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भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौता और रणनीतिक पुनर्गठन

  • 29 Jan 2026
  • 194 min read

यह लेख 27/01/2026 को द हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित “India-EU ties: Stagnation to strategic realignment” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत-यूरोपियन यूनियन संबंधों के दीर्घकालिक स्थिरता से रणनीतिक पुनर्गठन की ओर परिवर्तन का विश्लेषण करता है। इस लेख में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) और व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा तथा स्थिरता के क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग किस प्रकार इस संबंध को उभरती बहुध्रुवीय व्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ बनाते हैं।

प्रिलिम्स के लिये: CBAM, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम, भारत-EU FTA, TRIPS, नॉन टैरिफ बैरियर्स।

मेन्स के लिये: समय के साथ भारत-यूरोपियन यूनियन के संबंध, भारत-यूरोपियन यूनियन के मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर के चरण, भारत-यूरोपियन यूनियन के बीच सामंजस्य और मतभेद के प्रमुख क्षेत्र, संबंधों को घनिष्ठ करने के लिये आवश्यक उपाय।

विखंडित आपूर्ति शृंखलाओं, प्रतिबंधों, राजनीति और बढ़ती महाशक्ति प्रतिद्वंद्विता से ग्रस्त विश्व में भारत और यूरोपियन यूनियन ने भारत–यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर करके एक निर्णायक भू-राजनीतिक कदम उठाया है। द्विपक्षीय व्यापार 136 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है, यूरोपियन यूनियन भारत के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में 16% का योगदान देता है और इस FTA से 75 अरब डॉलर के अतिरिक्त निर्यात को बढ़ावा मिलने की संभावना है। आर्थिक एकीकरण अब रणनीतिक संरेखण को सुदृढ़ कर रहा है। यूरोप के लिये यह समझौता चीन और अमेरिका पर निर्भरता कम करने में सहायक है तथा भारत के लिये, यह विश्व के सबसे बड़े एकल बाज़ार तक पहुँच सुनिश्चित करता है। दोनों साझेदार मिलकर एक उभरती हुई बहुध्रुवीय, विनियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता के स्तंभ के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहे हैं।

समय के साथ भारत-यूरोपियन यूनियन के संबंध किस प्रकार विकसित हुए हैं? 

  • चरण I: सिद्धांतगत सहभागिता (1990 के दशक-2004)
    • शीत युद्ध के बाद की पुनर्संरचना के कारण व्यापार, विकास सहायता एवं साझा लोकतांत्रिक मूल्यों से प्रेरित आर्थिक और राजनीतिक जुड़ाव हुआ, जिसके परिणाम वर्ष 2004 में रणनीतिक संबंध के रूप में सामने आए।
  • चरण II: संस्थागत आशावाद, सीमित अभिसरण (2005-2013)
    • संयुक्त कार्य योजना (2005) और व्यापक व्यापार तथा निवेश समझौते (BTIA) वार्ता (2007) ने संवाद संरचना का विस्तार किया, लेकिन यूरोज़ोन संकट, विनियामक भिन्नता एवं राजनीतिक दबाव की कमी के कारण प्रगति स्थिर रही, जिससे महत्त्वाकांक्षा व कार्यान्वयन के बीच अंतर उजागर हुआ।
  • चरण III: वैश्विक अनिश्चितता में रणनीतिक असंतुलन (2014-2019)
    • व्यापार वृद्धि के बावजूद, यूरोप के अंतर्मुखी रवैये और भारत द्वारा संबंधों में विविधीकरण लाने के प्रयासों के कारण संबंध आर्थिक रूप से लेन-देन-केंद्रित एवं भू-राजनीतिक रूप से अपर्याप्त बने रहे।
  • चरण IV: रणनीतिक पुनर्संरेखण (2020-2024)
    • कोविड-19, आपूर्ति-शृंखला के झटके एवं चीन की आक्रामकता ने अनुकूलन क्षमता, प्रौद्योगिकी तथा इंडो-पैसिफिक पर अभिसरण को प्रेरित किया, जिससे व्यापार वार्ता तथा व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (2022) का पुनरुद्धार हुआ।
      • दोनों पक्षों ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का पुनर्मूल्यांकन केवल एक वाणिज्यिक साधन के रूप में नहीं, बल्कि अनुकूलन क्षमता, विविधीकरण और रणनीतिक स्वायत्तता के एक उपकरण के रूप में करना शुरू कर दिया।
  • चरण V: रणनीतिक समेकन (2025-वर्तमान)
    • भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौता (FTA), सुरक्षा और रक्षा साझेदारी तथा गतिशीलता संरचना पर हस्ताक्षर क्षेत्रीय सहयोग से हटकर व्यापक रणनीतिक संरेखण की ओर एक परिवर्तन का संकेत देते हैं, जो भारत एवं यूरोपियन यूनियन को एक स्थिर बहुध्रुवीय व्यवस्था के सह-निर्माता के रूप में स्थापित करते हैं।

भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौते की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?

  • वस्तुओं के व्यापार में टैरिफ उदारीकरण: यूरोपियन यूनियन में भारत के 99% से अधिक निर्यात (मूल्य के आधार पर) के लिये वरीयता पहुँच।
    • श्रम प्रधान क्षेत्रों के एक बड़े हिस्से के लिये तत्काल शून्य-शुल्क पहुँच।
    • चयनित संवेदनशील उत्पादों के लिये चरणबद्ध तरीके से शुल्क उन्मूलन और निर्धारित स्तर पर शुल्क कटौती।
    • घरेलू संरक्षण के साथ बाज़ार पहुँच को संतुलित करने के लिये ऑटोमोबाइल, इस्पात, चयनित कृषि और समुद्री उत्पादों के लिये टैरिफ दर कोटा (TRQ) का उपयोग।
  • EU के निर्यात के लिये समन्वित पारस्परिक बाज़ार पहुँच: भारत यूरोपियन यूनियन के 97.5% निर्यात को कवर करने वाली 92.1% टैरिफ लाइनों पर टैरिफ छूट प्रदान करता है।
    • संवेदनशील औद्योगिक वस्तुओं पर लगने वाले शुल्क को 5-10 वर्षों में क्रमिक टैरिफ उन्मूलन।
    • सीमित श्रेणी के फलों के लिये TRQ के माध्यम से कृषि में नियंत्रित उदारीकरण
    • इससे यूरोपियन यूनियन से प्राप्त उच्च-प्रौद्योगिकी उत्पादों तक पहुँच आसान हो जाती है, जिससे उत्पादन लागत कम होती है और भारतीय उद्योग की प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ती है।
  • उत्पाद-विशिष्ट उत्पत्ति नियम (PSR): स्पष्ट रूप से परिभाषित उत्पत्ति मानदंड जो भारत या यूरोपियन यूनियन के भीतर पर्याप्त प्रसंस्करण सुनिश्चित करते हैं।
    • व्यापार विचलन को रोकने के लिये मौजूदा वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ संरेखण।
    • गैर-उत्पत्ति वाले इनपुट की सोर्सिंग में लचीलापन, विशेष रूप से MSME को लाभ पहुँचाता है।
    • अनुपालन लागत को कम करने के लिये स्व-प्रमाणीकरण (उत्पत्ति का विवरण) का प्रावधान।
  • सुरक्षित कृषि उदारीकरण:
    • EU ने भारतीय कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात को अनुकूल तथा प्राथमिक बाज़ार पहुँच देने की प्रतिबद्धता जताई है।
      • इसमें चाय, कॉफी, मसाले, ताजे फल और सब्ज़ियाँ तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ जैसे प्रमुख उत्पाद शामिल हैं, जहाँ भारत को तुलनात्मक लाभ प्राप्त है।
    • भारत ने कृषि क्षेत्र में सतर्क और सुविचारित दृष्टिकोण अपनाते हुए संवेदनशील क्षेत्रों में यूरोपियन यूनियन को बाज़ार पहुँच प्रदान नहीं की है।
      • इनमें डेयरी उत्पाद, अनाज, मुर्गी पालन, सोयामील और कुछ फल एवं सब्ज़ियाँ शामिल हैं, जो घरेलू खाद्य सुरक्षा, किसानों की आजीविका तथा ग्रामीण रोज़गार के लिये महत्त्वपूर्ण हैं। 
  • सेवा व्यापार: उच्च मूल्य प्रतिबद्धताएँ
    • यूरोपियन यूनियन ने भारतीय सेवा आपूर्तिकर्त्ताओं के लिये 144 सेवा उपक्षेत्रों को खोलकर सेवा क्षेत्र में व्यावसायिक रूप से सार्थक और पूर्वानुमानित प्रतिबद्धताएँ की हैं।
      • इसमें IT और IT-सक्षम सेवाएँ, पेशेवर सेवाएँ, अन्य व्यावसायिक सेवाएँ तथा शिक्षा सेवाएँ शामिल हैं। EU ने गैर-भेदभावपूर्ण उपचार एवं नियामक निश्चितता भी सुनिश्चित की है।
    • भारत ने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के तहत यूरोपियन यूनियन के सेवा प्रदाताओं के लिये 102 सेवा उपक्षेत्रों को खोलने की प्रतिबद्धता जताई है।
    • इन प्रतिबद्धताओं का उद्देश्य उच्च-प्रौद्योगिकी सेवाओं, निवेश और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के भारत में प्रवेश को सुगम बनाना है।
  • पेशेवरों की गतिशीलता और आवागमन
    • यूरोपियन यूनियन ने पेशेवरों की कई श्रेणियों को कवर करने वाले एक सुगम और पूर्वानुमानित गतिशीलता ढाँचे पर सहमति व्यक्त की है।
      • इसमें इंट्रा-कॉर्पोरेट ट्रांसफरी (ICT) और व्यावसायिक आगंतुकों के लिये पहुँच शामिल है, साथ ही संविदात्मक सेवा आपूर्तिकर्त्ताओं (CSS) के लिये 37 क्षेत्रों में और स्वतंत्र पेशेवरों के लिये 17 क्षेत्रों में प्रतिबद्धताएँ शामिल हैं। 
        • इसके अलावा, यूरोपियन यूनियन ने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के आश्रितों और परिवार के सदस्यों के लिये प्रवेश तथा कार्य करने के अधिकारों का विस्तार किया है, साथ ही छात्र गतिशीलता एवं पोस्ट-स्टडी वर्क अवसरों का समर्थन करने वाले प्रावधानों को भी शामिल किया है। 
        • यूरोपियन यूनियन के देशों में जहाँ नियम नहीं हैं, वहाँ आयुष चिकित्सक भारत में प्राप्त पेशेवर योग्यताओं के आधार पर सेवाएँ प्रदान कर सकेंगे।
  • FTA (मुक्त व्यापार समझौता) व्यापारिक गतिशीलता के लिये एक पूर्वानुमानित और सुगम ढाँचा स्थापित करता है, जिसमें दोनों दिशाओं में अल्पकालिक, अस्थायी तथा व्यावसायिक यात्रा शामिल है।
    • इसके अतिरिक्त, भारत ने पाँच वर्ष की अवधि में सामाजिक सुरक्षा समझौतों पर रचनात्मक संवाद के लिये एक ढाँचा तैयार किया है, जिसका उद्देश्य दोहरी सामाजिक सुरक्षा अंशदान के बोझ को कम करना और व्यावसायिक गतिशीलता को सुविधाजनक बनाना है।
  • गैर-टैरिफ बाधाएँ और व्यापार सुविधा: 
    • यूरोपियन यूनियन ने नियामक पारदर्शिता, सीमा शुल्क प्रक्रिया सरलीकरण और स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता SPS उपायों में सुधार के माध्यम से गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने की प्रतिबद्धता जताई है।
      • इन उपायों का उद्देश्य भारतीय निर्यातकों, विशेष रूप से कृषि, खाद्य और विनिर्मित वस्तुओं के क्षेत्र में उनके सामने आने वाली प्रक्रियात्मक तथा अनुपालन संबंधी चुनौतियों का समाधान करना है।
    • भारत सीमा शुल्क, व्यापार सुगमता, व्यापार सुरक्षा और व्यापार में तकनीकी बाधाओं (TBT) से संबंधित नियमों पर सहयोग को सुदृढ़ करने के लिये सहमत हो गया है। 
  • CBAM और जलवायु–व्यापार इंटरफेस:
    • मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के तहत यूरोपियन यूनियन ने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) से संबंधित भविष्योन्मुखी आश्वासन प्रदान किये हैं। 
      • यह समझौता भारत को सर्वोपरि राष्ट्र का आश्वासन प्रदान करता है, जिसके तहत कार्बन सीमा समायोजन तंत्र के अंतर्गत यूरोपियन यूनियन द्वारा तीसरे देशों को दी जाने वाली कोई भी छूट भारत पर लागू होगी।
    • भारत ने अपनी विकास प्राथमिकताओं की रक्षा करते हुए CBAM से संबंधित मुद्दों पर रचनात्मक संवाद के लिये सहमति व्यक्त की है।
    • भारत दबाव के बजाय सहयोग के माध्यम से जलवायु कार्रवाई को व्यापार प्रतिस्पर्द्धा के साथ संरेखित करने का प्रयास करता है, यह सुनिश्चित करते हुए कि पर्यावरणीय मानक अप्रत्यक्ष व्यापार बाधाएँ न बन जाएँ।

  • नोट : भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते के तहत, भारत में आयातित कारों पर शुल्क धीरे-धीरे 110% से घटकर 10% हो जाएगा, जिसके लिये प्रति वर्ष 250,000 वाहनों का कोटा निर्धारित है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहन (EVs) को टैरिफ छूट से बाहर रखा गया है।
    • इस कदम से उन यूरोपीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं को लाभ होने की संभावना है, जिनकी वर्तमान में भारत के कार बाज़ार में 4% से भी कम हिस्सेदारी है तथा यह नए निवेश आकर्षित कर सकता है।
  • हालाँकि, शुरुआती टैरिफ कटौती से भारत की घरेलू ऑटोमोबाइल उद्योग की वृद्धि पर प्रभाव पड़ने की चिंताएँ हैं, विशेषकर तब तक जब तक वे वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता हासिल नहीं कर लेते, जिससे स्थानीय निर्माताओं और उभरते EV क्षेत्र पर असर पड़ सकता है।

भारत–EU संबंधों में अन्य साझा क्षेत्र कौन-से हैं?

  • सामरिक स्वायत्तता और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था: अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता के बीच गुटीय राजनीति का विरोध करने तथा सामरिक स्वायत्तता को संरक्षित करने के लिये भारत एवं यूरोपियन यूनियन एकमत हैं।
    • दोनों पक्ष द्वंद्व बजाए मुद्दे-आधारित गठबंधन, संप्रभुता और लचीलेपन को प्राथमिकता देते हैं।
      • यह संरेखण उन्हें स्थिर मध्य शक्तियों के रूप में स्थापित करता है, जो बहुध्रुवीय व्यवस्था को आकार देने में सक्षम हैं।
    • भारत-यूरोपियन यूनियन के संयुक्त व्यापक रणनीतिक एजेंडा ने समृद्धि और स्थिरता के प्रति प्रतिबद्धता की पुष्टि की। यूरोपियन यूनियन के नेता भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि थे, जो राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत है।
  • रक्षा, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की स्थिरता: समुद्री मार्गों में व्यवधान, साइबर खतरे तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दबाव जैसी चुनौतियों के कारण सुरक्षा अभिसरण बढ़ गया है।
    • भारत क्षेत्रीय उपस्थिति और नौसैनिक क्षमता लाता है, जबकि यूरोपियन यूनियन क्षमता निर्माण और समुद्री जानकारी में योगदान देता है।
    • सुरक्षा और रक्षा साझेदारी (SDP): समुद्री सुरक्षा, साइबर रक्षा, आतंकवाद विरोधी उपाय तथा संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों में सहयोग को बढ़ाती है।
    • सुरक्षा सहयोग अब आर्थिक संबंधों का पूरक बन गया है।
  • आपूर्ति शृंखला में लचीलापन और चीन पर निर्भरता कम करना: भारत तथा यूरोपियन यूनियन चाहते हैं कि केंद्रित विनिर्माण पर अत्यधिक निर्भरता, विशेष रूप से चीन पर, बिना संबंध तोड़े कम की जाए।
    • भारत के पास विशाल आकार, जनसांख्यिकी और विनिर्माण क्षमता है, जबकि यूरोपियन यूनियन पूंजी, प्रौद्योगिकी तथा मानक प्रदान करता है। यह अभिसरण विचारधारा के बजाए जोखिम प्रबंधन द्वारा संचालित है। यूरोपियन यूनियन भारत को विविधीकरण का विश्वसनीय भागीदार मानता है। 
      • उदाहरण के लिये, भारत में कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) में यूरोपियन यूनियन की कंपनियों का हिस्सा 16% है, जिनमें से 6,000 से अधिक कंपनियाँ स्थानीय स्तर पर कार्यरत हैं।
      • यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इस भावना का समर्थन करते हुए कहा था: 'जब भारत सफल होता है, तो विश्व अधिक स्थिर, अधिक समृद्ध और अधिक सुरक्षित होता है और हम सभी को इसका लाभ मिलता है।'
  • प्रौद्योगिकी शासन और विश्वसनीय डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र: भारत तथा यूरोपियन यूनियन प्रौद्योगिकी के लोकतांत्रिक शासन की आवश्यकता पर सहमत हैं। 
    • अमेरिका के बाज़ार-आधारित दृष्टिकोण या चीन के राज्य-केंद्रित मॉडल के विपरीत, ये दोनों पक्ष विनियम-आधारित डिजिटल व्यवस्था का समर्थन करते हैं। सहयोग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, साइबर मानदंड और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना शामिल हैं।
    • भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद (2022) ने विश्वसनीय प्रौद्योगिकी, आपूर्ति शृंखलाओं और हरित प्रौद्योगिकियों पर सहयोग को संस्थागत रूप दिया है।
    • बहुपक्षवाद और वैश्विक शासन सुधार: विखंडन, प्रतिबंधों की राजनीति और शासन व्यवस्था के क्षरण के दौर में भारत तथा यूरोपियन यूनियन बहुपक्षीय संस्थानों की रक्षा करने में एकमत हैं। दोनों ही वैश्विक स्थिरता के लिये एकतरफा कार्रवाई के बजाए सुधारित बहुपक्षवाद को आवश्यक मानते हैं। भारत का उदय और यूरोपियन यूनियन का मानक महत्त्व तेजी से एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं। 
      • भारत और यूरोपियन यूनियन G20, विश्व व्यापार संगठन (WTO) सुधार संबंधी संवाद तथा जलवायु वार्ताओं जैसे मंचों में अपनी स्थिति का समन्वय करते हैं।

भारत-यूरोपियन यूनियन संबंधों में मतभेद के प्रमुख क्षेत्र कौन-से हैं?

  • 'हरित संरक्षणवाद'-CBAM गतिरोध: प्प्रमुख आर्थिक मतभेद EU के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) को लेकर है, जिसे भारत एक भेदभावपूर्ण 'हरित कर' मानता है जो जलवायु कार्रवाई के बहाने लगाया गया है।
    • भारत का तर्क है कि यह एकतरफा शुल्क 'सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्वों' (CBDR) की अनदेखी करके उसके विकासशील औद्योगिक आधार को दंडित करता है। परिणामस्वरूप, नए FTA के तहत प्राप्त टैरिफ लाभ लगभग समाप्त हो जाते हैं और निर्यात पर 20–35% अतिरिक्त लागत लग जाती है।
    • हालांकि हालिया भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता CBAM से संबंधित लचीलेपन पर MFN क्लॉज के माध्यम से प्रगति का संकेत देता है, लेकिन भारतीय निर्यात की रक्षा करने में इसकी व्यावहारिक प्रभावशीलता अनिश्चित बनी हुई है। 
  • भू-राजनीतिक असंगति – रूस-यूक्रेन लिटमस टेस्ट: रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर एक तीव्र रणनीतिक विभाजन बना हुआ है, जहाँ यूरोपियन यूनियन प्रतिबंधों में एक 'मूल्य-आधारित' शर्त के रूप में सहमति की मांग करता है, जबकि भारत 'रणनीतिक स्वायत्तता' बनाए रखता है। 
    • यूरोपियन यूनियन भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद को यूरोप के खिलाफ युद्ध वित्तपोषित करने के प्रयास के रूप में देखता है, जबकि भारत इसे 1.4 अरब जनसंख्या की ऊर्जा सुरक्षा की अपरिहार्य आवश्यकता मानता है। इससे स्थायी राजनयिक तनाव उत्पन्न होता है।
    • वास्तविक आँकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 तक भारत रूसी जीवाश्म ईंधन का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार था और इसने कुल 2.3 बिलियन यूरो के हाइड्रोकार्बन का आयात किया, जबकि यूरोपियन यूनियन ने कड़े प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। 
      • इसके अतिरिक्त, भारत ने रूस की आलोचना करने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख प्रस्तावों पर मतदान से परहेज किया, जिससे यूरोपियन यूनियन के एकीकृत ब्लॉक वोट से अंतर उत्पन्न हुआ।
  • डिजिटल संप्रभुता – GDPR बनाम DPDP अधिनियम: जहाँ यूरोपियन यूनियन अपने सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन को डेटा पर्याप्तता के लिये 'सर्वोत्तम मानक' मानता है, वहीं भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम, 2023, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये सरकारी पहुँच को प्राथमिकता देता है, जिससे एक मौलिक ' उपयुक्तता अंतर' उत्पन्न होता है। 
    • यूरोपियन यूनियन भारत को 'डेटा सुरक्षित' दर्जा देने में हिचकिचाता है, जो उच्च मूल्य वाले आईटी आउटसोर्सिंग के लिये महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ एक स्वतंत्र नियामक का अभाव है (भारत का डेटा संरक्षण बोर्ड सरकार द्वारा नियुक्त है) और राज्य द्वारा निगरानी के लिये व्यापक छूट दी गई है।
    • भारत के DPDP अधिनियम, 2023 की धारा 17 के तहत सरकारी एजेंसियों को दी गई व्यापक छूटों को लेकर चिंताओं के कारण वर्तमान में यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच डेटा सहयोग बाधित है।
      •  इससे भारतीय आईटी कंपनियों को महंगे मानक संविदात्मक खंडों (SCC) का उपयोग करने के लिये मजबूर होना पड़ता है, जिससे फिलीपींस या वियतनाम की तुलना में यूरोपियन यूनियन के ग्राहकों के लिये उनकी अनुपालन लागत बढ़ जाती है।
  • गतिशीलता असमानता- फोर्ट्रेस यूरोप” बनाम “टैलेंट एक्सपोर्ट': जहाँ यूरोपियन यूनियन अपने वृद्ध कार्यबल की कमी को पूरा करने के लिये सख्ती से 'चक्रीय प्रवासन' (अस्थायी प्रवेश) चाहता है, वहीं भारत अपने आईटी और स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के लिये स्थायी और सरल 'मोड 4' पहुँच (पेशेवरों की आवाजाही) की मांग करता है। 
    • यह मतभेद यूरोपियन यूनियन के सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण में निहित है, जो 'अवैध प्रवासियों' की वापसी को प्राथमिकता देता है, जबकि भारत का आर्थिक दृष्टिकोण इसके विपरीत है, जो प्रतिबंधात्मक वीज़ा व्यवस्था और भारतीय डिग्रियों की गैर-मान्यता को एक प्राथमिक व्यापार बाधा के रूप में देखता है।
  • हालाँकि यूरोपियन यूनियन ने ब्लू कार्ड पर कोई आधिकारिक सीमा निर्धारित नहीं की है, लेकिन वर्ष 2026 के गतिशीलता समझौते में भारतीयों के लिये 100,000 बहुवर्षीय कार्य वीज़ा के वार्षिक लक्ष्य की में कम-से-कम 35,000 स्नातक परमिट की गारंटी दी गई है। 
    • यह न्यूनतम स्तर भारत में लाखों स्नातकों की विशाल आपूर्ति से काफी कम है, जिससे औपचारिक प्रवेश चाहने वालों के लिये प्रतिस्पर्द्धात्मक बाधा उत्पन्न होती है।
  • WTO में सब्सिडी विवाद - 'सार्वजनिक स्टॉकहोल्डिंग': विश्व व्यापार संगठन (WTO) में, यूरोपियन यूनियन, अमेरिका जैसे अन्य विकसित देशों के साथ मिलकर, भारत के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खाद्यान्न खरीद को 'व्यापार-विकृत' सब्सिडी के रूप में चुनौती देता है जो 10% की सीमा का उल्लंघन करती है, जबकि साथ ही साथ अपने किसानों को भारी 'ग्रीन बॉक्स' (गैर-व्यापार विकृत) सब्सिडी के साथ संरक्षण प्रदान करता है। 
    • उदाहरण के लिये, मार्च 2026 में आयोजित होने वाले 14वें विश्व व्यापार संगठन (WTO) मंत्रिस्तरीय सम्मेलन की हालिया बैठकों में, यूरोपियन यूनियन ने 'ज़िम्मेदार सहमति' शुरू करने, सबसे पसंदीदा राष्ट्र (MFN) सिद्धांत को कमज़ोर करने, विकासशील देशों के लिये विशेष और विभेदक व्यवहार (S&DT) को प्रतिबंधित करने तथा WTO के मूल सुधारों के पूरा होने तक एक विवाद निपटान तंत्र की बहाली को स्थगित करने का प्रस्ताव दिया है।
  • यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो भारत के स्थिति के विपरीत है, जो विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिये एक निष्पक्ष और प्रभावी बहुपक्षीय विवाद निपटान प्रणाली के पुनरुद्धार का दृढ़ता से समर्थन करता है।

भारत-यूरोपियन यूनियन के सहयोग को बढ़ाने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CBAM) के लिये 'ग्रीन इक्विवेलेंस' फ्रेमवर्क की स्थापना: कार्बन टैक्स के तनाव को कम करने के लिये, दोनों पक्षों को 'सॉवरेन कार्बन क्रेडिट रेसिप्रोसिटी' समझौते पर वार्ता करनी चाहिये, जहाँ भारत की घरेलू 'कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम' (CCTS) को तकनीकी रूप से यूरोपियन यूनियन की ETS के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाए। 
    • स्रोत पर ही भारतीय कार्बन प्रमाणपत्रों को 'समकक्ष ऑफसेट' के रूप में मान्य करके, निर्यातक कार्बन मूल्य का भुगतान ब्रुसेल्स के बजाय घरेलू स्तर पर कर सकते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि राजस्व भारत के भीतर ही हरित संक्रमण के वित्तपोषण के लिये बना रहे, साथ ही यूरोपियन यूनियन की समान प्रतिस्पर्द्धा की आवश्यकता को भी पूरा किया जा सके।
  • 'GDPR-संरेखित डेटा एन्क्लेव' (नियामक सैंडबॉक्स) का निर्माण: राष्ट्रीय डेटा पर्याप्तता पर गतिरोध को दूर करने के लिये, भारत को विशिष्ट विशेष आर्थिक क्षेत्रों (जैसे GIFT सिटी) को 'डेटा ऐडक्वसी आइलैंड्स' के रूप में नामित करना चाहिये, जो व्यापक राज्य निगरानी कानूनों से स्वतंत्र, सख्त, GDPR-समतुल्य गोपनीयता मानदंडों के तहत काम करते हैं। 
    • यह 'क्षेत्रीय पर्याप्तता' दृष्टिकोण यूरोपियन यूनियन के ग्राहकों के लिये उच्च-मूल्य वाले डेटा प्रोसेसिंग को इन निर्धारित क्षेत्रों के भीतर निर्बाध रूप से जारी रखने की अनुमति देता है, जिससे कमर्शियल डेटा फ्लो की आवश्यकताओं को DPDP अधिनियम से संबंधित जटिल राष्ट्रीय सुरक्षा बहसों से अलग किया जा सकता है।
  • ग्लोबल साउथ में 'तृतीय बाज़ार के सह-निर्माण' को क्रियान्वित करना: रूस पर द्विपक्षीय भू-राजनीतिक निर्भरता को कम करने के लिये, साझेदारी को अफ्रीका और हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिये एक 'संयुक्त अवसंरचना मंच' की ओर उन्मुख होना चाहिये, जिसमें यूरोपियन यूनियन की पूंजी (ग्लोबल गेटवे) को भारत की लागत प्रभावी निष्पादन क्षमताओं के साथ जोड़ा जाए। 
    • यह 'रणनीतिक अलगाव' केन्या में लचीले बिजली ग्रिड बनाने या वियतनाम में डिजिटल भुगतान प्रणाली बनाने जैसे साझा रचनात्मक लक्ष्यों पर ऊर्जा केंद्रित करता है, जिससे एक कार्यात्मक सफलता का मार्ग बनता है, जो व्यापक संबंधों को विशिष्ट राजनयिक मतभेदों से अलग रखता है।
  • मूल्यवर्द्धन गारंटी के साथ एक 'महत्त्वपूर्ण कच्चा माल क्लब': यूरोपियन यूनियन द्वारा केवल संसाधनों का दोहन करने के बजाय, एक 'सह-निर्भरता समझौता' पर हस्ताक्षर किये जाने चाहिये, जिसके तहत यूरोपियन यूनियन सुरक्षित लिथियम या दुर्लभ मृदा धातुओं की आपूर्ति के बदले में भारत को उन्नत धातुकर्म प्रसंस्करण प्रौद्योगिकी अंतरित करे। 
    • इससे संबंध ‘खरीदार–विक्रेता’ ढाँचे से आगे बढ़कर ‘संयुक्त प्रसंस्करणकर्त्ता’ (Joint-processor) गठबंधन में परिवर्तित होंगे, जहाँ भारत उच्च-मूल्य मध्यवर्ती विनिर्माण चरण में हिस्सेदारी प्राप्त करेगा तथा यूरोपियन यूनियन को चीन-प्रधान आपूर्ति शृंखला से मुक्त विविधीकृत स्रोत मिलेंगे।
  • महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों के लिये 'भारत-EU इनोवेशन हब' की स्थापना: संयुक्त भारत–EU समग्र रणनीतिक एजेंडा के अनुरूप, दोनों पक्षों को 6G, क्वांटम कंप्यूटिंग और उन्नत सेमीकंडक्टर जैसी महत्त्वपूर्ण एवं उभरती प्रौद्योगिकियों के सह-विकास को सुविधाजनक बनाने के लिये समर्पित 'इनोवेशन हब' को क्रियाशील बनाना चाहिये।
    • यह उपाय केवल 'प्रौद्योगिकी अंतरण' से आगे बढ़कर 'सह-निर्माण' मॉडल की ओर बढ़ता है, जहाँ भारतीय डिज़ाइन क्षमताओं (AI और चिप प्रोटोटाइपिंग में) को यूरोपीय अनुसंधान अवसंरचना के साथ एकीकृत किया जाता है, जिससे प्रभावी रूप से एक लोकतांत्रिक तकनीकी आपूर्ति शृंखला का निर्माण होता है, जो एकाधिकारवादी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धियों के लिये एक समुत्थानशील विकल्प के रूप में कार्य करती है।

निष्कर्ष: 

भारत–यूरोपियन यूनियन के संबंध सीमित सहभागिता से विकसित होकर बहुध्रुवीयता, रणनीतिक स्वायत्तता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर आधारित रणनीतिक अभिसरण की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। मुक्त व्यापार समझौता (FTA) इस प्रक्रिया में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है, परंतु यह संबंध अब सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, जलवायु शासन एवं मानव संसाधन जैसे तक विस्तृत हो चुका है। मतभेदों का समाधान दबाव के स्थान पर संवाद के माध्यम से किया जाना आवश्यक होगा। इस प्रकार, भारत और यूरोपियन यूनियन संयुक्त रूप से विभाजित वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता के स्तंभ के रूप में उभर सकते हैं।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) आपूर्ति शृंखला में जोखिम कम करने और हरित विनियमों के इस युग में भारत की विकसित होती व्यापार रणनीति को किस प्रकार प्रतिबिंबित करता है, इस पर चर्चा कीजिये। इसके संभावित लाभों तथा प्रमुख कार्यान्वयन चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।

 

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. वर्तमान में भारत-यूरोपियन यूनियन के संबंध रणनीतिक रूप से क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह दो प्रमुख लोकतांत्रिक शक्तियों को महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता के बीच रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीयता और विनियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये एकजुट करता है।

प्रश्न 2. भारत-यूरोपियन यूनियन मुक्त व्यापार समझौता किस प्रकार निर्णायक साबित होता है?
यह भारतीय निर्यात के 99 प्रतिशत से अधिक हिस्से को वरीयतापूर्ण बाज़ार पहुँच सुनिश्चित करता है और व्यापार को केवल वाणिज्य तक सीमित न रखकर उसे प्रौद्योगिकी, मानव गतिशीलता तथा जलवायु सहयोग के व्यापक ढाँचे से जोड़ता है।

प्रश्न 3. यह संबंध आपूर्ति शृंखला से जुड़े जोखिमों का समाधान कैसे करता है?
चीन से जुड़े जोखिमों को कम करके, विश्वसनीय विनिर्माण को बढ़ावा देकर और भारतीय कंपनियों को यूरोपियन यूनियन केंद्रित वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करके।

प्रश्न 4. भारत-यूरोपियन यूनियन संबंधों में मुख्य संघर्ष का बिंदु क्या है?
यूरोपियन यूनियन का CBAM तथा उसके नियामक मानक, जिन्हें भारत निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता को प्रभावित करने वाला हरित संरक्षणवाद मानता है।

प्रश्न 5. भारत-यूरोपियन यूनियन संबंधों के लिये आगे की राह क्या है?
जलवायु, डेटा, गतिशीलता और प्रौद्योगिकी सह-सृजन पर संस्थागत संवाद को सुदृढ़ करना, ताकि मतभेदों को अभिसरण में बदला जा सके।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2023)

  1. यूरोपियन यूनियन का ‘स्थिरता एवं संवृद्धि समझौता (स्टेबिलिटी एंड ग्रोथ पैक्ट)’ ऐसी संधि है, जो
  2. यूरोपियन यूनियन के देशों के बजटीय घाटे के स्तर को सीमित करती है
  3.  यूरोपियन यूनियन के देशों के लिये अपनी आधारिक संरचना सुविधाओं को आपस में बाँटना सुकर बनाती है
  4.  यूरोपियन यूनियन के देशों के लिये अपनी प्रौद्योगिकियों को आपस में बाँटना सुकर बनाती है

उपर्युक्त में से कितने कथन सही है?

(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) सभी तीन
(d) कोई भी नहीं

उत्तर: (a)


मेन्स 

प्रश्न. 'नाटो का विस्तार एवं सुदृढीकरण और एक मज़बूत अमेरिका-यूरोप रणनीतिक साझेदारी भारत के लिये अच्छा काम करती है।' इस कथन के बारे मे आपकी क्या राय है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण और उदाहरण दीजिये। (2023)

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