मॉडल की नकल करते हुए, ये कृत्रिम निस्पंदन प्रणालियाँ विशिष्ट जलीय पादपों और सूक्ष्मजीवों की क्रिया का उपयोग करके कार्बनिक अपशिष्ट एवं भारी धातुओं को प्राकृतिक रूप से विघटित करती हैं।
- यह कम लागत वाली, विकेंद्रीकृत अवसंरचना सुपोषण को रोकती है तथा महंगे, ऊर्जा-गहन सीवेज सोधन संयंत्रों (STP) पर भार को कम करती है।
- लघु आर्द्रभूमि क्षेत्रों का सख्त 'ग्राउंड ट्रूथिंग' और जियो-टैगिंग: हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद, उन आर्द्रभूमि क्षेत्रों को विधिक रूप से अधिसूचित एवं जियो-टैग करने की तत्काल आवश्यकता है, जो वर्तमान में भूमि-अतिक्रमण के प्रति संवेदनशील हैं।
- राजस्व विभागों को भूमि अभिलेखों को अद्यतन करने के लिये भौतिक 'ग्राउंड ट्रूथिंग' करना चाहिये और सार्वजनिक न्यास सिद्धांत के तहत संरक्षण प्राप्त करने के लिये इन लघु जल निकायों को स्पष्ट रूप से 'आर्द्रभूमि' के रूप में वर्गीकृत करना चाहिये।
- यह विधिक सुरक्षा कवच उपनगरीय तालाबों को रियल एस्टेट में परिवर्तित होने से रोकने का एकमात्र प्रभावी उपाय है।
- मास्टर प्लान में 'स्पंज सिटी' अवधारणाओं को एकीकृत करना: शहर के मास्टर प्लान में आर्द्रभूमियों को प्राकृतिक बाढ़ अवरोधक के रूप में बनाए रखना अनिवार्य किया जाना चाहिये, ताकि रैम्सर सम्मेलन के 'आर्द्रभूमि नगर प्रमाणन' मानदंडों के अनुरूप हों।
- इसमें ऐसे ज़ोनिंग कानून शामिल हैं जो बाढ़ के मैदानों में निर्माण को प्रतिबंधित करते हैं और भूजल पुनर्भरण को सुविधाजनक बनाने के लिये झीलों के आसपास पारगम्य सतहों के निर्माण की आवश्यकता होती है।
- आर्द्रभूमि को खाली भूखंडों के बजाय बाढ़ नियंत्रण के लिये महत्त्वपूर्ण शहरी अवसंरचना के रूप में मानकर, हम शहरीकरण के विरुद्ध उनके अस्तित्व को सुरक्षित कर सकते हैं।
- कृषि-पारिस्थितिकी में 'बफर ज़ोन' को लागू करना: कृषि अपवाह के कारण होने वाले मूक क्षरण से निपटने के लिये, हमें प्रमुख आर्द्रभूमि के आसपास विशिष्ट 'पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों' को अधिसूचित करना चाहिये, जहाँ रासायनिक खेती सख्ती से प्रतिबंधित है।
- राज्य सरकारों को इस बफर बेल्ट में जैविक या प्राकृतिक खेती की ओर संक्रमण के लिये सब्सिडी देनी चाहिये, यह सुनिश्चित करते हुए कि आर्द्रभूमि में प्रवेश करने वाला पानी नाइट्रोजन और फॉस्फोरस उर्वरकों से मुक्त हो।
- आर्द्रभूमि को अवरुद्ध करने और ऑक्सीजन के स्तर को कम करने वाले शैवाल के अत्यधिक विस्तार को रोकने के लिये यह निवारक उपाय आवश्यक है।
- विदेशी आक्रामक प्रजातियों का जैविक नियंत्रण: जलकुंभी जैसी आक्रामक खरपतवारों से कई भारतीय आर्द्रभूमि कुप्रभावित हो रही हैं, जो स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को बाधित करती हैं तथा वाष्पोत्सर्जन को बढ़ाती हैं।
- इसका व्यवस्थित, वैज्ञानिक और जैविक नियंत्रण आवश्यक है, जैसे कि कीट नियंत्रक (Weevils) या नियंत्रित खुदाई का उपयोग करना, न कि तदर्थ मैन्युअल सफाई।
- नियमित नियंत्रण इस बायोमास को हरी खाद या ऊर्जा में परिवर्तित कर देता है, जैविक खतरे को आर्थिक संसाधन में परिवर्तित करता है तथा जल सतह को पुनर्स्थापित करता है।
निष्कर्ष:
आर्द्रभूमियाँ केवल पारिस्थितिकी विलासिता नहीं, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूलन क्षमता और जैवविविधता संरक्षण को आधार प्रदान करने वाली महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक अवसंरचना हैं। इनका ह्रास जलवायु जोखिमों को शहरी बाढ़ एवं आजीविका संकट जैसी विकासात्मक आपदाओं में रूपांतरित कर देता है। अतः मिशन LiFE पर आधारित, समुदाय-नेतृत्वित, विज्ञान-समर्थित तथा जलग्रहण-क्षेत्र स्तरीय शासन की ओर संक्रमण अनिवार्य है। इस दृष्टि से, वर्तमान में आर्द्रभूमियों का संरक्षण सतत विकास, आपदा से निपटने की क्षमता तथा अंतर-पीढ़ीगत समता में निवेश के समान है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न विस्तृत कानूनी एवं संस्थागत प्रावधानों के होते हुए भी भारत में आर्द्रभूमियों का ह्रास निरंतर जारी है। इस संदर्भ में, भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण से संबंधित प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये तथा तीव्र शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन क्षमता की पृष्ठभूमि में उनसे निपटने के लिये उपयुक्त उपायों का सुझाव दीजिये। |
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1. आर्द्रभूमि क्या होती है?
आर्द्रभूमि भूमि और जल के बीच स्थित पारिस्थितिकी तंत्र हैं जैसे कि झीलें, दलदल, बाढ़ के मैदान एवं मैंग्रोव जो स्थायी या मौसमी रूप से जलमग्न रहते हैं।
प्रश्न 2. आर्द्रभूमि को प्राकृतिक अवसंरचना क्यों कहा जाता है?
क्योंकि ये बाढ़ नियंत्रण, भूजल पुनर्भरण, प्रदूषण निस्पंदन और जलवायु विनियमन जैसी लागत प्रभावी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करती हैं।
प्रश्न 3. आर्द्रभूमियाँ भारत के जलवायु लक्ष्यों का समर्थन कैसे करती हैं?
इनसे अवायवीय मृदाओं में दीर्घकालिक कार्बन भंडारण और 'ब्लू कार्बन' पृथक्करण के माध्यम से, भारत के राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों और वर्ष 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
प्रश्न 4. भारत की रामसर स्थिति क्या है?
भारत में 98 रामसर स्थल (2026) हैं, जो एशिया में सर्वाधिक और विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर हैं तथा लगभग 1.36 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र को आच्छादित करते हैं।
प्रश्न 5. आर्द्रभूमि संरक्षण में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
शहरी विस्तार और विनियामक शिथिलता के कारण आर्द्रभूमियों का अचल संपत्ति में रूपांतरण हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप उनकी बाढ़-नियंत्रण क्षमता तथा जैव विविधता-संरक्षण भूमिका क्षीण होती जा रही है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न 1. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2014)
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आर्द्रभूमि |
नदियों का संगम |
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1. |
हरिके आर्द्रभूमि |
ब्यास और सतलज का संगम |
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2. |
केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान |
बनास और चंबल का संगम |
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3. |
कोलेरु झील |
मुसी और कृष्णा का संगम |
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (a)
प्रश्न 2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि वैश्विक तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2ºC से अधिक नहीं बढ़ना चाहिये। यदि विश्व तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 3ºC से अधिक बढ़ जाता है, तो विश्व पर उसका संभावित प्रभाव क्या होगा? (2014)
- स्थलीय जीवमंडल एक नेट कार्बन स्रोत की ओर प्रवृत्त होगा।
- विस्तृत प्रवाल मर्त्यता घटित होगी।
- सभी भूमंडलीय आर्द्रभूमि स्थायी रूप से लुप्त हो जाएंगी।
- अनाज़ों की खेती विश्व में कहीं भी संभव नहीं होगी।
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:
(a) केवल 1
(b) केवल 1 और 2
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4
उत्तर: (b)