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भारतीय अर्थव्यवस्था

भारत की राजकोषीय स्वास्थ्य पर पुनर्विचार

  • 31 Jan 2026
  • 182 min read

यह लेख 29/01/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित "Debt, deficits, growth: Why state discipline matters for fiscal health” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में उल्लेख किया है कि भारत की मध्यम अवधि की राजकोषीय स्वास्थ्य केवल केंद्र सरकार के वित्तीय समेकन पर नहीं, बल्कि मुख्यतः राज्य सरकारों के राजकोषीय अनुशासन और विकासोन्मुख ऋण प्रबंधन रणनीति पर निर्भर करती है।

प्रिलिम्स के लिये: राजकोषीय घाटा, FRBM अधिनियम 2003, मध्यम-अवधि व्यय ढाँचा

मेन्स के लिये: राजकोषीय समेकन में नवीनतम प्रगति, प्रमुख मुद्दे और उपाय

भारत की राजकोषीय स्थिति का आकलन अब वार्षिक राजकोषीय घाटे के बजाए सार्वजनिक ऋण की स्थिरता के आधार पर किया जा रहा है, विशेषकर महामारी के बाद। सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के सापेक्ष सामान्य सरकारी ऋण का अनुपात मार्च 2020 के अंत में 75.7% से बढ़कर वित्त वर्ष 2021 के अंत में 89.6% हो गया, हालाँकि आर्थिक सुधार के साथ इसमें क्रमिक कमी आई है। राज्य सरकारों का कुल सार्वजनिक ऋण में लगभग एक तिहाई हिस्सा होने के कारण, एन.के. सिंह समिति द्वारा घाटे के लक्ष्यों के स्थान पर ऋण प्रबंधन को आधार बनाने की सिफारिश से यह स्पष्ट होता है कि राज्य स्तर पर राजकोषीय अनुशासन और विकास अब भारत की मध्यम अवधि की राजकोषीय स्वास्थ्य के लिये केंद्रीय महत्त्व रखते हैं।

भारत में वर्तमान राजकोषीय नियामक संरचना क्या है? 

  • संवैधानिक स्तंभ: वित्त आयोग
    • संसाधन वितरण: यह ऊर्ध्वाधर वितरण (राज्यों को मिलने वाले केंद्रीय करों का हिस्सा) और क्षैतिज वितरण (जनसंख्या, आय अंतर तथा वन आवरण जैसे मानदंडों के आधार पर राज्यों के बीच आवंटन) की सिफारिश करता है।
      • अनुदान सहायता: यह उन सिद्धांतों को निर्धारित करता है जिनके आधार पर उन राज्यों को अनुदान प्रदान किया जाता है जो राजस्व घाटे का सामना कर रहे हैं या जिन्हें स्थानीय निकायों और आपदा प्रबंधन के लिये धन की आवश्यकता है।
      • संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत स्थापित वित्त आयोग राजकोषीय संघवाद के "संतुलन पहिये" के रूप में कार्य करता है।
  • विधायी स्तंभ: FRBM अधिनियम (2003)
    • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करने का प्राथमिक कानूनी साधन है।
    • मुख्य लक्ष्य: यह सरकार को राजकोषीय घाटे को सीमित करने और ऋण-से-GDP अनुपात को कम करने का निर्देश देता है ( एन.के. सिंह समिति ने सामान्य सरकारी ऋण के लिये 60%, केंद्र के लिये 40% तथा राज्यों के लिये 20% का लक्ष्य अनुशंसित किया था)।
    • पारदर्शिता: अधिनियम के अनुसार सरकार को प्रतिवर्ष बजट के साथ-साथ तीन नीतिगत वक्तव्य संसद के समक्ष प्रस्तुत करने होंगे:
      • मध्यम अवधि की राजकोषीय नीति वक्तव्य।
      • राजकोषीय नीति रणनीति वक्तव्य।
      • वृहद आर्थिक ढाँचागत विवरण।
    • बचाव खंड: धारा 4(2) के तहत असाधारण परिस्थितियों में GDP के 0.5% तक लक्ष्य विचलन की अनुमति।
  • राजस्व स्तंभ: GST परिषद
    • 101वें संवैधानिक संशोधन ने GST परिषद का गठन किया, जो केंद्र और राज्यों का एक संयुक्त मंच है।
      • यह अप्रत्यक्ष कराधान में सामंजस्य स्थापित करता है, जो राजस्व की स्थिरता के लिये महत्त्वपूर्ण है।
      • अधिकांश अप्रत्यक्ष करों को एक ही दायरे में लाकर, इसका उद्देश्य कर चोरी को कम करना और कर-से-GDP अनुपात में सुधार करना है, जो राजकोषीय स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक है।
  • संस्थागत निगरानी: नीति आयोग और CAG
    • नीति आयोग: हाल ही में, नीति आयोग ने राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) की शुरुआत की है। FHI विश्लेषण में भारत की अर्थव्यवस्था के लिये महत्त्वपूर्ण 18 प्रमुख राज्यों का सकल घरेलू उत्पाद (GDP), जनसंख्या, सार्वजनिक व्यय, राजस्व और समग्र राजकोषीय स्वास्थ्य में उनके योगदान के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है।
    • नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG): CAG केंद्र और राज्यों के खातों का लेखापरीक्षण करता है, यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक व्यय कानून के अनुरूप हो तथा "बजट से बाह्य ऋण" न लिया गया हो।

राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक

  • परिचय: नीति आयोग द्वारा जनवरी 2025 में जारी किया गया राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक (FHI) एक समग्र सूचकांक है, जो वित्त वर्ष 2022-23 के लिये CAG द्वारा लेखापरीक्षित आँकड़ों का उपयोग करके 18 प्रमुख भारतीय राज्यों की राजकोषीय स्वास्थ्य का आकलन करता है।
    • यह राजकोषीय घाटे के मुख्य आँकड़ों से आगे बढ़कर व्यय की गुणवत्ता, राजस्व क्षमता और ऋण स्थिरता का मूल्यांकन करता है।
  • महत्त्वपूर्ण संकेतक: 
    • राजस्व संग्रह: राज्यों का अपना राजस्व प्रदर्शन, कर प्रवाह और गैर-कर राजस्व।
    • व्यय प्रबंधन : व्यय की दक्षता, पूंजीगत व्यय की प्राथमिकता और राजकोषीय अनुशासन।
    • ऋण प्रबंधन: ऋण-से-GSDP स्तर, ब्याज भार और ऋण स्थिरता।
    • राजकोषीय घाटा नियंत्रण : सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के हिस्से के रूप में राजकोषीय घाटा और वैधानिक सीमाओं का अनुपालन।
    • समग्र राजकोषीय स्वास्थ्य : राजस्व, व्यय, घाटा और ऋण संकेतकों का एकीकृत मूल्यांकन।
  • मुख्य तथ्य:
    • राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक में ओडिशा 67.8 के शीर्ष स्कोर के साथ सबसे आगे है, उसके बाद छत्तीसगढ़, गोवा, झारखंड और गुजरात का स्थान आता है।
      • इसके विपरीत, पंजाब, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल को कम गुणवत्ता वाले व्यय, खराब ऋण स्थिरता तथा उच्च राजकोषीय घाटे सहित महत्त्वपूर्ण राजकोषीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

भारत का राजकोषीय समेकन दृष्टिकोण किस प्रकार विकसित हुआ है?

  • रणनीतिक परिवर्तन- घाटे से ऋण-आधारित वित्तीय प्रणाली की ओर: सरकार ने आधिकारिक रूप से अपनी मुख्य राजकोषीय दिशा को वार्षिक राजकोषीय घाटा से मध्यम अवधि के ऋण-से-GDP अनुपात पर स्थानांतरित करने की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य अंतरपीढ़ी समानता सुनिश्चित करना और संप्रभु रेटिंग उन्नयन सुरक्षित करना है। 
    • यह संरचनात्मक सुधार अल्पकालिक लेखांकन समायोजन के बजाए दीर्घकालीन भुगतान क्षमता को प्राथमिकता देता है, जो वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप परिपक्व राजकोषीय ढाँचे का संकेत देता है।।
      • उदाहरण के लिये, केंद्र ने वित्त वर्ष 2030-31 तक केंद्र सरकार के ऋण को GDP के लगभग 50±1% तक कम करने का एक मध्यम अवधि का उद्देश्य निर्धारित किया है, जिसमें वित्त वर्ष 2025-26 (BE) में GDP के 56.1% पर बजटीय बकाया देनदारियाँ वित्त वर्ष 2024-25 में 57.1 से घटकर 56.1% हो गई हैं।
  • वैश्विक चुनौतियों के बीच 'राजकोषीय संतुलन पथ' का पालन: वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता और चुनाव वर्ष के दबावों के बावजूद, केंद्र ने अपने राजकोषीय संतुलन पथ का सख्ती से पालन किया है, जो बाज़ार की विश्वसनीयता बनाने के लिये प्रतिचक्रीय राजकोषीय अनुशासन का प्रदर्शन करता है।
    • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा GDP का 4.4% निर्धारित किया गया, जो वित्त वर्ष 2024-25 के संशोधित 4.8% से कम है और मध्यम अवधि के 4.5% लक्ष्य के अनुरूप है।
  • 'कैपेक्स-आधारित' समेकन - व्यय की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना: उपभोग व्यय (राजस्व घाटा) में कटौती करते हुए पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) में आक्रामक रूप से वृद्धि करके "घाटे की गुणवत्ता" में सुधार करने के लिये एक सुनियोजित बहुआयामी रणनीति है। 
    • इससे यह सुनिश्चित होता है कि उधार का उपयोग परिसंपत्ति निर्माण (सड़कें, रक्षा, रेलवे) के लिये किया जाता है, जिसका राजकोषीय गुणक प्रभाव उच्च होता है, न कि वेतन या सब्सिडी के भुगतान के लिये।
      • उदाहरण के लिये, राजस्व घाटा वित्त वर्ष 2024-25 में GDP के 1.9% से घटकर वित्त वर्ष 2025-26 में 1.5% हो गया है, जबकि प्रभावी पूंजीगत व्यय वित्त वर्ष 2025 (आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26) में GDP के लगभग 4% तक बढ़ गया है।
  • डिजिटलीकरण से प्रेरित राजस्व वृद्धि: राजकोषीय समेकन अब कर दर वृद्धि के बजाए प्रौद्योगिकी (AI और डेटा एनालिटिक्स) के माध्यम से राजस्व बढ़ाने पर आधारित है। 
    • कर आधार का विस्तार और GST चोरी को रोकना इस रणनीति का हिस्सा है, जिससे कर क्षमता बढ़ती है तथा प्राकृतिक राजकोषीय स्थिरीकरण सुनिश्चित होता है।
      • उदाहरण के लिये आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या वित्त वर्ष 2021-22 में 6.9 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में लगभग 9.2 करोड़ हुई। कुल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा बढ़कर 58.8% हुआ (आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26), जिससे राजस्व क्षमता में उल्लेखनीय मज़बूती आई और राजकोषीय घाटे पर दबाव कम हुआ।
  • संयुक्त संघीय वित्तीय अनुशासन – ‘गाजर और छड़ी’ नीति: केंद्र ने एक सहयोगात्मक लेकिन सशर्त राजकोषीय ढाँचा लागू किया है, जो राज्य की उधार लेने की सीमा को विशिष्ट ऊर्जा और शहरी क्षेत्र के सुधारों से जोड़ता है। 
    • इसका उद्देश्य राज्य स्तर पर होने वाली राजकोषीय फिजूलखर्ची को रोकना है और यह सामान्य सरकारी ऋण (केंद्र + राज्य) को स्वास्थ्य का सही मापदंड मानती है।
      • उदाहरण के लिये, उप-राष्ट्रीय एकीकरण को प्रोत्साहित करते हुए, केंद्र ने वित्त वर्ष 2025-26 में राज्यों को 50 वर्षों के लिये ब्याज मुक्त ऋण के रूप में ₹1.5 लाख करोड़ आवंटित किये हैं, जिनका वितरण सुधारों और अनुपालन शर्तों से जुड़ा है, जबकि कुल राज्य सरकार का ऋण सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 27.5% पर बना हुआ है (2024-25 तक)।
  • सब्सिडी में संरचनात्मक सुधार:गैर-लाभकारी सब्सिडी बोझ को संरचनात्मक रूप से कम किया गया है, सार्वभौमिक सब्सिडी से लक्षित प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) मॉडल की ओर स्थानांतरण किया गया।
    • सरकार ने नैनो-यूरिया जैसे दक्षता उपायों के माध्यम से ईंधन और उर्वरक पर होने वाली भारी सब्सिडी में कटौती कर बजट में वित्तीय संसाधन सृजित किये, जिससे घाटा बढ़ाए बिना विकास-उन्मुख लक्ष्यों की प्राप्ति संभव हुई।
      • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025-26 में कुल सब्सिडी बिल GDP के लगभग 1.1% तक घटाया गया। इसके अलावा, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने सरकार को यूरिया के खुदरा मूल्य में वृद्धि करने की सलाह दी है, जो 2018 से 242 रुपये प्रति 45 किलोग्राम बैग पर अपरिवर्तित रहा है।
  • योजना आवंटन और शून्य-आधारित बजटिंग (ZBB): सरकार ने केंद्रीय योजनाओं के लिये शून्य-आधारित बजटिंग दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें निधि के दुरुपयोग को रोकने तथा परिणाम-आधारित व्यय में सुधार करने के लिये अनावश्यक कार्यक्रमों का विलय किया गया है। 
    • यह सुनिश्चित करता है कि हर उधार लिया गया रुपया मापनीय आर्थिक उत्पादन में योगदान करे, जिससे वह "प्राथमिक घाटा (Primary Deficit)" कम होता है, जो ब्याज भुगतान को छोड़कर वर्तमान राजकोषीय प्रवृत्ति को दर्शाता है।
      • उदाहरण के लिये, चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2026 की पहली छमाही में GDP के 0.8% तक कम हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2025 की पहली छमाही में यह 1.3% था (आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26)।
  • उप-राष्ट्रीय गैर-बजट देनदारियों (OBB) पर नियंत्रण: केंद्र ने राज्यों की शुद्ध ऋण सीमा में गैर-बजट उधार (OBB) को शामिल करके उप-राष्ट्रीय राजकोषीय अनुशासन को संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ कर दिया है, जिससे छिपे हुए लीवरेज और अपारदर्शी गारंटी के युग का प्रभावी रूप से अंत हो गया है। 
    • इस कदम से राज्यों को स्वयं का कर राजस्व (OTR) बढ़ाना और संभावित देनदारियों को ठीक करना पड़ता है, विशेषकर अतिरिक्त उधारी की अनुमति को सीधे मापनीय ऊर्जा क्षेत्र सुधारों से जोड़कर विद्युत क्षेत्र की स्थिरता सुनिश्चित की जाती है। 

भारत में राजकोषीय समेकन से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • कठोर 'प्रतिबद्ध व्यय' का जाल: प्राथमिक संरचनात्मक अड़चन "प्रतिबद्ध व्यय" (ब्याज, पेंशन, वेतन) की अत्यधिक कठोरता है, जो विकासात्मक लक्ष्यों के लिये उपलब्ध विवेकाधीन राजकोषीय स्थान को गंभीर रूप से सीमित करती है। 
    • इससे एक "कैंची प्रभाव" उत्पन्न होता है, जहाँ ऋण सेवा पूंजी सृजन को कम कर देती है, जिससे सरकार को नए आर्थिक मूल्य उत्पन्न करने के बजाए पुराने ब्याज का भुगतान करने के लिये उधार लेने के लिये मजबूर होना पड़ता है।
    • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2024–25 (RE) में ब्याज भुगतान राजस्व प्राप्तियों का लगभग 37% और कुल व्यय का 25% खा गया, जिसका मतलब है कि एक-तिहाई से अधिक कर राजस्व पहले से मौजूद देनदारियों द्वारा पूर्व-नियोजित है, इससे पहले कि संसाधन भविष्योन्मुख विकास के लिये लगाए जा सकें।
  • असमान संघीयता और 'सेस' समस्या: एक प्रमुख विवाद का मुद्दा राजस्व बढ़ाने के लिये केंद्र द्वारा "सेस तथा सरचार्ज" पर निर्भरता है, क्योंकि ये राज्यों के साथ साझा नहीं किये जाते हैं, जिससे वास्तविक हस्तांतरण का दायरा संवैधानिक भावना से नीचे सिकुड़ जाता है। 
    • इससे राज्यों को वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है और उन्हें या तो अपने विकासात्मक खर्च में कटौती करनी पड़ती है या स्थानीय बुनियादी ढाँचे के वित्तपोषण के लिये महंगे बाजार ऋण लेने पड़ते हैं।
    • वित्त आयोग द्वारा 41% हस्तांतरण अनिवार्य होने के बावजूद, उपकरों और अधिभारों के कारण राज्यों को मिलने वाला प्रभावी हिस्सा अक्सर लगभग 33% ही रहता है।
      • केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष में उपकर और अधिभार से लगभग 5.91 लाख करोड़ रुपये एकत्र करने का बजट बनाया है, जो वित्त वर्ष 2025 में हुए संग्रह की तुलना में 9.43% की वृद्धि है, जिससे राजकोषीय संघवाद को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।
  • 'कैपेक्स-उपभोग' ट्रेड-ऑफ: "कैपेक्स-आधारित समेकन" की ओर बदलाव अक्सर सामाजिक कल्याण पर राजस्व व्यय को कम करने की कीमत पर आता है, जिससे ग्रामीण उपभोग को कम करके "के-आकार" की रिकवरी को और खराब करने का जोखिम होता है।
    • यदि सरकार राजमार्गों के वित्तपोषण के लिये आर्थिक रूप से सबसे निचले तबके से वित्तीय सहायता वापस ले लेती है, तो इससे मांग में कमी के कारण मंदी आ सकती है जो अंततः पूंजीगत व्यय गुणक को अप्रभावी बना देगी।
    • साथ ही, सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) में 7.8% की वृद्धि हुई लेकिन यह GDP के 30% पर ही सीमित रहा। 
    • वित्त वर्ष 2023-24 में GFCF में निजी पूंजीगत व्यय का हिस्सा 34.4% तक गिर गया, जो 2011-12 के बाद सबसे कम है; ऐसे में सार्वजनिक कैपेक्स पर निर्भरता विकास में गिरावट (growth cliff) ला सकती है यदि निजी निवेश पुनर्जीवित न हो।
  • उप-राष्ट्रीय राजकोषीय अपारदर्शिता (OBB): हालाँकि केंद्र के घाटे के आँकड़े अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं, लेकिन राज्य स्वामित्व वाली संस्थाओं के माध्यम से "ऑफ-बजट उधार" (OBB) द्वारा घाटे को छिपाने से "सामान्य सरकार" की स्थिति कमज़ोर हो जाती है। 
    • यह अपारदर्शी लीवरेज एक छिपे हुए संप्रभु जोखिम के रूप में कार्य करता है, जिसका अर्थ है कि वास्तविक सार्वजनिक क्षेत्र की ऋण आवश्यकता (PSBR) राजकोषीय घाटे के मुख्य आँकड़ों से कहीं अधिक है।
      • उदाहरण के लिये, राज्य वित्त पर RBI के अध्ययन के अनुसार, कुल राज्य ऋण मार्च 2026 के अंत तक GDP के 29.2% तक बढ़ने का अनुमान है, जो कि FRBM की 20% की सीमा से कहीं अधिक है।
  • मानव पूंजी अवसर लागत: GDP गुणक को बढ़ावा देने के लिये "कठोर बुनियादी ढाँचा" (भौतिक परिसंपत्तियों) पर ज़ोर अक्सर "नरम बुनियादी ढाँचा" (स्वास्थ्य और शिक्षा) की उपेक्षा की ओर ले जाता है, जिनकी विकास अवधि लंबी होती है लेकिन दीर्घकालिक उत्पादकता अधिक होती है।
    • सामाजिक क्षेत्र के व्यय को सीमित करके घाटे को समेकित करने से भारत के जनांकिकीय लाभांश पर दबाव पड़ता है, जिससे अल्पकालिक लेखांकन स्थिरता के लिये दीर्घकालिक मानवीय क्षमता का समझौता करना पड़ सकता है।
      • उदाहरण के लिये, स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक व्यय GDP के 2% से कम है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के 2.5% लक्ष्य से बहुत कम है।
  • विनिवेश और परिसंपत्ति मुद्रीकरण में अनिश्चितता: सरकार का राजकोषीय गणित अक्सर महत्त्वाकांक्षी विनिवेश और परिसंपत्ति मुद्रीकरण लक्ष्यों (राष्ट्रीय मुद्रीकरण) पर निर्भर करता है, जो ऐतिहासिक रूप से बाज़ार की अस्थिरता या नौकरशाही देरी के कारण अधूरा रहता है।
    • जब ये "गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियाँ" कम पड़ती हैं, तो सरकार व्यय में कटौती करने या अतिरिक्त ऋण लेने के लिये विवश हो जाती है, जिससे राजकोषीय प्रवाह पथ की अखंडता खतरे में पड़ती है।
      • उदाहरण के लिये, वित्त वर्ष 2025 में सरकार ने शेयर बिक्री से ₹33,000 करोड़ जुटाए, जो उसके ₹50,000 करोड़ के विनिवेश लक्ष्य से कम थे।
  • वैश्विक बाहरी आघातों के प्रति संवेदनशीलता: भारत की राजकोषीय समेकन ऊर्जा मूल्य अस्थिरता और वैश्विक व्यापार में व्यवधानों के प्रति संवेदनशील है। भू-राजनीतिक विखंडन और टैरिफ युद्ध व्यापार से संबंधित राजस्व को कम कर सकते हैं, जबकि सब्सिडी व्यय बढ़ सकता है।
    • कच्चे तेल या उर्वरक की कीमतों में तीव्र वृद्धि घाटे के लक्ष्यों को जल्दी बाधित कर सकती है।
      • उदाहरण के लिये, तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की वृद्धि से चालू खाते की स्थिति लगभग 15 अरब डॉलर तक बिगड़ सकती है, जिससे प्रतिचक्रीय राजकोषीय हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। 

भारत के राजकोषीय स्वास्थ्य में सुधार करने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है? 

  • सब्सिडी में 'सनसेट क्लॉज़' का संस्थागतकरण: प्रतिबद्ध व्यय की कठोरता को कम करने के लिये, सरकार को सभी कल्याणकारी योजनाओं के लिये कानूनी रूप से 'सनसेट क्लॉज़' अनिवार्य करना चाहिये, जिसके तहत उन्हें एक निश्चित अवधि के बाद स्वतः समाप्त होना या कठोर पुनर्मूल्यांकन का सामना करना पड़े।
    • इससे अस्थायी राहत उपायों को स्थायी राजकोषीय बोझ में बदलने से रोका जा सकता है और आवधिक 'शून्य-आधारित बजट' समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि संसाधनों को उच्च प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में गतिशील रूप से पुनः आवंटित किया जाए, बजाए इसके कि वे पुरानी सुविधाओं में फंसे रहें जिनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है।
  • परिसंपत्ति मुद्रीकरण के माध्यम से 'पूंजी का पुनर्चक्रण': पूर्णतः निजीकरण के बजाए, ध्यान राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन पर केंद्रित होना चाहिये, जिसके तहत ब्राउनफील्ड परिसंपत्तियों (सड़कें, बिजली ग्रिड) को दीर्घकालिक निवेशकों को पट्टे पर देकर अग्रिम तरलता अनलॉक की जा सके।
    • 'पूंजी का पुनर्चक्रण' सरकार को नए ऋण जुटाए बिना, फँसी हुई इक्विटी का उपयोग करके नए ग्रीनफील्ड बुनियादी ढाँचे को वित्तपोषित करने की अनुमति देता है।
    • यह प्रभावी रूप से सरकार की भूमिका को परिसंपत्ति संचालक से परिसंपत्ति विकासकर्त्ता में बदल देता है, जिससे सार्वजनिक पूंजी की गति अधिकतम हो जाती है।
  • प्रदर्शन-आधारित राजकोषीय हस्तांतरण: राजकोषीय संघवाद ढाँचे को इस तरह से पुनर्गठित करने की आवश्यकता है जिससे राजकोषीय प्रदर्शन दक्षता को प्रोत्साहन मिले, जहाँ केंद्रीय हस्तांतरण का एक हिस्सा राज्यों द्वारा ऋण सीमा का पालन करने और बजट से बाहर के उधार को समाप्त करने से सख्ती से जुड़ा हो। 
    • इससे प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को प्रोत्साहन मिलता है, जिससे राज्य सरकारों को लोकलुभावन राजस्व व्यय की तुलना में पूंजी निर्माण को प्राथमिकता देने के लिये बाध्य होना पड़ता है। 
    • राज्य स्तरीय राजनीतिक प्रोत्साहनों को राष्ट्रीय व्यापक आर्थिक स्थिरता के साथ संरेखित करके, केंद्र उप-राष्ट्रीय राजकोषीय जोखिमों को कम कर सकता है।
  • राजस्व सग्रहण में एल्गोरिथम संबंधी बुद्धिमत्ता: प्रशासन को विवेकाधीन प्रवर्तन से हटकर एआई-संचालित गैर-हस्तक्षेपकारी अनुपालन का दृष्टिकोण अपनाना चाहिये और GST, आयकर तथा संपत्ति डेटाबेस को आपस में जोड़ने के लिये बड़े डेटा का लाभ उठाना चाहिये ताकि करदाताओं का 360-डिग्री दृष्टिकोण प्राप्त हो सके। 
    • इससे अनौपचारिक क्षेत्र में कर चोरी और उच्च-निवल-संपत्ति वाले कर-कर न दाखिल करने वालों की पहचान स्वचालित हो जाती है, बिना कर आतंकवाद या उत्पीड़न को बढ़ाए। 
    • कर आधार में मौजूद 'मिसिंग मिडिल' को ठीक करके, राज्य मौजूदा कर दरों में वृद्धि किये बिना कर उछाल और राजस्व लोच में सुधार कर सकता है।
  • स्वतंत्र निगरानी के साथ परिणाम-आधारित बजट: भारत को 'इनपुट-आधारित' आवंटन से हटकर सख्त 'परिणाम-आधारित बजट' की ओर बढ़ना होगा, जहाँ निधि जारी करना केवल उपयोग प्रमाण-पत्रों के बजाए सत्यापन योग्य, तृतीय-पक्ष द्वारा ऑडिट किये गए लक्ष्यों पर निर्भर करता है।
    • व्यय की गुणवत्ता की निगरानी के लिये एक स्वतंत्र वित्तीय परिषद की स्थापना जवाबदेही सुनिश्चित करती है और साल के अंत में होने वाले फिजूलखर्ची व्यय को रोकती है।
      • यह संस्थागत सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करता है कि उधार लिया गया प्रत्येक रुपया अर्थव्यवस्था पर एक ठोस गुणक प्रभाव डाले।
  • सरकारी बांड बाज़ार को मज़बूत बनाना: ब्याज दर में अस्थिरता के प्रति संवेदनशीलता को कम करने के लिये, ऋण प्रबंधन रणनीति को सरकारी प्रतिभूतियों की परिपक्वता अवधि को बढ़ाने और वैश्विक बांड सूचकांक में शामिल करके निवेशक आधार में विविधता लाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये। 
    • धैर्यवान और दीर्घकालिक वैश्विक पेंशन फंडों को भारतीय ऋण में आकर्षित करके, सरकार घरेलू बैंकिंग क्षेत्र के 'बाहर निकलने' की समस्या को कम कर सकती है।
    • इससे निजी क्षेत्र के लिये उधार लेने की लागत कम हो जाती है और घरेलू तरलता संबंधी आघातों के तुलना में यील्ड कर्व स्थिर हो जाता है।
  • 'ग्रीन फिस्कैलिटी' का एकीकरण: 'ग्रीन फिस्कल रिफॉर्म्स' लागू करके राजकोषीय नीति को भविष्य के लिये तैयार किया जाना चाहिये, जैसे विभेदक कराधान जो कार्बन-गहन इनपुट पर जुर्माना लगाता है जबकि हरित प्रौद्योगिकी को अपनाने पर कर छूट प्रदान करता है।
    • जलवायु परिवर्तन-अनुकूल परियोजनाओं के लिये आरक्षित संप्रभु हरित बांड जारी करने से सरकार कम लागत वाले वैश्विक ESG पूंजी स्रोत का लाभ उठा सकती है।
  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के माध्यम से औपचारिकीकरण: सरकार को नियामक दबाव के बजाए सरलीकृत अनुमानित कराधान और नकदी प्रवाह-आधारित ऋण प्रोटोकॉल (जैसे OCEN) के माध्यम से MSME के औपचारिकीकरण को प्रोत्साहित करने के लिये डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का लाभ उठाना चाहिये।
    • अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक ऋण और कर व्यवस्था के दायरे में लाने से छोटे उद्यमों के विकास के साथ-साथ प्रत्यक्ष कर आधार स्वाभाविक रूप से विस्तृत हो जाता है। 
      • इससे कुछ बड़े कॉरपोरेट करदाताओं पर निर्भरता कम होती है और अनुकूलित तथा विविध राजस्व संरचना का निर्माण होता है।

निष्कर्ष

भारत का राजकोषीय समेकन अब घाटे की गणना से आगे बढ़कर ऋण स्थिरता पर केंद्रित हो गया है, जो पूंजीगत व्यय-आधारित विकास और राजस्व प्रवृत्ति में सुदृढ़ता पर आधारित है। तथापि, इस मार्ग की दीर्घकालिक स्थिरता का निर्धारण राज्य-स्तरीय अनुशासन, व्यय की गुणवत्ता तथा संघीय समन्वय द्वारा होगा। प्रतिबद्ध व्यय, बजट-बाह्य जोखिमों और वैश्विक आघातों का प्रभावी प्रबंधन आवश्यक है, ताकि राजकोषीय विचलन को रोका जा सके। विकास-आधारित समेकन, सहकारी संघवाद तथा संस्थागत राजकोषीय सुरक्षा उपायों का विश्वसनीय संयोजन ही दीर्घकालिक व्यापक आर्थिक स्थिरता की कुंजी है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत ने राजकोषीय घाटा-लक्ष्यीकरण से हटकर ऋण-आधारित राजकोषीय ढाँचे को अपनाया है। इस परिवर्तन के पीछे के तर्क का परीक्षण कीजिये तथा मध्यम अवधि में ऋण स्थिरता सुनिश्चित करने में राज्य-स्तरीय राजकोषीय अनुशासन की भूमिका का विश्लेषण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. राजकोषीय समेकन क्या है?
यह दीर्घकालिक राजकोषीय स्वास्थ्य सुनिश्चित करने के लिये घाटे और ऋण को कम करने की प्रक्रिया है।

प्रश्न 2. भारत ने ऋण-आधारित राजकोषीय व्यवस्था का दृष्टिकोण क्यों अपनाया है? 
क्योंकि सार्वजनिक ऋण वार्षिक घाटे की तुलना में मध्यम अवधि की राजकोषीय स्वास्थ्य को बेहतर रूप से दर्शाता है।

प्रश्न 3. भारत की राजकोषीय स्थिति के लिये राज्य इतने महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
क्योंकि राज्यों की हिस्सेदारी सार्वजनिक ऋण का लगभग 40% और सार्वजनिक पूंजीगत व्यय का 60% से अधिक है।

प्रश्न 4. पूंजीगत व्यय के नेतृत्व में समेकन का उद्देश्य क्या प्राप्त करना है?
यह ऋण को उच्च विकास गुणकों के साथ परिसंपत्ति निर्माण में परिवर्तित करता है।

प्रश्न 5. भारत के राजकोषीय समेकन के मार्ग के लिये प्रमुख जोखिम क्या है?
उच्च निर्धारित व्यय और राज्य स्तर पर बजट से बाहर लिये गए ऋण।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. निम्नलिखित में से कौन-सा अपने प्रभाव में सबसे अधिक मुद्रास्फीति कारक हो सकता है? (2021)

(a) सार्वजनिक ऋण की चुकौती
(b) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये जनता से उधार लेना
(c) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये बैंकों से उधार लेना
(d) बजट घाटे के वित्तीयन के लिये नई मुद्रा का सृजन करना

उत्तर: (d)


प्रश्न 2. शासन के संदर्भ में निम्नलिखित पर विचार कीजिये: (2010)

  1. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अंतर्वाह को प्रोत्साहित करना
  2. उच्च शिक्षण संस्थान का निजीकरण 
  3. नौकरशाही का डाउन-साइजिंग 
  4. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के शेयरों को बेचना/बंद करना

उपर्युक्त में से किसका उपयोग भारत में राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के उपायों के रूप में किया जा सकता है? 

(a) केवल 1, 2 और 3
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1, 2 और 4
(d) केवल 3 और 4 

उत्तर: (d) 


मेन्स

प्रश्न 1. पूंजी बजट और राजस्व बजट के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिये। इन दोनों बजटों के संघटकों को समझाइये। (2021)

प्रश्न 2. क्या आप इस मत से सहमत हैं कि सकल घरेलू उत्पाद की स्थायी संवृद्धि तथा निम्न मुद्रास्फीति के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है? अपने तर्कों के समर्थन में कारण दीजिये। (2019)

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