भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत में आय गतिशीलता
प्रिलिम्स के लिये: आय गतिशीलता, विश्व असमानता रिपोर्ट, 2026, K-शेप्ड इकाॅनमिक रिकवरी, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना
मेन्स के लिये: भारत में समावेशी विकास और आय असमानता, मानव पूंजी निर्माण
चर्चा में क्यों?
भारत में आय गतिशीलता की प्रवृत्तियाँ (2014–25) एक चिंताजनक परिवर्तन प्रदर्शित करती हैं, जिसमें आय-स्तर से ऊर्ध्वगामी गति करने वाले परिवारों की अपेक्षा निम्न आय स्तर की ओर निम्नगामी गति करने वाले परिवारों की संख्या अधिक दिखाई देती है।
- यह प्रवृत्ति समावेशी संवृद्धि संबंधी दावों को चुनौती देती है तथा ग्रामीण क्षेत्रों, जाति-समूहों एवं धार्मिक समुदायों में बढ़ती आर्थिक असुरक्षा को रेखांकित करती है, साथ ही यह गतिशीलता को असमानता के एक प्रमुख मापदंड के रूप में रेखांकित करती है।
सारांश
- भारत में आय गतिशीलता की प्रवृत्तियाँ (2014–25) दर्शाती हैं कि आय-स्तर से ऊपर उठने की तुलना में अधिक परिवार नीचे की ओर अवनत हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों, अनुसूचित जातियाँ, अन्य पिछड़े वर्ग तथा संवेदनशील धार्मिक समुदायों में असमानता, अनौपचारिक क्षेत्र के संकट और कोविड-पश्चात असमान पुनर्प्राप्ति के कारण यह गिरावट अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
- ग्रामीण आजीविका, MSME, शिक्षा तथा सामाजिक समावेशन को सुदृढ़ करने के साथ PM-KUSUM, MUDRA, PLI, स्किल इंडिया तथा स्टैंड अप इंडिया जैसी पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन द्वारा इस निम्नगामी प्रवृत्ति को उलटना आवश्यक है, ताकि आर्थिक संवृद्धि का लाभ व्यापक रूप से समग्र समाज तक पहुँचे।
भारत में आय गतिशीलता की प्रवृत्तियाँ क्या संदर्भित करती हैं?
- निम्नगामी गतिशीलता का दोगुना होना: निम्नगामी आय गतिशीलता का अनुभव करने वाले परिवारों का अनुपात लगभग दोगुना हो गया, जो वर्ष 2015 में 14% से बढ़कर वर्ष 2025 में 26.8% हो गया।
- वर्ष 2025 के अंत तक भारत में प्रत्येक चार में से एक से अधिक परिवार वर्ष 2014 की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक कमज़ोर स्थिति में पहुँच गए हैं।
- धीमी ऊर्ध्वगामी गतिशीलता: यद्यपि ऊर्ध्वगामी आय गतिशीलता में वृद्धि हुई (14.1% से बढ़कर 23.5%), तद्यपि यह लगातार निम्नगामी गतिशीलता की दर से पीछे रही।
- संकुचित होता मध्य वर्ग: अपने मूल आय-स्तर पर बने रहने वाले परिवारों का अनुपात तीव्रता से घटकर 70% से अधिक से 50% से कम रह गया।
- ग्रामीण संवेदनशीलता: वर्ष 2025 में लगभग 29% ग्रामीण परिवारों ने वर्ष 2014 की तुलना में आय-स्तर से निम्नगामी गतिशीलता प्रदर्शित की है।
- ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता की तुलना में निम्नगामी प्रवृत्ति अधिक तीव्र रही।
- शहरी क्षेत्रों में लाभ का संकेंद्रण: शहरी भारत का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में ऊर्ध्वगामी गतिशीलता की प्रवृत्ति अधिक रही है।
- हालाँकि, शहरी केंद्रों में भी निम्नगामी गतिशीलता में वृद्धि देखी गई, जो व्यापक आर्थिक असुरक्षा को दर्शाती है।
- आर्थिक गतिशीलता के निर्धारण में जाति की भूमिका: आर्थिक गतिशीलता को निर्धारित करने में जाति अभी भी एक महत्त्वपूर्ण कारक बनी हुई है, जो दीर्घकालिक संरचनात्मक असमानताओं तथा अवसरों तक असमान पहुँच को प्रतिबिंबित करती है।
- सभी सामाजिक समूहों में निम्नगामी गतिशीलता बढ़ी है, विशेषतः अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अनुसूचित जनजाति (SC) परिवारों में यह वृद्धि अधिक स्पष्ट रही।
- अनुसूचित जनजाति (SC) की स्थिति: SC परिवारों में 2014–25 की पूरी अवधि के दौरान ऊर्ध्वगामी गतिशीलता अपेक्षाकृत सीमित तथा असमान रही, जो अवसरों के विस्तार संबंधी दावों को चुनौती देती है।
- अनुसूचित जनजाति की प्रवृत्ति (ST): ST समुदायों में तुलनात्मक रूप से निम्नगामी गतिशीलता कम रही तथा कुछ अवसरों पर ऊर्ध्वगामी प्रगति अधिक देखी गई, जिसका कारण क्षेत्रीय विकास प्रयासों तथा लक्षित हस्तक्षेपों का प्रभाव माना जा सकता है।
- धार्मिक समुदायों में प्रवृत्ति: सभी धार्मिक समूहों में निम्नगामी गतिशीलता में वृद्धि हुई, हालाँकि यह वृद्धि विशेष रूप से हिंदू तथा मुस्लिम परिवारों में अधिक स्पष्ट रही।
- दशक के प्रारंभिक वर्षों में सिख तथा ईसाई परिवारों में अपेक्षाकृत सशक्त ऊर्ध्वगामी गतिशीलता देखी गई, किंतु दशक के उत्तरार्द्ध में यह गति उल्लेखनीय रूप से मंद पड़ गई।
नोट: आय गतिशीलता से आशय समय के साथ परिवारों के विभिन्न आय वर्गों के बीच होने वाले परिवर्तन से है। यह ऊर्ध्वगामी गतिशीलता (उच्च आय वर्ग की ओर गति), निम्नगामी गतिशीलता (निम्न आय वर्ग की ओर गति) अथवा यथास्थिति (कोई परिवर्तन न होना) के रूप में प्रकट हो सकती है।
- यह अवधारणा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह स्थिर निर्धनता के बजाय गतिशील असमानता को परिलक्षित करती है, यह संकेत देती है कि आर्थिक संवृद्धि अवसरों का सृजन कर रही है या नई संवेदनशीलताओं को जन्म दे रही है तथा समाज के समग्र स्वास्थ्य, धारणीयता और अनुकूलन को भी प्रतिबिंबित करती है।
भारत में आय गतिशीलता में निम्नगामी परिवर्तन के कारण क्या हैं?
- बढ़ती आय असमानता: विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार शीर्ष 10% आय अर्जक राष्ट्रीय आय का असमान रूप से 58% हिस्सा प्राप्त करते हैं, जबकि निचले 50% लोगों को केवल 15% आय प्राप्त होती है।
- देश की कुल संपत्ति का लगभग 65% शीर्ष 10% के पास केंद्रित है, जबकि केवल 1% सर्वाधिक समृद्ध वर्ग के पास लगभग 40% संपत्ति है।
- ऐसी उच्च असमानता पूंजी, नेटवर्क तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच को सीमित कर आय गतिशीलता को बाधित करती है।
- कोविड-19 का दीर्घकालिक प्रभाव: महामारी के पश्चात भारत की आर्थिक पुनर्प्राप्ति असमान रही है, परिणामस्वरूप संवृद्धि मुख्यतः प्रौद्योगिकी तथा वित्तीय क्षेत्र में केंद्रित रही, जबकि पर्यटन, खुदरा व्यापार तथा आतिथ्य क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों को स्थायी आय हानि का सामना करना पड़ा।
- इस प्रकार की K-शेप्ड इकाॅनमिक रिकवरी ने असमानता को बढ़ाया तथा निम्न आय वर्गों में निम्नगामी गतिशीलता को तीव्र किया।
- अनौपचारिक क्षेत्र तथा MSME पर कम फोकस: भारत का श्रमबल अभी भी अत्यधिक अनौपचारिक (लगभग 80–85%) है, किंतु कृषि, लघु उद्योगों तथा छोटे उद्यमों के लिये नीतिगत समर्थन विखंडित रहा है।
- MSME क्षेत्र, जो GDP में लगभग 30% योगदान देता है तथा 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार प्रदान करता है, कोविड-19 के पश्चात ऋण सीमाएँ, भुगतान में विलंब तथा कमज़ोर मांग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है।
- परिणामस्वरूप गरिमापूर्ण आय और रोज़गार की स्थिरता में कमी आई है, जिससे अर्द्ध-कुशल श्रमिकों में निम्नगामी आय गतिशीलता बढ़ी है।
- शैक्षिक असमानता: गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा तक असमान पहुँच उच्च उत्पादकता वाले क्षेत्रों में प्रवेश को सीमित करती है।
- टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स 2026 के अनुसार विश्व के शीर्ष 500 विश्वविद्यालयों में भारत के केवल 4 विश्वविद्यालय शामिल हैं। साथ ही राज्य विश्वविद्यालयों में संविदात्मक संकाय पर बढ़ती निर्भरता के कारण गैर-विशिष्ट पृष्ठभूमि के छात्रों के लिये शिक्षण गुणवत्ता कमज़ोर हुई है, जिससे कौशल अंतराल बढ़ा तथा ऊर्ध्वगामी गतिशीलता सीमित हुई है।
- जाति-आधारित वंचना: ऐतिहासिक सामाजिक पदानुक्रम आज भी आर्थिक परिणामों को प्रभावित करते हैं।
- व्यावसायिक विभाजन संपत्तियों तक असमान पहुँच तथा गहरे सामाजिक भेदभाव के कारण हाशिये पर स्थित समूहों, विशेषतः SCs तथा OBCs, में निम्नगामी गतिशीलता अधिक देखी गई।
- शहरी क्षेत्रों में केंद्रित संवृद्धि: आर्थिक विस्तार मुख्यतः बंगलूरू, हैदराबाद तथा गुरुग्राम जैसे महानगरीय केंद्रों में केंद्रित है, जिसे रियल एस्टेट, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) तथा उच्च-स्तरीय सेवाओं द्वारा प्रेरित किया जा रहा है।
- इसके विपरीत, ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि क्षेत्र में आय स्थिरता, जलवायु संबंधी आघात तथा फसल मूल्यों की अस्थिरता जैसी चुनौतियाँ विद्यमान हैं, जिससे क्षेत्रीय असमानता बढ़ रही है तथा ग्रामीण परिवार निम्नगामी आय गतिशीलता की ओर अग्रसर हो रहे हैं।
भारत में ऊर्ध्वगामी आय गतिशीलता को तीव्र करने हेतु कौन-से उपाय किये जा सकते हैं?
- ग्रामीण क्षेत्र में आजीविका के संसाधनों को सुदृढ़ करना: पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं का विस्तार, किसान उत्पादक संगठनों को प्रोत्साहन तथा कृषि अवसंरचना कोष के माध्यम से निवेश, कृषि आय को स्थिर बनाने एवं ग्रामीण आजीविकाओं के विविधीकरण में सहायक हो सकते हैं।
- ये उपाय आय की अस्थिरता को कम करते हैं तथा ग्रामीण परिवारों को निर्धनता की ओर जाने से रोकते हैं।
- MSME क्षेत्र को प्रोत्साहन एवं अनौपचारिक क्षेत्र का औपचारिकीकरण: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना तथा आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना के माध्यम से ऋण उपलब्धता में सुधार, साथ ही उद्यम पंजीकरण के ज़रिये औपचारिकीकरण लघु उद्यमों को सुदृढ़ कर सकता है।
- एक सुदृढ़ MSME क्षेत्र स्थिर रोज़गार सृजित करता है तथा ऊर्ध्वगामी आय गतिशीलता को प्रोत्साहित करता है।
- श्रम-प्रधान विनिर्माण के माध्यम से रोज़गार सृजन: उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना मेक इन इंडिया तथा पीएम मित्र पार्क के माध्यम से वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण एवं इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली जैसे रोज़गार-प्रधान क्षेत्रों का विस्तार किया जा सकता है।
- रोज़गार-केंद्रित आर्थिक संवृद्धि यह सुनिश्चित करती है कि विकास का लाभ व्यापक जनसमूह तक पहुँचे।
- शिक्षा की गुणवत्ता एवं कौशल विकास में सुधार: स्किल इंडिया मिशन का विस्तार तथा प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) को सुदृढ़ करने से कौशल अंतराल को कम किया जा सकता है।
- साथ ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा उद्योग-संबद्ध प्रशिक्षण से वंचित वर्गों को उच्च उत्पादकता वाले रोज़गारों तक पहुँच प्राप्त हो सकती है।
- समावेशी वृद्धि को प्रोत्साहन: उत्तर-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के अंतर्गत छात्रवृत्तियाँ तथा स्टैंड-अप इंडिया और नेशनल एससी/एसटी हब के माध्यम से उद्यमिता समर्थन, संरचनात्मक बाधाओं को कम करने में सहायक हैं।
- ऐसी समावेशी नीतियाँ अवसरों का विस्तार करती हैं तथा ऐतिहासिक रूप से वंचित समूहों में गतिशीलता को बढ़ाती हैं।
- महिलाओं की श्रमबल भागीदारी में वृद्धि: दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन तथा प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसे कार्यक्रम महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं।
- महिलाओं की श्रमबल भागीदारी में वृद्धि से पारिवारिक आय में उल्लेखनीय सुधार होता है तथा ऊर्ध्वगामी सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा मिलता है।
- अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार, श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने से भारत की GDP में लगभग 27% तक वृद्धि संभव है, जो इसके महत्त्वपूर्ण आर्थिक तथा सामाजिक लाभों को रेखांकित करता है।
निष्कर्ष
जैसा कि चार्ल्स डिकेंस ने कहा था, "यह सबसे अच्छा समय था; यह सबसे बुरा समय था।" भारत की विकास गाथा इस द्वंद्वता (उल्लेखनीय प्रगति के साथ-साथ गहरी असमानता) को दर्शाती है और आगे की राह यह सुनिश्चित करने में निहित है कि अवसर भेद्यता की तुलना में अधिक तेज़ी से बढ़े।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न: भारत में निरंतर GDP वृद्धि के बावज़ूद निम्नगामी गतिशीलता के लिये उत्तरदायी संरचनात्मक कारकों की जाँच कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. आय गतिशीलता क्या है और यह महत्त्वपूर्ण क्यों है?
आय गतिशीलता समय के साथ आय समूहों के बीच आवागमन को संदर्भित करती है; यह गतिशील असमानता को मापती है और यह इंगित करती है कि विकास अवसर पैदा करता है या भेद्यता।
2. निम्नगामी गतिशीलता भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में क्या संकेत देती है?
यह बढ़ती असमानता, ग्रामीण संकट और कमज़ोर रोज़गार सृजन का संकेत देती है, जो दर्शाता है कि विकास व्यापक समृद्धि में परिवर्तित नहीं हुआ है।
3. MSME भारत में आय गतिशीलता को कैसे प्रभावित करते हैं?
MSME 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार देते हैं जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में ~30% का योगदान करते हैं; संकट के समय इनमें स्थिर नौकरियाँ कम होती हैं और निम्नगामी गतिशीलता बढ़ती है।
4. शैक्षिक असमानता ऊर्ध्वगामी गतिशीलता में बाधा क्यों है?
गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा और कौशल प्रशिक्षण तक सीमित पहुँच उच्च-उत्पादकता क्षेत्रों में प्रवेश को रोकती है, जिससे आय अंतराल गहरा होता है।
5. कौन-सी योजनाएँ भारत में ऊर्ध्वगामी आय गतिशीलता का समर्थन करती हैं?
PM-कुसुम, मुद्रा योजना, PLI योजना, NEP 2020, कौशल भारत मिशन, स्टैंड-अप इंडिया और दीनदयाल अंत्योदय योजना - राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) रोज़गार, कौशल और समावेशी विकास को बढ़ावा देते हैं।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न
प्रिलिम्स
प्रश्न. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में प्रतिपादित समावेशी विकास में निम्नलिखित में से एक शामिल नहीं है: (2010)
(a) गरीबी में कमी
(b) रोज़गार के अवसरों का विस्तार
(c) पूंजी बाज़ार का सुदृढीकरण
(d) लैंगिक असमानता में कमी
उत्तर: (c)
मेन्स
प्रश्न. संसाधनों के स्वामित्व पैटर्न में असमानता गरीबी का एक प्रमुख कारण है। 'गरीबी के विरोधाभास' के संदर्भ में चर्चा कीजिये। (2025)
प्रश्न. कोविड-19 महामारी ने भारत में वर्ग असमानताओं एवं गरीबी को गति दे दी है। टिप्पणी कीजिये। (2020)
सामाजिक न्याय
जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या स्थिरीकरण तक
प्रिलिम्स के लिये: राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), प्रतिस्थापन स्तर, कुल प्रजनन दर, यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA)।
मेंस के लिये: भारत में प्रजनन दर में परिवर्तन से संबंधित प्रमुख बिंदु, भारत में न्यून प्रजनन दर के मुख्य कारण, भारत में न्यूनतम प्रजनन दर के प्रभाव और सतत जनसंख्या वृद्धि हेतु ज़रूरी उपाय।
चर्चा में क्यों?
पिछले 25 वर्षों में भारत ने प्रजनन में उल्लेखनीय संक्रमण का अनुभव किया है, इसे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के क्रमिक आँकड़ों ने उच्च-प्रजनन वाले विकासशील राष्ट्र से परिवर्तन को दर्शाया है, जहाँ अधिकांश राज्यों का प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँच गया है या उससे नीचे आ गया है।
- इन रुझानों ने पॉल और ऐनी एर्लिच द्वारा प्रस्तुत एक समय के प्रभावशाली "पॉपुलेशन बॉम्ब" सिद्धांत को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया है, जिसमें माना गया था कि तीव्र प्रजनन दर आर्थिक विकास से आगे निकल जाएगी और भारत में सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव डालेगी।
सारांश
- भारत ने उप-प्रतिस्थापन प्रजनन स्तर की ओर संक्रमण किया है, NFHS-5 में कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 रिपोर्ट की गई है, जो एक प्रमुख जनसांख्यिकीय संक्रमण को दर्शाती है।
- प्रेरक कारकों में महिला शिक्षा, शहरीकरण, गर्भनिरोधक तक पहुँच और बदलते सामाजिक मानदंड शामिल हैं।
- यह स्तर जनसांख्यिकीय लाभांश प्रदान करता है, जिसमें बढ़ती वृद्ध आबादी, कार्यबल में कमी और क्षेत्रीय असमानताओं जैसी चुनौतियों के लिये रणनीतिक नीतिगत प्रतिक्रियाओं की आवश्यकता होती है।
भारत में प्रजनन दर में परिवर्तन से संबंधित प्रमुख तथ्य क्या हैं?
- ऐतिहासिक संदर्भ: वर्ष 1950-70 के दशक में भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) निरंतर उच्च बनी हुई थी, जो वर्ष 1960 के दशक की शुरुआत में प्रति महिला लगभग 6 बच्चों के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई। वर्ष 1970 के दशक से परिवार नियोजन संबंधी पहलों और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के कारण इसमें निरंतर गिरावट देखी गई।
- वर्ष 2000 तक कुल प्रजनन दर घटकर लगभग 3.5 बच्चे प्रति महिला रह गई, जो वर्ष 1980 और 1990 के दशक के दौरान निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
- NFHS-5 बेंचमार्क: NFHS-5 (2019-21) ने राष्ट्रीय कुल प्रजनन दर 2.0 को दर्ज किया, जो राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम बार प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे आने का संकेत है।
- वर्तमान अनुमान (2020 के दशक के मध्य): वर्ष 2023-25 तक भारत की कुल प्रजनन दर व्यापक रूप से लगभग 1.9 बच्चे प्रति महिला होने का अनुमान है, जो उप-प्रतिस्थापन प्रजनन की एक सतत अवधि की पुष्टि करता है।
- क्षेत्रीय विविधताओं का बरकरार रहना: यह भिन्नता महत्त्वपूर्ण रूप से बनी हुई है। दक्षिणी राज्यों (जैसे– केरल और तमिलनाडु) और शहरी क्षेत्रों में कुल प्रजनन दर 1.4–1.8 तक पहुँच गई है, जबकि कुछ उत्तरी राज्य (जैसे– बिहार और उत्तर प्रदेश) अभी भी प्रतिस्थापन स्तर तक नही पहुँचे हैं या उसके नज़दीक हैं।
- भविष्य का अनुमान: वर्ष 2060-80 के दशक तक स्थिर होने या क्रमिक गिरावट से पहले भारत की जनसंख्या के लगभग 1.7–1.9 बिलियन तक पहुँचने की उम्मीद है।
भारत में न्यूनतम प्रजनन दर के मुख्य कारण क्या हैं?
- महिला शिक्षा प्राथमिक चालक के रूप में: न्यूनतम प्रजनन दर का महत्त्वपूर्ण संबंध महिला शिक्षा से है। NFHS-5 के आँकड़ों के अनुसार 12 या उससे अधिक वर्षों की शिक्षा प्राप्त महिलाओं की कुल प्रजनन दर 1.8 है, जबकि अशिक्षित महिलाओं के लिये यह 2.8 है, क्योंकि शिक्षित महिलाएँ देरी से विवाह करती हैं, कॅरियर को प्राथमिकता देती हैं और अधिक प्रजनन स्वायत्तता का प्रयोग करती हैं।
- शहरी-ग्रामीण विभाजन: शहरी कुल प्रजनन दर (~1.6) ग्रामीण कुल प्रजनन दर (~2.1) से काफी कम है, जो शहरों में उच्च जीवन लागत, कॅरियर केंद्रित, छोटे आवास स्थान और बदलती जीवनशैली से प्रेरित हैं जो बड़े परिवारों को हतोत्साहित करती है।
- आर्थिक दबाव: यूनाइटेड नेशंस पॉपुलेशन फंड (UNFPA) की विश्व जनसंख्या स्थिति 2025 रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि वित्तीय तनाव, असुरक्षित रोज़गार (~21%), आवास संबंधी मुद्दे (~22%) और किफायती बाल देखभाल की कमी (~18%) प्रमुख बाधा हैं, जिसके कारण युगल अधिक बच्चे चाहने के बावजूद कम बच्चे पैदा करना चाहते हैं या माता-पिता बनने में देरी करते हैं।
- गर्भनिरोधक तक पहुँच: भारत के दीर्घकालिक परिवार नियोजन कार्यक्रमों के परिणामस्वरूप गर्भनिरोधक प्रसार दर लगभग 67% हो गई है, जो प्रभावी जन्म अंतराल को सक्षम बनाती है और अनियोजित गर्भधारण को कम करती है।
- कमज़ोर होती पुत्र प्राथमिकता: पुत्रों के लिये पारंपरिक सांस्कृतिक प्राथमिकता, जो पितृवंशीय उत्तराधिकार और वृद्धावस्था सुरक्षा से प्रेरित है, बढ़ती शिक्षा, बदलती लैंगिक रूढ़ियों और लड़कियों को आर्थिक संपत्ति के रूप में देखे जाने के कारण कमज़ोर हो रही है, जिससे बार-बार बच्चे पैदा करने का दबाव कम हो रहा है।
- सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन: वर्तमान अभिभावक पालन-पोषण में "मात्रा से अधिक गुणवत्ता" के पक्षधर हैं, अधिकतर परिवार बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य के लिये अधिक निवेश कर रहे हैं, जो शिशु मृत्यु दर में कमी (वर्ष 1990 में 89 प्रति 1000 जीवित जन्म से वर्ष 2023 में 25 प्रति 1000 जीवित जन्म) और वृद्धावस्था सहायता के लिये बच्चों पर निर्भरता कम करने वाली बेहतर स्वास्थ्य सेवा/बचत द्वारा समर्थित है।
भारत में कम प्रजनन दर के क्या प्रभाव हैं?
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सकारात्मक |
चिंताएँ/जोखिम |
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जनसांख्यिकीय लाभांश: जब आश्रितों की तुलना में कामकाजी आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की आबादी अधिक होती है, तो कार्यबल की भागीदारी बढ़ने, बचत तथा निवेश में वृद्धि होने, शिक्षा एवं मानव पूंजी में अधिक निवेश के कारण आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। |
वृद्ध होती आबादी: बुज़ुर्गों की आबादी में तेज़ वृद्धि (2050 तक लगभग 20% होने का अनुमान), जिससे वृद्धावस्था आश्रितता अनुपात बढ़ेगा और स्वास्थ्य सेवाओं, पेंशन तथा सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों पर दबाव पड़ेगा। |
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संसाधनों पर दबाव में कमी: कम जनसंख्या वृद्धि से भूमि, जल, भोजन, अवसंरचना और पर्यावरण पर दबाव घटता है, जिससे संसाधनों के क्षरण तथा जलवायु प्रभाव में कमी आती है। |
संकुचित होता कार्यबल: कम युवा आबादी के नौकरी बाज़ार में प्रवेश करने से भविष्य में श्रम की कमी हो सकती है, जिससे यदि उचित प्रबंधन न किया जाए तो GDP वृद्धि और नवाचार की गति धीमी पड़ सकती है। |
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“सिल्वर इकॉनमी” के विकास का अवसर: वृद्ध होती आबादी नए बाज़ार अवसर पैदा करती है। इससे स्वास्थ्य सेवाओं, सहायक आवास सुविधाओं, वरिष्ठ नागरिकों हेतु अवकाश यात्रा तथा सेवानिवृत्त लोगों के लिये अनुकूलित वित्तीय उत्पादों की मांग बढ़ेगी। |
समृद्ध होने से पहले वृद्धावस्था की चुनौती: भारत के पर्याप्त रूप से समृद्ध बनने से पहले ही उसकी आबादी तेज़ी से वृद्ध हो सकती है, जिससे बुज़ुर्गों की देखभाल की कमी, सामाजिक असमानताओं में वृद्धि और मज़बूत सामाजिक सुरक्षा तंत्र के अभाव में राजकोषीय बोझ बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। |
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स्वास्थ्य और प्रजनन परिणाम: कम प्रजनन दर का संबंध महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य संकेतकों में सुधार से होता है, जैसे– परिवार नियोजन तक बेहतर पहुँच, बार-बार गर्भधारण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों में कमी तथा बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के संदर्भ में समग्र कल्याण में वृद्धि। |
सैंडविच जनरेशन का बोझ: कार्यशील आयु वर्ग की आबादी (15-59 वर्ष) को दोहरा बोझ उठाना होगा, उन्हें अपने बच्चों की परवरिश करनी होगी (जिनकी शिक्षा अत्यधिक महंगी है) और साथ ही अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की देखभाल भी करनी होगी, इससे उन पर आर्थिक और मानसिक तनाव बढ़ सकता है। |
सतत जनसंख्या वृद्धि प्राप्त करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?
- मानव पूंजी में निवेश: प्रति परिवार कम बच्चों की स्थिति में प्रति व्यक्ति आर्थिक उत्पादकता बढ़ाना आवश्यक हो जाता है। इसके लिये राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 के माध्यम से बुनियादी शिक्षा संकट को दूर करना, युवाओं को भविष्य की नौकरियों (जैसे– AI और हरित ऊर्जा) के लिये कौशल प्रदान करना तथा मिशन इंद्रधनुष जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश करना आवश्यक है, ताकि एक स्वस्थ एवं उत्पादक कार्यबल सुनिश्चित किया जा सके।
- परिवार-समर्थक आर्थिक वातावरण: जन्म दर को अत्यधिक कम होने से रोकने के लिये सरकार को बच्चों के पालन-पोषण की लागत कम करनी होगी। इसके लिये बेहतर बाल देखभाल सुविधाएँ (आंगनवाड़ी 2.0), दोनों अभिभावकों हेतु सवेतन अभिभावकीय अवकाश और विशेष रूप से मध्यम वर्ग के लिये कर रियायतें प्रदान करना आवश्यक है।
- सिल्वर इकॉनमी के लिये तैयारी: जनसंख्या के वृद्ध होने के साथ भारत को उपयुक्त अवसंरचना विकसित करनी होगी। इसमें असंगठित क्षेत्र हेतु व्यापक पेंशन व्यवस्था, बुज़ुर्गों की देखभाल के लिये जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिये सुलभ एवं अनुकूल शहरी ढाँचे का विकास शामिल होना चाहिये, ताकि उनकी जीवन गुणवत्ता बेहतर हो सके।
- आंतरिक प्रवासन का प्रबंधन: प्रजनन दर में गिरावट सभी राज्यों में समान नहीं (जैसे– बिहार ~2.98 और केरल ~1.7) है। इसलिये सरकार को उच्च प्रजनन दर वाले राज्यों से कम प्रजनन दर वाले राज्यों की ओर आंतरिक श्रम गतिशीलता को प्रोत्साहित करना चाहिये, ताकि श्रम की कमी को पूरा किया जा सके तथा प्रवासियों के सुगम एकीकरण के लिये उपयुक्त नीतियाँ बनाई जा सकें।
निष्कर्ष
भारत का प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन दर की ओर संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय परिवर्तन को दर्शाता है, जो जनसांख्यिकीय लाभांश और सतत विकास के अवसर प्रदान करता है। हालाँकि जनसंख्या के वृद्ध होने, कार्यबल के संकुचन एवं क्षेत्रीय प्रजनन असमानताओं जैसी उभरती चुनौतियों से निपटने के लिये मानव पूंजी विकास, सामाजिक सुरक्षा के विस्तार व संतुलित जनसंख्या प्रबंधन पर केंद्रित सक्रिय नीतियों की आवश्यकता है।
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दृष्टि मेन्स प्रश्न: प्रश्न. “भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर से नीचे आ गई है, फिर भी यह एक अवसर और एक चुनौती दोनों प्रस्तुत करती है।” चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर क्या है?
प्रतिस्थापन स्तर की प्रजनन दर (प्रति महिला 2.1 बच्चे) वह प्रजनन दर है जिस पर कोई जनसंख्या बिना प्रवासन के एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक स्वयं को ठीक-ठीक प्रतिस्थापित कर लेती है।
2. भारत की वर्तमान कुल प्रजनन दर (TFR) क्या है?
NFHS-5 (2019–21) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 तक गिर गई है और हालिया अनुमानों (2023–25) के अनुसार यह लगभग 1.9 बच्चे प्रति महिला है, जो प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन दर को दर्शाता है।
3. जनसांख्यिकीय लाभांश क्या है?
यह उस आर्थिक विकास की क्षमता को दर्शाता है जो तब उत्पन्न होती है जब कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की आबादी आश्रितों की तुलना में अधिक होती है, जिससे उत्पादकता, बचत और निवेश बढ़ाने में मदद मिलती है।
4. महिला शिक्षा प्रजनन दर कम करने के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
उच्च महिला शिक्षा से विवाह में देरी होती है, कार्यबल में भागीदारी बढ़ती है, प्रजनन संबंधी निर्णयों में स्वतंत्रता आती है और छोटे परिवार की प्राथमिकता विकसित होती है।
5. ‘सिल्वर इकॉनमी’ क्या है?
सिल्वर इकॉनमी उस आर्थिक अवसर को दर्शाती है जो वृद्ध होती आबादी से उत्पन्न होता है, जिसमें जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाएँ, सेवानिवृत्ति सेवाएँ, सहायक आवास सुविधाएँ और वरिष्ठ नागरिकों के लिये वित्तीय उत्पाद जैसे क्षेत्रों को शामिल किया जाता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQs)
प्रिलिम्स
प्रश्न. आर्थिक विकास से जुड़े जनांकिकीय संक्रमण के निम्नलिखित विशिष्ट चरणों पर विचार कीजिये: (2012)
- निम्न जन्म दर के साथ निम्न मृत्यु दर
- उच्च जन्म दर के साथ उच्च मृत्यु दर
- निम्न मृत्यु दर के साथ उच्च जन्म दर
नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर उपर्युक्त चरणों का सही क्रम चुनिये:
(a) 1, 2, 3
(b) 2, 1, 3
(c) 2, 3, 1
(d) 3, 2, 1
उत्तर: (c)
प्रश्न. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (IGNOAPS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2008)
- ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों के 60 वर्ष अथवा उससे अधिक आयु के सभी नागरिक इस योजना के पात्र हैं।
- इस योजना के तहत केंद्रीय सहायता प्रति लाभार्थी 300 प्रति माह की दर से है। योजना के तहत राज्यों से समतुल्य राशि देने का आग्रह किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1 और न ही 2
उत्तर: (d)
मेन्स
प्रश्न. 'जनसांख्यिकीय शीत' (डेमोग्राफिक विंटर) की अवधारणा क्या है? क्या यह दुनिया ऐसी स्थिति की ओर अग्रसर है? विस्तार से बताइये। (2024)
प्रश्न. जनसंख्या शिक्षा के प्रमुख उद्देश्यों की विवेचना करते हुए भारत में इन्हें प्राप्त करने के उपायों पर विस्तृत प्रकाश डालिये। (2021)
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