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भारत का ई-कॉमर्स क्षेत्र: नीति-प्रेरित रूपांतरण

  • 30 Jan 2026
  • 236 min read

यह एडिटोरियल 24/01/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित “E-commerce promise for a Viksit Bharat” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। संपादकीय में इस बात का विश्लेषण किया गया है कि भारत का तेज़ी से बढ़ता ई-कॉमर्स क्षेत्र नवाचार, प्रतिस्पर्द्धा और समावेशन के बीच संतुलन बनाकर किस प्रकार विकसित भारत का आधार बन सकता है। इसमें संतुलित विनियमन की अनुशंसा की गई है, जो निष्पक्षता और उपभोक्ता विश्वास की रक्षा करते हुए लघु एवं मध्यम उद्यमों को सशक्त बनाए, निर्यात को बढ़ावा दे तथा डिजिटल-आधारित विकास को बनाए रखे।

प्रिलिम्स के लिये: ONDC, DPDP अधिनियम 2023, क्विक कॉमर्स, CCI, UPI, ई-कॉमर्स, व्यापार सक्षमता और विपणन (TEAM) योजना, 'वुमनिया' पहल, 'ई-कॉमर्स निर्यात हब' (ECEH)

मेन्स के लिये: भारत में ई-कॉमर्स के प्रमुख चालक, ई-कॉमर्स को मज़बूत करने के लिये उठाए गए उपाय, प्रमुख मुद्दे तथा ई-कॉमर्स को सुदृढ़ करने के उपाय।

भारत का ई-कॉमर्स क्षेत्र भारत की डिजिटल और उपभोग-आधारित वृद्धि का एक प्रमुख चालक बनकर उभरा है, जो शहरी बाज़ारों से कहीं आगे बढ़कर द्वितीय एवं तृतीय स्तर के शहरों तक विस्तृत हो चुका है। वर्ष 2024 में लगभग 125 अरब डॉलर के इस क्षेत्र के वर्ष 2030 तक 345 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जो इंटरनेट की बढ़ती एक्सेस, स्मार्टफोन के बढ़ते उपयोग एवं सुगम डिजिटल भुगतान के कारण संभव हो पाया है। UPI के भारी लेन-देन ने ऑनलाइन वाणिज्य को रोज़मर्रा की आर्थिक जीवनशैली का अभिन्न अंग बना दिया है, जिससे लघु एवं मध्यम उद्यमों और छोटे विक्रेताओं को सशक्त बनाया जा रहा है। ई-कॉमर्स अब रोज़गार, निर्यात, लॉजिस्टिक्स और नवाचार का आधार बन गया है, जिससे यह 'विकसित भारत' के दृष्टिकोण का केंद्र बन गया है।

भारत में ई-कॉमर्स के प्रमुख प्रेरक कारक क्या हैं?

  • लेन-देन की रीढ़ की हड्डी के रूप में डिजिटल भुगतान और UPI: तीव्र, कम लागत वाले, वास्तविक काल के भुगतानों ने ऑनलाइन लेन-देन के लिये बाधाओं को मौलिक रूप से कम कर दिया है तथा उपभोक्ता व्यवहार, विक्रेता ऑनबोर्डिंग एवं कार्यशील पूंजी चक्रों को बदलते हुए व्यक्ति-से-व्यापारी प्रवाह को सक्षम बनाया है। 
    • UPI की सर्वव्यापकता निपटान के समय को कम करती है, नकदी पर निर्भरता को घटाती है तथा सूक्ष्म लेन-देन को सक्षम बनाती है जिससे छोटे शहरों में कम मूल्य वाले डिजिटल वाणिज्य को व्यवहार्य बनाया जा सकता है। 
    • उदाहरण के लिये, UPI ने अगस्त 2025 में 24.85 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 20 अरब से अधिक लेन-देन संसाधित किये, जो भुगतान अवसंरचना के रूप में इसके व्यापक पैमाने को रेखांकित करता है।
  • इंटरनेट और स्मार्टफोन की बढ़ती एक्सेस मांग को बढ़ा रही है: इंटरनेट उपयोगकर्त्ताओं की बढ़ती संख्या और उपकरणों की घटती लागत ने लक्षित बाज़ार को महानगरों से लेकर ग्रामीण भारत तक विस्तारित कर दिया है, जिससे मांग की संरचना एवं पसंदीदा प्रारूप (शाॅर्ट वीडियो, स्थानीय भाषा, मोबाइल-फर्स्ट) दोनों में परिवर्तन आया है। 
    • इस लोकतांत्रिकरण से औसत ऑर्डर आवृत्ति बढ़ती है तथा नए वर्ग (ग्रामीण, वृद्ध, कम बिक्री मूल्य वाले) डिजिटल रिटेल की ओर आकर्षित होते हैं, जिससे प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्त्ता अनुभव, लॉजिस्टिक्स एवं भुगतान को स्थानीयकृत करने के लिये विवश होना पड़ता है। 
      • मज़बूत नेटवर्क अपग्रेड (4G, 5G और 6G का विस्तार) से बेहतर अनुभव (वीडियो कॉमर्स, लाइवस्ट्रीमिंग) संभव हो पाते हैं।
    • 'व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण: दूरसंचार, 2025' के अनुसार, भारत में वर्ष 2025 तक 800 मिलियन से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्त्ता होंगे तथा 85.5% घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन होगा।
  • लॉजिस्टिक्स, लास्ट-माइल नेटवर्क और कोल्ड-चेन का विकास: कुशल लॉजिस्टिक्स और हाइपरलोकल फुलफिलमेंट डिजिटल मांग को विश्वसनीय उपभोक्ता अनुभव में परिवर्तित करते हैं। 
    • वेयरहाउसिंग, रूट ऑप्टिमाइजेशन और डार्क स्टोर्स में निवेश से लीड टाइम एवं रिटर्न कम होते हैं। लॉजिस्टिक्स का व्यापक विस्तार कैटेगरी विस्तार (फ्रेश किराना सामान, फार्मास्यूटिकल्स) को सक्षम बनाता है और बार-बार खरीदारी में आने वाली दिक्कतों को कम करता है।
    • उदाहरण के लिये, क्विक कॉमर्स ने वर्ष 2024 में ई-ग्रॉसरी ऑर्डर का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हासिल किया तथा 6 बिलियन डॉलर से अधिक का बाज़ार विकसित किया, जो तेज़ी से पूर्ति-आधारित अंगीकरण को दर्शाता है।
  • MSME एकीकरण, ONDC और प्लेटफॉर्म लोकतंत्रीकरण: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म सूक्ष्म और लघु विक्रेताओं के लिये बाज़ार अभिगम्यता की लागत को कम करते हैं (उदाहरण के लिये, भारत में ई-कॉमर्स बिक्री का लगभग 70% MSME से संबंधित है), जिससे उत्पाद विविधता एवं भौगोलिक अभिगम्यता को बढ़ावा मिलता है। 
    • सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना (ONDC) और इंटरऑपरेबल नेटवर्क खोज को विकेंद्रीकृत करने तथा ‘विनर-टेक्स-मोस्ट’ प्रवृत्तियों को कम करने का प्रयास करते हैं, जिससे प्रवेश बाधाएँ घट सकती हैं और स्थानीय विक्रेताओं को प्रतिस्पर्द्धा का अवसर मिलता है।
    • उदाहरण के लिये, ONDC ने दिसंबर 2025 तक 630 से अधिक शहरों/कस्बों में 1.16 लाख से अधिक खुदरा विक्रेताओं के सक्रिय होने की रिपोर्ट दी, जो एक ओपन नेटवर्क दृष्टिकोण को वास्तविक रूप से अपनाने का संकेत देता है।
  • निर्यात और सीमा पार ई-कॉमर्स की क्षमता: डिजिटल प्लेटफॉर्म स्थानीय लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) की क्षमताओं (वस्त्र, हस्तशिल्प, विशेष खाद्य पदार्थ) को वैश्विक मांग चैनलों में परिवर्तित करते हैं। 
    • सफल एग्रीगेटर मॉडल विदेशों में विक्रेताओं की पहुँच को बढ़ाते हैं। मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के विकास और प्लेटफॉर्म निर्यात कार्यक्रम मूल्यवर्द्धित निर्यात के लिये बड़े गुणक उत्पन्न करते हैं।
    • उदाहरण के लिये, वर्ष 2015 से, अमेज़न ने अमेज़न ग्लोबल सेलिंग प्रोग्राम सहित भारत से 20 बिलियन डॉलर के संचयी ई-कॉमर्स निर्यात को सक्षम बनाया है। इसके अलावा, अमेज़न का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 80 बिलियन डॉलर का निर्यात करना है।
  • जनरेटिव AI, एनालिटिक्स और उत्पादकता लाभ: AI/ML खोज, गतिशील मूल्य निर्धारण, मांग पूर्वानुमान और इन्वेंट्री अनुकूलन में सुधार करता है, जिससे सकल व्यापार उत्पादकता बढ़ती है तथा विक्रेताओं के लिये कार्यशील पूंजी का दबाव कम होता है। 
    • वैयक्तिकरण, संवादात्मक वाणिज्य और स्वचालित ग्राहक सहायता से सेवा लागत कम होती है तथा रूपांतरण दर बढ़ती है।
      • एडॉप्शन कैटलॉग निर्माण, अनुवाद और लक्षित विपणन को स्वचालित करके छोटे व्यापारियों को सहायता प्रदान करता है।
    • उद्योग रिपोर्टों के अनुसार, जनरेटिव AI वर्ष 2030 तक AI-संचालित विकास और एंगेजमेंट के माध्यम से भारत के रिटेल, उपभोक्ता और ई-कॉमर्स क्षेत्रों में 35%–37% तक उत्पादकता वृद्धि ला सकता है, जो बड़े दक्षता लाभ को दर्शाता है।  
  • व्यावसायिक मॉडलों का विकास: विशुद्ध मार्केटप्लेस, इन्वेंटरी-आधारित वर्टिकली इंटीग्रेटेड रिटेल और क्विक कॉमर्स जैसे विविध मॉडल सह-अस्तित्व में हैं, जिनमें से प्रत्येक में ग्राहक अधिग्रहण लागत (CAC), मार्जिन और ग्राहक अनुभव पर नियंत्रण के बीच अलग-अलग तालमेल बिठाना पड़ता है। बाज़ार कम पूंजी निवेश के साथ उत्पादों की विस्तृत शृंखला उपलब्ध कराते हैं।
    • इन्वेंटरी मॉडल उच्च मार्जिन अर्जित करते हैं, लेकिन इसके लिये भारी पूंजीगत व्यय और इन्वेंटरी जोखिम की आवश्यकता होती है। त्वरित वाणिज्य मार्जिन के बदले समय का लाभ प्राप्त करता है।
    • उदाहरण के लिये, फ्लिपकार्ट की री-डोमिसिलियेशन और IPO योजनाएँ इन्वेंटरी प्लस मार्केटप्लेस हाइब्रिड की परिपक्वता को दर्शाती हैं, जबकि क्विक कॉमर्स ने ई-रिटेल खर्च का लगभग 10% हिस्सा प्राप्त कर लिया है।
  • प्रतिस्पर्द्धा और नियामक वातावरण: CCI द्वारा प्रतिस्पर्द्धा प्रवर्तन और न्यायिक समीक्षा प्लेटफॉर्म आचरण को आकार दे रही हैं। इसमें वरीयतापूर्ण व्यवहार, पैरिटी क्लॉज़ और डेटा-आधारित लाभों का नियमन किया जा रहा है, साथ ही नवाचार के प्रोत्साहनों को बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
    • उदाहरण के लिये, अप्रैल 2025 में, CCI ने एंड्रॉइड टीवी मामले में गूगल से अपनी तरह के पहले निपटान प्रस्ताव को मंजूरी दी।
      • इसके अंतर्गत Google ने ₹20.24 करोड़ का सेटलमेंट शुल्क अदा करने और बंडलिंग आवश्यकताओं को हटाने तथा निर्माताओं को वैकल्पिक Android-आधारित डिवाइस विकसित करने की अनुमति देने की प्रतिबद्धता जताई।

भारत में ई-कॉमर्स क्षेत्र को किस प्रकार विनियमित किया जा रहा है?

  • उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अंतर्गत निर्मित ये नियम ऑनलाइन खरीदारों के लिये प्राथमिक सुरक्षा कवच हैं। प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं:
    • शिकायत निवारण: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिये एक ‘शिकायत अधिकारी’ की नियुक्ति अनिवार्य है तथा उपभोक्ता की शिकायत को 48 घंटे के भीतर स्वीकार करना आवश्यक है।
    • पारदर्शिता: ई-कॉमर्स इकाइयों को ‘उत्पत्ति देश’, कुल मूल्य (जिसमें डिलीवरी शुल्क एवं कर शामिल हों) तथा रिफंड और एक्सचेंज नीतियों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना होता है।
    • अनुचित व्यापार प्रथाओं की रोकथाम: नियमों में अनुचित व्यापार प्रथाओं पर भी रोक लगाई गई है। ई-कॉमर्स संस्थाएँ भ्रामक विज्ञापन प्रकाशित नहीं कर सकतीं, फर्जी छूट की पेशकश नहीं कर सकतीं या झूठी समीक्षाएँ प्रदर्शित नहीं कर सकतीं। 
    • उपभोक्ता डेटा संरक्षण और निष्पक्ष रद्दीकरण मानदंड: किसी भी प्रकार का डेटा संग्रह उपभोक्ता की स्पष्ट सहमति से ही किया जा सकता है; पहले से टिक किये गए चेकबॉक्स की अनुमति नहीं है।
      • इसके अतिरिक्त, उपभोक्ताओं पर रद्दीकरण शुल्क तभी लगाया जा सकता है जब प्लेटफॉर्म को स्वयं भी रद्दीकरण की स्थिति में समान लागत वहन करनी पड़े।
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति और FEMA (विदेशी निवेश): उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (DPIIT) अमेज़न एवं फ्लिपकार्ट जैसी विदेशी वित्तपोषित दिग्गज कंपनियों के संचालन को नियंत्रित करता है।
    • मार्केटप्लेस बनाम इन्वेंटरी मॉडल: 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) केवल मार्केटप्लेस मॉडल में ही अनुमत है (जो खरीदारों और विक्रेताओं के बीच सेतु का काम करता है)। इन्वेंटरी-आधारित मॉडल में (जहाँ प्लेटफॉर्म वस्तुओं का मालिक होता है) FDI पूरी तरह से प्रतिबंधित है।
    • स्वामित्व संबंधी प्रतिबंध: कोई ई-कॉमर्स इकाई ऐसे विक्रेता से उत्पाद नहीं बेच सकती जिसमें उसकी इक्विटी हिस्सेदारी हो।
  • डेटा प्राइवेसी: डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023 के प्रभावी होने के बाद ई-कॉमर्स कंपनियों पर कड़े डेटा प्रबंधन मानदंड लागू हो गए हैं—
    • स्पष्ट सहमति: प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्त्ता डेटा एकत्र करने से पहले स्पष्ट और सूचित सहमति प्राप्त करनी होगी।
    • डेटा हटाने का अधिकार: उपयोगकर्त्ताओं को यह अधिकार प्राप्त है कि वे किसी 'उद्देश्य' (जैसे डिलीवरी) के पूरा हो जाने के बाद प्लेटफॉर्म से अपना व्यक्तिगत डेटा हटाने का अनुरोध कर सकते हैं।
    • भारी जुर्माना: नियमों का पालन न करने पर प्रति मामले 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
  • भारतीय प्रतिस्पर्द्धा आयोग (CCI): CCI एकाधिकार को रोकने के लिये 'बाज़ार प्रहरी' के रूप में कार्य करता है। यह विशेष रूप से निम्नलिखित की निगरानी करता है:
    • स्व-वरीयता: यह सुनिश्चित करना कि प्लेटफॉर्म तृतीय-पक्ष विक्रेताओं की तुलना में अपने स्वयं के 'निजी लेबल' को बेहतर खोज दृश्यता न दें।
    • एक्सक्लूसिव लॉन्च: प्लेटफॉर्म को ब्रांडों के साथ एक्सक्लूसिव डील (जैसे विशिष्ट स्मार्टफोन लॉन्च) करने से रोकना, जिससे अन्य प्रतिस्पर्द्धियों को बाहर कर दिया जाता है।

भारत में ई-कॉमर्स को बढ़ावा देने के लिये सरकार द्वारा क्या उपाय किये गए हैं?

  • ONDC – ई-कॉमर्स का लोकतंत्रीकरण: ONDC ई-कॉमर्स को बंद प्लेटफॉर्म से एक खुले नेटवर्क में स्थानांतरित करता है, जिससे किराना स्टोर और MSMEs को उच्च कमीशन एवं एल्गोरिदम पर निर्भरता को कम करते हुए विभिन्न ऐप्स के माध्यम से खरीदारों तक पहुँचने में सहायता मिलती है।
    • उदाहरण के लिये, ONDC ने मार्च 2025 तक 20.4 करोड़ से अधिक लेन-देन दर्ज किये और 7.6 लाख विक्रेताओं को अपने साथ जोड़ा।
  • GeM – सार्वजनिक खरीद में बदलाव: GeM ने पारदर्शिता और समावेशिता को बढ़ाकर सरकारी खरीद में क्रांति ला दी है।
    • 23 जनवरी, वर्ष 2025 तक GeM ने ₹4.09 लाख करोड़ का सकल व्यापार मूल्य (GMV) हासिल किया जो पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 50% की वृद्धि को दर्शाता है। इसके अंतर्गत 'वुमनिया' पहल के माध्यम से 1.8 लाख महिला-नेतृत्व वाले सूक्ष्म एवं लघु उद्यमों को जोड़ा गया है।
  • FTP 2023 के तहत ई-कॉमर्स निर्यात केंद्र: बंदरगाहों और हवाई अड्डों के पास स्थित ECEHs (इलेक्ट्रो -कॉमर्स एक्सपोर्ट हब्स) त्वरित सीमा शुल्क एवं भंडारण सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे छोटे निर्यातकों के लिये अनुपालन आसान हो जाता है तथा एकल-वस्तु वैश्विक शिपमेंट सक्षम हो जाते हैं। निर्यात कंसाइनमेंट की सीमा ₹10 लाख तक बढ़ायी गयी है।
  • इंडिया पोस्ट-ONDC एकीकरण के माध्यम से लास्ट-माइल लॉजिस्टिक्स: इंडिया पोस्ट और ONDC के एकीकरण से 1.6 लाख डाकघरों का लाभ उठाकर ग्रामीण क्षेत्रों में डिलीवरी की लागत को कम किया जा सकता है तथा डिजिटल वाणिज्य का विस्तार किया जा सकता है।
    • इंडिया पोस्ट ने जनवरी 2026 में अपना पहला आधिकारिक ONDC ऑर्डर डिलीवर किया।
  • डार्क पैटर्न दिशानिर्देशों के माध्यम से नियामक विश्वास: डार्क पैटर्न की रोकथाम एवं विनियमन के लिये दिशानिर्देश, 2023, जो 30 नवंबर 2023 को अधिसूचित किये गए थे, जिनमें ‘False Urgency’, ‘Basket Sneaking’ तथा ‘Confirm Shaming’ सहित 13 डार्क पैटर्न की पहचान कर उन्हें प्रतिबंधित किया गया है।
    • इसके अलावा, प्रस्तावित डिजिटल इंडिया अधिनियम का उद्देश्य वर्ष 2000 के पुराने IT अधिनियम को प्रतिस्थापित करना है, ताकि भारत के विकसित होते डिजिटल क्षेत्र को विनियमित करने के लिये एक भविष्य के लिये तैयार, व्यापक कानूनी ढाँचा स्थापित किया जा सके।
  • UPI पर क्रेडिट लाइन – वित्तीय समावेशन: UPI में अंतर्निहित पूर्व-स्वीकृत क्रेडिट लाइनें चेकआउट के समय तत्काल क्रेडिट सक्षम बनाती हैं, जिससे छोटे विक्रेताओं के लिये कार्यशील पूंजी में सुधार होता है तथा टियर-2 और टियर-3 शहरों में उपभोग को बढ़ावा मिलता है।
  • भाषिनी - ई-कॉमर्स में भाषाई समावेशन: भाषिनी का एकीकरण 22 भारतीय भाषाओं में ध्वनि-आधारित, बहुभाषी ई-कॉमर्स को सक्षम बनाता है, जिससे संवादात्मक भुगतान के माध्यम से ग्रामीण एवं स्थानीय भाषा बोलने वाले उपयोगकर्त्ताओं को सशक्त बनाया जा सकता है।
    • उदाहरण के लिये, ONDC पर भाषिनी-सक्षम 'सहायक' बॉट 5 भाषाओं (हिंदी, अंग्रेज़ी, मराठी, बांग्ला और तमिल) का समर्थन करता है।
  • TEAM योजना – MSME डिजिटल ऑनबोर्डिंग: केंद्र प्रायोजित RAMP कार्यक्रम की एक उप-योजना, TEAM योजना, MSME को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने के लिये डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ उठाती है, जिसका लक्ष्य वर्ष 2026 तक 5 लाख MSME को ONDC में शामिल करना है, जिसमें 50% महिला लाभार्थी होंगी।

भारत में ई-कॉमर्स क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं? 

  • एंटी-ट्रस्ट तथा ‘वरीयता प्राप्त विक्रेता’ (Preferred Seller) गठजोड़: मूल संरचनात्मक मुद्दा प्लेटफॉर्म-तटस्थता का विरोधाभास है, जहाँ अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट जैसी दिग्गज कंपनियाँ कथित तौर पर तीसरे पक्ष के व्यापारियों की तुलना में अपने स्वयं के इन्वेंट्री-धारक 'अल्फा विक्रेताओं' को प्राथमिकता देती हैं। 
    • इससे प्रतिस्पर्द्धा का माहौल असमान हो जाता है और साधारण विक्रेता केवल ‘डेटाबेस प्रविष्टियाँ’ बनकर रह जाते हैं, जो उन प्लेटफॉर्म-समर्थित इकाइयों से प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाते, जिन्हें सब्सिडी-युक्त लॉजिस्टिक्स और खोज-दृश्यता में कृत्रिम बढ़त प्राप्त होती है।
    • CCI की एक जाँच रिपोर्ट (2024) ने पुष्टि की कि अमेज़ॅन और फ्लिपकार्ट ने इन्वेंट्री को नियंत्रित करने के लिये चुनिंदा विक्रेताओं को प्राथमिकता दी।
      • डिजिटल प्रतिस्पर्द्धा विधेयक अभी भी लंबित है, जिसमें इस तरह के 'स्व-वरीयता' उल्लंघनों के लिये वैश्विक कारोबार के 10% तक के जुर्माने का प्रस्ताव है।
  • 'त्वरित वाणिज्य' सुरक्षा और श्रम संकट: '10-मिनट डिलीवरी' मॉडल (ब्लिंकइट, ज़ेप्टो) के विस्फोटक उदय ने मानवीय और नागरिक संकट को जन्म दिया है, जिसमें मानव सुरक्षा की तुलना में गति को प्राथमिकता दी गई है। 
    • यह 'प्रेशर कुकर' मॉडल गिग वर्कर्स को एल्गोरिदम द्वारा निर्धारित समय सीमा को पूरा करने के लिये यातायात नियमों का उल्लंघन करने के लिये विवश करता है, जिससे सड़क दुर्घटनाओं एवं श्रम हड़तालों में वृद्धि होती है, क्योंकि प्लेटफॉर्म 'तत्काल संतुष्टि' की कीमत को श्रमिक के जीवन व सार्वजनिक सुरक्षा पर थोप देते हैं।
    • उदाहरण के लिये, बंगलुरु में डिलीवरी एजेंटों द्वारा यातायात नियमों के उल्लंघन के मामले वर्ष 2023 से 2025 के बीच दोगुने हो गए हैं, जिनमें 1.46 लाख मामले दर्ज किये गए हैं। 
      • इन परिस्थितियों के प्रतिवाद में, गिग वर्कर्स यूनियनों ने जनवरी 2026 में राष्ट्रव्यापी हड़तालें कीं, जिनकी प्रमुख माँग बढ़ती मृत्यु-संख्या के कारण ‘10-मिनट से कम’ डिलीवरी वादे पर प्रतिबंध थी।
  • 'डार्क पैटर्न' और एल्गोरिदम मैनीपुलेशन: ई-कॉमर्स इंटरफेस उपभोक्ता व्यवहार-मनोविज्ञान का दुरुपयोग करते हुए ‘डार्क पैटर्न’ जैसे झूठी तात्कालिकता (“Only 2 left!” — सिर्फ 2 शेष!) और ‘बास्केट स्नीकिंग’ के माध्यम से उपभोक्ताओं को आवेगपूर्ण खरीद के लिये फँसा रहे हैं।
    • ये भ्रामक UX डिज़ाइन उपभोक्ता स्वायत्तता को कमजोर करते हैं और डिजिटल सहमति को एक हेरफेर-युक्त परिणाम में बदल देते हैं, जिसके चलते नियामक को केवल ‘दिशानिर्देश’ जारी करने के बजाय कठोर ‘स्व-ऑडिट’ को अनिवार्य (CCPA परामर्श, जून 2025) करना पड़ा।     
      • अध्ययनों में भारत के शीर्ष यात्रा और खुदरा ऐप्स में प्रचलित 13 विशिष्ट डार्क पैटर्न (जैसे, 'ड्रिप प्राइसिंग') पाए गए।
  • ONDC की 'अपनाई जाने की व्यवहार्यता' में अंतर: डिजिटल वर्चस्व को तोड़ने और डिजिटल एक्सेस को लोकतांत्रिक बनाने के उद्देश्य से शुरू किया गया ‘ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स’ (ONDC) विवाद निवारण एवं सेवा-संगति के संदर्भ में ‘कोल्ड-स्टार्ट’ समस्या से जूझ रहा है।
    • LocalCircles के सर्वेक्षण के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024–25 (मई 2025 तक) में केवल 15% ई-कॉमर्स उपभोक्ताओं ने ONDC के माध्यम से ऑर्डर दिया। 
      • एक अन्य सर्वेक्षण में 54% उपयोगकर्त्ताओं ने प्लेटफॉर्म को जटिल बताया, जबकि 35% ने कमज़ोर ग्राहक सहायता की शिकायत की, जिससे उपयोगकर्त्ता विश्वास और पुनः-उपयोग प्रभावित हुआ।
      • इससे यह संकेत मिलता है कि ONDC की प्रभावशीलता में बाधा मूल्य नहीं, बल्कि उपयोगिता और सेवा-अंतराल हैं।
  • नियामक अतिचार बनाम नवाचार का दमन: डिजिटल प्रतिस्पर्द्धा विधेयक के माध्यम से 'अपराध के बाद दंड देने' (एक्स-पोस्ट) से 'पूर्व-निवारक' (एक्स-एंटे) विनियमन में प्रस्तावित बदलाव स्टार्टअप्स के लिये अनुपालन संबंधी संकट उत्पन्न कर रहा है। 
    • उद्योग जगत के संगठनों का तर्क है कि उपयोगकर्त्ता सीमा के आधार पर सफल भारतीय प्लेटफॉर्मों को 'प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण डिजिटल उद्यम' (SSDEs) के रूप में नामित करने से विकास बाधित हो सकता है, जिससे घरेलू यूनिकॉर्न को वैश्विक बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों के लिये बनाए गए समान नियमों से बचने के लिये अपने विस्तार को धीमा करने के लिये विवश होना पड़ सकता है।  
      • इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (IAMAI) ने भी SSDE (सिस्टमैटिक डेवलपमेंट एंटरप्राइजेज) नामांकन की सीमाओं पर चिंता जताई है।
  • 'इन्वेंटरी मास्किंग' और FDI मानदंडों का उल्लंघन: एक लगातार संरचनात्मक समस्या 'प्रेस नोट 3' (जिसने ई-कॉमर्स संस्थाओं के लिये FDI जाँच को कड़ा कर दिया) का कथित उल्लंघन है, जो 'प्रॉक्सी विक्रेताओं' के जटिल जाल के माध्यम से किया जाता है।
    • नवनिर्मित शेल एंटिटीज के माध्यम से इन्वेंट्री को रूट कर वैश्विक कंपनियाँ मूल्य-नियंत्रण और ‘शोषणकारी छूट’ जारी रखती हैं, जिससे स्वतंत्र ऑफलाइन खुदरा क्षेत्र लगभग समाप्ति की कगार पर पहुँच जाता है।
    • उदाहरण के लिये, कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने आरोप लगाया है कि त्वरित-वाणिज्य प्लेटफॉर्म नियामक उल्लंघनों में लिप्त हैं, जिनमें प्रतिबंधित बाज़ार अभिगम्यता, पारदर्शिता की कमी, FEMA का उल्लंघन तथा प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002 के तहत प्रतिस्पर्द्धा-विरोधी प्रथाएँ शामिल हैं।
      • CAIT द्वारा जारी श्वेत पत्र में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि ये रणनीतियाँ एक अनुचित प्रतिस्पर्द्धा का माहौल बनाती हैं, जिससे 30 मिलियन किराना स्टोरों के लिये प्रतिस्पर्द्धा करना लगभग असंभव हो जाता है।
  • 'रिवर्स लॉजिस्टिक्स' कार्बन फुटप्रिंट संकट: यह उद्योग एक ऐसे स्थिरता संबंधी विरोधाभास से जूझ रहा है जहाँ उदार 'बिना सवाल पूछे' वापसी नीतियाँ 'रिवर्स लॉजिस्टिक्स' कार्बन बम का निर्माण करती हैं। 
    • यह चक्र एक ही वस्तु के परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को दोगुना कर देता है तथा प्रायः इसके परिणामस्वरूप 'खुले डिब्बे' वाले सामान को पुनः स्टॉक करने के बजाय नष्ट कर दिया जाता है या लैंडफिल में डाल दिया जाता है, जो भारत की 'लाइफ' (पर्यावरण के लिये जीवनशैली) तथा नेट-जीरो प्रतिबद्धताओं के सीधे विपरीत है।
    • उदाहरण के लिये, भारत में ऑनलाइन खरीदारी के लिये कपड़ों की वापसी दर काफी अधिक है, जो प्रायः 25% से 40% के बीच होती है। 
      • रिवर्स लॉजिस्टिक्स (वापसी) 'आधे भरे ट्रक' जैसी समस्या उत्पन्न करती है, जिससे प्रत्येक सफल बिक्री पर कार्बन फुटप्रिंट में काफी वृद्धि होती है।
  • AI-संचालित 'एस्ट्रोटर्फिंग' (नकली समीक्षा फार्म): जनरेटिव AI के दुरुपयोग से ‘रिव्यू फार्म’ उत्पाद पृष्ठों पर मिनटों में हज़ारों यथार्थ-सदृश नकली सकारात्मक समीक्षाएँ भर देते हैं, जिससे उपभोक्ता विश्वास क्षीण हो रहा है।
    • उदाहरण के लिये, केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण ने 450 से अधिक सामूहिक कार्रवाई नोटिस जारी किये हैं और 2.13 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना लगाया है, जिसमें डिजिटल बाज़ारों में भ्रामक विज्ञापनों और डार्क पैटर्न के खिलाफ कार्रवाई भी शामिल है।
    • यह 'एस्ट्रोटर्फिंग' '5-स्टार' प्रणाली की विश्वसनीयता नष्ट कर देती है और उपभोक्ताओं को निम्न-गुणवत्ता उत्पाद खरीदने हेतु भ्रमित करती है, जिसके कारण नियामकों को ‘स्वैच्छिक मानकों’ से आगे बढ़कर अनिवार्य दंडात्मक उत्तरदायित्व अपनाना पड़ रहा है।
  • ई-कॉमर्स में प्लास्टिक के प्रसार का संकट: बहुस्तरीय पैकेजिंग और सुरक्षात्मक पैडिंग (बबल रैप/टेप) के लिये गैर-बायोडिग्रेडेबल, एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग एक विशाल पर्यावरणीय प्रभाव उत्पन्न करता है जो पारंपरिक अपशिष्ट प्रबंधन को दरकिनार कर देता है। 
    • प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियमों में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) अनिवार्य होने के बावजूद, इसका प्रवर्तन कमज़ोर बना हुआ है क्योंकि प्लेटफॉर्म चक्रीय अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों की तुलना में लॉजिस्टिक्स सुरक्षा एवं लागत-दक्षता को प्राथमिकता देते हैं।
      • भारत में प्रतिवर्ष लगभग 93 लाख टन प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है तथा ई-कॉमर्स की तीव्र वृद्धि इस समस्या को और भी गंभीर बना रही है।

भारत में ई-कॉमर्स क्षेत्र को सुदृढ़ करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • ONDC 2.0 के माध्यम से 'संप्रभु अंतर-संचालनीयता' को गहन करना: वैश्विक प्लेटफॉर्मों के 'बंद दायरे' को समाप्त करने के लिये, डिजिटल वाणिज्य के लिये ओपन नेटवर्क (ONDC) को एक 'पूर्ण-स्तरीय' सार्वजनिक उपयोगिता में विकसित होना चाहिये। 
    • इसमें उच्च स्तरीय AI-संचालित कैटलॉगिंग स्वचालन और वास्तविक काल में शिकायत निवारण बॉट्स को सीधे प्रोटोकॉल में एकीकृत करना शामिल है। 
      • इन बैक-एंड सेवाओं को मानकीकृत करके, सरकार ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमों के लिये तकनीकी प्रवेश बाधा को कम कर सकती है, जिससे वे केवल कीमत के बजाय सेवा की गुणवत्ता पर प्रतिस्पर्द्धा कर सकेंगे तथा इस प्रकार एक सही मायने में विकेंद्रीकृत एवं प्रतिस्पर्द्धी 'भारत-स्तरीय' बाज़ार का निर्माण कर सकेंगे।
  • न्यायसंगत प्रतिस्पर्द्धा के लिये 'पूर्व-निर्धारित' विनियामक सुरक्षा उपायों को लागू करना: प्रणालीगत रूप से महत्त्वपूर्ण प्लेटफॉर्मों द्वारा एल्गोरिद्मिक स्व-वरीयता तथा अनुचित मूल्य-निर्धारण को रोकने के लिये प्रतिक्रियात्मक (एक्स-पोस्ट) से सक्रिय (एक्स-एंटे) प्रतिस्पर्द्धा विनियमन की ओर संक्रमण  करना महत्त्वपूर्ण है। 
    • इस उपाय के तहत 'प्लेटफॉर्म न्यूट्रल ऑडिट' को अनिवार्य बनाना आवश्यक है, जिसमें कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनकी खोज रैंकिंग योग्यता-आधारित है तथा उनके अपने 'अल्फा-विक्रेताओं' या संबंधित ब्रांडों के प्रति पक्षपाती नहीं है। 
    • इस तरह की पारदर्शिता 'विकसित भारत' की परिकल्पना की रक्षा करेगी, यह सुनिश्चित करते हुए कि घरेलू स्टार्टअप और MSME को धनी मौजूदा कंपनियों द्वारा संरचनात्मक रूप से हाशिए पर न डाल दिया जाए।
  • 'ग्रीन लॉजिस्टिक्स' और चक्रीयता जनादेश को क्रियान्वित करना: तीव्र डिलीवरी के भारी कार्बन फुटप्रिंट का मुकाबला करने के लिये, सरकार को उन प्लेटफॉर्मों के लिये 'चक्रीय अर्थव्यवस्था क्रेडिट' शुरू करना चाहिये, जो प्लास्टिक-मुक्त पैकेजिंग एवं इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बेड़े को अपनाते हैं। 
    • साधारण सब्सिडी के अलावा, इसमें चेकआउट के समय 'मरम्मत का अधिकार' प्रकटीकरण और 'ग्रीन डिलीवरी' विकल्प अनिवार्य करना शामिल है, जिससे उपभोक्ताओं को तत्काल संतुष्टि के बजाय समेकित, पर्यावरण के अनुकूल शिपिंग का विकल्प चुनने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके। 
    • इससे ई-कॉमर्स की वृद्धि भारत की नेट-ज़ीरो 2070 प्रतिबद्धताओं के अनुरूप हो जाती है, साथ ही शहरी अधोसंरचना पर अपशिष्ट प्रबंधन का दीर्घकालिक बोझ भी कम हो जाता है।
  • ग्रामीण डिजिटल व्यापार केंद्रों (RDTH) की स्थापना: शहरी-ग्रामीण विभाजन को समाप्त करने के लिये, सरकार को ज़िला स्तर पर 'दक्ष' केंद्रों को भौतिक-सह-डिजिटल केंद्रों के रूप में नामित करना चाहिये, जो साझा भंडारण, कोल्ड स्टोरेज और निर्यात-प्रसंस्करण सुविधाएँ प्रदान करते हैं। 
    • ये केंद्र पीएम गति शक्ति मास्टरप्लान के साथ एकीकृत 'फर्स्ट-माइल' संग्रह बिंदुओं के रूप में कार्य करेंगे, जिससे ग्रामीण उत्पादकों को मध्य्वर्तियों को दरकिनार करते हुए कम लॉजिस्टिक्स लागत के साथ राष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचने की सुविधा मिलेगी। 
    • भौतिक अवसंरचना की यह परत डिजिटल कनेक्टिविटी का आवश्यक पूरक है, जो यह सुनिश्चित करती है कि 'डिजिटल इंडिया' से कृषि प्रधान क्षेत्रों को ठोस आर्थिक लाभ प्राप्त हो।
  • डेटा सॉवरेनिटी और विश्वास पूंजी को बढ़ाना: उपभोक्ता विश्वास को मज़बूत करने के लिये ई-कॉमर्स ऐप्स के लिये 'प्राइवेसी-बाय-डिजाइन' प्रमाणपत्रों के माध्यम से डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम का कड़ाई से प्रवर्तन आवश्यक है।
    • उपायों में 'डार्क पैटर्न' (भ्रामक यूआई) पर प्रतिबंध लगाना और 'डेटा न्यूनीकरण' प्रोटोकॉल को अनिवार्य करना शामिल होना चाहिये, जहाँ प्लेटफॉर्म केवल लेन-देन के लिये आवश्यक न्यूनतम जानकारी ही एकत्र करते हैं। 
      • 'ट्रस्ट कैपिटल' का निर्माण करके, यह इकोसिस्टम अगले 500 मिलियन रूढ़िवादी उपयोगकर्त्ताओं को ऑनलाइन ला सकता है, जिससे ई-कॉमर्स एक शहरी सुविधा से एक सुरक्षित राष्ट्रीय आदत में परिवर्तित हो जाएगा।
  • गिग वर्कर्स के लिये 'कौशल-प्रमाणीकरण' को संस्थागत बनाना: ई-कॉमर्स की दीर्घकालिक स्थिरता एक औपचारिक कार्यबल पर निर्भर करती है; इसलिये, सरकार को डिलीवरी पार्टनर और वेयरहाउस कर्मचारियों के लिये एक 'सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा खाता' लागू करना चाहिये।
    • इसमें एक ऐसी पोर्टेबल लाभ प्रणाली बनाना शामिल है, जिसमें विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर काम किये गए प्रत्येक घंटे का योगदान एक एकीकृत स्वास्थ्य और पेंशन कोष में हो। श्रम आपूर्ति को स्थिर करके तथा गिग अर्थव्यवस्था को सम्मान प्रदान करके, यह क्षेत्र उच्च टर्नओवर दरों और श्रम हड़तालों को कम कर सकता है, जो वर्तमान में लास्ट-माइल डिलीवरी सीरीज़ की विश्वसनीयता को खतरे में डाल रही हैं।
  • 'गिग वर्कर सोशल सिक्योरिटी कमांड' को लागू करना: चूँकि यह क्षेत्र 'त्वरित वाणिज्य' श्रम बल पर बहुत अधिक निर्भर करता है, इसलिये राज्य को वैकल्पिक कल्याण से एक अनिवार्य, पोर्टेबल सामाजिक सुरक्षा कमांड में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। 
    • इसमें एक केंद्रीकृत डिजिटल खाता बही शामिल है जो एक एकीकृत स्वास्थ्य बीमा और पेंशन योजना प्रदान करने के लिये कई प्लेटफॉर्मों (स्विगी, ब्लिंकइट, ज़ेप्टो) पर एक डिलीवरी पार्टनर के 'सेवा घंटों' को ट्रैक करती है।
    • किसी एक नियोक्ता से मिलने वाले लाभों को अलग करके, सरकार अस्थिर गिग लेबर मार्केट को स्थिर कर सकती है, हड़तालों एवं उच्च टर्नओवर के परिचालन जोखिमों को कम कर सकती है, साथ ही '10-मिनट डिलीवरी' अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक मानवीय स्थिरता सुनिश्चित कर सकती है।
  • ई-कॉमर्स में ग्रीन पैकेजिंग को मुख्यधारा में लाना: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के लिये EPR मानदंडों के तहत पुनर्चक्रण योग्य, जैव अपघटनीय और खाद योग्य सामग्रियों के लिये न्यूनतम सीमा लागू की जानी चाहिये।
    • पर्यावरण के अनुकूल पैकेजिंग का उत्पादन करने वाले स्टार्टअप और MSME को GST प्रोत्साहन एवं व्यवहार्यता अंतर सहायता प्रदान किया जाना चाहिये।
    • ई-कॉमर्स कंपनियों को पैकेजिंग फुटप्रिंट के प्रकटीकरण तथा सामग्री तीव्रता घटाने हेतु ‘राइट-साइज़्ड’ पैकेजिंग अपनाने के लिये बाध्य किया जाना चाहिये।
    • पुनः प्रयोज्य पैकेजिंग और जमा-वापसी मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिये तथा पता लगाने की क्षमता और अनुपालन के लिये डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का लाभ उठाया जाना चाहिये।

निष्कर्ष: 

भारत का ई-कॉमर्स इकोसिस्टम डिजिटल नवाचार, समावेशी विकास और बाज़ार निष्पक्षता के समावेश पर आधारित है, जो इसे विकसित भारत की परिकल्पना का केंद्र बिंदु बनाता है। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, AI-संचालित उत्पादकता और MSME एकीकरण का लाभ उठाकर, यह क्षेत्र बड़े पैमाने पर रोज़गार, निर्यात एवं उद्यमिता को बढ़ावा दे सकता है। हालाँकि, इस गति को बनाए रखने के लिये प्रतिस्पर्द्धा में निष्पक्षता, विश्वास-आधारित डेटा प्रबंधन और मानवीय गिग-इकोनॉमी सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है। सुनियोजित विनियमन और नवाचार-अनुकूल नीति के साथ, ई-कॉमर्स एक सुविधा संपन्न अर्थव्यवस्था से विकसित होकर विकसित भारत के लिये राष्ट्र निर्माण का एक प्रेरक इंजन बन सकता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

प्रश्न.“ई-कॉमर्स भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था और विकसित भारत की परिकल्पना का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है।” भारत में ई-कॉमर्स के विकास के प्रमुख कारकों पर चर्चा कीजिये तथा उन संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये जो इसकी दीर्घकालिक स्थिरता में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।

       

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. विकसित भारत के लिये ई-कॉमर्स का क्या महत्त्व है?
यह डिजिटल समावेशन, MSME के विकास, रोज़गार सृजन, निर्यात और उपभोग-आधारित आर्थिक विस्तार को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 2.  UPI को भारत के ई-कॉमर्स विकास की रीढ़ क्यों माना जाता है?
UPI कम लागत वाले, रियल टाइम भुगतान को सक्षम बनाता है, जिससे लेन-देन में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं तथा ई-कॉमर्स का विस्तार छोटे शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रों तक होता है।

प्रश्न 3. ONDC क्या है और इसे क्यों शुरू किया गया था?
ONDC एक ओपन डिजिटल नेटवर्क है जिसका उद्देश्य प्लेटफॉर्म के एकाधिकार को कम करके और छोटे विक्रेताओं के लिये प्रवेश बाधाओं को कम करके ई-कॉमर्स का लोकतंत्रीकरण करना है।

प्रश्न 4. भारत के ई-कॉमर्स क्षेत्र में प्रमुख नियामक चिंताएँ क्या हैं?
प्लेटफॉर्म का प्रभुत्व, एल्गोरिदम की अस्पष्टता, डार्क पैटर्न, डेटा का दुरुपयोग और गिग-वर्कर का शोषण।

प्रश्न 5. डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम ई-कॉमर्स को किस प्रकार समर्थन देता है?
सहमति आधारित डेटा उपयोग सुनिश्चित करके, उपभोक्ता विश्वास बढ़ाकर और सतत डिजिटल वाणिज्य विकास को सक्षम बनाकर।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स 

प्रश्न 1. भारत में कार्य कर रही विदेशी-स्वामित्व की e-वाणिज्य फर्मों के सन्दर्भ में, निम्नलिखित कथनों में कौन-सा/से सही है/हैं? (2022)

  1. अपने प्लेटफॉर्मों को बाज़ार-स्थान के रूप में प्रस्तुत करने के अतिरिक्त वे स्वयं अपने माल का विक्रय भी कर सकते हैं। 
  2. वे अपने प्लेटफॉर्मों पर किस अंश तक बड़े विक्रेताओं को स्वीकार कर सकते हैं, यह सीमित है।

नीचे दिए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों 

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (b)

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